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Saturday, 21 June 2014

Justice anywhere in the justice of poku temple

उत्तरांखड और हिमाचल की सीमा पर उत्तरकाशी जिले के जौनसार-बावर इलाके के नैटवाड़ में न्याय प्रिय माने जाने वाले पोखू देवता के दरबार में दर्जनों लोग रोजाना अपनी फरियाद लेकर आते हैं।

मान्यता है कि पोखू देवता किसी को भी निराश नहीं करते। इस मंदिर में पूजा-पाठ की विधि भी अनूठी है। हिमालय पर्वत से निकली रुपीण और सुपीण नदी के संगम पर स्थित नैटवाड़ के पोखू मंदिर में पूरे साल यह क्रम चलता है।

किंवदंती है कि पोखू देवता के दरबार आए पीड़ित लोगों को हाथों-हाथ न्याय मिलता है। न्याय की आस में पोखू दरबार आए लोगों को मंदिर के कुछ नियम-कायदों का पालन करना होता है।

यहां भक्त खासकर, जमीन-जायजाद के विवाद के साथ अपनी तमाम समस्याएं लेकर आते हैं। लेकिन, उत्तराखंड में एक मात्र ऐसा मंदिर है, जहां सामाजिक प्रताड़ना और मुसीबतें झेलने के बाद निराश लोग हाथों-हाथ न्याय मिलने की उम्मीद में आते हैं।

पोखू हैं कुल देवता

सिंगतूर पट्टी के नैटवाड़, दड़गाण, कलाब, सुचियाण, पैंसर, पोखरी, पासा, खड़ियासीनी, लोदराला व कामड़ा समेत दर्जनभर गांव के लोग पोखू को अपना कुल आराध्य देव मानते हैं।

पौराणिक मान्यता

इस क्षेत्र के लोगों का जीवन पूरी तरह खेती बाड़ी पर निर्भर हैं। इसी वजह से यहां जमीन जायजाद के झगड़े ज्यादा होते हैं। सिविल मामलों की सुनवाई में ज्यादा लंबा वक्त लगने की वजह से लोगों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता था, इसी को देखते हुए लोग कोर्ट कचहरी की बजाय पोखू देवता के मंदिर में अपनी फरियाद लेकर जाने लगे। सदियों से यही परंपरा आगे बढ़ रही है।

इस परंपरा के पीछे सामाजिक मनोविज्ञान भी है। समाजशास्त्रियों का मत है कि पोखू देवता के त्वरित न्याय की मान्यता के चलते दूसरों की जमीन जायजाद हड़पने या चेष्टा करने वालों पर सामाजिक दबाव भी बनता है।

पूजा की अनूठी विधि

पोखू देवता मंदिर में पूजा-पाठ की विधि अनूठी है। मंदिर के पुजारी पोखू देवता की मूर्ति की तरफ मुख करने के बजाय पीठ घुमाकर पूजा करते हैं।

यहां प्रतिदिन सुबह-सायं दो बार पूजा होती है। पूजा से पहले पुजारी रुपीण नदी में स्नान करके सुराई-गढ़वे में पानी लाना होता है। इसके बाद आधे घंटे तक ढ़ोल के साथ मंदिर में पूजा होती है।

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