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Monday, 23 June 2014

Vrat tyohar decided to increase your virtue

योगिनी एकादशी का व्रत रखने से संसार के पुण्य दोगुने हो जाते हैं। यानी अगर आपने सारे वर्ष में दस पुण्य कार्य किए हैं तो योगिनी एकादशी व्रत रखने से इनका फल बीस के बराबर हो जाता है।

हिंदू धर्म में एकादशी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष में आता है। जिसे योगिनी एकादशी कहते हैं। आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है।

ऐसे करें व्रत

इस बार 23 जून सोमवार को योगिनी एकादशी का व्रत है। इसलिए रात्रि से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन यथा संभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें, संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।साफ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर संकल्प लें।

मंत्र उच्चारण

मम सकल पापक्षयपूर्वक कुष्ठादिरोग निवृत्तिकामनया योगिन्येकादशीव्रतमहं करिष्ये।

इसके बाद भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़के और उस चरणामृत को पिए। माना जाता है कि इससे विशेष रूप से कुष्ठ रोगी की पीड़ा खत्म होती है और वह रोगमुक्त हो जाता है।

व्रत का महत्व

योगिनी व्रत की कथा श्रवण का फल अट्ठासी सहस्त्र ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान माना गया है. इस व्रत से समस्त पाप दूर होते है। भगवान नारायण की मूर्ति को स्नान कराकर पुष्प, धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए तथा भोग लगाना चाहिए। इस दिन गरीब लोगों को दान देना चाहिए।

व्रत की कथा

कहते हैं कि स्वर्गधाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह शिव भक्त था और प्रतिदिन शिव की पूजा किया करता था।

हेम नाम का एक माली पूजन के लिए उसके यहाँ फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य-विनोद तथा रमण करने लगा।

राजा उसकी दोपहर तक राह देखता रहा। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के न आने का कारण पता करो, क्योंकि वह अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया।

सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी अतिकामी है, अपनी स्त्री के साथ विनोद और रमण कर रहा होगा। यह सुनकर कुबेर ने क्रोधित होकर उसे बुलाया।

हेम माली राजा के भय से कांपता हुआ ‍आया। राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा- तुमने मेरे परम पूजनीय ईश्वरों के ईश्वर श्री शिवजी महाराज का अनादर किया है, इस‍लिए मैं तुझे शाप देता हूं कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होगा।

कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गया। भूतल पर आते ही उसके शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया। उसकी स्त्री भी उसी समय अंतर्ध्यान हो गई। मृत्युलोक में आकर माली ने महान दु:ख भोगे, भयानक जंगल में जाकर बिना अन्न और जल के भटकता रहा।

रात को नींद भी नहीं आती थी, परंतु शिवजी की पूजा के प्रभाव से उसको पिछले जन्म की स्मृति का ज्ञान अवश्य रहा। घूमते-घ़ूमते एक दिन वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुंच गया, जो ब्रह्मा से भी अधिक वृद्ध थे और जिनका आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान लगता था। हेम माली वहां जाकर उनके पैरों में पड़ गया।

उसे देखकर मारर्कंडेय ऋषि बोले तुमने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके प्रभाव से यह हालत हो गई। हेम माली ने सारा वृत्तांत कह ‍सुनाया। यह सुनकर ऋषि बोले- निश्चित ही तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए तेरे उद्धार के लिए मैं एक व्रत बताता हूँ। यदि तूम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सब पाप नष्ट हो जाएंगे।

यह सुनकर हेम माली ने अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने उसे स्नेह के साथ उठाया। हेम माली ने मुनि के कथनानुसार विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से अपने पुराने स्वरूप में आकर वह अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

भगवान कृष्ण ने कहा- हे राजन! यह योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है। इसके व्रत से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अंत में स्वर्ग प्राप्त होता है।

Thursday, 12 June 2014

How did stress

आधुनिक जीवन में हम भौतिक तरक्की और आराम को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। सुविधाओं के इस समय में भौतिक वस्तुएं अधिक प्रकाशमान हो गई हैं या कहें कि उनकी महत्ता अधिक हो गई है। हालांकि यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि यह तरक्की और आराम बहुत सारे तनाव और खिंचाव के साथ आता है और इसी वजह हम उसका वैसा उपभोग नहीं कर पाते हैं।

तनाव और खिंचाव हमारे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद है और हम उसे अनुभव भी करते हैं। व्यवसाय में प्रतिस्पर्धा है, परिवार और सामाजिक संबंधों में तनाव है और अंतत: हम अपने भीतर इस तनाव को चिंता, डर और हताशा के रूप में महसूस करने लगते हैं।

निश्चित मात्रा में तनाव बहुत सामान्य है। इसे हम ऑब्जेक्टिव स्ट्रेस कह सकते हैं। यह तनाव चुनौतीपूर्ण स्थितियों में होता है। जैसे कि बहुत ही थोड़े समय में आपको बहुत सारा काम पूरा करना है। यद्यपि हम कार्यकुशल हो सकते हैं, कार्य के कारण हमारा शेड्यूल अति व्यस्त है तो हम तनाव महसूस करते ही हैं।

इस तरह की स्थितियों में हमें शांत रहने की जरूरत है। हमें तय समय में काम को अच्छे से पूरा करने के रास्ते तलाशना ही होते हैं। इसे समय प्रबंधन भी कहा जाता है। अगर मुझे बहुत थोड़े समय में दस पत्र लिखना होंगे तो मैं हर पत्र में कुछ ही लाइनें लिख पाऊंगा।

ऑब्जेक्टिव स्ट्रेस से मुक्ति का एक तरीका है खुद को अधिक अनुशासित और व्यवस्थित करना। सुबह जल्दी उठने का अनुशासन हमारे जीवन को सहज बनाने में मदद करता है। अक्सर काम में जब हम जल्दी में होते हैं, हम हड़बड़ी में चीजें करने लगते हैं और ऐसे में ही अक्सर गलतियां कर बैठते हैं लेकिन योजना और अनुशासन के साथ हम तनाव से मुक्ति की स्थिति बना सकते हैं और उसमें ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।

अगर हम सब्जेक्टिव स्ट्रेस की बात करें तो इस दुनिया में केवल स्थितियां होती हैं और तनाव और दबाव जैसा कुछ नहीं होता। जो तनाव हम महसूस करते हैं वह बाह्य परिस्थितियों के कारण नहीं होता बल्कि उस स्थिति में हम कैसा बर्ताव करते हैं उस कारण होता है। इस तरह का तनाव हमारी आंतरिक बनावट के कारण होता है।

बाह्य स्थिति नहीं हमारी आंतरिक बनावट या संरचना ही हमारे लिए समस्या बन जाती है?

चिंता और व्यग्रता इससे पैदा होती है कि हम किसी खास परिस्थिति का कुशलता के साथ मुकाबला नहीं कर पाते हैं। यह तनाव का एक प्रकार होता है जो हम अमूमन महसूस करते हैं और हम इससे मुक्ति के लिए कई तरह से प्रयास करते हैं। जैसे कि जब हमारी तैयारी नहीं होती है तो हम चिंतित हो जाते हैं और तनाव में आ जाते हैं लेकिन अगर किसी विद्यार्थी ने अच्छे से पढ़ाई की है तो परीक्षा उसके लिए चिंता की बात नहीं है।

अगर कोई विद्यार्थी अच्छी तैयारी के बावजूद परीक्षा कक्ष में भी चिंता में है तो उसका अर्थ है कि उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या उसके माता-पिता की उससे अपेक्षा बहुत ज्यादा है। इसलिए अपेक्षा, महत्वाकांक्षा, इच्छा एक प्रेरक या आगे ले जाने वाली शक्ति के बजाय हमें सफलता से दूर ले जानी वाली चीजें साबित होती हैं। अपेक्षा की वजह से ही तनाव पैदा होता है।

इच्छा और महत्वाकांक्षा हमें कार्य के लिए प्रेरित करती हैं लेकिन अगर वे बड़ी हों तो वे हमारे माथे पर पसीना ला देती हैं वे फिर प्रेरक नहीं रह जातीं। फिर वे हम पर हावी होने लगती हैं। व्यावसायिक असुरक्षा, भावनात्मक असुरक्षा, तनावपूर्ण संबंध या किसी भी तरह की असुरक्षा तनाव पैदा करती है।

हर समय एक भय लगा रहता है। इस दुनिया के बारे में एक ही बात निश्चित है कि यहां सबकुछ अनिश्चित है। इस तथ्य को स्वीकार करना कि कुछ भी निश्चित नहीं है, हमें बड़ी राहत मिलती है। हम इसी तरह सहज हो सकते हैं कि इस दुनिया में सबकुछ बदलता रहता है और हमें अपनी तरह से प्रयास करने के बाद शांत रहना चाहिए।

सब्जेक्टिव स्ट्रेस से मुक्ति का तरीका यह है कि हमें आस्था रखना चाहिए। चाहे इसे आस्था कहिए या भरोसा या विश्वास। यह उसी तरह है कि जब हम प्लेन में सफर करते हैं तो हम आराम से सोते हैं और पायलट के भरोसे सबकुछ छोड़ देते हैं। उसकी कुशलता पर निर्भर रहते हैं और बहुत चिंतित नहीं होते।

इसी तरह हमें अपने जीवन में भी निश्चिंत होना चाहिए। इसी तरह हमें दुनिया को चलाने वाली शक्तियों पर आस्था रखना चाहिए। मन में अगर शांति रहेगी तो हम ज्यादा बेहतर काम कर पाएंगे।