Showing posts with label Spiritual News in Hindi. Show all posts
Showing posts with label Spiritual News in Hindi. Show all posts

Tuesday, 15 July 2014

Ravana had abducted also rama mother kausalya

त्रेतायुग में कोशल देश में कोशल नाम का एक राजा था। उसकी विवाह योग्य पुत्री थी, नाम था कौशल्या। राजा कोशल ने अपनी पुत्री का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से करने का निर्णय लिया,और राजा दशरथ को विवाह का प्रस्ताव सुनाने के लिए आमंत्रित किया, जिस समय दूत राजा के पास पहुंचा वह जलक्रीड़ा कर रहे थे।

लगभग उसी समय लंकापति रावण ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी के सामने आदरपूर्वक पूछ रहा था कि मेरी मृत्यु किसी हाथों होगी। रावण की बात सुनकर ब्रह्माजी ने कहा कि दशरथ की पत्नी कौशल्या से साक्षात् भगवान विष्णु जी का जन्म होगा। वही तुम्हारा विनाश करेंगे।

ब्रह्माजी की बात सुनकर रावण अपनी सेना के साथ अयोध्या की ओर निकल पड़ा वहां पहुंचकर उसने युद्ध किया और राजा दशरथ को पराजित कर दिया। लड़ाई सरयु के निकट हो रही थी और राजा नौका में थे। रावण ने नौका को तहस-नहस कर दिया, तब राजा दशरथ और उनके मंत्री सुमंत नदी में बहते हुए समुद्र में जा पहुंचे।

उधर रावण अयोध्या से चलकर कोशल नगरी में जा पहुंचा। वहां भयानक युद्ध करके उसने राजा कोशल को भी जीत लिया। इसके बाद कौशल्या का हरण करके खुश होते हुए आकाशमार्ग से लंका की ओर चल पड़ा। रास्ते में समुद्र में रहने वाली तिमंगिल मछली को देखकर रावण ने सोचा कि सभी देवता मेरे शत्रु हैं, कहीं रूप बदलकर वे ही कौशल्या को लंका से न ले जाएं।

इसलिए कौशल्या को इस तिमिंगिल मछली को ही क्यों न सौंप दूं। ऐसा सोचकर उसने कौशल्या को एक संदूक में बंद करके मछली को सौंप दिया, और वह लंका चला गया। मछली संदूक लेकर समुद्र में घूमने लगी। अचानका एक और मछली के आने से वह उसके साथ युद्ध करने लगी और संदूक को समुद्र में छोड़ा दिया।

उसी समय राजा भी अपने मंत्री के साथ बहते हुए समुद्र में पहुंचे। वहां उनकी दृष्टि पेटिका पर पडी़। कौशल्या ने अपनी आपबीती सुनाई। राजा भी कौशल्या को देखकर आश्चर्यचकित हो गए।

आपस में संवाद करने के बाद वह तीनों पुनः संदूक में बैठ गए। वह इसलिए क्यों कि ज्यादा समय तक समुद्र के अंदर रहना ठीक नहीं था। मछली जब आई तो उसने संदूक को मुंह में रख लिया।

तब अहंकारी रावण ने कहा ब्रह्माजी से कहा कि मैनें दशरथ को जल में और कौशल्या को संदूक में छिपा दिया है। तब ब्रह्माजी आकाशवाणी से बोले कि उन दोनों का विवाह हो चुका है। रावण बहुत क्रोधित हुआ। तब ब्रह्माजी ने कहा कि होनी होकर ही रहती है।

जब राजा दशरथ अयोध्या पहुंचे तो उनका विवाह विधि-विधान से कोशल्या के साथ हो गया।

Monday, 14 July 2014

Find something like this in mind the mind

ध्यान में एकाग्रता नहीं है तो उसका कारण है कि ध्यान के प्रति आपकी प्यास में कुछ कमी है। प्रेम जैसी लगन ध्यान में भी होना चाहिए केवल तभी आप आध्यात्मिक उत्कर्ष की राह पर बढ़ पाएंगे। जब तक आप ध्यान के लिए प्रयास नहीं करते तब तक उसमें मन नहीं लगेगा।

आध्यात्मिक राह पर आगे

बढ़ने वाले के मन में कुछ जिज्ञासाएं उठती ही हैं। जैसे मन में यह शिकायत रहती है कि बहुत समय, ऊर्जा और संसाधन खर्च करने के बावजूद मन अभी भी भटकता है और हमेशा की तरह ही अनुशासनहीन बना हुआ है। जान लीजिए कि यह इसी वजह से हो रहा है क्योंकि आपके भीतर कहीं गहरे में सांसारिक चीजों के प्रति अधिक आकर्षण मौजूद है।

अभी भी आध्यात्मिक उत्कर्ष की प्यास उस तरह नहीं जगी है जैसे जगना चाहिए। अभी भी इस दुनिया में जो कुछ भी तथाकथित आकर्षण और चमक है- जैसे धन, सत्ता, रुतबा, तरक्की, संबंध और अन्य सभी चीजें वे ही जीवन के सबसे बड़े लक्ष्य नजर आते हैं।

ये ही चीजें हैं जिनके लिए आदमी मेहनत करता है, जिनके पीछे भागता है और जिन्हें हर कीमत पर पाना चाहता है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि दिमाग इन्हीं चीजों को पाने, इनसे जुड़े व्यक्तियों और पक्षों के बारे में विचार करे। इसका आशय यही है कि किसी भी व्यक्ति ने अपने जीवन की प्राथमिकताएं तय कर रखी हैं और दिमाग उन्हीं चीजों को पाने के पीछे दौड़ता है।

अब जब ध्यान आपकी प्राथमिकता में ही नहीं है तो इसे आप दूसरे दर्जे पर रखेंगे और आपके लक्ष्य ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आएंगे। इन्हीं स्थितियों में एक व्यक्ति शिकायत करता है, 'मैं क्यों ध्यान के लिए नहीं बैठ पा रहा हूं?" - यह इसी कारण है कि आपने उसे प्राथमिकता में नहीं रखा।

एक उदाहरण के साथ इस बात को समझते हैं। एक पुरुष किसी महिला से प्रेम करने लगता है। वह ऐसी स्थितियां बनाता है या ऐसे उपाय करता है जिससे कि वह अपनी प्रेमिका से मिल सके। सोचकर बताइए कि उसे ऐसे उपाय कौन सुझाता है? यह चाह ही होती है जो उसके मन को उस ओर ले जाती है।

तब जीवन में काम भी है, परिवार भी है और अन्य संबंध भी हैं लेकिन उसका ध्यान प्रेमिका की ओर रहता ही है। वह उसे रिझाने के लिए हरसंभव प्रयास करता है। जब तक ध्यान के लिए ऐसी लगन नहीं हो तब तक ध्यान लगता नहीं। संस्कारों के कारण, दूसरों के विचारों के प्रभाव से, अज्ञात के भय से कोई व्यक्ति अध्यात्म के पथ पर चलने, ध्यान करने का निर्णय तो ले लेता है लेकिन यह सब वह बिना किसी चाह के करता है। तात्पर्य यही है कि जब आपमें उसके प्रति ललक नहीं है तो आप ध्यान कैसे कर पाएंगे।

जिस तरह दुनिया के अन्य आकर्षणों की तरफ ध्यान देना पड़ता है उसी तरह क्या ध्यान के प्रति भी उत्सुकता नहीं होना चाहिए? अगर कोई व्यक्ति प्रेम संबंधों में समय और ऊष्मा का निवेश नहीं करेगा तो क्या वे चलेंगे? शायद बिलकुल नहीं। अगर आप गिफ्ट, फूल, डिनर, चॉकलेट और समय नहीं देंगे तो संबंध ज्यादा चलेगा नहीं। जब संबंधों के लिए इतना करना पड़ता है तो आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए इससे सौ गुना प्रयास करना होते हैं।

इसे एक और उदाहरण के साथ समझा जा सकता है। अगर आप अपने बॉस की बात नहीं सुनते हैं या अपना प्रोजेक्ट समय पर शुरू नहीं करते हैं तो आपका बॉस आपसे नाराज हो सकता है और आपकी नौकरी जा भी सकती है। इसलिए बॉस आपकी प्राथमिकता है। इसी तरह जिस दिन गुरु के कहे शब्द आपकी प्राथमिकता बन जाएंगे तो आप ध्यान की ओर उन्मुख हो सकेंगे।

आध्यात्मिक राह को सम्मान और श्रद्धा देना जरूरी है तभी आप अपना समय उस पर खर्च करेंगे। भले ही आपकी व्यस्त दिनचर्या में आधा घंटा ही ऐसा हो लेकिन जब इतना समय भी होगा तो आप उसके हर सेकंड को अनुभूत कर पाएंगे। आप किसी और को उस समय में व्यवधान पैदा नहीं करने देंगे।

यह समय आपके लिए होगा और आपके उत्कर्ष के लिए। यह आपकी शांति के लिए होगा और आपकी चिंता से मुक्ति के लिए। इसी समय की तलाश में हम सभी रहते हैं।

Should be willing to lear

महादेव गोविंद रानाडे जब मुंबई हाईकोर्ट के जज थे। उन्हें नई-नई भाषाएं सीखने का शौक था। जब उन्हें पता चला कि उनका बारबर दोस्त बहुत अच्छी बांग्ला जानता था। तो उन्होंने उसे गुरु बना दिया। जितनी देर बारबर उनकी हजामत करता वे उससे बांग्ला सीखते।

यह देखकर उनकी पत्नी बोलीं औरों को पता चलेगा कि कि हाईकोर्ट के जज साहब साधारण आदमी से भाषा सीख रहे हैं। तो कितनी जग हंसाई होगी। यदि बांग्ला सीखना ही है तो किसी अच्छे से विद्वान की मदद ले सकते हैं।

रानाडे ने यह सुनकर पत्नी को समझाया कि, ज्ञान तो किसी से भी लिया जा सकता है। चाहे वह साधारण आदमी ही क्यों न हो। मुझसे इस बत से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं एक साधारण आदमी से भाषा सीख रहा हूं। ज्ञान की चाह ऱखने वाले साधारण और असाधारण में फर्क नहीं करते। वे तो किसी से शिक्षित होकर अपने ज्ञान की प्यास बुझाते हैं।

संक्षेप में

ज्ञान जहां से भी मिले ले लेना चाहिए। जरूरी नहीं ज्ञान के लिए विद्वान की तलाश की जाए। क्यों कि ज्ञान किसी के पास भी हो सकता है। एक साधारण आदमी के पास भी।

When king dasaratha had cast an evil eye on the state of shani

एक बार देवर्षि नारद राजा दशरथ के यहां अयोध्या गए। राजा ने खूब आदर सत्कार किया। मुनि ने राजा को आशीर्वाद दिया। राजा ने मुनिश्री के आने का कारण पूछा। तब मुनि बोले राजन् आपको प्रजा कि चिंता नहीं बस स्त्रियों में मग्न रहते हैं। प्रजा परेशान है।

रोहिणी पर शनि की दृष्टि पहले ही थी, अब उसकी संपूर्ण दृष्टि उस पर छा गई है, यही कारण है कि वर्षा नहीं हो रही है। आप स्वयं अपने राज्य को देखें, लोगों की परेशानियों को सुनें।

इतना कहकर देवर्षि नारदजी चले गए। इसके बाद राजा दशरथ अपने रथ पर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर चले। वह वन में पहुंचे। जहां एक तोता अपनी पत्नी से कह रहा था कि मेरा वचन सुना प्रिये, हम इस वन को छोड़ दूसरे वन में चलते हैं।

तब तोते की पत्नी ने कहा सुनो, मैं इस वन को छोड़कर जाने का कारण बताता हूं। सूर्यवंश में अनेक महान राजा हो चुके हैं। उनके राज्य में कभी कोई जीव दुखी नहीं हुआ है। इतने दिनों बाद अब यहां अंधकार उतर आया है। यहां के राजा को अपनी प्रजा के बारे में कोई भी फ्रिक नही हैं। अतः चलो कहीं और चलते हैं क्योंकि यहां अब पांच वर्षों तक वर्षा नहीं होगी।

इतना कहकर तोते ने जैसे ही नीचे देखा तो वहां राजा दशरथ बैठे थे। तब राजा बोले डरो मत यहीं रहो ऐसा कुछ नहीं होगा। यह कहकर राजा दशरथ अमरावती के लिए निकल पड़े और इंद्र भवन में जा पहुंचे। उन्होंने क्रोधित होकर इंद्र से कहा उठो इंद्र मैं तुमसे युद्ध करने आया हूं। देवताओं ने कहा कि इंद्र आपसे युद्ध नहीं करेंगे। तब राजा दशरथ बोले कि इंद्र अधीन है वो मेरे राज्य में वर्षा क्यों नहीं करते।

तब इंद्र ने कहा कि हे राजन् ध्यान से सुनो रोहिणी पर शनि की पूर्ण दृष्टि है। इस कारण से मैं बारिश नहीं कर सकता। अगर शनिदेव मान जाएं तो बारिश हो सकती है। तब राजा दशरथ शनिदेव के पास गए। राजा को आया देख शनि ने उन्हें गुस्से से देखा। जिससे उनके रथ टूटकर गिर पड़ा और वह घोड़े सहित नीचे आ गए। उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं था। गरुड़ के पुत्र जटायु ने राजा को आसामान से गिरते देख लिया था। तो उन्होंने राजा को पंख फैलाकर राजा को बचा लिया।

लेकिन राजा दशरथ फिर से शनिदेव के पास गए। राजा को जिंदा देख शनिदेव सोचने लगे जरूर यह कोई पुण्यआत्मा हैं। इससे वह काफी प्रसन्न हो गए और राजा दशरथ को शनि ने अपनी पूर्वकथा सुनाई।

इसके बाद उन्होंने राजा से वर मांगने को कहा तो राजा दशरथ ने वर मांगा कि आप रोहिणी पर से अपनी दृष्टि हटा लो ताकि मेरे राज्य में बारिश हो सके। शनिदेव ने ऐसा ही किया। कहते हैं अयोध्या में उस वर्ष काफी

Rushed to the worship of shiva raj

उज्जैन। सावन के पहले सोमवार को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सपरिवार उज्जैन के महाकाल मंदिर पहुंचे। उन्होंने वहां पूजा अर्चना की। यह मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है।

पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। ऐसी मान्यता है कि स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। साव न के महीने में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।

यह मंदिर उज्जैन में स्थित है उज्जैनभारत के मध्य प्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है जो क्षिप्रा नदी के किनारे बसा है। यह एक अत्यन्त प्राचीन शहर है। यह विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी थी।

इसे कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हर १२ वर्ष पर सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल इस नगरी में स्थित है । उज्जैन मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इन्दौर से 55 कि मी पर है। उज्जैन के प्राचिन नाम अवन्तिका, उज्जयनी, कनकश्रन्गा आदि है।

वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण राणोजी सिंधिया के काल में मालवा के सूबेदार रामचंद्र बाबा शेणवी द्वारा कराया गया था। वर्तमान में भी जीर्णोध्दार एवं सुविधा विस्तार का कार्य होता रहा है। महाकालेश्वर की प्रतिमा दक्षिणमुखी है। तांत्रिक परम्परा में प्रसिध्द दक्षिण मुखी पूजा का महत्व बारह ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर को ही प्राप्त है।

भगवान महाकाल का मंत्र

ऊँ महाकाल महाकाय, महाकाल जगत्पते।

महाकाल महायोगिन्‌ महाकाल नमोऽस्तुते॥

Teach children how to cope with difficulties

बच्चों का सहारा बनना अच्छी बात है लेकिन उन्हें अपने भरोसे मुश्किलों का सामना करना सिखाया जाना चाहिए। तभी वे कठिनाइयों से निकलने में कामयाब रहेंगे।

स्वीकार भाव जगाइए

बच्चों को मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना सिखाने का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है कि जब भी आप इस तरह की स्थितियों का सामना कर रहे हों तो बच्चों को अपने साथ रखें। उन्हें बताइए कि वे किन चीजों को नियंत्रित कर सकते हैं और किन्हें नहीं।

बच्चे माता-पिता से ही सीखते हैं कि मुश्किल परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए। उन्हें स्थितियों को समझने और उनसे निपटने की कला सिखाइए। अपने बच्चे को बताइए कि संघर्ष के बाद मिली विजय किस तरह महत्वपूर्ण होती है। उन्हें यह सिखाना जरूरी है कि सबसे कठिन क्षणों में आप चीजें बहुत तेजी से किस तरह सीखते जाते हैं। अगर आपने उन्हें मुश्किल परिस्थितियों से जूझना सिखा दिया तो वे विजेता साबित होंगे।

मुश्किलों की पूरी तैयारी

जब हम बच्चों को कठिन दिनों का सामना करना सिखाते हैं तो हम उन्हें यह भी सिखाते हैं कि वे अपनी तैयारी कैसे करें। इसका एक तरीका तो यह हो सकता है कि आप उन्हें अपने जीवन की घटनाएं बताएं और यह भी बताएं कि किस तरह उन घटनाओं ने आपको बेहतर सबक सीखने में मदद की। जब भी बच्चे किसी बात को लेकर परेशान हों तो उन्हें बताएं कि किस तरह एक योद्धा मुश्किलों को परास्त कर सकता है। उनमें उत्साह और विश्वास जगाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

टालने की आदत से बचना

चुनौतीपूर्ण स्थितियों से बच निकलना मानव स्वभाव होता है। हम सभी कठिन स्थितियों से बचने का प्रयास करते हैं। हालांकि अपने जीवन की उन चुनौतियों के बारे में सोचें जो आपने झेलीं और जिनसे आप मजबूत होकर निकले। इन स्थितियों ने आपको अधिक धैर्यवान, सहनशील, लचीला, साहसी, समझदार और करुणावान बनाया। अगर आप अपने बच्चों में इन गुणों का विकास करना चाहते हैं तो उन्हें मुश्किल स्थितियों से रूबरू करवाना चाहिए।

बच्चों की मदद के लिए मौजूद रहिए लेकिन उसे खुद चीजें करने का विश्वास भी दिलाइए। अगर आप अभी तक हर कदम पर बच्चों की मदद करते रहे हैं तो एकदम उन्हें अकेला छोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें चुनौतियों का सामना करना सिखाना चाहिए। ताकि वे निराश नहीं हों और चीजों का सामना करने का आत्मविश्वास जगा पाएं।

Keep love the idea of engagement between

व्यस्तता के बीच भी जरूरतों और सीमाओं को पहचानकर खुशियों के लिए कदम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रतिस्पर्धात्मक समय है। लोगों की जिंदगी पहले से ज्यादा व्यस्त हो गई है। दफ्तर में हर महीने बढ़ती जिम्मेदारी, परिवार के प्रति बढ़ता दायित्व और मित्रों के साथ जुड़े रहने की कोशिशें हर चीज हमसे ज्यादा समय की मांग करती है। हमारी व्यस्तता खत्म नहीं होती क्योंकि जिंदगी में लगातार नई जिम्मेदारियां जुड़ती जाती हैं।

जीवन में आगे बढ़ते हुए मिलने वाली जरूरी फुर्सत कम होती जाती है लेकिन काम के ज्यादा दबाव के बीच भी हमें अपनी प्रसन्नाता और खुशियों के लिए प्रयास करना छोड़ना नहीं चाहिए वरना जीवन से ऊब पैदा होने लगती है और जीवन निराशाजनक लगने लगता है। काम को टाला नहीं जा सकता लेकिन उसके साथ जीवन में प्रसन्नाता की तलाश करना बहुत जरूरी है। यह ठीक वैसे ही है कि एक नट रस्सी पर चलते हुए संतुलन साधता है लेकिन उसके चेहरे पर सहजता और मुस्कान बनी रहती है। संतुलन के साथ व्यस्तता के बीच भी खुश रहा जा सकता है।

अपनी जरूरतों को पहचानें आप संतुलित और प्रसन्ना रहना चाहते हैं तो अपनी जरूरतों को पहचानें। सुनिश्चित करें कि आपकी जरूरी आवश्यकताएं समय पर पूरी हों। अति व्यस्त रहने के बावजूद यह महत्वपूर्ण है कि आप पर्याप्त नींद लें और आपका खानपान भी संतुलित रहे। काम का दबाव इतना नहीं हो कि आप दैनिक जरूरतों को पूरा करने का समय भी न पाएं। ऐसी स्थिति है तो उसकी तरफ तुरंत ध्यान देना चाहिए। अगर आप खाने, पहनने और जीने के अंदाज पर गौर करने का समय भी नहीं पा रहे हैं तो आपको इन चीजों के लिए समय निकालना ही चाहिए।

पूर्व योजना के साथ आगे बढ़ें

व्यक्तिगत जीवन में आपको समय तभी मिलेगा जब आप अपने काम को नियत समय में पूरा कर पाएंगे। तभी सहजता और शांति आएगी। इसके लिए पूर्व योजना सबसे अहम है।

अपने कामों के लिए पूर्व योजना बनाने पर आप बिना किसी चूक के साथ उन्हें पूरा कर पाएंगे। एक उपाय यह हो सकता है कि आप अपने कामों की सूची बनाएं ताकि उन्हें याद रख सकें। हालांकि व्यस्त रहने पर सभी चीजें कर पाना तो संभव नहीं होगा लेकिन अगर आपको अपने कामों के बारे में पता है तो उन्हें लेकर आपको चिंता नहीं होगी। भले ही आप उनमें से कुछ ही काम पूरे कर पाएं लेकिन आप कामों के बीच प्राथमिकता भी तय कर पाएंगे।

दबाव में बिखरे नहीं

अत्यधिक व्यस्तता में यह भी होता है कि आप हताशा और गुस्से को परिजनों और मित्रों पर व्यक्त करने लगते हैं। अगर आपके साथ ऐसा कुछ हो रहा है जबकि आप काम से घर पहुंचने पर बहुत ज्यादा थकान और चिड़चिड़ापन महसूस कर रहे हैं तो काम के दौरान हर थोड़ी देर में खुद को सहज करना जरूरी है। काम को अपने ऊपर इतना हावी न होने दें कि आपकी भावनाएं बुरी तरह प्रभावित हों।

किसी भी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में लगे होने के बावजूद छोटे-छोटे ब्रेक लें, खुद को समय दें और तनाव को निकल जाने दें। पूरे दिन काम के बारे में ही सोचते रहने पर मानसिक थकान ज्यादा हो जाती है। अपने दिन में सहजता के लिए एक से ज्यादा चीजों को शामिल करें।

अपने लिए समय निकालें

आप कितने ही व्यस्त क्यों न हों लेकिन अपनी रुचियों के लिए समय निकालना आपको हताशा में नहीं घिरने देगा। सप्ताह में एक दिन की छुट्टी जरूर लें। रोज काम के अलावा अपनी रुचियों के लिए कुछ समय देना चाहिए। शारीरिक कसरत वाली किसी गतिविधि से

जुड़ना तनाव को कम करने में मदद करता है। माना कि आपके पास बहुत काम है लेकिन उसके बावजूद सुबह काम शुरू करने से पहले दस मिनट के लिए श्वास का अभ्यास असंभव नहीं है। इसके अलावा रात को घर पहुंचने के बाद मोबाइल फोन, ईमेल और अन्य चीजों से खुद को दूर रखने का प्रयास करें। अपने काम से यह अलगाव आपके मस्तिष्क को शांति देगा। संगीत या कोई अच्छी किताब आपको व्यस्तता के बावजूद प्रसन्नाता हासिल करने में मदद करेगी। ये सभी चीजें आपको प्रेरित भी करती हैं।

क्षमता से ज्यादा को कहें ना

आज के समय की मुश्किल यही है कि हमसे हमेशा अधिक की उम्मीद बंधी रहती है। भले ही हम मौजूदा स्थितियों में संघर्ष कर रहे हों लेकिन हम पाते हैं कि हमें नया काम मिलता ही जाता है। अगर अपनी प्रसन्नाता को बनाए रखना है तो बोझ से लगातार मुक्त होने का विवेक जगाना चाहिए।

जीवन में हम परिवार, मित्रों और कार्य से दूर नहीं हो सकते हैं लेकिन अतिरिक्त काम को ओढ़ने से पहले विचार कर सकते हैं कि क्या हम उसे सहज रूप में कर सकते हैं। स्पष्ट रूप से मना करने का अर्थ यह नहीं है कि आप जिम्मेदारी से जी चुरा रहे हैं बल्कि इसका अर्थ यही है कि आप सीमा तय कर रहे हैं और अपने जीवन में संतुलन बना रहे हैं। सीमाएं और प्राथमिकताएं तय करके ही आप आनंद पा सकेंगे। व्यस्त रहते हुए खुश रहने का यही मंत्र है।

काम और निजी जीवन में ऐसे साधें संतुलन

    तय करें कि आप कितने अधिक व्यस्त रहना चाहते हैं।

    देखें कि काम के घंटे निजी प्राथमिकताओं को प्रभावित न करें।

    व्यावसायिक लक्ष्य पूरे हों लेकिन सामाजिक मेलजोल भी बना रहे।

    संबंधों के लिए भी समय निकालें। उन्हीं से जिंदगी खुशहाल बनेगी।

    दिन में ऐसा समय जरूर हो जब गैजेट्स और उपकरणों से कटे रहें।

व्यस्त रहो पर आनंदित भी

कभी भी इतने व्यस्त न हो जाना कि दूसरों के बारे में सोच भी न सको।

- मदर टेरेसा

जो अच्छे काम में बहुत व्यस्त रहता है उसके पास अच्छा बनने के लिए समय ही नहीं रहता।

- रवींद्रनाथ टैगोर

This time in four months will sawan monday

श्रावण मास में महादेव भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं। इस समय वे संहारक और पालन दोनों भूमिकाओं में होते हैं। एक बिल्व पत्र से ही प्रसन्न होकर वे भक्तों मनचाहा वर देते हैं। इस वर्ष सावन में चार सोमवार ही होंगे।

भगवान शिव को संहार का देवता कहा गया है। वे सौम्य और रौद्र रूप दोनों के लिए विख्यात हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं। काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव को कल्याणकारी माना जाता है लेकिन वे हमेशा लय और प्रलय को अपने अधीन रखते हैं।

शिव के स्वरूप में परस्पर विरोधी तत्व भी देखने को मिलते हैं। वे आशुतोष हैं तो रुद्र भी हैं। उनके मस्तक पर शीतलता प्रदान करने वाला चंद्र है तो गले में भुजंग भी है। वे अर्धनारीश्वर हैं तो कामजित भी हैं। गृहस्थ हैं तो श्मशानवासी और वीतरागी भी हैं।

जहां वे हर तरह के द्वंद्व से मुक्त हैं तो सह-अस्तित्व के विचार के पोषक भी हैं। ऐसे दयालु और नियंता भगवान के पूजन का मास है श्रावण मास। 13 जुलाई से श्रावण मास के प्रारंभ होते ही श्रद्धालु शिवभक्ति में डूब जाएंगे।

श्रावण सोमवार शिवपूजा के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दिवस है। वैसे तो भोलेनाथ पूरे वर्ष ही अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं लेकिन श्रावण में वे जल्दी प्रसन्न होते हैं क्योंकि इस समय वे सृष्टि के पालक की भूमिका में होते हैं। सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु जब शयन में चले जाते हैं तो वे सृष्टि संचालन शिव से संचालित होता है। यही वजह है कि चातुर्मास का पहला महीना श्रावण शिव भक्ति के लिए उपयुक्त समय माना जाता है।

श्रावण मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। इसके संबंध में पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने से विष निकला और भगवान शिव ने उसे कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया।

विष के प्रभाव को कम करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का महत्व है। यही कारण है कि श्रावण मास में शिवजी को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि नदियों से जल लेकर कावड़िए शिव मंदिरों तक की पदयात्रा करते हैं और शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं।

इस सृष्टि के समस्त जीवों के लिए जिस जल तत्व की प्रधानता है वह शिव ही हैं। श्रावण मास में भी सोमवार के दिन शिव पूजन सर्वथा शुभदायी माना जाता है। वर्णन है कि इस दिन शिवजी को एक बिल्व पत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है।

इसलिए भक्तजन शिव पूजा कर उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। चूंकि भोलेनाथ भक्तों से बहुत आसानी से प्रसन्ना होते हैं इसलिए श्रावण मास में उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत, पूजन और अर्चना की जाती है। इस मास में प्रति सोमवार या प्रदोष को शिव पूजा या पार्थिव शिव पूजा विशेष फलदायी होती है।

Do something like this take bholenath

भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए खास माह श्रावण आज यानी रविवार से शुरू हो गया है। शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा है।

गौरतलब है कि इस महीने शिव भक्त गंगाजल लेने यानी कांवड़ का पवित्र जल लेने हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी और गंगासागर की यात्रा पैदल करके श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को अपने क्षेत्र के शिवमंदिर में शिवलिंग का अभिषेक कर पुण्य अर्जित करते हैं।

ज्योतिषाचार्य पं. धर्मेंद्र शास्त्री के अनुसार श्रावण मास में आशुतोष भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है, जो प्रतिदिन पूजन न कर सकें उन्हें सोमवार को शिव पूजा अवश्य करनी चाहिए और व्रत रखना चाहिए।

सोमवार भगवान शंकर का प्रिय दिन है, अतः सोमवार को शिवाराधना करनी चाहिए। श्रावण में पार्थिव शिवपूजा व शिवमहापुराण की कथा सुनने का विशेष महत्त्व है। भगवान शिव का यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

श्रावण मास में हुआ था समुद्र मंथन

मनीषियों का कहना है कि समुद्र मंथन भी श्रावन मास में ही हुआ। इस मंथन मंज 14 प्रकार के तत्व निकले। इसमें जहर को छोड़ कर सभी 13 तत्वों को देवताओं और राक्षसों में वितरित किया गया।

इन सभी तत्वों में से निकले जहर को भगवान शिव पी गए और इसे अपने कंठ में संग्रह कर लिया। इस प्रकार इनका नाम नील कंठ पड़ा। इसके बाद देवताओं ने भगवान शिव को जहर के संताप से बचाने के लिए उन्हें गंगा जल अर्पित किया। इसके बाद से ही शिव भक्त श्रावण मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

ऐसे प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ

    श्रावन मास में रुद्राक्ष पहनना बहुत ही शुभ माना गया है। इसलिए पूरे मास रुद्राक्ष की माला धारण करें व रुद्राक्ष माला का जाप करें

    शिव को भभूती लगाएं। अपने मस्तक पर भी लगाएं।

    शिव चालीसा और आरती का गायन करें ।

    महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें ।

    सोमवार को श्रद्धापूर्वक व्रत धारण करें (यदि पूरे दिन का व्रत संभव न हो तो सूर्यास्त तक भी व्रत धारण किया जा सकता है)

    बेलपत्र, दूध, शहद और पानी से शिवलिंग का अभिषेक करें।

श्रावण मास के अन्य व्रत

    अपशकुनों से बचनें के लिए नवविवाहित जोड़ों को मंगलागौरी व्रत धारण करना चाहिए।

    शुक्रवार को सुहागिन स्त्रियों को वरदलक्ष्मी व्रत (श्रावण शुक्रवार व्रत) धारण करना चाहिए।

    ऊँ नमः शिवाय। का जप चलते, फिरते, उठते-बैठते करते रहना चाहिए।

Friday, 11 July 2014

Guru Puja miles pupil arrived long way

श्रीराधा-कृष्ण की लीला स्थली और संतों की साधना स्थली में बहने लगी है भक्ति और आस्था की बयार। गुरु पूर्णिमा पर विश्व के अनेक देशों समेत अनेक प्रांतों से श्रद्धालुओं के आगमन से धार्मिक नगरी गुलजार होने लगी है।

आस्था के साथ समर्पण का भाव मन में लिए मीलों लंबा सफर तय करके लोगों का आना लगातार जारी है। प्राचीन आश्रम, मठ-मंदिर हों या नये आधुनिक मठ और मंदिर हर ओर उल्लास और भक्ति का विहंगम संगम इन दिनों वृंदावन में देखा जा रहा है। पारंपरिक गुरु स्थान पर डेरा जमाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

गुरु पूर्णिमा पर्व 12 जुलाई को है, लेकिन गुरुवार तक शहर के हर आश्रम में हजारों शिष्यों ने पहुंचकर दस्तक दे दी। सुबह पूजन-अर्चन और संतों के प्रवचन सुन, मंदिर-मंदिर दर्शन कर पुण्य लाभ कमाने वाले श्रद्धालुओं की कमी नजर नहीं आ रही।

गुरु पूजन को मीलों लंबा सफर तय कर पहुंचे शिष्य-

गुरु पूजन को शहर में भक्तों का कारवां लगातार बढ़ रहा है, इन्हें उचित पार्किंग व्यवस्था मुहैया कराने व ट्रैफिक नियम के अनुसार वाहनों को आने-जाने की व्यवस्था न होने से शहर में जाम से हालात होने लगे हैं। गुरु पूर्णिमा पर्व में दो दिन बाकी हैं, लेकिन अभी से श्रद्धालु और आम नागरिक जाम की समस्या से जूझने लगे हैं। गुरु पूर्णिमा पर्व पर लाखों श्रद्धालु वृंदावन में गुरु पूजन करने पहुंच रहे हैं। गुरु स्थानों पर शुरू हुए धार्मिक अनुष्ठानों में शिरकत करने के लिए गुरुवार से ही श्रद्धालुओं ने निजी वाहनों से आना आरंभ कर दिया, लेकिन पुलिस की लापरवाही के चलते शहर में जाम के हालात लोगों की मुसीबत बन रहे हैं। सबसे व्यस्ततम चौराहे अटल्ला चुंगी पर रेंगते वाहन अधूरी व्यवस्था की चुगली करते दिखाई दिए। यमुना एक्सप्रेस-वे के रास्ते शहर में प्रवेश करने वाले वाहन इसी मार्ग से बांकेबिहारी मंदिर के अलावा कई आश्रमों में पहुंच रहे हैं, लेकिन पुलिस को कोई व्यवस्था न होने से यहां पूरे दिन जाम के हालात बने रहे।

दो पुलिसकर्मियों के कंधों पर इस चौराहे की जिम्मेदारी संभालना उनके लिए चुनौती साबित हो रही है। बांकेबिहारी को जाने वाले गांधी मार्ग पर वाहनों की लंबी कतार लगी थी। आगे विद्यापीठ चौराहा पर वाहन इस कदर एक-दूसरे के सामने आ खड़े हुए, जिन्हें निकालना संभव नहीं था। पुलिस यहां भी मौजूद न थी। यही हालात कुछ हरिनिकुंज इलाके में देखने को मिले। हरिनिकुंज इलाके में सड़क के दोनों ओ नो-पार्किंग जोन में दर्जनों वाहन खड़े होकर जाम को बढ़ावा देते रहे, इन्हें हटाने की जहमत तक नहीं उठा पाए यातायात पुलिसकर्मी। हालांकि यातायात पुलिसकर्मी क्रेन के साथ टहलते नजर जरूर आए, लेकिन वाहन चालकों से बातचीत कर उन्हें वहीं खड़े रहने की अनुमति दे गये। किशोरपुरा, बनखंडी, रंगजी मंदिर, सेवाकुंज, शाहजी मंदिर, नगर पालिका चौराहा, इस्कॉन मंदिर, प्रेम मंदिर पर भी जाम के हालातों से श्रद्धालु और स्थानीय लोग परेशान रहे।

Inundation of the city steeped in reverence of faith

गिरिराज प्रभु की दिव्यता पर नत मस्तक भक्ति ने गोवर्धन की धरा को अलौकिक बना रखा है। सतरंगी रोशनी में नहाई पर्वतराज की धरा राधे-राधे से गुंजायमान है। सप्तकोसीय परिक्रमा मार्ग भक्तों के जयकारों और भजनों से झंकृत हो रहा है। पांच दिवसीय मुड़िया पूर्णिमा मेला रफ्ता-रफ्ता शबाब पर पहुंच रहा है। जोश और उल्लास में डूबे भक्त गिरिराज महाराज की 21 किमी लंबी परिक्रमा झूमते-नाचते कर रहे हैं।

विभिन्न संस्कृति और भाषाओं के संगम ने मानो गोवर्धन में अनूठे संसार की रचना कर दी है। गुरुवार को पांच दिवसीय मेला के तीसरे दिन सूर्य देव की प्रचंडता श्रद्धालुओं की परीक्षा लेती रही, लेकिन भक्तों के जुनून में कोई कमी नहीं आई। आसमान से बरसते आग के गोले और गर्म दहकती धरा भक्तों के नंगे कदमों को रोकने का साहस नहीं जुटा सकी। शाम ढलते ही चारों दिशाओं से गूंजते जयकारे भक्तों के आगमन की सूचना दे रहे थे। गोवर्धन को जोड़ने वाले सभी संपर्क मागरें से उमड़ते आस्था के सैलाब को देखकर सरकारी मशीन हांफ ती नजर आई। परिक्रमार्थियों की संख्या के आगे व्यवस्थाएं बौनी साबित होने लगीं। बसें ठसाठस, तो रेलगाड़ी खचाखच भरकर गोवर्धन की तरफ दौड़ी आ रही हैं।

नहाने को लगी हैं कतारें- गुरुवार सुबह करीब साढ़े तीन बजे मानसीगंगा का किनारे स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइन नजर आई। सप्तकोसीय परिक्रमा के उपरांत मानसीगंगा में स्नान का महत्व है। सुरक्षा की दृष्टि से मानसीगंगा के घाटों को बैरीकेडिंग लगाकर बंद कर दिया गया है तथा किनारों पर स्नान के लिए फव्वारे लगाए गए हैं, परंतु फव्वारों की कम संख्या के कारण श्रद्धालुओं को स्नान किए बिना ही लौटना पड़ रहा है।

Vaishnav Devi Yatra: Ktdha be given to the important post of EO

हाईकोर्ट की डिवीजन बैंच ने भ्रष्टाचार के आरोपी कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर रवि कुमार का तबादला रियासी म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के पद पर किए जाने को गंभीरता से लिया। उन्होंने सरकार को निर्देश दिए हैं कि उन्हें रियासी मुख्यालय में महत्वपूर्ण पद न दिया जाए। अगर कोर्ट के निर्देश पर अमल नहीं हुआ तो शहरी विकास विभाग के डायरेक्टर स्वयं अदालत में पेश हो।

इसके लिए कोर्ट ने दो सप्ताह का समय दिया है। यह मामला एक गैर सरकारी एसओएस इंटरनेशनल के चेयरमैन राजीव चुन्नी द्वारा दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। जिसमें कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने की वकालत की गई। मामले में कहा गया कि रवि कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत दो एफआईआर दर्ज हैं और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। दरअसल एसओएस की ओर से दायर जनहित याचिका में यह अदालत से यह गुहार की गई थी कि माता वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए आने वाले वो श्रद्धालुओं जो पालकी वालों, पिट्ठुओं की सेवाएं लेते हैं, और उनसे टैक्स वसूला जा रहा है। यह टैक्स केवल कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी ही श्रद्धालुओं से ले सकती है, न कि जिला प्रशासन उन पर कोई और टैक्स लगा सकती है। यह टैक्स म्यूनिसिपल लिमिट कटड़ा में ही होना चाहिए लेकिन रियासी के डिप्टी कमिश्नर ने श्रद्धालुओं के लिए टैक्स की दरों में कुछ समय पहले संशोधन किया था और इन्हें लागू कर दिया था। दलील में कहा गया कि कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव आफिसर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

Guru purnima is a festival to honor

भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से ही गुरु को आदर-सम्मान देने की परंपरा रही है। गुरु को हमेशा से ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना जाता है।

'आचार्य देवोभव:" का स्पष्ट अनुदेश भारत की पुनीत परंपरा है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में गुरु को भी भगवान की तरह सम्मानजनक स्थान दिया गया है। गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को यह विशेष पर्व मनाया जाता है। गुरु अपने आपमें पूर्ण होते हैं। अत: पूर्णिमा को उनकी पूजा का विधान स्वाभाविक है।

पथ प्रदर्शक हैं गुरु

आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी होती है। ऐसी मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के बाद सभी देवी-देवता चार मास के लिए सो जाते हैं। इसलिए देवशयनी एकादशी के बाद पथ प्रदर्शक गुरु की शरण में जाना आवश्यक हो जाता है। परमात्मा की ओर संकेत करने वाले गुरु ही होते हैं।

इसीलिए गुरु की छत्रछाया से निकले कपिल, कणाद, गौतम, पाणिनी जैसे विद्वान ऋषि आदि अपनी विद्या वैभव के लिए आज भी संसार में प्रसिद्ध हैं। गुरुओं के शांत पवित्र आश्रम में बैठकर अध्ययन करने वाले शिष्यों की बुद्धि भी वहां के वातावरण के अनुकूल उज्जवल और उदात्त हुआ करती थी। तब सादा जीवन, उच्च विचार गुरुजनों का मूल मंत्र था। तप और त्याग ही उनका पवित्र ध्येय था। लोकहित के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देना ही उनकी शिक्षा का आदर्श होता था।

श्रीकृष्ण हैं जगत् गुरु

धर्मग्रंथों में गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा गया है कि जो शिष्य के कानों में ज्ञान रूपी अमृत का सिंचन करे और उन्हें धर्म का मार्ग दिखाए वही गुरु है। यह जरूरी नहीं है कि हम किसी व्यक्ति को ही अपना गुरु बनाएं। योग दर्शन नामक पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण को जगत्गुरु कहा गया है, क्योंकि महाभारत युद्ध के दौरान उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया था।

व्रत का विधान

इसी उदात्त परंपरा की याद दिलाने के लिए प्रत्येक वर्ष आषाढ़ी पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन प्रात:काल शांत चित्त से अपने गुरु का स्मरण करते हुए गुरु पूर्णिमा व्रत का संकल्प करें। इस दिन अपने गुरुु के पास जाकर उनका अर्चन, वंदन और सम्मान करना चाहिए।

इस दिन अपने गुरु से आशीर्वाद, उपदेश और भविष्य के लिए निर्देश ग्रहण करना चाहिए। यदि गुरु दूर रहते हों, दिवंगत हों या आपने भगवान को ही अपना गुरु मान लिया हो तो उनके चित्र या पादुका (खड़ाऊं) को उच्च स्थान पर रखकर, लाल, पीले और सफेद कपड़े को बिछाकर स्थापित करें, लाल स्नेह, पीला समृद्धि और श्वेत शांति का प्रतीक है। ये तीनों ही जीवन में परम आवश्यक है। गुरु के चित्र या पादुका का धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, चंदन, नैवेद्म आदि से पूजन करें। गुरु स्रोत का पाठ करें और श्रद्धापूर्वक गुरु का स्मरण करें।

वेद व्यास ने वेद, उपनिषद और पुराणों का प्रणयन किया है। इसलिए वेद व्यासजी को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि वेद व्यासजी का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। आज के दिन व्यासजी के चित्र का पूजन और उनके द्वारा रचित ग्रंथों का भी अध्ययन करना चाहिए।

Feast of faith and belief

आज के युग में मनुष्य पूर्ण भौतिकता में लिप्त होकर अपने सन्मार्ग से भटक गया है। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए वह अनैतिक और कदाचारी बन चुका है। ऐसे में सदगुरु ही एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है जो इन भटके हुए लोगों को नैतिकता और सदाचार के मार्ग पर ला सकता है।

कहा गया है कि गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई यानी संसार सागर दुःख भरा हुआ है। उसे गुरु के बिना कोई भी पार नहीं लगा सकता है। गुरु की महिमा के बारे में सिखों के पहले गुरु कहते हैं कि सौ चांद और हजार सूर्य भी एक साथ आकाश में आ जाए तो भी गुरु की रोशनी का कोई मोल नहीं है।गुरु को भगवान से ऊंचा दर्जा देने वाले संत कबीर दास ने कहा है कि पहले में गुरु महाराज के चरण स्पर्श करुंगा उसके बाद भगवान के चरण स्पर्श करना चाहूंगा।

गुरु विकास का कारण है, वह कल्याण मित्र है और शिष्य की प्रतिभा को तराश कर कंचन बना देता है। जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बना दिया था। यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा का पर्व आस्था और विश्वास का पर्व है। यह समर्पण का पर्व है साथ ही लोगों में विश्वबंधुत्तव की भावना को बढ़ावा देता है।

Philosophy in the dark

अंधेरा और उजाला, रात और दिन यूं तो जीवन का हिस्सा है। बात चाहे दैनंदिनी जीवन की हो या फिर प्रतीकात्मकता की। हर इंसान का जीवन दिन-रात की तरह ही होता है। अंधेरे और उजाले में बंटा हुआ। जैसे दिन और रात है, वैसे ही जीवन में सुख-दुख की तरह ही अंधेरा और उजाला आता-जाता है।

अध्यात्म और धर्म में भी अंधेरा और उजाला प्रतीकों के तौर पर मौजूद हैं। हर तरह की सकारात्मकता का प्रतीक है उजाला... रोशनी... किरणें...। हर तरह की नकारात्मकता को अंधेरे के प्रतीक से परिभाषित किया गया है। ज्ञान उजाला है, अज्ञान अंधेरा।

प्रेम, सद्भाव, ममता, वात्सल्य, नैतिक, सद् इन सबको रोशनी से परिभाषित किया गया है, और ईर्ष्या, द्वेष, अनैतिकता, असद् इस तरह की सारी भावनाओं को अंधेरे से चित्रित किया जाता रहा है। लेकिन ये बस प्रतीकात्मकता तक ही सीमित है। तभी तो हमारे यहां कहा जाता है 'तमसो मा ज्योतिर्गमय" या फिर ये पश्चिम में कहा जाता है 'हे ईश्वर अंधकार में हमारी रोशनी बने रहना।

अंधेरा जीवन का उतना ही बड़ा सच है, जितना बड़ा सच उजाला है, रोशनी है। क्योंकि जिस तरह दिन और रात मिलकर एक चक्र पूरा करते हैं, उसी तरह रोशनी और अंधेरा मिलकर जीवन का चक्र पूरा करते हैं। अंधेरा सृष्टि में विद्यमान है, सूर्य से पहले अंधकार ही था, सूर्य आता और जाता है, उजाला भी आता-जाता रहता है। अंधकार बना रहता है।

अंतरिक्ष के अंधकार से लेकर गर्भ के अंधकार तक इसका अस्तित्व सृजन की पूर्वपीठिका है। अंधकार सृष्टि का पहला और अंतिम सत्य है। जीवन को सतत रहस्य, सृजन और अध्यात्म से सिंचित करता है ये अंधकार।

बिना अंधकार के हम सृजन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। सोचें कि धरती के भीतर बीज के अंकुरित होने से लेकर कोख में जीव के विकसित होने तक का साक्षी सिर्फ और सिर्फ अंधकार ही तो है। ये अंधकार ही है जो हमें खुद के साथ रहने, भीतर झांकने और महसूस करने का अवसर देता है।

आखिर ध्यान की अवस्था भी हमें आंखें बंद करने के बाद ही प्राप्त होती है। बिना अंधेरा के हम अपने करीब नहीं आ पाते हैं, हम खुद को जान नहीं पाते हैं। खुद में झांक नहीं पाते हैं, स्व हो नहीं पाते हैं। दुनिया से दूर जाने और खुद के करीब आने लिए अंधेरे की जरूरत होती है। ये सही है कि उजाला हमें देखने की सहूलियत देता है, लेकिन साथ ही ये हमें बंटने की सुविधा भी देता है। जब हम देखने की सीमा से बाहर चले जाते हैं तो हम अपने भीतर झांकने का अवसर पाते हैं।

जिस तरह रात और दिन एक दूसरे के पूरक हैं, उसी तरह अंधकारऔर प्रकाश का वजूद एक-दूसरे के साथ है। एक के बिना दूसरा समझा नहीं जा सकता है। दोनों ही जीवन के लिए जरूरी है।

हम ये भूल जाते हैं कि आंखें बंद करके ही हम साधना और आराधना करते हैं, कर सकते हैं। ध्यान के लिए भी अंधकार की ही दरकार होती है। अंधकार का मतलब भौतिक या शाब्दिक तौर पर अंधकार नहीं है। आंखों को बंद करने के बाद जो होता है वह भी तो अंध्ाकार ही है।

चाहे अंधकार को अज्ञान से और रोशनी को ज्ञान के प्रतीकों से व्यक्त किया जाता हो, लेकिन है तो ये दोनों ही जीवन के अभिन्न हिस्से। अंधकार या रात सृजन, रहस्य, विश्राम, पुनर्निर्माण और ईश्वर और स्व से रूबरू होने का अवसर है।

आखिर क्यों ईसा मसीह और भगवान कृष्ण का जन्म रात के अंधेरे में होता है? आखिर क्यों ईश्वर अब्राहम को रात में दिखाई देते हैं और मूसा को भी ईश्वर रात में ही दिखाई देते हैं।

इसी सिलसिले में अमेरिका की एक धर्मशास्त्री बारबरा ब्राउन टेलर अपनी हालिया किताब 'लर्निंग टू वॉक इन द डार्क में बताती हैं कि अंधेरा का हमारे जीवन में क्या महत्व है और ये भी कि जिस तरह से जीवन में रोशनी की जरूरत और महत्व है, उसी तरह से अंधेरे की भी जरूरत और महत्व है।

बारबरा कहती हैं कि जिस तरह से हमें तृप्ति के अहसास तक पहुंचने के लिए भूख को समझना जरूरी है, उसी तरह हमें रोशनी के अर्थ और महत्व को समझने से पहले अंधकार को समझना जरूरी है।

बिना अंधकार के उजाले का अर्थ नहीं समझा जा सकता है। यदि हम अंधकार को नकारात्मकता का प्रतीक भी मानें तब भी जीवन के सद् को समझने के लिए अंधकारको जानना ही होगा। बिना अंधकार को जानें हम स्व को नहीं जान सकते हैं, न ईश्वर को, न जीवन को और न ही सद्, सत् और सत्य को।

In the coming three days the political upheaval occurring

गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु अस्त होगा। इसी दिन राहु और केतु अपनी राशि परिवर्तन कर दूसरे ग्रह में प्रवेश करेंगे। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि राहु तुला राशि को छोड़कर दोपहर 3.45 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। कन्या का राहु शत्रुहंता योग बना रहा है।

यह योग 18 वर्ष पूर्व 1996 में बना था। वहीं केतु भी मेष को छोड़कर मीन राशि में प्रवेश करेगा। राहु केतु के इस परिवर्तन से सभी राशियों में प्रभाव पड़ेगा।

    12 जुलाई को गुस्र्पूर्णिमा

    राहू केतु बदलेंगे राशि

    बनेगा शत्रुहंता योग

ज्योतिषमठ संस्थान के संचालक पं विनोद गौतम ने बताया कि इसके पूर्व राहु केतु ने 23 दिसंबर 2012 में राशि परिवर्तन किया था। अब कन्या राशि में वैद्यति योग एवं धनु के चंद्रमा के समय उत्तरा अषाढ़ नक्षत्र में राशि परिवर्तन करेगा। वक्री रहने वाला ग्रह डेढ़ वर्ष तक कन्या राशि में रहेगा, जिससे कई राशियों पर प्रभाव पड़ेगा।

होंगे चार परिवर्तन

    12 जुलाई को राहु तुला छोड़ कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। केतु मेष को छोड़कर मीन में प्रवेश करेंगे।

    12 जुलाई को गुस्र् अस्त होगा।

    13 जुलाई को शुक्र का राशि वृष से मिथुन में जाएंगे।

    14 जुलाई को मंगल कन्या राशि से तुला में जाएंगे।

उजागर होंगे पुराने भ्रष्टाचार

तुला का मंगल षडयंत्रकारी योग बनाएगा। इससे पुराने भष्टाचार उजागर होंगे। राजनीति में उथल पुथल करेगा। एक माह तक राजनीति से जुड़े लोगों को प्रभावित करेगा। वहीं कन्या का राहु शत्रुहंता योग बना रहा है जिससे आतंकी, नक्सली, माओवादी जैसी घटनाओं पर कमी आएगी।

कुप्रभाव से बचाव के उपाय

जिन राशियों पर कुप्रभाव पड़ रहा है उन्हें तिल तेल, नारियल, लौंग तथा काले व भूरे रंग के वस्त्र में सात प्रकार के अनाज बांधकर शाम के समय गरीबों व अपंगों को दान करना चाहिए। इसके अलावा राहु का बीज मंत्र का जाप करना चाहिए।

राहु के कन्या में प्रवेश से राशियों पर प्रभाव

मेष- महासुख

वृष- धन क्षयकारी

मिथुन- अपमानजनक

कर्क- सौभाग्य दायक

सिंह- कलहकारी

कन्या- भयकारी

तुला- विनाशक

वृश्चिक- धनलाभ

धनु- विवादकारी

मकर- दुख देगा

कुंभ- धन क्षति

मीन- राजभय

So are necessary to master every guru purnima festival

जिसके पास गुरु नहीं, उसका सच्चा हितेषी कोई नहीं होता, उसके पास सब कुछ होते हुए भी वह अनाथ है। इसलिए जीवन में सदगुरु अति आवश्यक हैं।

किंतु धर्माचार्यों की मान्यता है कि पूर्व जन्मों के फलसवरूप ही सदगुरु की प्राप्ति होती है। गुरु शिष्य को शिक्षा के साथ संस्कार भी देता है जोकि मनुष्य को पूर्ण बना देता है। एक चाणक्य सैकड़ों चंद्रगुप्त को सम्राट बना सकता है। एक अरस्तु हजारों सिकंदर को महान बना सकता है।

ऐसे ऐतिहासिक कई उदाहरण हैं जिनमें युवा नरेंद्र को गुरु रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद बना दिया और गुरु समर्थ रामदास ने तो छत्रपति शिवाजी को ओज और उत्साह से पूर्ण कर दिया।

गुरु की इससे अधिक महिमा और भी है जब धर्म ग्रंथ यह भी वर्णन करते हैं कि ईश्वरावतार भगवान राम भी ज्ञान प्राप्ति के लिए महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र के श्रीचरणों में समर्पित हो गए। नंदबाबा ने भी बालकृष्ण को सन्दीपनी गुरु के पास गोकुल से उज्जयिनी तक भेज दिया।

ये ऐसे ऐतिहासिक प्रमाण हैं जो गुरु की सर्वज्ञाता और आवश्यकता को ज्ञापित करते हैं क्योंकि गुरु का दिया प्रत्येक मंत्र महामंत्र है इसे भगवान भी मान चुके हैं। इसलिए कहा भी कहा गया है कि-

गुरुब्रह्मा,गुरुविष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवै नमः

Wednesday, 9 July 2014

Get rid of rahu device so there is discord

शनिदेव को अगर प्रसन्न करना है तो कई उपाय मिल जाते हैं, पर अगर राहू की वजह से आप परेशान हैं तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि यहां हैं राहू से निजात दिलाने वाले उपाय।

दरअसल राहू की शांति एवं अनुकूलता के लिए कुछ ऐसे मंत्रों और उपायों को आजमा सकते हैं जिनसे काफी प्रभाव मिल सकेगा और आपके ऊपर से राहू का दोष दूर हो जाएगा।

    रविवार की शाम को चांदी की गोली जब में रखने से रोगादि से मुक्ति मिलती है। इससे लड़ाई-झगड़े भी दूर हो जाते हैं।

    प्रतिदिन 8 खोटे सिक्के नदी के जल में डालें। 45 दिनों तक यह उपाय करें। इससे राहू का प्रकोप कम होगा।

    सरसों का तेल, सरसों, काले तिल, सीसा, नीले पुष्प, लोहे का कोई शस्त्र, कंबल आदि वस्तुएं नीले वस्त्र में बांधकर जोशी ( एक जाति के लोग) को दान करें। इससे राहू की दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

    शनिवार के दिन श्वेत चंदन की जड़ खोदकर लाएं और स्नान पूजा आदि कर उसे काले डोरे के सहायता से बाजू पर बांधे इससे कई तरह की यौन समस्याएं दूर हो जाती हैं।

    अमावस्या या किसी मंगलवार को पाव भर बाजरा लाएं उसमें थोड़ा गुड़ मिला दें। फिर इसे किसी लाल रंग के श्वान को खिला दें। इससे उदर रोग काफी हद तक दूर हो जाएंगे।

Pandharpur has not appeared in the dream

इंदौर शहर के मध्य उस व्यस्ततम चौराहे और पुलिस थाने को पंढरीनाथ के नाम से जाना जाता है, जिसका ट्रैफिक अनजाने में ही सही, सफेद मंदिर की परिक्रमा से संचालित हो जाता है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि यह नाम क्यों-कैसे पड़ा और कौन हैं ये पढरीनाथ।

भगवान विष्णु, जिन्हें भक्त पंढरीनाथ, पांडुरंग, विट्ठल, विठोबा, विठू, विठू माउली और न जाने कितने नामों से पुकारते हैं। मंदिर में विराजित भगवान पंढरीनाथ की काले पत्थर की स्वयंभू मूर्ति बेहद आकर्षक, चिकनी एवं कलात्मक है। इसकी ठोड़ी में लगे हीरे की चमक सड़क से भी नजर आती है।

देशभर में ऐसी दूसरी मूर्ति नहीं है। पंढरपुर की मूर्ति बालू रेत से बनी है और खुरदरी है। सदियों से भक्तों द्वारा माथा टेकने के कारण मूर्ति को क्षति पहुंची। इसके चलते भगवान को चांदी के पैर लगाए गए हैं।

इंदौर के मंदिर का निर्माण महाराजा मल्हारराव होलकर द्वितीय के शासनकाल 1811-1833 के मध्य हुआ। काले पत्थर के खंभों पर आधारित मंदिर को बाद में दीवारों से बंद कर सफेदी रंगवा दी गई।

कहते हैं कि जीरापुर-मांचल के जगीरदार विसाजी लांभाते बहुत धार्मिक थे। उनकी भगवान पंढरीनाथ में गहरी आस्था थी। प्रतिवर्ष आषाढ़ी एकादशी पर पंढरपुर की वारी (तीर्थ यात्रा) में शामिल होने का उनका नियम रहा। वे आषाढ़ी नवमी को पंढरपुर रवाना हो जाते थे। उनकी इस वारी की विशेषता यह थी कि सालभर की कमाई और पत्नी के लिए बनवाए गहने वे पंढरपुर पहुंचकर जरूरतमंदों में बांट देते ते।

इससे उनकी पत्नी बहुत दुःखी थी। यह बात महाराजा मल्हारराव होलकर द्वितीय तक पहुंची। उन्होंने विसाजी कारावास में डलवा दिया गया। इधर वारी का नियम चूक जाने से विसाजी अन्ना-जल त्याग कर पंढरीनाथ को पुकारते और क्षमा मांगते रहे। आषाढ़ी एकादशी को ब्रह्म मुहूर्त में भगवान पंढरीनाथ ने उन्हें सपने में दर्शन दिए और कहा- 'तुम नहीं आ सके तो क्या हुआ, मैं आ गया हूं।

कारावास के पास बहने वाली नदी में मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। मुझे यहां से निकालो। खुदाई में भगवान पंढरीनाथ की यह मूर्ति निकली। आज भी जागीरदार लांभाते परिवार को मंदिर में पहली पूजा-अभिषेक का मान हासिल है।

भगवान पंढरीनाथ की पालकी पहले जागीरदार लांभाते की हवेली में जाती है। आज भी उनके परिवार की पांचवीं पीढ़ी के चैतन्य लांभाते द्वारा यह परंपरा जारी है।

God precious gift

'मोबाइल में हजारों सुविधाएं होती हैं, पर वह डिस्चार्ज हो जाए तो सब बेकार है। ठीक वैसे ही जीवन परमात्मा की ओर से मिला बेशकीमती उपहार है। अगर हम इसका आनंद न ले पाएं तो जीवन बेकार है।

हमारा मोबाइल भले ही डिस्चार्ज हो जाए, उसमें ज्यादा दिक्कत नहीं है, पर जिंदगी हमेशा चार्ज रहनी चाहिए। जो जिंदगी को उत्साह, आनंद और आत्मविश्र्वास से जीते हैं, उनके लिए जीवन स्वर्ग बन जाता है।'

यह बात राष्ट्रसंत महोपाध्याय ललितप्रभसागर महाराज ने सोमवार को कही। वे दशहरा मैदान पर आयोजित आध्यात्मिक प्रवचनमाला में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, 'जैसे खाली बोरी को खड़ा करने के लिए उसमें कुछ भरना जरूरी है, वैसे ही जिंदगी को खड़ा करने के लिए हम ऊंची सोच, अच्छा स्वभाव और उत्तम व्यवहार के मालिक बनें।

वे लोग नासमझ हैं जो खुद को बाहरी वस्तुओं से संवारते हैं। जिंदगी को हंसते-मुस्कराते जीना या रोते-झिकते, यह हम पर निर्भर है। हम जिंदगी को जीभर के जिएं और जीवन में मिलने वाली हर चीज का आनंद उठाएं। याद रखें, भगवान ने हमें जो दिया है हम उससे सुखी भी हो सकते हैं और दुःखी भी।

जो मिला है, उसका हम आनंद उठाना सीख जाएं तो सुखी हो जाएंगे। जो नहीं मिला है उसका रोना रोते रहेंगे तो दुःखी हो जाएंगे।