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Thursday, 6 February 2014

He had to protect the rights of kashmiri pandits

सिखों के नवें गुरु श्री तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए आत्मबलिदान दिया था। उनके इस अमिट बलिदान के लिए अनंतकाल तक याद किया जाता रहेगा।

आध्यात्मिक रुचि

बैसाख कृष्ण पक्ष पंचमी संवत 1678 वि. यानी 18 अप्रैल, 1621 ई. को अमृतसर नगर में पिता छठे गुरु श्री हरगोविंद साहिब एवं माता नानकी के घर जन्म लेने वाले गुरु तेग बहादुर बचपन से ही आध्यात्मिक रुचि वाले थे।

उन्होंने 1634 ई. में मात्र 13 वर्ष की आयु में करतारपुर के युद्ध में ऐसी वीरता दिखाई कि पिता ने उनका नाम 'त्याग मल' से 'तेग बहादुर' रख दिया।

गुरु पिता के ज्योति जोत समाने के बाद वे पत्नी माता गुजरी के साथ अमृतसर के बकाला गांव में आकर साधना में लीन हो गए। 21 वर्ष की सतत् साधना के उपरांत 1665 ई. में गुरु गद्दी पर विराजमान हुए।

अत्याचारी औरंगजेब

गुरु जी का बलिदान इतिहास में दर्ज है। वर्ष 1675 ई. में कश्मीरी पंडितों का एक दल गुरु जी के दरबार में आया और उसने बताया कि औरंगजेब जबरन लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर कर रहा है और ऐसा न करने पर उन पर अत्याचार करता है। उस दल के मुखिया ने गुरु जी से सहायता की याचना की।

गुरु जी ने कहा- 'इसके लिए किसी महापुरुष को आत्मबलिदान देना होगा। नौ वर्षीय बालक गुरु गोविंद सिंह जी ने फरमाया, इस बलिदान के लिए आपसे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है?'

करामात दिखाएं या शहादत दें

नौवें गुरु कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा हेतु औरंगजेब से मिलने दिल्ली रवाना हो गए। गुरु जी के सामने तीन शर्ते रखी गईं - 'इस्लाम कबूल करें, करामात दिखाएं या शहादत दें।'

गुरु जी ने उत्तर दिया - 'मैं धर्म परिवर्तन के विरुद्ध हूं और चमत्कार दिखाना ईश्वर की इच्छा की अवहेलना है। परिणामस्वरूप गुरु जी के साथ आए तीन सिखों भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला को यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया।'

औरंगजेब ने गुरु जी पर भी अनेक अत्याचार किए, परंतु वे अविचलित रहे। अंतत: आठ दिनों की यातना के बाद 24 नवंबर 1675 ई. को गुरु जी को दिल्ली के चांदनी चौक में शीश काटकर शहीद कर दिया गया।

गुरुद्वारा 'रकाब गंज'

वर्तमान में यह गुरुद्वारा 'शीश गंज' सुशोभित है। भाई जैता जी भरे पहरे के बावजूद गुरु जी का शीश आनंदपुर ले जाने में सफल रहे।

भाई लखीशाह भारी धनराशि चुकाकर गुरु जी के शरीर को अपने घर ले गए और उस घर को आग लगाकर दाह संस्कार संपन्न किया। इस पवित्र स्थान पर अब गुरुद्वारा 'रकाब गंज' सुशोभित है।