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Friday, 27 June 2014

Fountain enhances life by managing the business

पृथ्वी के पांचों तत्वों में संतुलन बनाना जीवन के विकास के लिए आवश्यक रहता है। फव्वारा पानी तत्व को बढ़ावा देता है। फव्वारा व्वसाय को भी बढ़ावा देता है।

व्यवसाय से धन प्राप्त होता है। फेंगशुई का फव्वारा मुख्यद्वार के पास रहना चाहिए। फव्वारे घरों में रहते हैं और कार्यालय में भी। पानी धन का प्रतीक होता है। पानी का बहना धन की बर्बादी है।

फव्वारे से हम कैसे अपनी जिंदगी को मैनेज कर सकते हैं। इसके लिए हमें इन बातों पर ग़ौर करने की जरुरत है।

    व्यक्ति जब तनाव में घर लौटता है तो उसको फव्वारा देखकर सुकून मिलता है। खुशी मिलती है। पानी की शुष्कता तनाव मुक्त कर देती है।

    कार्यालय में टेबिल पर फब्वारा कार्य से होने वाले तनाव को कम करता है, और इसके लिए शक्ति को बढ़ावा देता है।

    फव्वारा धन क्षेत्र में रखना चाहिए। यह हमेशा बहता रहना चाहिए। रुका हुआ फव्वारा धन की हानि करता है।

    यह मुख्य द्वार के बायीं और रहना चाहिए। मुख्य द्वार के सामने नहीं रहना चाहिए।

    फव्वारा में पानी ऊपर की ओर जाना चाहिए और यहां लाइट्स होनी चाहिए।

    फव्वारा गोल आकार का होना चाहिए। यह चतुर्भुज नहीं होना चाहिए। दरअसल चतुर्भुज के कोनों से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है।

    फव्वारा कभी भी खराब नहीं रहना चाहिए वरना धन के प्रवाह में कमी आ जाएगी।

Friday, 20 June 2014

It is prized statues of buddha

पिछले वर्ष बेल्जियम में धूम मचाने के बाद इस वर्ष मथुरा संग्रहालय की मूर्तियां कोरिया में धूम मचाएंगी। लेकिन कोरिया की टीम द्वारा पसंद की गई आठ मूर्तियों में से बुद्ध की दो मूर्तियों को प्रशासन ने कोरिया न भेजने का निर्णय लिया है। कारण है कि यह मूर्तियां बेशकीमती मानी जाती हैं।

कुछ दिन पहले कोरिया की टीम ने दिसंबर में लगने वाली प्रदर्शनी के लिए भगवान बुद्ध, कटरा बुद्धा, महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय, महात्मा बुद्ध का स्तूप, बुद्धा हेड, अभय मुद्रा में बुद्ध, चौकी पर महात्मा बुद्ध एवं महात्मा बुद्ध का स्वर्गावतरण मूर्तियों को पंसद किया था। लेकिन संग्रहालय प्रशासन ने महात्मा बुद्ध और कटरा बुद्ध को कोरिया न भेजने का निर्णय लिया है। बुद्ध हेड को भी न भेजने पर विचार चल रहा है। कारण है कि यह मूर्तियां बेशकीमती और मास्टर पीस मानी जाती हैं। राष्ट्रीय संग्रहालय कोरिया के एसोसिएट्स और सह एसोसिएट्स द्वारा पंसद की गई मूर्तियों को कोरिया भेजने से पहले राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली की टीम यहां आकर कीमत का आंकलन करेगी। ताकि इन मूर्तियों का बीमा कराया जा सके। संग्रहालय के सहायक निदेश डा.एसपी सिंह ने बताया कि भगवान बुद्ध और कटरा बुद्धा को कोरिया नहीं भेजा जाएगा। यह बहुत महत्वपूर्ण मूर्तिया हैं।

कटरा बुद्धा की मूर्ति। दूसरे चित्र में महात्मा बुद्ध की दुलर्भ मूर्ति।महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है।

महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है। महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है।

Saturday, 7 June 2014

Ranjit singh gave valuable donet the golden temple

स्वर्ण मंदिर हालही में चर्चा में हैं। स्वर्ण मंदिर को हरमंदिर साहिब या दरबार साहिब भी कहा जाता है। इसके आस पास के सुंदर परिवेश और स्वर्ण की पर्त के कारण स्वर्ण मंदिर कहते हैं। यह अमृतसर (पंजाब) में स्थित सिक्खों का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है।

पंजाब-केसरी महाराज रणजीत सिंह ने स्वर्ण-मन्दिर को एक बहुमूल्य पटमण्डप दान में दिया था, जो संग्रहालय में है।

यह मंदिर सिक्ख धर्म का सहनशीलता तथा स्वीकार्यता के संदेश को अपने वास्तुकला में समेटे हुए है। जिसमें अन्य धर्मों के संकेत शामिल किए गए हैं।

दुनिया भर के सिक्ख अमृतसर आना चाहते हैं और श्री हरमंदिर साहिब में अपनी अरदास देकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करना चाहते हैं।

कहते हैं कि सन 1589 ने गुरु अर्जुन देव के एक शिष्य शेखमियां मीर ने सरोवर के बीच में स्थित वर्तमान स्वर्ण-मन्दिर की नींव रखी थी।

मन्दिर के चारों ओर चार दरवाजों का प्रबन्ध किया गया था। यह गुरु नानक के उदार धार्मिक विचारों का प्रतीक समझा गया।

मन्दिर में गुरु-ग्रंथ-साहिब की, जिसका संग्रह गुरु अर्जुन देव ने किया था, स्थापना की गई थी। सरोवर को गहरा करवाने और परिवर्धित करने का कार्य बाबू बूढ़ा नामक व्यक्ति को सौंपा गया था और इन्हें ही ग्रंथ-साहब का प्रथम ग्रंथी बनाया गया।

1757 ई. में वीर सरदार बाबा दीपसिंह जी ने मुसलमानों के अधिकार से इस मन्दिर को छुड़ाया, किन्तु वे उनके साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने अपने अधकटे सिर को सम्भालते हुए अनेक शत्रुओं को मौत के घाट उतारा।

उनकी दुधारी तलवार मन्दिर के संग्रहालय में सुरक्षित है। स्वर्ण-मन्दिर के निकट बाबा अटलराय का गुरुद्वारा है। ये छठे गुरु हरगोविन्द के पुत्र थे, और नौ वर्ष की आयु में ही सन्त समझे जाने लगे थे।

उन्होंने इतनी छोटी-सी उम्र में एक मृत शिष्य को जीवन दान देने में अपने प्राण होम दिए थे। कहा जाता है, कि गुरुद्वारे की नो मंजिलें इस बालक की आयु की प्रतीक हैं।

Grahashanti removing impurities measures

अगर आपकी कुंडली में किसी भी ग्रह की दशा ठीक नहीं है तो उसकी शांति के लिए कुछ आसान से उपाय आजमा सकते हैं। आप रत्न धारण करने की तरह ही वनस्पति का प्रयोग कर सकते हैं।

जिस ग्रह की शांति के लिए जो जड़ बताई गई है। उसे उसी वार में विधिवत् लाकर धारण कर सकते हैं। ध्यान रखें कि जड़ एक इंच लंबी होनी चाहिए।

    सूर्यः सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ा रविवार को गुलाबी धागे स पीली धातु के कवर में धारण करें।

    चंद्रः चंद्र की शांति के लइ खिरनी की जड़ सोमवार को सफेद ऊन के धागे में लपेटकर धारण करें।

    मंगलः मंगल ग्रह की शांति के लिए अनन्तमूल की जड़ केवल मंगलवार को लाल धागे के साथ धारण करें।

    बुद्धः बुद्ध ग्रह की शांति के लिए विधारा की जड़ बुधवार को हरे धागे से चांदी के यंत्र के साथ धारण करें।

    गुरुः गुरु ग्रह की शांति के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे के साथ स्वर्ण के ताबीज के साथ ग्रहण करें।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए सरपुख की जड़ शुक्रवार को सफेद धागे के साथ धारण करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए सफेद चंदन की जड़ बुधवार को लोहे के यंत्र में धारण करें।

    केतूः केतू की शांति के लिए असगंध की जड़ गुरुवार को आसमानी धागे से चांदी के यंत्र में धारण करें।

वनस्पति से ग्रह शांति

    सूर्यः सूर्य की शांति के लिए कनेर, देवदार, केसर, इलायची, महुआ के फूल का चूर्ण पानी में डालकर स्नान करें। जल्द ग्रह शांति दोष दूर हो जाएगा।

    मंगलः मंगल की शांति के लिए सोंठ, सौंफ, लाल चंदन, के फूल पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    बुधः बुध की शांति के लिए बहेड़ा, चावल, आंवला, और शहद को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    गुरुः गुरु की शांति के लिए मुलेठी, सफेद सरसों को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए हड़,बहेड़ा, आंवला, इलायची, केसर पानी में डालकर स्नान करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए नागबेल, लोबान, तिल के पत्र को पानी में डालकर स्नान करने से ग्रह शांति दोष से मुक्ति मिल जाती है।

    केतुः केतु की शांति के लिए लोबान, बला, मोथा, प्रियंगु को पानी में डालकर स्नान करें।

Source: Spiritual News in Hindi & Horoscope 2014

Friday, 6 June 2014

Than mahmud ghaznvi take somanth mandir door

आगरा किले में करीब 172 वर्षो से रखे गजनी दरवाजा को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने आम सैलानियों के खोल दिया है। गजनी दरवाजा का इतिहास काफी रोचक है।

ईस्ट इंडियन आर्मी के इतिहास के अनुसार वर्ष 1024 में महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर के चंदन के दरवाजों को उखाड़कर अपने साथ गजनी ले गया था।

वर्ष 1842 में प्रथम अफगान युद्ध के दौरान बंगाल नेटिव आर्मी की 1-जाट बटालियन गजनी स्थित महमूद गजनवी की मजार से छह सितंबर को दरवाजा उखाड़ लाई थी।

मुगल सल्तनत के स्वर्णिम दौर की गवाही देते आगरा किला में वर्षो से बंद दरवाजे में रखा 'गजनी दरवाजा' सैलानियों के लिए हालही में खोला गया है।

हजार वर्ष पुराने गजनी दरवाजा को देखकर सैलानी अभिभूत हो रहे हैं। मगर, बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि गजनी दरवाजे के हिलने (गजनी से उखाड़कर आगरा लाने) पर ब्रिटिश सरकार भी हिल गई थी।

कहते हैं यह दरवाजा सोमनाथ मंदिर नहीं पहुंच सका क्योंकि आजादी के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 12 नवंबर, 1947 को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का आदेश जारी किया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस पर सरकारी खजाने से धनराशि खर्च न करने को कहा। मगर, कुछ ही दिनों बाद गांधी जी की हत्या कर दी गई और सरदार का भी स्वर्गवास हो गया।

नेहरू मंत्रिमंडल में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री केएम मुंशी को मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य कराना पड़ा। इस दौरान गजनी दरवाजा सोमनाथ ले जाने पर विचार हुआ था। मगर, ऐसा संभव नहीं हो सका।

When will pierce palmistry marriage

ज्योतिष के विभिन्न रूपों में हस्तरेखाओं की गणना करना काफी दिलचस्प है। इसमें न तो जन्म समय या दिनांक की समस्या रहती है और न ही किसी जन्म पत्रिका की आवश्यकता, जहां है जैसे हैं की स्थिति में जातक का के भाग्योदय के बारे में बताया जा सकता है।

यहां आपको ऐसे ही टिप्प दिए जा रहे हैं जिनके जरिए आप अपना भविष्य खासतौर पर वैवाहिक भविष्य पता कर सकते हैं।

    विवाह रेखा एक से ज्यादा हो तो जो रेखा लम्बी हो उसे विवाह की रेखा समझना चाहिए। शेष छोटी रेखाएं प्रेम संबंधों या सगाई के बारे में बताती हैं। प्रधान रेखा यदि लम्बी हो लेकिन लहरदार होकर पतली हो जाए तो यह जीवन साथी के स्वास्थ्य के उतार-चढाव को दर्शाती है।

    सबसे छोटी अंगुली (किनिष्ठका) के नीचे बुध का स्थान माना गया है। यहीं से हृदय रेखा निकल कर बृहस्पति के स्थान की तरफ जाती है। अंगुली के मूल में और हृदय रेखा के मध्य के स्थान पर दिखाई देने वाली आड़ी रेखाओं से व्यक्ति के विवाह का आकलन किया जाता है। रेखाओं की संख्या, स्थिति और उनकी बनावट से विवाह की आयु, स्वरूप, विवाह की संख्या और जीवन साथी की शारीरिक बनावट का आकलन किया जाना चाहिए।

    कुछ लोग प्रेम विवाह के लिए उक्त रेखाओं से गणना करते हैं। लेकिन वास्तव में प्रेम विवाह के लिए हथेली में बृहस्पति, शुक्र और मंगल के स्थान भी बहुत प्रभावी देखें गये हैं। हालांकि प्रेम विवाह होगा या नहीं, इसकी जानकारी के लिए बुध के स्थान पर पड़ी रेखाओं से काफी कुछ स्पष्ट किया जा सकता है। लेकिन प्रेम विवाह में आ रही अड़चने और प्रेमिका (या प्रेमी) के स्वभाव और चरित्र के बारे में शुक्र और बृहस्पति से अंदाजा लगाना ठीक रहेगा।

    जब विवाह रेखा दूसरी प्रधान रेखाओं की तुलना में निम्न या उच्च दिखाई दे तो यह अंतरजातीय विवाह की सूचक है। कुछ विद्वान इसे अपने से धनी या निर्धन परिवार में विवाह होने का प्रतीक समझते हैं। अर्थात ऐसी रेखाएं बेमेल विवाह करवाती हैं। यदि इस प्रकार का कोई योग यदि दिखाई दे तो यह निश्चित है कि ऐसे व्यक्ति का विवाह सामान्य तो नहीं होगा।

इसलिए होता है विवाह में विलम्ब

    यदि बृहस्पति अपने स्थान से शनि की तरफ झुकाव लिये हो तो 30 वर्ष की आयु के बाद विवाह होता है।

    पुरूष की हथेली में जब विवाह रेखा हृदय रेखा से काफी दूर हो, शुक्र का आकार हथेली में राशि सामंजस्य न बैठा पाता हो साथ ही बृहस्पति के स्थान पर कोई शुभ चिह्न न हो, तो ऐसे जातक का विवाह प्रायः देरी से हुआ करता है। कितनी देरी होगी और विवाह कब होगा यह जानने के लिए पुनः विवाह रेखा से ही आकलन करना चाहिए।

    यदि हथेली में विवाह रेखा ही न हो तो विवाह में काफी देर हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि जीवन में विवाह नहीं होगा। यह अवश्य है इसके कारण विवाह में अनावश्यक रूप से देरी हो सकती है। या फिर उपाय करने पर ही विवाह होगा।

कुछ जरूरी बातें

    यदि विवाह रेखा द्वीप युक्त हो तो यह जीवन साथी के खराब स्वास्थ्य का द्योतक है।

    विवाह रेखा का मध्य में खण्डित हो जाना विवाह के टूटने के संकेत हैं। लेकिन इसके लिए हथेली के दूसरों चिह्नों पर भी विचार करना चाहिए।

    यदि विवाह रेखा सर्प-जिह्वाकार हो तो यह पति-पत्नि के मध्य विचारों की भिन्नता को दर्शाती है।

    लम्बी और सूर्य के स्थान तक जाने वाली विवाह रेखा संपन्न और समृद्ध जीवन साथी की प्रतीक है।

    जब विवाह रेखा को खड़ी रेखाएं काट रही हो तो यह विवाह में हो रहे विलम्ब और बाधाओं की सूचक हैं।

Source: Spiritual News in Hindi & Hindi Rashifal 2014


Thursday, 5 June 2014

Grahashanti removing impurities measures

अगर आपकी कुंडली में किसी भी ग्रह की दशा ठीक नहीं है तो उसकी शांति के लिए कुछ आसान से उपाय आजमा सकते हैं। आप रत्न धारण करने की तरह ही वनस्पति का प्रयोग कर सकते हैं।

जिस ग्रह की शांति के लिए जो जड़ बताई गई है। उसे उसी वार में विधिवत् लाकर धारण कर सकते हैं। ध्यान रखें कि जड़ एक इंच लंबी होनी चाहिए।

    सूर्यः सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ा रविवार को गुलाबी धागे स पीली धातु के कवर में धारण करें।

    चंद्रः चंद्र की शांति के लइ खिरनी की जड़ सोमवार को सफेद ऊन के धागे में लपेटकर धारण करें।

    मंगलः मंगल ग्रह की शांति के लिए अनन्तमूल की जड़ केवल मंगलवार को लाल धागे के साथ धारण करें।

    बुद्धः बुद्ध ग्रह की शांति के लिए विधारा की जड़ बुधवार को हरे धागे से चांदी के यंत्र के साथ धारण करें।

    गुरुः गुरु ग्रह की शांति के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे के साथ स्वर्ण के ताबीज के साथ ग्रहण करें।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए सरपुख की जड़ शुक्रवार को सफेद धागे के साथ धारण करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए सफेद चंदन की जड़ बुधवार को लोहे के यंत्र में धारण करें।

    केतूः केतू की शांति के लिए असगंध की जड़ गुरुवार को आसमानी धागे से चांदी के यंत्र में धारण करें।

वनस्पति से ग्रह शांति

    सूर्यः सूर्य की शांति के लिए कनेर, देवदार, केसर, इलायची, महुआ के फूल का चूर्ण पानी में डालकर स्नान करें। जल्द ग्रह शांति दोष दूर हो जाएगा।

    मंगलः मंगल की शांति के लिए सोंठ, सौंफ, लाल चंदन, के फूल पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    बुधः बुध की शांति के लिए बहेड़ा, चावल, आंवला, और शहद को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    गुरुः गुरु की शांति के लिए मुलेठी, सफेद सरसों को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए हड़,बहेड़ा, आंवला, इलायची, केसर पानी में डालकर स्नान करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए नागबेल, लोबान, तिल के पत्र को पानी में डालकर स्नान करने से ग्रह शांति दोष से मुक्ति मिल जाती है।

    केतुः केतु की शांति के लिए लोबान, बला, मोथा, प्रियंगु को पानी में डालकर स्नान करें।

Source: Spiritual Hindi News & Rashifal in Hindi 2014

Monday, 2 June 2014

Pleasant way to live life

खुश और चिड़चिड़े लोगों की जिंदगियां अलग नहीं होती हैं बल्कि उनका जिंदगी को देखने का नजरिया अलग होता है। किसी भी व्यक्ति के व्यवहार से इस बात का अंदाज हो जाता है कि वह अपनी जिंदगी को कितना महत्वपूर्ण मानता है।

कुछ लोग जीवन में हर चयन को लेकर बहुत सावधान होते हैं क्योंकि वे अपने जीवन को तमाम चीजों से अधिक महत्व देते हैं। ऐसे खुशमिजाज लोगों की कुछ सामान्य आदतों पर गौर करके प्रेरणा पाई जा सकती है।

    वे स्वयं को दूसरों की तरह बनाने के फेर में नहीं पड़ते। वे दूसरों के नहीं अपने प्रति ही उत्तरदायी होते हैं। उन्हें इस बात की प्रतीक्षा नहीं होती कि कोई उनकी तारीफ करेगा तभी वे जिंदगी को उस तरह से जिएंगे। वह न आलोचना से डरते हैं और न प्रशंसा से अपना रास्ता बदलते हैं।

    वे कोई भी काम इसलिए करते हैं क्योंकि वह उन्हें पसंद होता है। वे किसी भी काम को ढोते नहीं हैं। किसी भी दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण के मुकाबले वे खुद की दृष्टि को प्राथमिकता देते हैं। अपने अनुभवों के अनुरूप ही अपने निर्णय लेते हैं।

    वे अपने दोस्तों से प्यार करते हैं और उनकी सोहबत पसंद करते हैं लेकिन वे उन पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं होते। वे इस बात से परिचित होते हैं कि जब दोस्ती में अपेक्षा जगह बनाने लगती है तो फिर संबंध पहले की तरह नहीं रह जाते हैं।

    जब भी आप उनसे पूछें कि वे क्या कर रहे हैं तो वे अपने काम से संबंधित जवाब नहीं देते बल्कि उस रोमांच के बारे में बात करते हैं जिसे वे जी रहे होते हैं। वे आपको उन जगहों के बारे में बताते हैं जहां वे जाने वाले होते हैं या फिर जहां के रोमांचक अनुभव से गदगद होते हैं। वे पेशे से इतर बात करते ही मिलेंगे।

    वे किसी समुदाय या धर्म से बंधे नहीं होते और अपनी फिलॉसफी से जिंदगी जीते हैं। वे बंधे-बंधाए विचार के बजाय अपने अनुभवों से जिंदगी को देखते और तराशते हैं।

    चीजों के लेकर इस तरह के लोगों के मन में डर नहीं होता। वे जानते हैं कि चीजें समय के साथ बदलेंगी और वे इस बदलाव से अवगत होते हैं। वे चीजों को निराशा के भाव से नहीं उम्मीद से देखते हैं और बदलावों का स्वागत करते हैं।

    इस दुनिया को वे एक आकर्षक नाट्यमंच की तरह देखते हैं जहां वे एक पात्र की भांति हैं और हर घटना को पूरी तरह जीते हैं। वे सिर्फ एक ही चीज से बंधकर जिंदगी पूरी नहीं बिताते बल्कि अपनी रुचियों को विस्तार देने में भी कामयाब होते हैं।

    वे मौजूदा क्षण को जीते हैं लेकिन भविष्य को लेकर उनके पास कुछ सपने जरूर होते हैं। हालांकि वे सपनों के पीछे भागते नहीं लेकिन सहज रूप में उन्हें पूरा करने की कोशिश करते हैं। सपनों और महत्वाकांक्षाओं के बीच के फर्क से भलीभांति परिचित होते हैं।

    वे दूसरों को बदलने की कोशिश में नहीं रहते बल्कि इस बात को सीखने का प्रयास करते हैं कि उनके साथ निबाह कैसे किया जाए। वे मानते हैं कि लोग किसी के कहने से नहीं बल्कि अपनी जरूरतों और अपने अनुभवों से ही बदलते हैं।

Source: Spiritual Hindi News & Rashifal 2014

If you are not a prisoner of its ease anywhere

व्यक्ति अपने लिए आरामदायक सहजता तलाशता है लेकिन इस सहजता की आदत मुश्किल में डाल सकती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने पर आप बदलावों के साथ कदमताल में पिछड़ जाते हैं।

कहते हैं, 'एक जहाज किनारे पर सबसे सुरक्षित होता है लेकिन जहाज सिर्फ किनारे पर खड़ा रहने के लिए नहीं बनाया जाता है। अक्सर लोग अपनी जिंदगी में बदलाव के सवाल से जूझते हैं। वे खुद को अपनी मौजूदा स्थितियों में संतुष्ट नहीं पा रहे होते हैं लेकिन बदलाव के लिए उनके भीतर पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती है या कहें वे खुद को एक कम्फर्ट जोन में पाते हैं और उससे बाहर नहीं निकल पाते हैं।

ये लोग अपनी जिंदगी में बदलाव करने से हिचकते हैं। उन्हें असुरक्षा का डर सताता है। वे जिस तरह सहज स्थितियों के आदी हो जाते हैं उनसे बाहर निकलना भी उनके लिए कठिनाई पैदा करता है। अधिकांश लोगों के साथ यह भी होता है कि अपने लिए नई संभावनाएं तलाशते हुए वे खुद से बहुत सवाल पूछने लगते हैं और जब अपने ही सवालों के उत्तर नहीं दे पाते हैं तो अपने कम्फर्ट जोन से भी बाहर नहीं निकल पाते हैं।

ऐसे में तात्कालिक रूप से तो लगता है कि राहत है लेकिन लंबे समय में कम्फर्ट जोन से बाहर नहीं निकलना आपके लिए नया सीखने के सारे दरवाजे बंद कर देता है। लंबे समय तक अगर आप सहज स्थिति से बाहर निकलने की कोई कोशिश नहीं करते हैं तो चुनौतियों के लिए की जाने वाली तैयारियों में भी पिछड़ जाते हैं। जब आप लंबे समय इस सहजता की आदत लगा बैठते हैं तो जीवन में नई संभावनाओं की तरफ कदम नहीं बढ़ा पाते हैं।

कार्ल सेंडबर्ग ने एक बार कहा था, 'मेरे भीतर एक बाज है जो ऊंची उड़ान चाहता है लेकिन मेरे भीतर ही एक हिप्पोपोटेमस भी है जो कीचड़ में पड़ा रहना चाहता है।" मनुष्य के भीतर दोनों ही तरह के भाव होते हैं जिनकी कश्मकश चलती रहती है। जो लोग संभावनाओं की ओर खुद को प्रेरित कर पाते हैं वे जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने का डर मनुष्य के सबसे आम डरों में से है।

कम्फर्ट जोन क्यों?

    आप अपनी सहजता के दायरे में इसलिए भी बने रहते हैं क्योंकि आपको लगता है कि इससे बाहर निकलने पर आप असफल हो सकते हैं।

    अपनी सहज दुनिया से बाहर के लोगों और जगहों से संवाद की अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं रहता। लगता है कि आपमें वो बात नहीं है।

    बाहर की बदलती दुनिया को अपने स्वभाव के विपरीत पाते हैं और उसी जगह बने रहना चाहते हैं जहां मौजूदा समय में हैं।

    नई चुनौतियों या प्रयोगधर्मिता के प्रति शुरू से आपका रुझान नहीं रहा और तय फॉर्मेट में ज्यादा खुशी महसूस करते हैं।

    असुरक्षा का भय सताता है और नकारात्मकता की तरफ अधिक ध्यान देने की आदत के कारण भी अपनी तय दुनिया में ही बना रहना ठीक समझते हैं।

अपने कम्फर्ट जोन से आगे बढ़ते हुए खुद से कहें आप सबकुछ नहीं पा सकते जीवन में जब भी आप संभावनाओं को देखते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपके भीतर एक द्वंद्व पैदा होता है और आपको वर्षों से जमी जमाई चीजों से बाहर निकलने में कुछ छूटने का एहसास होने लगता है।

लेकिन जब तक आप कुछ छोड़ेंगे नहीं, नई चीजों के लिए जगह कैसे बनेगी। नई संभावनाओं को पाने के लिए पुरानी आशंकाओं से मुक्त होना जरूरी है। जब तक पिछले समय के बारे में सोचते रहेंगे आपके कदम आगे की ओर नहीं बढ़ेंगे।

कुछ मिनटों में फैसला करें

जब आप अपने मन का काम करने का निर्णय लेते हैं तो उसका फैसला करने में आपको कुछ ही सेकंड लगते हैं। जब आप अपने निर्णय पर पहुंच जाते हैं तो फिर दूसरों को भी उससे अवगत करा देते हैं कि अब आप क्या करना चाहते हैं। अगर आपने अपने मन में पक्का इरादा कर लिया है तो फिर फैसला लेने में देर नहीं लगती है और फिर आप चीजों के बारे में बहुत नहीं सोचते हैं।

अनिश्चितताओं को अपनाएं

भले ही आप इसके लिए तैयार हों या न हों लेकिन अनिश्चितताएं जीवन का हिस्सा हैं। या तो हम आने वाली चीजों के प्रति नकारात्मक भाव से सोच सकते हैं या फिर उनकी तरफ बहुत सकारात्मक तरीके से बढ़ सकते हैं। यह सहज वृत्ति होती है कि व्यक्ति नकारात्मकता से ज्यादा चिंतित होता है और अधिक सतर्क भी और इसलिए वह उसके निर्णयों को ज्यादा प्रभावित भी करती है। लेकिन अगर आप यह मान लें कि जीवन में अनिश्चितता सभी दूर है तो आपको आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।

दूसरों का नहीं, अपना सोचें

अक्सर हम कम्फर्ट जोन से निकलने से पहले यही सोचते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे और इसलिए कोई भी साहसिक कदम नहीं उठा पाते हैं। असल में दूसरों के बारे में सोचते हुए हम खुद को कमजोर कर लेते हैं। ऐसे मौकों पर यह जरूरी है कि सिर्फ अपने बारे में सोचा जाए।

यह न सोचें कि दूसरे आपको लेकर क्या बातें करेंगे। ऐसे समय अपनी संभावना को सोचें। जब भी हम किसी फैसले की घड़ी में होते हैं तो अक्सर थोड़े नर्वस और चिंतित होते हैं और ऐसे भावुक और कमजोर क्षणों में अक्सर सहजता जीत जाती है। थोड़ी भी अतिरिक्त चिंता हमें कमजोर कर देती है और हम आगे नहीं जा पाते हैं।

पैसा सबकुछ नहीं को विचारें

अक्सर कुछ लोग अपनी दुनिया से यह कहते हुए भी बाहर नहीं निकलते हैं कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता। यह सच है कि पैसा सबकुछ नहीं होता लेकिन नई चीजों को सीखना आपके जीवन के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होता है। एक ही दुनिया में रहते हुए आप बदलाव के साथ कदमताल नहीं कर पाते हैं। जब आपकी सहज दुनिया के भीतर ही कुछ समय बाद चीजें बदलती हैं तो आप खुद को पिछड़ा महसूस करते हैं। इसलिए पैसे के लिहाज से नहीं बल्कि सीखने की संभावनाओं को देखें।

रोज आएं कम्फर्ट से बाहर

    नई तरह का संगीत सुनें- अगर आप संगीत के शौकीन हैं तो एक ही तरह के गीत सुनने के बजाय नई तरह का संगीत सुनें जो आपको अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने में मदद करेगा।

    खाने में कुछ नया प्रयोग करें- हर सप्ताह या हर महीने में किसी नई रेसिपी को लेकर प्रयोग कर सकते हैं। यह बहुत ही रोमांचक अनुभव बन सकता है।

कुछ नया पढ़ें- आपके मित्र आपके पढ़ने को लेकर एक धारणा बनाकर चलते हैं और ऐसे में आपको कुछ नए विषयों को आजमाना चाहिए। यह आपको नए विचार भी देगा।

नए रास्ते तलाशें- अक्सर दफ्तर से घर लौटते हुए अगर आप एक ही रूट से आते हैं तो कभी-कभार रास्ता बदलकर देखना चाहिए। कभी व्हीकल बदलना भी मजेदार अनुभव दिला सकता है।
 

Tuesday, 13 May 2014

God is everywhere just need to find

एक धार्मिक व्यक्ति था। भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा थी। उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी। एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा-भगवान मुझसे बात करो, और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना।

इसलिए इस बार वह जोर से चिल्लाया और आकाश में घटाएं उमङ़ने लगी, बादलो की गड़गडाहट होने लगी लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना। उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर- नीचे सब तरफ देखा और बोला, भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा।

पर उसने नहीं देखा आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया।

अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा 'भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहां हो,मेरे पास हो,मेरे साथ हो और एक तितिली उड़ते हुए आकर उसके हथेली पर बैठ गई।

लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया, और उदास मन से आगे चला गया। भगवान इतने सारे रूपो में उसके सामने आए इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी।

संक्षेप में

ईश्वर हर जगह है। वह अपने तरीके से आते हैं और हम अपने तरीके से देखते हैं। हर जगह हर पल उन्हें महसूस करना चाहिए।

Monday, 12 May 2014

Maitreya budhdha will be next avtar

वैशाली की नगर-वधू आम्रपालि को धर्म की दीक्षा देकर भगवान बुद्ध आम्रवन से चलकर बेलवा गांव में आए और वहीं वर्षावास करते समय बुद्ध को मृत्यु तुल्य कष्ट होने लगा तथापि अपने आत्मबल से उन्होंने शारीरिक व्याधि पर नियंत्रण कियाा। उस समय बुद्ध अस्सी वर्ष के हो चुके थे तब उन्होंने अपने शिष्यों को स्पष्टत: कहा कि तथागत बुद्ध अब देहत्याग कर परिनिर्वाण प्राप्त करेंगे।

भगवान बुद्ध की इस अकस्मात घोषणा से सभी शिष्य दुखी हो गए। बुद्ध के शिष्य आनंद एकान्त में खड़े होकर रोने लगे, अश्रुपूर्ण नेत्रों से आनंद ने बुद्ध से पूछा, 'भदन्त! आपके जाने के बाद हमें कौन शिक्षा देगा? कौन हमारे दुखों को दूर करेगा?" इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा कि- 'आनंद! मैं

पृथ्वी पर अवतीर्ण होने वाला पहला और अंतिम बुद्ध नहीं हूं। मुझसे पहले अनेक बुद्ध अवतार लेकर इस भूतल पर आए और मेरे बाद अनेक बुद्ध भविष्य में भी अवतीर्ण होंगे जो मानवों को त्रिविध दुखों से मुक्त कर उनका कल्याण करेंगे। मेरे महापरिनिर्वाण के चार हजार वर्ष पश्चात मेरे द्वारा प्रवर्तित यह बौद्ध धर्म लुप्त हो जाएगा। इस लोक में अनैतिकता-अनाचार इतना बढ़ जाएगा कि मानव जीवन असुरक्षित होता रहेगा, सुरक्षा के लिए लोग इधर-उधर भटकेंगे। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच जाएगी, मानव जीवन संघर्षमय बनता रहेगा। ऐसे आपातकाल में प्राणियों की सुरक्षा के लिए 'बोधिसत्व मैत्रेय" इस भूतल पर भविष्य बुद्ध के रूप में अवतार लेंगे। वे पुन: बौद्ध धर्म की संस्थापना करेंगे और सभी मानवों को सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करेंगे।"

भगवान बुद्ध की इस भविष्यवाणी से शिष्यों और भिक्षुओं की भविष्य बुद्ध मैत्रेय के प्रति आस्था स्थापित हो गई और वे मैत्रेय को गौतम बुद्ध के समान मानने लगे और कालान्तर में मैत्रेय बौद्धों की उपासना के पात्र बन गए। ईसा की पहली शताब्दी में बुद्ध धर्म की हीनयान और महायान इन दोनों शाखाओं के शिष्य मैत्रेय को बुद्धावतार के रूप में समुचित आदर देने लगे। बौद्ध धर्म ग्रंथों में वर्णन है कि इस समय मैत्रेय 'तुषित" नामक स्वर्ग में विराजमान हैं, वे अवतार लेने के उचित अवसर की प्रतीक्षा में हैं। आगे यह भी वर्णन है कि तुषित स्वर्ग में मैत्रेय बुद्ध अनेक चमचमाती मणियों से युक्त हार पहने, स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं। शीतल, सुगंधित पवन से तुषित स्वर्ग में रम्य वातावरण है, मैत्रेय के चारों ओर इंद्र यम आदि देवता स्तुतिगान कर रहे हैं, यक्ष, किन्नार, गन्धर्व आदि उनके द्वारपाल हैं, अप्सराएं एवं नृत्यांगनाएं मधुर संगीत की संगत के साथ नृत्य कर रही हैं। ऐसे दिव्य तुषित स्वर्ग पर बुद्ध मैत्रेय शासनारूढ़ हैं।

जब बौद्ध उपासकों में यह धारणा सुदृढ़ हो गई मैत्रेय भूतल पर अवतीर्ण होकर प्राणिमात्र का पूर्ण रूप से कल्याण करेंगे, इस आस्था से मैत्रेय की उपासना में विस्तार होने लगा। इसी तारतम्य में बौद्ध शिल्पियों ने मैत्रेय के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए मैत्रेय की भिन्ना-भिन्ना आकार-प्रकार की अनेक मूर्तियों का निर्माण किया। इनकी अधिकतर मूर्तियां गांधार शैली की हैं जिनमें मैत्रेय अपने बाएं हाथ में कलश तथा दाएं हाथ में चम्पक पुष्प लिए हुए उत्कीर्ण हैं। शीर्ष पर मुकुट है तथा कमर में दुपट्टा बांधे हैं। वे कुरुकुल्ला एवं भृकुटि इन दो देवियों के साथ उद्धृत हैं।

बौद्ध तंत्र में मैत्रेय तीन मुखवाले, त्रिनेत्र एवं चतुर्भुज रूप में अंकित हैं, ये पर्यंक आसन तथा वरमुद्रा में आसीन हैं। नाना अलंकारों से विभूषित मैत्रेय की ऐसी आकर्षक प्रतिमाएं बनाकर बौद्ध शिल्पियों ने इन्हें सर्वत्र भविष्य बुद्ध के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। जब बौद्ध धर्म हिमालय की चोटियों को पार कर चीन और तिब्बत में प्रचलित हुआ तब चीन के बौद्धों ने मैत्रेय को भी भारतीय बौद्धों की तरह अपनी उपासना में सम्मिलित कर लिया और मैत्रेय चीन देश में शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए। चीनी बौद्धों ने मैत्रेय को चीनी भाषा में 'मि लो फो" नाम से सम्बोधित किया। इन बौद्धों की मान्यता है कि हर बुद्ध का एक मनोनीत वृक्ष होता है जिसके नीचे वे तपस्या में लीन होकर बुद्धत्व प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार गौतम बुद्ध ने बोधिवृक्ष के नीचे सम्बोधि प्राप्त की वैसे ही बोधिसत्व मैत्रेय चम्पक वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर बुद्धत्व प्राप्त करेंगे।

इस मान्यता से चीन देश के ची क्याड.प्रान्त में मैत्रेय की चालीस से सत्तर फुट ऊंची अनके मूर्तियां बनाई गईं। मैत्रेय की इतनी लोकप्रियता देखकर छठी शताब्दी के तांग-वंश के शासन काल में एक मैत्रेय-समाज की स्थापना हुई और इस समाज के सदस्य वे ही होते थे जो भविष्य बुद्ध मैत्रेय के उपासक थे।

चीन की तरह तिब्बत के लामाओं ने भी मैत्रेय को भविष्य बुद्ध के रूप में माना। तिब्बती भाषा में इन्हें 'धम-पा" कहा गया है। ये लामा मानते हैं कि बुद्धावतार के रूप में मैत्रेय पांचवें बुद्ध होंगे जो अलौकिक ज्ञान से पूर्ण, लोगों के कल्याण के लिए अवतरित होंगे। लामाओं के पवित्र ग्रंथ 'तंजुर" में मैत्रेय की महिमा का विशद वर्णन है। आठवीं शताब्दी में मैत्रेय जापान पहुंच गए। जापानी बौद्धों ने इन्हें करुणा का सागर माना और इसी रूप में जापानी भाषा में उन्हें 'मि रो कु" नाम दिया। जापानी, मैत्रेय से अपने कष्ट निवारण के लिए प्रार्थना करते हैं और उनसे शीघ्र भूतल पर अवतीर्ण होने का आग्रह करते हैं।

भारत के निकटवर्ती देश श्रीलंका में मैत्रेय को 'मेत्तेय" कहा। पांचवीं शताब्दी के राजा धातुसेन ने लंका में एक विशाल मंदिर बनाया और उसमें मैत्रेय को ससम्मान विराजित किया। कालक्रम से लंका में मैत्रेय जन-जन के देवता हो गए। इन्हीं देशों की तरह मैत्रेय बर्मा, जावा और स्याम देशों में भी उपास्य हैं।

इस प्रकार बौद्ध जगत में भविष्य बुद्ध मैत्रेय अति आदरणीय हो गए। पुराण-गाथाओं में जिस प्रकार भगवान विष्णु के दशावतार की गणना में भगवान गौतम बुद्ध नवें अवतार हैं और भविष्य में अवतार कल्कि होंगे उसी प्रकार बौद्ध-गाथाओं में जो बुद्ध के अवतारों का वर्णन हैं उनमें गौतम बुद्ध सातवें बुद्ध हैं और मैत्रेय भविष्य बुद्ध होंगे।

जब इस भूतल पर धर्म लुप्त हो जाएगा, सर्वत्र लोग अनाचार-अत्याचार से त्रस्त हो चुके होंगे, जीवन जीना दूभर हो जाएगा ऐसे घोर संकट से मानवों को मुक्त करने के लिए बोधिसत्व मैत्रय अवतीर्ण होकर पुन: सदधर्म की स्थापना करेंगे।

Love yourself

जब आप खुद से प्रेम करने लगते हैं तो चीजें एकाएक सुंदर और अर्थवान दिखाई देने लगती हैं। प्रसन्नता,

उत्कृष्टता और प्रेरणा के लिए अपने आप से प्रेम करना बहुत जरूरी है। अपने प्रति अच्छा भाव आपको अपने अन्य कामों में भी बेहतर प्रदर्शन का मौका देता है।

अपने प्रति अच्छा महसूस करने पर हम शांति और सकारात्मकता के साथ अपने कामों को पूरा कर पाते हैं। बहुत छोटी-छोटी चीजों के सहारे हम यह देख सकते हैं कि हम खुद को बेहतर नजर के साथ देख पा रहे हैं या नहीं।

अक्सर हम दूसरों के साथ व्यवहार में इतने ज्यादा व्यस्त होते हैं कि अपने प्रति ईमानदारी से एकाग्र नहीं हो पाते हैं लेकिन जब हम खुद के लिए समय निकालते हैं तो दुनिया पहले से ज्यादा बेहतर बन सकती है।

हमारी समस्याओं, तनावों और चिंताओं का हल तभी निकल सकता है जबकि हम खुद से प्यार करें। तभी हम अपने को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। अपने को समझे बिना और अपनी खूबियों के एहसास के बिना कोई भी व्यक्ति आनंद की अवस्था में नहीं पहुंचता है। जब आप अपनी जरूरतों को जान लेते हैं तो ज्यादा बेहतर काम कर पाते हैं। यह अपने सहारे संसार को बदलने का प्रयास भी है।

कैसे जांचें स्वयं से प्रेम है

अपने सपनों को आप प्राथमिकता देते हैं और वे ही चीजें करते हैं जो आपको प्रेरित करती हैं और अच्छा महसूस करने में मदद करती हैं।

जिन चीजों से आप सहमत नहीं होते या जो आपकी योजना में ठीक नहीं बैठती उनके लिए स्पष्ट रूप से ना"कहते हैं।

आप उन लोगों के साथ समय बिताते हैं जो आपका समर्थन करते हैं, आपको प्रेरित करते हैं और आपकी अच्छी चीजों को बढ़ावा देते हैं।

आप अपने विचारों के साथ जाना पसंद करते हैं और दूसरों को प्रसन्ना करने के लिए कोई काम नहीं करना चाहते।

आप अपने आप से बात करते हुए शांति के साथ रह पाते हैं और खुद से आपको चिढ़ नहीं होती।

आप उन नई चीजों के साथ प्रयोग का साहस कर पाते हैं जिनका अनुभव आप हमेशा से लेना चाहते थे।

आप अपने भोजन, व्यायाम और एकांत के लिए समय निकाल पाते हैं।

अपने सत्य के पक्ष में खड़े रह पाते हैं। पैसा उन चीजों में खर्च करते हैं जो आपको आश्चर्य महसूस करने में मदद करती हैं।

अच्छी चीजों को देखना और उन चीजों से दूरी रखना जो आपको नीचे ले जाती हैं।

खुद से रिश्ता बदले दुनिया

जब आप अपने से प्यार करने लगते हैं तो आप शंका और चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। हम अपनी भावनाओं और निर्णयों पर विश्वास करते हैं। यह हमें ज्यादा साहसी और प्रामाणिक बनाता है।

हम दिल से जीने लगते हैं और जिंदगी को ज्यादा उदार तरीके से देखने लगते हैं। हम अपने लिए तय की गईं सीमाओं से बाहर देखने लगते हैं और ज्यादा बड़े सपनों में विश्वास करने लगते हैं।

हम नकारात्मक पक्षों पर ध्यान देना बंद देते हैं और अपनी संभावनाओं पर ध्यान देकर अपने लिए आगे की राह खोज पाते हैं। हम यह देखते हैं कि हमारा जीवन कितने नई चीजों से भरा हुआ है।

हम सकारात्मकता, शांति, आत्मविश्वास और प्रसन्नता के साथ अपने काम में आगे बढ़ने लगते हैं। हमारे व्यवहार में एक खास तरह की तन्मयता झलकने लगती है।

Get special grace of lord shani

यमराज यदि मृत्यु के देवता हैं, तो शनि कर्म के दंडाधिकारी हैं। गलती जाने में हुई हो या अनजाने में, दण्ड तो भोगना ही पड़ेगा।

कहते हैं जिस व्यक्ति पर शनि की ढैया या साढ़ेसाती हो या फिर जाे कुंडली में शनि के अशुभ प्रभाव के कारण किसी रोग से पीड़ित है अगर वे इन उपायों को आजमाते हैं तो उसे शनिदेव की विशेष कृपा की प्राप्ति होती है और सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

1. दोनों समय भोजन में काला नमक और काली मिर्च का प्रयोग करें।

2. शनिवार के दिन बंदरों को भुने हुए चने खिलाएं और मीठी रोटी पर तेल लगाकर काले कुत्ते को खाने को दें।

3. यदि शनि की अशुभ दशा चल रही हो तो मांस-मदिरा का सेवन न करें।

4. प्रतिदिन पूजा करते समय महामृत्युंजय मंत्र ऊं नमः शिवाय का जाप करें शनि के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है।

5. घर के किसी अंधेरे भाग में किसी लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भरकर उसमें तांबे का सिक्का डालकर रखें।

6. शनि ढैया के शमन के लिए शुक्रवार की रात्रि में 8 सौ ग्राम काले तिल पानी में भिगो दें और शनिवार को प्रातः उन्हें पीसकर एवं गुड़ में मिलाकर 8 लड्डू बनाएं और किसी काले घोड़े को खिला दें। आठ शनिवार तक यह प्रयोग करें।

7. शनि के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए शनिवार के दिन काली गाय की सेवा करें। पहली रोटी उसे खिलाएं, सिंदूर का तिलक लगाएं, सींग में मौली (कलावा या रक्षासूत्र) बांधे और फिर मोतीचूर के लड्डू खिलाकर उसके चरण स्पर्श करें।

8. प्रत्येक शनिवार को वट और पीपल वृक्ष के नीचे सूर्योदय से पूर्व कड़वे तेल का दीपक जलाकर शुद्ध कच्चा दूध एवं धूप अर्पित करें।

9. शनिवार को ही अपने हाथ के नाप का 29 हाथ लंबा काला धागा लेकर उसको मांझकर(बंटकर) माला कि तरह गले में पहनें।

10 यदि शनि की साढ़ेसाती से ग्रस्त हैं तो शनिवार को अंधेरा होने के बाद पीपल पर मीठा जल अर्पित कर सरसों के तेल का दीपक और अगरबत्ती लगाएं और वहीं बैठकर क्रमशः हनुमान, भैरव और शनि चालीसा का पाठ करें और पीपल की सात परिक्रमा करें।

Thursday, 1 May 2014

It is the abode of lord shiva dham

हिमालय की 'केदार' नामक चोटी पर स्थित है देश के बारह ज्योतिर्लिगों में सर्वोच्च केदारनाथ धाम। कहते हैं समुद्रतल से 11746 फीट की ऊंचाई पर केदारेश्वर ज्योतिर्लिग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। आने वाली 4 मई को केदारनाथ के धाम खोले जाएंगे।

पुराणों के अनुसार केदार महिष अर्थात् भैंसे का पिछला अंग (भाग) है। मंदिर की ऊंचाई 80 फीट है, जो एक विशाल चबूतरे पर खड़ा है। मंदिर के निर्माण में भूरे पत्थरों का उपयोग हुआ है।

'स्कंद पुराण' में भगवान शंकर जी माता पार्वती से कहते हैं, 'हे प्राणोश्वरी! यह क्षेत्र उतना ही प्राचीन है, जितना कि मैं हूं। मैंने इसी स्थान पर सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्म के रूप में परब्रह्मत्व को प्राप्त किया, तभी से यह स्थान मेरा चिर-परिचित आवास है। यह केदारखंड मेरा चिरनिवास होने के कारण भू-स्वर्ग के समान है।'

केदारखंड में उल्लेख है, 'अकृत्वा दर्शनम् वैश्वय केदारस्याघनाशिन:, यो गच्छेद् बदरीं तस्य यात्र निष्फलताम् व्रजेत्'।

मौसम

गर्मियों में धूप खिलने पर मौसम मनोरम और रात को ठंड। बारिश होने पर पारा गर्मियों में भी शून्य से नीचे आ जाता है। जून से सितंबर तक बरसात रहती है, पहाड़ों से चट्टानें टूटकर गिरने का खतरा। अक्टूबर से कड़ाके की ठंड शुरू। दिसंबर से मार्च तक पारा शून्य से 10 डिग्री नीचे तक लुढ़क जाता है।

वेशभूषा

मई से अगस्त तक हल्के ऊनी कपड़े सितंबर से नवंबर तक भारी ऊनी कपड़े।

Monday, 28 April 2014

Hindu lucky day akshaya tritiya

अक्षय तृतीया (अखातीज) को अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलदायक माना जाता है। वैसे तो बारह महीनों के शुक्ल पक्ष की तृतीया शुभ मानी जाती है लेकिन वैशाख माह की तिथि अति स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है। माना जाता है कि इस शुभ दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है।

इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नाता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है। इस दिन को धर्मशास्त्रों में शुभ फलदायक माना गया है और इसलिए इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य आरंभ किया जा सकता है। इस दिन को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना है।

यह दिन सिर्फ परिणय मुहूर्त के लिहाज से ही ठीक नहीं है बल्कि समस्त शुभ कार्यों जिमें स्वर्ण और आभूषण खरीदने, गृह प्रवेश, पद भार ग्रहण, वाहन खरीदी, भूमि पूजतन और किसी नए व्यापार की शुरुआत के लिए भी इसे बिलकुल उपयुक्त अवसर माना गया है।

क्यों हैं अक्षय तृतीया का महत्व

हमारे धर्म शााों में अक्षय तृतीया एक प्रमुख अवसर के रूप में प्रतिष्ठित है। भविष्य पुराण के अनुसार इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। विष्णु के अवतार भगवान परशुराम, नर-नारायण और हयग्रीव तीनों इसी दिन धरा पर अवतरित हुए। हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थ बद्रीनारायण के पट भी अक्षय तृतीया को ही खुलते हैं। इस तिथि के महत्ता के कारण ही आज भी वृंदावन के बांके बिहारी के मंदिर में विग्रह के श्री चरण दर्शन केवल इस शुभ दिन को ही हो पाते हैं, शेष दिन वे पूरे वाों से ढके रहते हैं।

साढ़े तीन शुभ मुहूर्त

पूरे वर्ष में साढ़े तीन अक्षय मुहूर्त माने जाते हैं उनमें अक्षय तृतीया को प्रमुख स्थान दिया गया है। ये मुहूर्त हैं चैत्र शुक्ल गुड़ी पड़वा, वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया, आश्विन शुक्ल विजयादशमी तथा दीपावली की पड़वा का आधा दिन। इन साढ़े तीन तिथियों को शुभ फलदायक माना जाता है।

अक्षय तृतीया पर क्या करें

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने से मनोकामना पूर्ण होती है। नैवेद्य में जौ या गेहूं या सत्तू, ककडी और चने की दाल अर्पित की जाती है। तत्पश्चात फल, फूल, बर्तान तथा वस्त्र आदि दान कर दक्षिणा देने की मान्यता है। इस दिन ग्रीष्म का प्रारंभ माना जाता है इसलिए इस दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, सकोरे, पंखे, खड़ाऊं, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककडी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गर्मी के मौसम में लाभ देने वाली वस्तुओं का दान किया जाता है। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद अथवा पीले गुलाब से करना चाहिए।

जैन धर्म में भी पूजनीय

जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने एक वर्ष की तपस्ता पूर्ण करने के पश्चात इक्षु (गन्नो) रस से पारायण किया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक व पारिवारिक सुखों को का त्यागते हुए जैन वैराग्य अंगीकार किया था। सत्य और अहिंसा का प्रचार करते हुए प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहां उनके पौत्र सोमयश का शासन था।

प्रभु का आगमन सुनकर संपूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा। सोमयश के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्नो का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्नो के रस को इक्षुरस भी कहते हैं, इसी कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाने लगा।

Why to wear rudraksh

रूद्राक्ष के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक धारियां खिंची होती हैं। इन्हें मुख कहा जाता है। इन्हीं धारियों के आधार पर एकमुखी से सत्ताईस मुखी तक रूद्राक्ष फलते हैं, जिनका अलग-अलग महत्व व उपयोगिता है।

जिस रूद्राक्ष में स्वयं छिद्र होता है, चाहे वह किसी भी मुख का हो, अपने गुण-धर्म के आधार पर श्रेष्ठ होता है। रुद्राक्ष धारण करने से कभी किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होती है अत: हमारे धर्म एवं हमारी आस्था में रूद्राक्ष का स्थान रत्नों से भी उच्च है।

इस दिन पहनें रुद्राक्ष

रूद्राक्ष को हमेशा सोमवार के दिन प्रात:काल शिव मन्दिर में बैठकर गंगाजल या कच्चे दूध में धो कर, लाल धागे में अथवा सोने या चांदी के तार में पिरो कर धारण किया जा सकता है।

तीन तरह के विशेष रुद्राक्ष

गौरी शंकर रुद्राक्ष : यह रुद्राक्ष प्राकृतिक रुप से जुडा़ होता है शिव व शक्ति का स्वरूप माना गया है। इस रुद्राक्ष को सर्वसिद्धिदायक एवं मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। गौरी शंकर रुद्राक्ष दांपत्य जीवन में सुख एवं शांति लाता है।

गणेश रुद्राक्ष : इस रुद्राक्ष को भगवान गणेश जी का स्वरुप माना जाता है. इसे धारण करने से ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है। यह रुद्राक्ष विद्या प्रदान करने में लाभकारी है विद्यार्थियों के लिए यह रुद्राक्ष बहुत लाभदायक है।

गौरीपाठ रुद्राक्ष : यह रुद्राक्ष त्रिदेवों का स्वरूप है। इस रुद्राक्ष द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कृपा प्राप्त होती है।

21 तरह के विशेष रूद्राक्ष

1. एक मुखी रुद्राक्ष को साक्षात शिव का रूप माना जाता है। इस एकमुखी रुद्राक्ष द्वारा सुख-शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. तथा भगवान आदित्य का आशिर्वाद भी प्राप्त होता है।

2. दो मुखी रुद्राक्ष या द्विमुखी रुद्राक्ष शिव और शक्ति का स्वरुप माना जाता है। इसमें अर्धनारीश्व का स्वरूप समाहित है तथा चंद्रमा की शीतलता प्राप्त होती है।

3. तीन मुखी रुद्राक्ष को अग्नि देव तथा त्रिदेवों का स्वरुप माना गया है। तीन मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है तथा पापों का शमन होता है।

4. चार मुखी रुद्राक्ष ब्रह्म स्वरुप होता है। इसे धारण करने से नर हत्या जैसा जघन्य पाप समाप्त होता है। चतुर्मुखी रुद्राक्ष धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष को प्रदान करता है।

5. पांच मुखी रुद्राक्ष कालाग्नि रुद्र का स्वरूप माना जाता है। यह पंच ब्रह्म एवं पंच तत्वों का प्रतीक भी है। पंचमुखी को धारण करने से अभक्ष्याभक्ष्य एवं स्त्रीगमन जैसे पापों से मुक्ति मिलती है. तथा सुखों को प्राप्ति होती है।

6. छह मुखी रुद्राक्ष को साक्षात कार्तिकेय का स्वरूप माना गया है। इसे शत्रुंजय रुद्राक्ष भी कहा जाता है यह ब्रह्म हत्या जैसे पापों से मुक्ति तथा एवं संतान देने वाला होता है।

7. सात मुखी रुद्राक्ष या सप्तमुखी रुद्राक्ष दरिद्रता को दूर करने वाला होता है। इस सप्तमुखी रुद्राक्ष को धारण करने से महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

8. आठ मुखी रुद्राक्ष को भगवान गणेश जी का स्वरूप माना जाता है। अष्टमुखी रुद्राक्ष राहु के अशुभ प्रभावों से मुक्ति दिलाता है तथा पापों का क्षय करके मोक्ष देता है।

9. नौ मुखी रुद्राक्ष को भैरव का स्वरूप माना जाता है। इसे बाईं भुजा में धारण करने से गर्भहत्या जेसे पाप से मुक्ति मिलती है। नौमुखी रुद्राक्ष को यम का रूप भी कहते हैं। यह केतु के अशुभ प्रभावों को दूर करता है।

10. दस मुखी रुद्राक्ष को भगवान विष्णु का स्वरूप कहा जाता है। दस मुखी रुद्राक्ष शांति एवं सौंदर्य प्रदान करने वाला होता है। इसे धारण करने से समस्त भय समाप्त हो जाते हैं।

11. एकादश मुखी रुद्राक्ष साक्षात भगवान शिव का रूप माना जाता है। एकादश मुखी रुद्राक्ष को भगवान हनुमान जी का प्रतीक माना गया है। इसे धारण करने से ज्ञान एवं भक्ति की प्राप्ति होती है।

12. द्वादश मुख वाला रुद्राक्ष बारह आदित्यों का आशीर्वाद प्रदान करता है। इस बारह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान यह फल प्रदान करता है।

13. तेरह मुखी रुद्राक्ष को इंद्र देव का प्रतीक माना गया है। इसे धारण करने पर व्यक्ति को समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

14. चौदह मुखी रुद्राक्ष भगवान हनुमान का स्वरूप है। इसे सिर पर धारण करने से व्यक्ति परमपद को पाता है।

15. पंद्रह मुखी रुद्राक्ष पशुपतिनाथ का स्वरूप माना गया है। यह संपूर्ण पापों को नष्ट करने वाला होता है।

16. सोलह मुखी रुद्राक्ष विष्णु तथा शिव का स्वरूप माना गया है। यह रोगों से मुक्ति एवं भय को समाप्त करता है।

17. सत्रह मुखी रुद्राक्ष राम-सीता का स्वरूप माना गया है। यह रुद्राक्ष विश्वकर्माजी का प्रतीक भी है। इसे धारण करने से व्यक्ति को भूमि का सुख एवं कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने का मार्ग प्राप्त होता है।

18. अठारह मुखी रुद्राक्ष को भैरव एवं माता पृथ्वी का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है.

19. उन्नीस मुखी रुद्राक्ष नारायण भगवान का स्वरूप माना गया है यह सुख एवं समृद्धि दायक होता है।

20. बीस मुखी रुद्राक्ष को जनार्दन स्वरूप माना गया है। इस बीस मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति को भूत-प्रेत आदि का भय नहीं सताता।

21. इक्कीस मुखी रुद्राक्ष रुद्र स्वरूप है तथा इसमें सभी देवताओं का वास है। इसे धारण करने से व्यक्ति ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्त हो जाता है।

Tuesday, 15 April 2014

Hanuman is the only in the world is upside down

लाल लंगोट धारण किए हुए और हाथ में सोटा लिए राम भक्त हनुमानजी अहिल्याबाई की नगरी के चारों-ओर सैकड़ों वर्षों से विराजित हैं। वह कहीं रण में विजयश्री का आशीर्वाद देते रणजीत स्वरूप में हैं तो दास बगीची में भगवान राम के दास स्वरूप में। पेश है हनुमान जयंती पर रामभक्त मारुतिनंदन बजरंगबली के इंदौर स्थित मंदिर का संक्षिप्त परिचय...

सांवेर के उलटे हनुमानजी

नगर के रावेर क्षेत्र में विश्वर प्रसिद्ध पाताल विजय हनुमानन की उलटी प्रतिमा स्थापित है। दुनिया में यह एक ऐसी प्रतिमा और कहीं देखने को नहीं मिलती है। लोकप्रिय और पुरातन मंदिर होने के कारण हनुमानजी के प्रति श्रद्धा रखने वाले श्रद्धा रखने वाले लोग दूर-दूर से यहां आते हैं और रामभक्त हनुमानजी उनकी मनोकामना पूरी करते हैं।

रण को जिताने वाले रणजीत हनुमान जी

शहर के पश्चिम क्षेत्र में स्थित रणजीत हनुमान मंदिर अहिल्या नगरी के सबस ख्यात मंदिरों में शुमार है। इस मंदिर की स्थापना सवा सौ साल से भी पहल की गई थी। कहा जाता है कि युद्ध से पूर्व होल्कर शासक रण जीतने के लिए यहां स्थित हनुमानजी की पूजा-अर्चना और दर्शन करते थे। इससे उनको युद्ध में जीत हासिल होती थी। यही कारण है कि यहां स्थापित हनुमानजी का नाम रणजीत हनुमान मंदिर है।

दास बगीची में हनुमानजी का दास स्वरूप

शहर के पश्चिम क्षेत्र में ही दास बगीची में स्थापित हनुमानजी की प्रतिमा श्री फल लिए हाथ जोड़े दास स्वरुप में है। इस प्रतिमा के कारण बड़ा गणपति स्थित इस बगीची का नाम दास बगीची पड़ा। कहते हैं कि यह ढाई एकड़ क्षेत्र में फैली इस बीगीची में प्राकृतिक वातावरण आनंदित करता है। 400 वर्ष पुरानी यह मूर्ति किसी चमत्कार से कम नहीं है। जय सियाराम बाबा की तपोस्थली रहे इस स्थान में कभी निर्मल शीतल जल बहा करता था, इसलिए यहां काले पत्थरों का घाट बना हुआ है।

सिद्धि देने वाले सिद्देश्वरजी

चिड़ियाघर के सामने स्थित प्राचीन सिद्धेश्वर हनुमान मंदिर भक्तों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। 400 साल पुराने इस मंदिर में भगवान हनुमान की बालरूप की मनोहारी प्रतिमा है। कहते हैं कि 5 मंगलवार यहां आकर दर्शन करने पर भक्त की मनोकामना पूरी होती है। सिद्धि देने वाले इस मंदिर का जीर्णोद्धार होल्कर शासकों ने कराया था।

बेटमा के खेड़ापति हनुमानजी

नगर का सबसे प्रचीन हनुमान मंदिर कुम्हार मोहल्ला स्थित खेड़ापति हनुमान मंदिर है। बुजुर्गों के अनुसार यह मंदिर वर्षों पुराना होकर नगर की बसाहट के समय का है। यह मंदिर कितना पुराना है। इसे ठीक से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। कहते है यह मंदिर आल्हा-ऊदल के शासनकाल के पहले का है। शमशान रोड़ स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर भी काफी प्राचीन है। इस मंदिर की विशेषता है कि यह उत्तरमुखी है।

दक्षिणामुखी हनुमानजी

शहर के व्यावसायिक क्षेत्र के भगवान नृसिंह मंदिर स्थित हनुमान मंदिर आकर्षण का केंद्र है। कहते हैं यहां स्थापित दक्षिणामुखी आदमकद प्रतिमा 500 वर्ष पुरानी है। यह खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। मंदिर का जीर्णोद्धार होलकर शासकों द्वारा कराया गया था।

Monday, 31 March 2014

When spring turns the water of temple

कश्मीर स्थित खीर भवानी मंदिर श्रीनगर से महज 27 किलोमीटर दूर तुल्ला मुल्ला गांव में स्थित है। इस मंदिर में मां को खीर प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है इसलिए इस मंदिर को खीर भवानी मंदिर कहा जाता है।

यहां खीर का एक विशेष महत्त्व है और इसका इस्तेमाल यहां प्रमुख प्रसाद के रूप में किया जाता है। मान्यता है कि अगर यहां मौजूद झरने के पानी का रंग बदल कर सफ़ेद से काला हो जाए तो पूरे क्षेत्र में अप्रत्याशित विपत्ति आती है।

मां दुर्गा को समर्पित इस मंदिर का निर्माण एक बहती हुई धारा पर किया गया है। इस मंदिर के चारों ओर चिनार के पेड़ और नदियों की धाराएं हैं, जो इस जगह की सुंदरता पर चार चांद लगाते हुए नज़र आते हैं।

ये मंदिर, कश्मीर के हिन्दू समुदाय की आस्था को बखूबी दर्शाता है। खीर भवानी देवी के मंदिर को कई नामों से जाना जाता है जैसे 'महाराग्य देवी', 'रग्न्या देवी', 'रजनी देवी', 'रग्न्या भगवती' मंदिर अन्य नाम भी प्रचलित हैं।

इस मंदिर का निर्माण 1912 में महाराजा प्रताप सिंह द्वारा करवाया गया जिसे बाद में महाराजा हरि सिंह द्वारा पूरा किया गया। इस मंदिर की एक ख़ास बात यह है कि यहां एक षट्कोणीय झरना है जिसे यहां के मूल निवासी देवी का प्रतीक मानते हैं।

किंवदंती है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने इस मंदिर में चौदह वर्ष के वनवास के समय पूजा की थी। वनवास की अवधि समाप्त होने के बाद भगवान हनुमानजी को एक दिन अचानक यह आदेश मिला कि वो देवी की मूर्ति को स्थापित करें।

हनुमानजी ने प्राप्त आदेश का पालन किया और देवी की मूर्ति को इस स्थान पर स्थापित किया, तब से लेकर आज तक मां की मूर्ति इसी स्थान पर है।

Wednesday, 26 March 2014

Lord vishnu lives in banana leaf

हमारे देश में पेड़ पौधे संस्कृति आैर पाैराणिक कथाअों में रचे बसे हैं। कई पेड़-पौधे जहां औषधीय महत्व रखते हैं तो कई आध्यात्मिक आैर पौराणिक महत्व। शास्त्रों में भी पेड़ पौधों का महत्व दिया गया है।

ऐसा ही एक पौधा है केले का पौधा, जिसे हिंदू धर्म में काफी पवित्र माना गया है और कई धार्मिक कार्य में इसका उपयोग किया जाता है।

कहते हैं केले के वृक्ष में साक्षात भगवान विष्णु(हरि) का वास होता है। भगवत पूजा में इसका उपयाेग करने से भगवान प्रसन्न हाेते हैं आैर भक्तों को सुख समृद्धि और शांति का वर प्राप्त होता है। केले के वृक्ष को शुभ आैर संपन्नता का प्रतीक माना जाता है।

इसके पत्तों को घर के प्रवेश द्वार पर शादी विवाह और कथा के दौरान मंडप बनाने के काम में लाया जाता है।

केले के पत्ते पर भोजन ग्रहण करने वाले को उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं गुरुवार को भगवान वृहस्पतिदेव की पूजा में भी इसका महत्व है।

भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है, केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है।

मूसा जाति के इस घासदार पौधे और इस पर उत्पादित फल को आम तौर पर केला कहा जाता है । मूल रूप से यह दक्षिण पूर्व एशिया के उष्णदेशीय क्षेत्र का पाैधा है और संभवतः पपुआ न्यू गिनी में इन्हें सबसे पहले उपजाया गया था।

Friday, 21 March 2014

Chanakya and ambassador of greece

पाटलिपुत्र के मंत्री आचार्य चाणक्य बहुत ही विद्वान और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। वह एक सीधे आैर ईमानदार व्यकि् भी थे। वे इतने बडे साम्राज्य के महामंत्री होने के बावजूद छप्पर से ढकी कुटिया में रहते थे।

एक आम आदमी की तरह उनका रहन-सहन था। एक बार यूनान का राजदूत उनसे मिलने राजदरबार पहुंचा। राजनीति और कूटनीति में दक्ष चाणक्य की चर्चा सुनकर राजदूत मंत्रमुग्ध हो गया। राजदूत ने शाम को चाणक्य से मिलने का समय मांगा।

आचार्य ने कहा-'आप रात को मेरे घर आ सकते हैं।' राजदूत चाणक्य के व्यवहार से प्रसन्न हुआ। शाम को जब वह राजमहल परिसर में आमात्य निवास के बारे में पूछने लगा। तब राज प्रहरी ने बताया कि 'आचार्य चाणक्य तो नगर के बाहर रहते हैं।'

राजदूत ने सोचा शायद महामंत्री का नगर के बाहर सरोवर पर बना सुंदर महल होगा। राजदूत नगर के बाहर पहुंचा। एक नागरिक से पूछा कि चाणक्य कहां रहते हैं। एक कुटिया की ओर इशारा करते हुए नागरिक ने कहा-देखिए, वह सामने महामंत्री की कुटिया है।

राजदूत आश्चर्य चकित रह गया। उसने कुटिया में पहुंचकर चाणक्य के पांव छुए और शिकायत की-आप जैसा चतुर महामंत्री एक कुटिया में रहता है। चाणक्य ने कहा-अगर में जनता की कडी मेहनत और पसीने की कमाई से बने महलों से रहूंगा तो मेरे देश के नागरिक को कुटिया भी नसीब नहीं होगी। चाणक्य की ईमानदारी पर यूनान का राजदूत नतमस्तक हो गया।

संक्षेपः

विनम्रता में ही महानता छिपी हाेती है।