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Saturday, 5 July 2014

Devotees hold rain Baltal step

मूसलाधार बारिश के चलते शुक्रवार को बालटाल से श्री अमरनाथ की पवित्र यात्रा स्थगित कर दी गई। किसी भी श्रद्धालु को पवित्र गुफा की तरफ जाने की अनुमति नहीं दी गई।

अलबत्ता, पहलगाम के रास्ते यात्रा सुचारू रूप से जारी रही और 4,115 श्रद्धालुओं को पवित्र गुफा की तरफ रवाना किया गया। इससे पूर्व सुबह यात्री निवास जम्मू से अब तक का सबसे बड़ा 2234 श्रद्धालुओं का जत्था बालटाल व पहलगाम के लिए रवाना हुआ। शुक्रवार को कुल 5563 श्रद्धालुओं ने हिमलिंग के दर्शन किए। इसी के साथ 28 जून से शुरू हुई यात्रा में अब तक 80 हजार से अधिक श्रद्धालु पवित्र गुफा में माथा टेक चुके हैं, जबकि इस दौरान 11 यात्रियों की मौत भी हो चुकी है।

जानकारी के अनुसार, शुक्रवार तड़के से बालटाल में मूसलाधार बारिश का सिलसिला शुरू हो गया। हालांकि श्रद्धालुओं के जत्थे को पवित्र गुफा की तरफ भेजने के लिए पूरे बंदोबस्त किए गए थे, लेकिन लगातार हो रही बारिश श्रद्धालुओं की रवानगी में बाधा बनी और बालटाल से यात्रा को दिनभर के लिए स्थगित कर दिया गया। बारिश के चलते हेलीकॉप्टर सेवा भी सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दी गई। अलबत्ता 11 बजे के बाद यह सेवा बहाल की गई और 172 श्रद्धालुओं को पवित्र गुफा की तरफ रवाना किया गया। उधर, पहलगाम से यात्रा सुचारू

ढंग से जारी रही और इस बीच 4,115 श्रद्धालुओं में 3560 पुरुष, 469 महिलाएं, 64 साधु तथा 22 बच्चे यात्रा पर रवाना हुए। हेलीकॉप्टर से भी 312 श्रद्धालु गुफा तक पहुंचे। 

Hopes are now pinned on the Nanda Devi Rajjat ??Chardham

बीते वर्ष जून माह में आई आपदा से इस वर्ष यात्रा सीजन में भी सीमांत जनपद चमोली का पर्यटन व्यवसाय बुरी तरह ठप रहा है, लेकिन जैसे-जैसे नंदादेवी राजजात यात्रा शुरू की तिथि समीप आ रही है ऐसे में एकबार फिर से क्षेत्रवासियों व व्यापारियों में मेहमानों के आने उम्मीद बंधी है।

गौरतलब है कि चारधाम यात्रा के साथ नंदादेवी राजजात यात्रा का मुख्य पड़ाव कर्णप्रयाग (ईडाबधाणी)है। इससे आगे मोटर मार्ग से जुडे नौटी व कांसुवा पड़ावों की यात्रा शुरू होती है लेकिन सर्वाधिक भीड़ कर्णप्रयाग के ईडाबधाणी सहित चांदपुरगढ़ी, कांसुवा में जुटती है। इससे आगे का सफर पिंडरघाटी से गुजरता है जहां आज भी मोटर मार्ग सहित पैदल मार्गो की स्थिति आपदा के बाद किसी से छिपी नही है।

भले ही एक ओर जहां प्रदेश सरकार सुरक्षा के मद्देनजर देवाल के वेदनी से आगे 10 हजार से अधिक तीर्थ यात्रियों के न जाने व मेडिकल जांच उपरांत ही यात्रा की बात कह रही हो, लेकिन आज भी दूरस्थ पड़ाव नगर क्षेत्र सहित दूरस्थ गांवों के लोग क्षेत्र की अराध्य देवी की ससुराल में विदाई को भव्य रूप से मनाते हैं और इस दौरान आयोजित होने वाली 280 किमी की पैदल यात्रा में बढ़-चढ़ कर भाग लेकर माता को श्रंगार सामग्री अर्पित कर विदा करते हैं।

Try this easy solution is to please lord shani

शनिदेव की कृपा के लिए शनि भक्त क्या-क्या नहीं करते, मंदिर जाते हैं। उपवास रखतें हैं और जब भक्तों की मुराद पूरी हो जाती है तो वह शनिदेव की भक्ति भाव से निहाल हो जाते हैं। अगर शनिभक्त शनिदेव की आराधना सच्चे मन से करे तो सूर्यपुत्र उनकी मनोकामना पूरी करने में कभी देर नहीं करते हैं।

सूर्यपुत्र शनिदेव को कैसे प्रसन्न किया जाए यह सवाल हर भक्त के मन में जरूर रहता है। यहां हम आज बहुत ही आसान से उपाय बता रहे हैं जिन्हें आजमाकर आप शनिदेव को जल्द से जल्द प्रसन्न कर सकते हैं।

    शनिवार को पीपल के वृक्ष के चारों और 7 बार कच्चा सूत लपेंटे और यह क्रिया करते समय शनि के किसी भी एक मंत्र का जप करते रहें। इसके बाद वृक्ष का धूप-दीप से पूजन करें। ध्यान रखें जब यह पूजा करें उस दिन बिना नमक का भोजन ही करें।

    शनिदेव के प्रकोप को शांत कर उनको प्रसन्न करने के लिए आप शनि की पत्नी के नामों का नित्य पाठ करें तो शुभ रहेगा। मंत्र कुछ इस तरह है।

ध्वजिनी धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिहा।

कंकटी कलही चाउथ तुरंगी महिषी अजा।।

शनैर्नामानि पत्नीनामेतानि संजपन् पुमान्।

दुःखानि नाश्येन्नित्यं सौभाग्यमेधते सुखमं।।

    यदि कुष्ठरोग वंशानुगत न होकर शनि के कोप के कारण हुआ है तो इससे मुक्ति पाने के लिए डॉक्टरी सलाह के साथ इस मंत्र का जाप करने से यह रोग दूर हो सकता है।

ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चरायः नमः

    शनिग्रह के अशुभ प्रभाव के कारण शरीर पर चर्म रोग हो जाए शनिवार के दिन बिछुआ की जड़( एक प्रकार का जंगली पौधा) को बाजू में बांधने से आपकी आशा के अनुरूप लाभा होता है।

    नीलम को शनि का रत्न माना जाता है। इसका प्रभाव क्योंकि तत्काल प्रारंभ हो जाता है। इसल इसे धारण करते समय सावधानी रखें।

    प्रत्येक शनिवार को वट और पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय से पहले कड़वे तेल का दीपक जलाकर कच्चा दूध अर्पित करें। शनिदेव जरूर प्रसन्न होंगे।

Source: Spiritual Hindi Stories & Rashifal 2014

Some will love the new

जीवन में हमेशा नएपन के लिए प्रयास करना चाहिए। जब हम कुछ नया करेंगे तो वह सीधे-सीधे हमारी प्रसन्नता की वजह बनेगा। अपने संस्थान में ऐसा माहौल बनाने के लिए कोशिश करना ही चाहिए।

हमारे जीवन में कुछ नया रचने या नया करने का महत्व हमेशा बना रहता है। अगर आप इसे (इनोवेशन) अपनी रचनात्मकता के साथ संभालते हैं तो आपका जीवन अधिक आनंददायक बनता है। आप का नजरिया कैसा है इसी से आप ऊंचाई हासिल करते हैं। अगर आप सबकुछ जानते हैं लेकिन कुछ नहीं करते तो वह ऐसे ही है कि आप कुछ भी नहीं जानते।

हमें इसे बहुत स्पष्ट शब्दों में समझने की जरूरत है कि 'अगर आप चीजों को उसी तरह करते रहते हैं जैसा कि पहले करते रहे हैं तो आप उतना ही पाएंगे जो पा चुके हैं।" इसलिए जीवन के हर क्षेत्र में कुछ नया करने की जरूरत होती है। जब आप नए प्रयोग करना छोड़ देते हैं तो आप चीजों को ढोने लगते हैं। वे आपको नई ऊंचाई भी नहीं देती।

एक छोटी-सी कहानी है। एक 10 वर्ष के बच्चे का बायां हाथ किसी दुर्घटना में जाता रहा और उसने अपने दाएं हाथ के सहारे ही जूडो सीखना शुरू किया। उसके गुरु ने उसे केवल एक वार सिखाया। तीन वर्षों तक धैर्य के साथ इसका अभ्यास करने के बाद उसने एक जूडो प्रतिस्पर्धा में भाग लिया और स्पर्धा जीत ली। उसने अपने गुरु से पूछा कि स्पर्धा में भाग लेने वाले

खिलाड़ी तरह-तरह से वार करना जानते थे जबकि उसे तो सिर्फ एक ही वार आता था फिर भी उसने सभी को परास्त कर दिया, कैसे? गुरु ने उत्तर दिया कि भले ही शारीरिक रूप से तुम पूर्ण नहीं थे लेकिन तुमने जो वार सीखा था उसकी काट के लिए प्रतिस्पर्धी को तुम्हारे बाएं हाथ को पकडना जरूरी था और इस तरह कमजोरी ही तुम्हारी ताकत बन गई। अगर हमारी कमजोरी ही हमारी ताकत बन जाए तो हम जीत सकते हैं। यही इनोवेशन है। अपनी कमजोरियों के साथ भी कुछ नया कर दिखाने का प्रयास ही जीत दिलाता है।

हममें से सभी को उन क्षेत्रों में इनोवेशन के लिए प्रयास करना चाहिए जिनसे हम जुड़े हैं। भले ही हम अपनी संस्था के लिए कुछ नया करें या फिर अपने जीवन में। अगर हम कुछ भी नया करने का प्रयास करेंगे तो उसका नतीजा हमारी खुशी के रूप में सामने आएगा। हम अपना महत्व समझेंगे और चीजों से जुड़ाव को महसूस कर सकेंगे। किसी संस्थान को अपने मूल लक्ष्य के साथ-साथ इसके लिए भी प्रयास करना ही चाहिए कि वहां लोग नयापन लाने के लिए कोशिश करें। नए प्रयोग करें।

अगर ऐसा किया जाता है तो हम पाएंगे कि उस संस्था में नया रचने का उत्साह दिखाई देने लगता है और वहां एक बढ़िया माहौल पैदा होता है। किसी संस्था में रिसर्च और नॉलेज मैनेजमेंट शाखा को इस बात का पता लगाना चाहिए कि संस्था के मिशन और विजन केवल एक रूटीन अभ्यास बनकर न रह जाएं बल्कि वे विचार के स्तर पर होने वाला अभ्यास हों। अगर ऐसा प्रयास नहीं होगा तो मिशन और विजन कभी पूरे नहीं होंगे।

लेकिन सिर्फ विचार ही सबकुछ नहीं है बल्कि कोई भी विचार वास्तविकता में बदलने लायक भी होना चाहिए। किसी भी विचार को कार्यरूप में कैसे बदलेंगे इसके लिए भी आपके पास एक योजना होना चाहिए। उदाहरण के लिए दांत का दर्द से गुजरने वाले व्यक्ति के लिए वह दर्द एक सचाई है।

ऐसे में कयास नहीं लगाए जा सकते बल्कि उसे राहत देना महत्वपूर्ण होता है। आशय है, सिर्फ कल्पना या बातें नहीं हों। कोई भी योजना ऐसी हो कि उसे कार्यरूप में बदला जा सके। आखिरकर किसी भी विचार का कार्यरूप में बदलना भी बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

किसी भी संस्था और संगठन की नीति ऐसी होना चाहिए कि सभी लोग उसके लिए काम करें न कि एक ढर्रे का पालन करें। अपनी रणनीति को लगातार बदलना, नॉलेज को लगातार अपडेट करना यह बहुत जरूरी होता है। यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। ऐसा नहीं है कि एक बार रणनीति बना दी और फिर हमेशा के लिए उससे मुक्ति पा ली जाए। यानी नएपन का महत्व यहां भी हमेशा बना रहता है।

इसके अलावा किसी भी संस्था में टीम भावना हमेशा होना चाहिए ताकि कर्मचारी अलग-अलग टुकडों में काम करने के बजाय समूह के रूप में अच्छा काम कर सकें। किसी भी संस्थान की स्थिति उसकी टीम से बेहतर होती है किसी एक व्यक्ति से नहीं। इसके अलावा संस्थान में उत्साहजनक वातावरण होना ही चाहिए।

ऐसे वातावरण में ही व्यक्ति बढ़िया प्रदर्शन कर पाता है। उत्साह से नए विचार आते हैं। ऐसा संस्थान जहां चीजें जम गई हों वहां नयापन नहीं दिखाई देता। यह उत्साह कैसे बनाया रखा जाए इसके लिए प्रयास करने चाहिए। उत्साह है तो ही इनोवेशन होगा।

Friday, 4 July 2014

Weather interrupted the helicopter service, continue hiking Amarnath

खराब मौसम के बावजूद वीरवार को श्री अमरनाथ यात्रा जारी रही, हालांकि हेलीकॉप्टर सेवा बाधित रहने से श्रद्धालु हवाई मार्ग से यात्रा पर नहीं जा पाए। सुबह 8808 श्रद्धालु बालटाल और पहलगाम से पैदल यात्रा पर निकले।

देर शाम तक करीब दस हजार श्रद्धालुओं ने पवित्र हिमलिंग के दर्शन कर लिए थे। इसी के साथ छह दिनों में पवित्र गुफा में माथा टेकने वालों का आंकड़ा 70 हजार पार कर गया। इस बीच, दो और श्रद्धालुओं की पवित्र गुफा के पास हृदयगति रुकने से मौत हो गई। इस साल यात्रा के दौरान मरने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 10 हो गई है। अलबत्ता, इनमें से तीन की मौत हादसों में हुई है।

यात्रा के दोनों आधार शिविर बालटाल व पहलगाम में बुधवार रात को रुक-रुककर बारिश जारी रही। उम्मीद थी कि सुबह मौसम पूरी तरह साफ हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक बार तो यात्रा को स्थगित करने पर भी विचार किया गया, लेकिन मौसम में हल्के सुधार व यात्रा मार्ग को श्रद्धालुओं के आवागमन योग्य सुरक्षित पाए जाने पर यात्रा की अनुमति दे दी गई। अलबत्ता, धुंध छाए होने के कारण हेलीकॉप्टर सेवा को दिनभर स्थगित रखा गया।

संबंधित अधिकारियों ने बताया कि सुबह बालटाल से 5209 और पहलगाम के रास्ते 3299 श्रद्धालु दर्शन को निकले। इस बीच, वीरवार सुबह दो श्रद्धालु पवित्र गुफा के पास अचेत पाए गए। दोनों को तुरंत निकटवर्ती चिकित्सा शिविर ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने दोनाें को मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों के मुताबिक, इन दोनों की मृत्यु हृदयगति रुकने से हुई है। मृतकों की पहचान बलवंत सिंह पुत्र जगराम निवासी मकान नंबर 140, छोटी माता मंदिर के पास, गुड़गांव, हरियाणा और मूर्तिगिरि स्वामीनाथन पुत्र गुरुप्रेम गिरि निवासी समराओ स्ट्रीट फोर्ट तमिलनाडु के रूप में हुई है।

The Board agreed on the formation of Jay Srin

नीलकंठ महादेव मंदिर का अधिग्रहण कर यहां मां वैष्णो देवी की तर्ज पर श्राइन बोर्ड के गठन की राह आसान हो गई है। शासन के निर्देश पर वीरवार को हुई आम बैठक में क्षेत्रीय जन प्रतिनिधि व संगठनों ने इस मसौदे पर हामी भरी।

तहसील प्रशासन दो दिन के भीतर इस संबंध में रिपोर्ट सौंपेगा। श्रावण मास की नीलकंठ यात्रा के दौरान करीब 30 लाख श्रद्धालु नीलकंठ महादेव मंदिर में आते हैं। वैसे तो पूरे साल श्रद्धालुओं का यहां आना-जाना होता है। समुचित इंतजाम न होने से नीलकंठ मार्ग और मंदिर क्षेत्र में अव्यवस्थाएं हावी हो जाती हैं। स्थानीय लोगों को भी इस वजह से परेशानियां उठानी पड़ती है। श्रावण मास में लोग ज्यादा परेशान रहते हैं। इसके मद्देनजर राज्य आंदोलनकारी इंद्रदत्त शर्मा ने ग्रामीणों के साथ नीलकंठ मंदिर के अधिग्रहण के लिए आंदोलन की शुरुआत की।

फरवरी माह में सचिव धर्मस्व डॉ. उमाकांत पंवार ने जिलाधिकारी पौड़ी को नीलकंठ में श्रइन बोर्ड के गठन के लिए क्षेत्र के जन प्रतिनिधियों, ग्रामीणों व मंदिर समिति के साथ बैठक कर सुझाव आमंत्रित करने को कहा था। वीरवार को लक्ष्मण झूला स्थित डीएम कैंप कार्यालय में तहसील प्रशासन की पहल पर आम बैठक बुलाई गई। इसमें पूर्व ब्लॉक प्रमुख शमशेर सिंह सजवाण, पूर्व सैनिक संगठन के केंद्रीय संरक्षक शोभाराम रतूड़ी, सत्यपाल राणा आदि ने श्राइन बोर्ड का गठन को जनहित में जरूरी बताया। उनका कहना था कि नीलकंठ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है।

मंदिर समिति सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं कर पा रही है। सारा खर्च प्रशासन को उठाना पड़ता है। सुलोचना पयाल, वेदप्रकाश शर्मा, डीएस गुसांई, बंशी लाल नौटियाल, शमशेर सिंह आदि ने कहा कि श्राइन बोर्ड गठित होने से इस तीर्थ क्षेत्र का विकास होगा। राज्य आंदोलनकारी इंद्रदत्त शर्मा ने चेताया कि एक सप्ताह के भीतर इस बाबत जिला प्रशासन से शासन को रिपोर्ट नहीं जाती है तो जनता पुन: आंदोलन को बाध्य होगी। नीलकंठ मंदिर समिति के प्रतिनिधि धन सिंह राणा ने भी जनहित में श्राइन बोर्ड का समर्थन करते हुए मंदिर समिति द्वारा क्षेत्र में कराए जा रहे कार्यो का ब्योरा प्रस्तुत किया।

तहसीलदार एससी ध्यानी ने कहा कि बैठक में सभी लोगों ने श्राइन बोर्ड गठन के समर्थन में अपनी बात रखी है। वह दो दिन के भीतर जिलाधिकारी को इस संबंध में अपनी रिपोर्ट सौंप देंगे। बैठक का संचालन प्रधान संगठन के निवर्तमान ब्लॉक अध्यक्ष सत्यपाल सिंह पयाल ने किया। बैठक में देवेंद्र सिंह राणा, महिपाल सिंह पयाल, राजेंद्र जुगलान, तौली केप्रधान रविंद्र सिंह, आलम सिंह नेगी, बैरागढ़ के प्रधान अरुण जुगलान, पूर्व प्रधान कृपाल सिंह, श्रीधर प्रसाद नौटियाल, सुरेंद्र सिंह सजवाण आदि उपस्थित थे।

नीलकंठ मंदिर- गेंद प्रशासन के पाले में

नीलकंठ महादेव मंदिर के अधिग्रहण व यहां श्रइन बोर्ड के गठन की मांग पर क्षेत्रीय जनता ने मोहर लगा दी है अब गेंद प्रशासन के पाले में है। शासन के आदेश पर पांच माह बाद बैठक बुलाकर प्रशासन की मंशा पर सवाल खड़े हुए हैं। महत्वपूर्ण बैठक में उप जिलाधिकारी के न पहुंचने पर स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी जताई। नीलकंठ महादेव मंदिर से जुड़ी इस मांग को लेकर चले आंदोलन के बाद दो वर्ष की अवधि में नायब तहसीलदार, तहसीलदार, उप जिलाधिकारी यमकेश्वर व जिलाधिकारी पौड़ी पूर्व में नीलकंठ मंदिर के अधिग्रहण को लेकर सहमति रिपोर्ट शासन को भेज चुके थे। शासन स्तर पर लंबित इस मामले में मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारी पौड़ी को आदेश जारी किए थे। इसी क्त्रम में 28 फरवरी को सचिव धर्मस्व उत्तराखंड उमाकांत पंवार की अध्यक्षता में आंदोलनकारियों की बैठक हुई। इस बैठक के बाद सचिव धर्मस्व ने जिलाधिकारी पौड़ी को आदेश जारी कर निर्देशित किया कि एसडीएम के द्वारा नीलकंठ मंदिर में श्रइन बोर्ड के गठन के लिए आम बैठक बुलाई जाए। इसके बाद भी पांच माह तक बैठक न बुलाने पर प्रशासन की मंशा पर सवाल उठते रहे। आखिरकार गुरुवार को डीएम कैंप कार्यालय लक्ष्मण झूला में बुलाई गई बैठक में यमकेश्वर के उप जिलाधिकारी नहीं पहुंचे। एसडीएम की अनुपस्थिति यहां पहुंचे जन प्रतिनिधियों और ग्रामीणों को अखरी। इन सभी लोगों ने एसडीएम के खिलाफ प्रदर्शन कर उन्हें यहां से अन्यत्र भेजे जाने की मांग की। इस मामले को लेकर राज्य आंदोलनकारी इंद्रदत्त शर्मा ने कहा कि नीलकंठ मंदिर जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर जिला प्रशासन की भूमिका को सही नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी महत्वपूर्ण बैठक में एसडीएम का न आना कई सवालों को जन्म देता है। 

Why not throw the stone on the money

एक बार महाराज रणजीत सिंह कहीं जा रहे थे। सामने से एक ईंट आकर उन्हें लगी। सिपाहियों नें चारों ओर नजर दौड़ाई, तो एक बुढ़िया दिखाई दी। उसे गिरफ्तार करके महाराज के सामने हाजिर किया गया।

बुढ़िया महाराज को देखते ही डर गई। वह बोली, सरकार, मेरा बच्चा कल से भूखा था। घर में खाने को कुछ न था। इसलिए पेड़ पर पत्थर मारकर कुछ फल तोड़ रही थी, किंतु एक पत्थर भूलवश आपको लग गया।

वह बोली कि मैं निर्दोष हुं क्यों कि यह गलती मुझसे जानबूझकर नहीं हुई है। महराज ने कुछ देर सोचा और कहा कि बुढ़िया को एक हजार रुपया देकर सम्मान पूर्वक विदा किया जाए। तब सभी दरबारी चुप हो गए। तब एक मंत्री ने पूछा जिसे दंड मिलना चाहता उसे आप सम्मान दे रहे हैं।

तब रणजीत सिंह बोले कि, यदि वृक्ष पत्थर लगने पर मीठा फल दे सकते है तो पंजाब का महाराज उसे खाली हाथ कैसे लौटा सकता है?

संक्षेप में

परोपकार करना हमें पेड़ों से सीखना चाहिए। जिन्हें हम पत्थर मारते हैं तो वह हमें फल देते हैं।


It only vegetarian village

गुजरात का भावनगर शहर के नजदीक है जैन तीर्थ पलीताना शहर यह एक छोटा कस्बा है। यहां रहने वालों की चर्चा अमूमन यहां आने वाला हर व्यक्ति जरूर करता है क्योंकि यह देश का एकमात्र शहर है जहां शाकाहारी लोग रहते हैं।

यहां कई धर्मों के लोग रहते हैं जिनमें मुस्लिम और जैन धर्म को मानने वाले लोगों की तादात अन्य धर्मों की अपेक्षा अधिक है।

यहां रहने वाले जैन सन्यासी चाहते हैं कि सरकार भी इस कस्बे को शाकाहारी कस्बे का दर्जा दे। इस अनोखी मांग को लेकर करीब 200 जैन संन्यासी गुजरात सरकार यह मांग कर चुके हैं।

पलीताना के प्रशासनिक अधिकारी भी मानते हैं की यहां की जनसंख्या 65,000 है। जिसमें से 17,000 मुस्लिम हैं। यहां मुस्लिम धर्म को मानने वाले लोग भी अब शाकाहार को प्राथमिकता दे रहे हैं। शाकाहर का बढ़ावा देने के लिए पहले भी जैन संन्यासी विद्या सागर महाराज भी पहल कर चुके हैं।

करीब एक सप्ताह पहले ही पलीताना को हिंसा मुक्त शहर का दर्जा देने के लिए कई सामाजिक संगठनों ने सहमति प्रकट की है। यहां शाकाहार को बढ़ावा देने वाले इस आंदोलन की शुरूआत सन् 1999 से जारी है। जिसमें यहां के निवासियों ने कानूनी तौर पर लंबा अभियान चला चुके हैं।

जैन मुनियों की इस पहल को लेकर यहां का मुस्लिम वर्ग तैयार नहीं था पर धीरे-धीरे समय करवट लेता गया और जैन मुनियों के शाकाहार आंदोलन सहयोग देना शुरू कर दिया। आलम यह है कि यहां का हर घर आज शाकाहार को बढ़ावा दे रहा है।

इस क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिम परिवार मानते हैं कि उन्हें नॉनवेज खाना जैसे अंडा, चिकिन खाना काफी पसंद है, पर यहां के लोगों का शाकाहार के प्रति बढ़ावा देखते हुए उन्होंने मांसाहर छोड़कर शाकाहारी बनना पसंद किया।

इसी तरह यहां कई साल पहले आईं एक इंग्लिश मीडियम स्कूल की प्रिसिंपल भी कहती हैं कि यहां आकर उनका पूरा परिवार शाकाहारी हो गया है।


Kashi kalpvriksh

वाराणसी के छावनी क्षेत्र में एक ऐसा भी वृक्ष है जिसके साथ लोगों की आस्था और विश्वास जुड़ा है। अनंत फलदायी कल्पवृक्ष के रूप में पूजित वृक्ष कल्पतरु की शाखा है।

सवाल श्रद्धालुओं की भावनाओं पर ही छोड़ दें तो भी लगभग 34 फीट की विशाल परिधि वाला यह वृक्ष पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी संरक्षण और संवर्धन के प्रयास मांगता है।

चिंता की बात यह है कि समय के थपेड़े झेलते-झेलते जर्जर हो चला पूर्वाचल में अपने वंश का यह बिरला पेड़ वजूद के संकट के दौर से गुजर रहा है। उसकी छाल ढीली पड़ चुकी है और स्थूल तनों तथा सुपुष्ट शाखाओं में कीड़े लग जाने से छिद्र भी दीखने लगे हैं।

बंगला नंबर 29

हरियाले छावनी क्षेत्र में वृक्ष का पता बंगला नंबर 29 है जो स्व. प्रो. बीबी सिंह बिसेन के नाम है। बताते हैं कि करीब पांच वर्ष पूर्व स्व. श्री विसेन के बंगले पर मांगलिक समारोह था जिसमें शामिल होने के लिए तत्कालीन वन संरक्षक (वाराणसी मंडल) आर हेमंत कुमार भी पहुंचे थे। उनकी नजर वृक्ष पर पड़ी तो वे ठिठक गए। सुबह फिर बंगले पर पहुंचे तो जांच में वृक्ष कल्पतरु निकला।

134 फीट वृक्ष का तना

बताते हैं कि जब आर हेमंत कुमार ने जांच की थी तो उस वक्त पेड़ के तने की मोटाई करीब 30 फीट थी लेकिन वर्तमान में उसके तने की मोटाई करीब 34 फीट हो गई है। पेड़ की दो शाखाओं की मोटाई भी काफी अधिक है

जरूरी जानकारियां

    फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने वर्ष 1775 में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था। पाया जाता है फ्रांस, इटली, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया।

    भारत में रांची, अल्मोड़ा, नर्मदा के तटीय क्षेत्रों और कर्नाटक आदि में। औसत आयु 2500-3000 साल। मोटा तना, टहनी लंबी, कमल के फूल में रखी किसी छोटी गेंद में निकले मरमरी रेशे वाले फूल, नारियल की तरह फल।

वृक्ष से स्वास्थ्य लाभ

आयुर्विज्ञानियों के अनुसार वृक्ष की 3 से 5 पत्तियों का सेवन करने से दैनिक पोषण की जरूरत पूरी, उम्र बढ़ाने में सहायक हैं।


Wednesday, 2 July 2014

50 thousand devotees pulled the chariot

पिछले सात साल से भुवनेश्वर वाणीक्षेत्र स्थित जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा का आयोजन किया जा रहा है। इस साल 29 जून रविवार को मंदिर प्रांगण से रथ यात्रा मंदिर के मुख्य संरक्षक एवं कीट्-कीस् के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत द्वारा छेरापंहरा किए जाने के साथ आरंभ हुई।

पहले चरण में देव विग्रहों को पहंडी विजय कराकर रथारूढ़ किया गया और लगभग 50 हजार जगन्नाथ भक्तों ने अपने हाथों से बलभद्रजी के तालध्वज रथ, सुभद्राजी के देवदलन रथ और जगन्नाथजी के नंदिघोष रथ को खींचकर अपने मानव जीवन को सार्थक बनाया। रथारूढ़ चतुर्धा देवों बलभद्रजी, सुभद्राजी, सुदर्शनजी और जगन्नाथजी ने रथ पर ही रात्रि विश्राम किया। दूसरे दिन सोमवार को पहंडी विजय कराकर उन्हें गुंडिचा मंदिर लाया गया, जहां उन्हें महा स्नान कराकर नवीन वस्त्र से सुशेभित किया गया। ऐसी मान्यता है कि लंबी यात्रा के उपरांत देव विग्रह काफी थक जाते हैं इसलिए उनको महास्नान कराया जाता है।

इस शोभायात्रा का हजारों जगन्नाथ ने अपने अपने घर की छतों पर से ही आनंद लिया। मंदिर के प्रशासक श्री केके राउत के अनुसार सब कुछ बहुत अच्छा रहा यहां तक कि मौसम ने भी साथ दिया और कीट्-कीस् के बच्चों के साथ-साथ सभी संकाय प्रमुखों, सदस्यों एवं कर्मचारियों ने स्वेच्छा से इसमें योगदान दिया।

प्राचीन नगरी कटक में पूरी श्रद्धा के साथ जगन्नाथ जी की रथयात्रा संपन्न हुई। कटक के दो प्रमुख जगन्नाथ मंदिर दोलमुंडई पतित पावन जीउ मंदिर एवं चांदनी चौक जगन्नाथ मंदिर के पास हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भी़ड़ उमड़ी।

सुबह से दोनों जगहों पर पुरी की ही तरह तमाम रीति रिवाज के अनुसार सूर्य पूजा व मंगल आरती आदि रस्म अदा की गई। इसके बाद चतुर्धा मूर्ति की पहंडी व छेरा पहंरा किए जाने के बाद अपराह्न् को रथ खींचा गया। दोलमुंडाई रथ सेमीनारी चौक से होकर मौसी मां मंदिर परिसर पहुंचा। ठीक उसी तरह चांदनी चौक रथ भी शांतिपूर्ण तरीके से गुंडिचा मंदिर पहुंचने के बाद शताधिक श्रद्धालुओं की भीड़ दोनों जगह देखी गई। हालांकि कुछ सालों के परंपरा के मुताबिक दोनों जगहों पर माता सुभद्रा के रथ को महिलाओं ने खींचा। रथयात्रा के चलते कमिश्नरेट पुलिस की तरफ से सुरक्षा के इंतजाम किए गए थे। दोनों जगहों पर धारा विवरण व प्रवचन सुबह से लेकर रात 10 बजे तक चला। दोनों जगहों पर रातभर भीड़ काफी संख्या में श्रद्धालु जमे रहे।

Start holy Ramadan, Iftar compliments from palm

रमजानुल मुबारक के पवित्र माह में सोमवार की शाम मगरिब की अजान होने के साथ खजूर से पहले रोजे का इफ्तार किया गया। काफी लोगों ने मुल्क की सलामती, खुशहाली, सेहत, रोजगार में बरकत आदि की दुआएं की।

कई मस्जिदों में बांस में बल्ब लगाया गया था। अजान के साथ ही लाल बल्ब जला दिया गया। ताकि अजान की आवाज नहीं पहुंचने पर जलता हुआ बल्ब इफ्तार के समय का सूचक बन जाए। इफ्तार से पहले दुकानों पर भीड़ - रमजानुल मुबारक के पहले रोजे पर इफ्तार से पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में अस्थायी इफ्तारी की दुकानों पर भीड़ नजर आई।

दातून की बढ़ी मांग-रोजेदार किसी भी सुगंध वाले मंजन से दांत साफ नहीं कर सकते यही वजह है कि इन दिनों दातून की मांग बढ़ गई है। आम दिनों में जो दातून 1 रुपये में मिल जाता था वही अब 2 रुपये में मिल रहा है।

लोगों ने खजूर की खरीददारी में दिलचस्पी दिखाई। फलों में अनन्नास, सेब, केला, अनार, पपीता, आम की खरीदारी की गई। घरों में मनोरंजक कार्यक्रम बंद - रहमतों व इबादतों के इस माह में लोगों ने अपने घरों में टीवी सेट पर होने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों को फिलहाल देखना बंद कर दिया है। घरों से नातिया कलाम, कुरान की तिलावत की सदा गूंज रही है। प्रत्येक शख्स किसी न किसी रूप में अल्लाह और उसके रसूल का जिक्र कर रहा है। कोई भी इस माह में बिना इबादत के नहीं रहना चाहता।

कटक- पवित्र रमजान का महीना सोमवार को शुरू हो गया। कटक व भुवनेश्वर समेत पूरे राज्य में रमजान के मद्देनजर सोमवार की सुबह से मस्जिदों के सामने खास चहल-पहल देखी गई। भुवनेश्वर में रहने वाले हजारों की संख्या में मुसलमान भाइयों ने रमजान महीने को पूरी निष्ठा के साथ मनाने के लिए पिछले कई दिनों से खुद को एवं परिवार को तैयार किए हुए थे। आज आखिरकार वह दिन आ गया और उसी के मद्देनजर सभी मुसलमान परिवार में माहौल कुछ खास देखने को मिला। सुबह के समय नहा-धोकर मुसलमान संप्रदाय के लोग मस्जिदों में पहुंचे और नमाज अदा की। कटक के दरघा बाजार में कदम रसूलए ओडिआ बाजार में स्थित मोती मस्जिद, सतीचौरा में मौजूद ईदगाह मैदान में हजारों की संख्या में मुसलमान संप्रदाय के लोग एकत्र होकर सामूहिक नमाज अदा की। इस मौके पर मस्जिद के मौलवी लोगों को इस महीने के अहमियत के बारे में जानकारी दी और निष्ठा के साथ मनाकर पुण्य कमाने का आह्वान किया। 

Attention! Do not ever be betrayed heart

अगर आपको सांस लेने में दिक्कत है और आप मधुमेह पीड़ित हैं तथा श्री बाबा अमरनाथ की यात्रा के लिए पंजीकरण भी करवा चुके हैं तो लापरवाही न बरतें। आपकी जरा सी लापरवाही आपकी जान के लिए खतरा बन सकती है। सिर्फ स्वास्थ्य प्रमाणपत्र हासिल करने से आप स्वस्थ्य नहीं हो जाते, यात्रा के दौरान स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

इन दिनों चल रही श्री बाबा अमरनाथ की यात्रा में चार दिन में चार श्रद्धालुओं की हृदयघात से मौत हो चुकी है। यात्रा के दौरान सावधानियां न बरतना महंगा पड़ रहा है। यात्रा में लापरवाही के कारण ही वर्ष 2009 में 45 श्रद्धालुओं की हार्ट अटैक के कारण मौत हो गई थी। इसके अगले वर्ष 2010 में सरकार द्वारा श्रद्धालुओं के लिए मेडिकल प्रमाणपत्र अनिवार्य करने के बावजूद मरने वालों की संख्या 68 हो गई।

वर्ष 2011 में तो 105 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। इसके बाद बोर्ड ने फिर से स्वास्थ्य प्रमाणपत्र को अनिवार्य किया और सुप्रीम कोर्ट ने भी यात्रियों को हर संभव स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए। लेकिन मात्र स्वास्थ्य प्रमाणपत्र हासिल करने से ही कुछ नहीं होता। इसके लिए आपको स्वयं भी कई सावधानियां बरतने की जरूरत है। मेडिसीन के विशेषज्ञ डॉ. नीरज शर्मा का कहना है कि बोर्ड जो हेल्थ एडवाइजरी जारी करता है, उसका भी यात्री पालन नहीं करते हैं। यात्रा के दौरान अक्सर देखा गया है कि शहरों में रहने वाले श्रद्धालु अधिक बीमार होते हैं। इन लोगों को पैदल चलने या फिर पहाड़ी क्षेत्रों में चलने का अभ्यास नहीं होता। अमरनाथ यात्रा के दौरान जब इन लोगों को अचानक पहाड़ी क्षेत्र में चलना पड़ता है तो उनके दिल को पर्याप्त आक्सीजन नहीं मिल पाती। इससे यात्री को हार्ट अटैक हो जाता है।

श्रइन बोर्ड की ओर से जारी हेल्थ एडवाइजरी का करें पालन-

यात्रा में जाने के लिए यह जरूरी है कि पैदल चलने की आदत डालें। यात्रा में आने से ठीक पहले भी डॉक्टरों से स्वास्थ्य की जांच करवाएं। अगर आप हृदय रोगी हैं, बाईपास सर्जरी करवाई है तो यात्र में भाग लेने से परहेज करें। मधुमेह, ब्लडप्रेशर या फिर किसी अन्य बीमारी के मरीज यात्रा के दौरान भी नियमित दवाइयां लें। यात्रा में गर्म कपड़े जरूर साथ रखें, ठंड में दिल अधिक दगा देता है। यात्र रुक-रुक कर व विश्रम कर करें। अगर यात्रा के दौरान सांस की समस्या आती है तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवाएं

मेडिकल कॉलेज जम्मू में कार्डियालोजी विभाग के एचओडी डॉ. सुशील शर्मा का कहना है कि अमरनाथ यात्रा पहाड़ी क्षेत्र में है और वहां बहुत अधिक ठंड होती है। ठंड में दिल को अधिक पंपिंग की जरूरत पड़ती है मगर नाड़ियों के सिकुड़ जाने के कारण ऐसा हो नहीं पाता। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में आक्सीजन की भी कमी है। ऐसे में स्वस्थ्य लोगों को ही पूरी सावधानी के साथ यात्रा करनी चाहिए। अगर कोई पहले से ही दिल का रोगी है तो वह यात्रा में जाने से परहेज करें।

आधार शिविर यात्री निवास में बने स्वास्थ्य केंद्र में हर दिन औसतन सौ यात्री अपनी जांच करवा रहे हैं। कैंप के प्रभारी डॉ. अशोक शर्मा का कहना है कई यात्रियों को पहलगाम से जाना है, वह जल्दी पहुंच गए हैं। उन्हें दर्द, बुखार, पेट की समस्या है, जिसकी जांच कर दवाई दी जा रही है।

Ganga reached the desired awakening amroha

कभी कल-कल बहती निर्मल गंगा का जल आज आचमन लायक तक नहीं बचा। निर्मल-अविरल गंगा की जलधार खंड-खंड हो चुकी हैा। गंदगी और प्रदूषण से गंगा इस कदर मैली हो गई है कि उसके अस्तित्व पर भी संकट छा गया है, लेकिन अब गंगा मां को निर्मल और स्वच्छ बनाने की मुहिम शुरू हो गई है जिसके तहत शुरू की गई गंगा जागरण यात्रा बुधवार को अमरोहा जिले में पहुंच गई। जगह जगह यात्रा का भव्य स्वागत हुआ। लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था, मानों सभी ने एक साथ संकल्प कर लिया हो कि अब गंगा मां के साथ और अत्याचार सहन नहीं करेंगे और सब के पाप धोने वाली गंगा को निर्मल बनाकर ही रहेंगे।

अमरोहा से मुरादाबाद तक वातावरण गंगामय

बड़ीं संख्या में गंगा यात्रियों की मौजूदगी और शिरकत से अमरोहा से मुरादाबाद तक का वातावरण गंगा मय हो गया।

गंगा को निर्मल और स्वच्छ बनाने का संकल्प

गंगा यात्रा के दौरान आज सुबह अमरोहा के बृजघाट पर आरती, भजन और संगीत की ऐसी छटा बिखरी कि देखने वाले मंत्रमुग्ध हो गये। यहां राजनेता हो या व्यापारी या फिर आम जनता, सभी ने एक साथ यात्रा का स्वागत करते हुए पुष्पवर्षा की। इसके बाद यात्रा जुबिलेंट पहुंची जहां हजारों की संख्या में लोगों ने यात्रा पर फूल बरसाये। पवित्र उद्देश्य को लेकर शुरू की गयी इस यात्रा को जिसने देखा वह इसकी प्रशंसा किये बगैर नहीं रह सका। तमाम लोग ऐसे भी थे जो यात्रा के साथ ही जुड़ गये और गंगा मां को हर हाल में निर्मल और स्वच्छ बनाने का संकल्प लिया। इसके बाद यात्रा चौपला की तरफ बढ़ चली।

झनकपुरी में भाजपाइयों ने फूल बरसाए

गजरौला के चौपला पर यात्रा का पुष्पवर्षा और गंगा मां के जयकारों से गूंज उठा। पूर्व चेयरमैन गजरौला रोहताक शर्मा, डा. आशुतोष भूषण, जूनखाड़ा के राष्ट्रीय महासचिव कर्णपुरी महाराज, महावीर सिंह समेत कई गणमान्य नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने यात्रा का स्वागत किया। इसके साथ ही आगे मुरादाबाद की ओर बढ़ते ही विश्वबन्धु स्कूल के प्रधानाचार्य विकास जैरथ, स्टाफ और छात्र यात्रा में शामिल हो गए। साथ ही झनकपुरी में सांसद के कार्यालय पर भाजपाइयों ने भी पुष्पवर्षा की।

अपने-अपने अंदाज में अगवानी

अमरोहा के जोया में गंगा यात्रा का भाजपा नेता अतुल जैन, जिलाध्यक्ष गिरीश त्यागी, जोया चेयरमैन समेत कई जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों ने यात्रा की अपने-अपने अंदाज में अगवानी की। खाता गांव में एएसएम इंटर कालेज में यात्रा में शामिल लोगों को जलपान कराया गया। यहां प्रबंधक विरेन्द्र गुप्ता, प्रधानाचार्य, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने यात्रा पर पुष्पवर्षा की। ग्राम जलालपुर कला स्थित श्रीकृष्ण इंटर कालेज में शिक्षकों और विद्यार्थियों ने गंगा यात्रियों को शरबत पिलाया।

मुरादाबाद की सीमा में प्रवेश

जोया से होते हुए गंगा जागरण यात्रा मुरादाबाद जिले की सीमा में प्रवेश कर गई! इससे पहले भी तमाम स्थानों पर लोगों ने यात्रा पर पुष्पवर्षा की और गंगा को निर्मल और स्वच्छ बनाने का संकल्प लिया। लोगों ने कहा कि वह अपने स्तर से गंगा को स्वच्छ बनाने का हरसम्भव प्रयास करेंगे। मुरादाबाद में भी यात्रा के स्वागत की जबर्दस्त तैयारी है। मुरादाबाद जिले की सीमा में प्रवेश करते ही यात्रा का भव्य स्वागत हुआ। पाकबड़ा में हजारों लोगों ने यात्रा पर पुष्पवर्षा की और गंगा को निर्मल बनाने का संकल्प लिया। बैंड बाजों के साथ हजारों लोग गंगा यात्रा के साक्षी बने

तीथरंकर महावीर विश्वविद्यालय परिसर में कमिश्नर शिवशंकर, महापौर बीना अग्रवाल, टीएमयू के कुलाधिपति सुरेश जैन, वाइस चांसलर मनीष जैन आदि ने पुष्पवर्षा की और इसके बाद यात्रा शहर की तरफ बढ़ चली। 

CAG report: Maha Kumbh not show up in the planning and coordination of

संगम तट पर महाकुंभ 2013 के आयोजन की सफलता पर अपनी पीठ थपथपाने वाले विभागों की खामियों को अब सीएजी ने उजागर किया है। लेखा परीक्षा रिपोर्ट के अनुसार विभागों में नियोजन का अभाव था और सामंजस्य बनाने के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तक नहीं बनाया गया था।

मेला खत्म हो गया पर काम नहीं

महाकुंभ 2013 की ऑडिट रिपोर्ट मंगलवार को विधानसभा के पटल पर रखी गई। तेरह विभागों के अभिलेखों की जांच पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि महाकुंभ की शुरुआत 14 जनवरी 2013 से हुई थी लेकिन लोक निर्माण विभाग और नगर निगम के कई काम मेला खत्म होने के कई माह बाद तक अधूरे रहे। विशेष तौर पर सड़क निर्माण के 111 कायरें में से 65 कार्य जून 2013 तक नहीं खत्म किए जा सके थे। यही स्थिति नगर निगम की 35 सड़कों की भी थी। रिपोर्ट में इस बात का जिक्र भी है कि 26.64 करोड़ लागत के चार काम तो मेला खत्म होने के बाद भी शुरू नहीं हो सके थे। कई सड़कों के चौड़ीकरण का काम बिना यातायात गणना के ही कराया गया। 23 सड़कों के चौड़ीकरण पर 57.41 करोड़ का व्यय अनियमित रहा। मेला की शुरुआत में लगभग 59 फीसद काम अधूरे थे।

लागबुक में ट्रैक्टर और पंजीकरण में रिक्शा

सीएजी रिपोर्ट ने महाकुंभ के कायरें में धांधली की ओर भी इशारा किया है। भूमि के समतलीकरण में दो ट्रैक्टरों को एक ही समय में दो स्थानों पर कार्य करता हुआ दिखाया गया। इस कार्य में 93 ट्रैक्टर लगाए गए थे लेकिन नौ की पंजीकरण संख्या मोटरसाइकिल, स्कूटर, आटो रिक्शा, खुली ट्रक एवं बसों की थी। अभिलेख परीक्षण में तीस श्रमिक भी ऐसे मिले जो एक ही समय दो स्थानों पर कार्य करते दर्शाए गए। 23 ठेकेदारों को 4.65 करोड़ अग्रिम भुगतान पर भी आपत्तियां जताई गई है। कहा गया है कि यह न सिर्फ अनियमित था बल्कि ठेकेदारों को अनुचित लाभ भी था।

मनमानी खरीदारी, दवाओं की बर्बादी

महाकुंभ में राज्य क्रय मैन्युअल की भी जमकर अवहेलना की गई। अधिक सामान खरीद लेने से धनराशि अवरुद्ध रही। मसलन स्वास्थ्य विभाग ने 93.45 लाख रुपये से 172 तरह की औषधियां खरीदी जिनमें 61.06 लाख का उपयोग नहीं किया जा सका। इनकी एक्सपायरी भी अगस्त 2013 में ही हो जानी थी। मेडिकल कालेज ने मई में इन दवाओं को गरीबों में बांटने की अनुमति मांगी लेकिन शासन से छह अगस्त 2013 को अनुमति दी गई। हालांकि शासन का कहना था कि अधिकांश दवाओं का इस्तेमाल कर लिया गया। नगर निगम ने भी अधिक सामान खरीदे।

भीड़ प्रबंधन पर सवाल

कैग ने महाकुंभ में भीड़ प्रबंधन की योजना को भी कटघरे में रखते हुए कहा है कि विभागों में समन्वय एवं प्रबंधन का अभाव था। मौनी अमावस्या पर रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे के लिए भी समन्वय की कमी को ही जिम्मेदार माना। रेलवे और मेला नियंत्रण कक्ष में सजीव प्रसारण को साझा करने की कोई सुविधा नहीं थी।

Amarnath Yatra: the number of devotees across 50 thousand

श्री अमरनाथ यात्रा के पहले चार दिनों में बाबा बर्फानी के पवित्र हिमलिंग के दर्शन करने वाले भक्तों की संख्या पचास हजार पार कर गई। मंगलवार को 15,812 श्रद्धालुओं ने पवित्र गुफा में माथा टेका। इसी के साथ अब तक दर्शन करने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या 50,528 पहुंच गई।

इस बीच, दुखद यह रहा कि हृदयगति रूकने से दो और शिवभक्तों की मौत हो गई। 28 जून से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा में चार दिन में ही आठ यात्रियों की मौत हो चुकी है।

जानकारी के अनुसार, मंगलवार सुबह बालटाल से 10146 श्रद्धालु पवित्र गुफा की तरफ रवाना हुए। इनमें 300 श्रद्धालु हेलीकॉप्टर से पवित्र गुफा तक पहुंचे। वहीं पहलगाम से भी 236 श्रद्धालु हेलीकॉप्टर के जरिए पवित्र गुफा की तरफ रवाना हुए। पहलगाम से पैदल यात्रा दो जुलाई से शुरू की जाएगी। इससे पूर्व सोमवार देर रात ब्रारीमर्ग के निकट 50 वर्षीय महिला श्रद्धालु रतना गुलाटी निवासी आइटीआइ, लेबर कॉलोनी हरियाणा ने सीने में तेज दर्द की शिकायत की। उन्हें तुरंत निकटवर्ती चिकित्सा शिविर पहुंचाया गया, लेकिन वहां पहुंचते ही उन्होंने दम तोड़ दिया। इसी बीच, मंगलवार सुबह भी ब्रारीमर्ग इलाके के निकट 69 वर्षीय हरविंदर कुमार मखन पुत्र रामलाल मखन निवासी नई दिल्ली ने भी सीने में तेज दर्द की शिकायत की। उन्हें भी चिकित्सा शिविर पहुंचाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। बता दें कि वर्ष 2013 में अमरनाथ यात्रा के दौरान 56 श्रद्धालुओं और वर्ष 2012 में 120 यात्रियों की मौत हो गई थी। 

Do not presumptuous generously donated

राजा जानुश्रुति अपने समय के महान दानी थे। एक शाम वह महल की छत पर विश्राम कर रहे थे, तभी सफेद हंसों का जोड़ा आपस में बात करता आकाश-मार्ग से गुजरा।

हंस अपनी पत्नी से कह रहा था। क्या तुझे राजा जानुश्रुति के शरीर से निकल रहा यश प्रकाश नहीं दिखाई देता। बचकर चल, नहीं तो इसमें झुलस जाएगी।

हंसिनी मुस्कराई, प्रिय मुझे आतंकित क्यों करते हो? क्या राजा के समस्त दानों में यश निहित नहीं है, इस लिए मैं ठीक हूं। जबकि संत रैक्व एकांत साधना लीन हैं? उनका तेज देखते ही बनता है। व हीं सच्चे अर्थों में दानी हैं।

जानुश्रुति के ह्दय में हंसो की बातचीत कांटों की तरह चुभी। उन्होंने सैनिकों को संत रैक्व का पता लगाने का आदेश दिया। बहुत खोजने पर किसी एकांत स्थान में वह संत अपनी गाड़ी के नीचे बैठे मिले।

जानुश्रुति राजसी वैभव से अनेक रथ, घोड़े, गौ और सोने की मुद्राएं लेकर रैक्व के पास पहुंचे। रैक्व ने बहुमूल्य भेटों को अस्वीकार करते हुए कहा कि मित्र यह सब कुछ ज्ञान से तुच्छ है। ज्ञान का व्यापार नहीं होता।

राजा शर्मिंदा होकर लौट गए कुछ दिन बाद वह खाली हाथ, जिज्ञासु की तरह रैक्व के पास पहुंचे। रैक्व ने राजा की जिज्ञासा देखकर उपदेश दिया कि दान करो, किंतु अभिमान से नहीं उदारता की, अहं से नहीं, उन्मुक्त भाव से दान करो। राजा रैक्व की बात सुनकर प्रभावित हुए और लौट गए।

संक्षेप में

दान हमेशा निश्छल भाव से करना चाहिए। दान करते समय यह नहीं सोचना चाहिए कि हमें दान करने से भविष्य में कोई लाभ मिलेगा। क्यों कि दान दान होता है।

First to make architectural house

जब हम अपना आशियाना बनाते हैं तो इसके लिए ईंट, पत्थर, बालू, लोहे की मदद से अपने आशियाने को सुंदर बनाते हैं। तब उस घर में वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करना आवश्यक हो जाता है।

ऐसे घर जिनमें वायु आर-पार होती है वहां वास्तु शास्त्र के नियम लागू नहीं होते हैं। यहां कुछ ऐसे ही वास्तु टिप्स हैं जिन्हें आजमाकर आप अपने आशियाने को सुंदर और खुशहाल बना सकते हैं।

    भोजन हमेशा पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके खाना चाहिए।

    जिस घर में सूर्य की किरणें और वायु प्रवेश नहीं करती वह शुभ नहीं होता है।

    पूर्व में ऊंची भूमि पुत्र और धन का नाश करती है इसलिए ऐसी परिस्थिति में भूमि को समतल बनाकर ही घर बनाएं।

    एक दीवार से मिले हुए दो मकान यमराज के समान गृहस्वामी का नाश करने वाले होते हैं। इसलिए भवन के चारों और मुख्य द्वार के सामने व पूछे कुछ जमीन छोड़ देना चाहिए।

    घर के भीतर कोई पेड़ नहीं होना चाहिए। बड़े पेड़ के कारण उसकी जड़ में सांप, बिच्छू होने के कारण घर के स्वामी को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    मकान के किसी भी भाग को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। यदि बढ़ाना हो तो सभी दिशाओं में समान रूप से आगे बढ़ाना चाहिए।

    यदि मकान के किसी भी भाग को बढ़ाना अनिवार्य हो तो पूर्व या उत्तर की तरफ बड़ा सकते हैं। क्योंकि उसमें थोड़ा दोष होता है।

    घर के अंदर मांसाहार पशुओं या पक्षियों के चित्र या पेंटिंग कभी भी नहीं लगाना चाहिए।

    ध्यान रखें एक दूसरे को प्यार करते कबूतर, बच्चों को दाना खिलाती चि़ड़िया, घृणा, क्रोध और क्रूरता पैदा करना वाले चित्रों को कभी नहीं लगाना चाहिए।

Monday, 30 June 2014

Will only be met by myself alone

जब आप एकांत में अपने निर्णयों और जीवन के बारे में विचारते हैं तो अधिक बेहतर तरीके से आगे बढ़ पाते हैं। अकेले में विचार हमारी दूसरों पर निर्भरता भी खत्म करता है। अधिकतर लोग अकेले हो जाने से डरते हैं। यही कारण है कि वे दोस्त बनाते हैं, प्रियजनों के बीच रहना चाहते हैं और हर समय किसी न किसी संस्था या गतिविधि के साथ जुड़े रहना चाहते हैं।

तमाम तरह की सोशल नेटवर्किंग साइट्स की बढ़ती लोकप्रियता इसी तरफ इशारा करती है। इन सोशल प्लेटफॉर्म्स के कारण व्यक्ति आधा घंटा भी खुद पर खर्च नहीं करता लेकिन जब हम अपने साथ समय बिताते हैं, खुद से बातचीत करते हैं तो हमारे जीवन में शांति और निर्णयों में अधिक सहजता दिखाई देती है। खुद के साथ कुछ वक्त रहने पर हमारे मन की व्यग्रता और हड़बड़ी भी खत्म होती है।

अक्सर अकेले रहने वाले व्यक्ति की सामाजिकता पर सवाल उठाए जाते हैं लेकिन यह सच है कि जब हम अकेले होते हैं तभी हमें अपने व्यक्तित्व के आकलन का मौका मिलता है। अपनी जिंदगी की दिशा तय करने का यही सबसे उपयुक्त समय होता है। खुद के साथ बिताए जाने वाले लम्हें अपने रिश्तों, अपनी खूबियों और अपने जीवन के बड़े निर्णयों के तमाम पहलुओं पर सोचने का मौका देते हैं। आइए देखें खुद के साथ बिताए जाने वाले लम्हों का हासिल क्या है।

सरलता से परिचय

इस समय जीवन बहुत आपाधापी और व्यस्तता के बीच है। ऐसे में हमने खुद को हम यह करना चाहते हैं, हमें यह करना चाहिए, हमें यह करने की जरूरत है और हमें यह नहीं करना चाहिए, जैसे बहुत सारे प्रश्नों के बीच खड़ा कर लिया है। इस तरह के तमाम प्रश्न हमारे भीतर एक खिंचाव पैदा करते हैं।

हम पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। माना कि हमारे जीवन में बहुत सारी चीजें चल रही हैं लेकिन हमें थोड़ा रुककर यह देखने की जरूरत तो है कि कहीं हम सिर्फ प्रतियोगिता को ही तो नहीं जीने लगे हैं। प्रतियोगिता से मुक्ति के लिए और अपनी खुशी को बेहतर तरीके से समझने के लिए अकेलापन बहुत मददगार होता है। वह बताता है कि आपकी सही जरूरतें क्या हैं।

सूचनाओं से मुक्ति

इन दिनों जिस तरह का जीवन हमारे आसपास है उसमें लोगों के दिमाग में बहुत सारी सूचनाएं और चीजें भरी रहती हैं। याद रखिए कि हम सिर्फ सूचनाएं इकट्ठा ही नहीं करते हैं बल्कि उन सूचनाओं के आधार पर प्रतिक्रिया की कोशिशें भी करते हैं। लगातार सूचनाओं के बीच आप प्रतिक्रिया ही व्यक्त करते रह जाते हैं और अपने मन की बात नहीं सुन पाते हैं। समय-समय पर इन सूचनाओं से दूर होने की जरूरत होती है। जब हम एकांत में समय बिताते हैं तो बहुत सारी नई सूचनाओं से भी बच जाते हैं और इनके प्रभाव से दूर होकर चीजों को देख पाते हैं।

सटीक निर्णय की ओर

दुनिया को देखने की हमारी दृष्टि अक्सर निकट के लोगों द्वारा प्रभावित होती है। हमारे मित्र, रिश्तेदार, शिक्षक और माता-पिता उनके अनुभवों के द्वारा हमारे हमारे निर्णयों और जरूरतों को प्रभावित करते हैं इसलिए यह जरूरी है कि हम अकेले में कुछ समय बिताकर अपनी सही और असल आवश्यकताओं से परिचित हों। जिस भी दिशा में हम आगे

बढ़ने जा रहे हों उसके बारे में अपने दिल पर हाथ रखकर पूछें कि क्या यही हम चाहते हैं। इस उत्तर के साथ आगे बढ़ना आपके मन की दुविधा खत्म कर देगा।

चिंताओं से मुक्ति

जब हमारे विचारों और हमारे आगे बढ़ने की दिशा के बीच कोई दुविधा नहीं होती है तो हमारे मन में किसी भी तरह की चिंता नहीं होगी। यह तभी होगा जब हम अकेले रहकर अपने विचार और दिशा के बीच एकरूपता बनाएं। जब तक हम एकांत में अपने बारे में और अपने निर्णयों के बारे में ठीक से नहीं सोचेंगे तो मन कई तरह की चिंताओं से भरा रहेगा। चिंताओं से मुक्ति के लिए खुद के साथ समय बिताना बहुत ही जरूरी है।

खत्म होती निर्भरता

बहुत से लोग इस कारण एकांत में समय नहीं बिताते क्योंकि उन्हें दूसरों का साथ अच्छा लगता है, उनके साथ बातचीत करना अच्छा लगता है। इससे उनके निर्णयों को दूसरों से सहारा मिलता है। यह मानव स्वभाव है। दूसरों के साथ बिताए जाने वाले लम्हों के कारण हमारी खुशी उन पर निर्भर हो जाती है।

हम ऐसे किसी साथ का उपयोग अपनी समस्याओं से दूर जाने के लिए करते हैं। हम खुद से दूर जाने के लिए भी दूसरों का सहारा लेते हैं। लेकिन यह समझना होगा कि तब हमारे निर्णय पूरी तरह अपने नहीं होते और हमारी दूसरों पर निर्भरता बढ़ती जाती है। एकांत में अपने निर्णयों पर विचार हमारी निर्भरता को खत्म करता है।

सक्रियता में बढ़ोतरी

अक्सर हम अपनी जिंदगी में खालीपन को भरने के लिए तरह-तरह की गतिविधियों में शामिल होते रहते हैं। कभी गौर कीजिएगा कि जब आप कुछ नहीं कर रहे हैं तब भी कुछ तो आप कर ही रहे होते हैं। रोजमर्रा के जीवन में अतिरिक्त गतिविधियों को हटाने की जरूरत है। गैर-जरूरी चीजों को अगर हम कम करते रहेंगे तो हमारी सक्रियता में बढ़ोतरी होगी। तब हम पाएंगे कि हमारे पास अधिक समय है और अधिक ऊर्जा भी।

छोटे पलों का आनंद

अक्सर प्रतियोगिता में बने रहने पर हम अपने आसपास की बहुत छोटी चीजों का आनंद नहीं ले पाते हैं, इसलिए जब अकेले हों तो उन चीजों के बारे में सोचें। उन छोटी चीजों के बारे में जो आपको सहज उपलब्ध हैं और जो आपके ध्यान से दूर रहती हैं। इन चीजों पर ध्यान देने पर आप पाएंगे कि जीवन कितने रूपों में बंटा हुआ है और हर रूप आपको विस्मित करने की क्षमता से परिपूर्ण है।

प्राथमिकता में मदद

जब हम एकांत तलाश पाते हैं तो यह भी देख पाते हैं कि हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं और उन प्राथमिकताओं की दिशा में आगे बढ़ने के लिए किन-किन प्रयासों की जरूरत है। एकांत में हम शांत मन से अपनी प्राथमिकताओं के बारे में सोच पाते हैं।

ऐसा करते हुए आप जीवन के तमाम पक्षों को देखते हुए प्राथमिकताएं तय करते हैं। हमारा लक्ष्य तब सफल ही नहीं होता बल्कि अपने लिए सुकून और सहजता की तलाश भी होता है।

Wednesday, 25 June 2014

Flowers and archeology at home

फूलों से मानसिक असंतुलन को संतुलित किया जा सकता है क्यों कि यह प्रेम के प्रतीक होते हैं। फिर चाहे फूल कृत्रिम ही क्यों न हों? यह जीवन में सक्रियता को बढ़ावा देते हैं।

यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक होते हैं। फूल मन को सुगंध देते हैं इसके अलावा भी घर के वास्तु में भी सहायक हैं।

    लाल रंग के फूल दक्षिण दिशा और पीले रंग के फूल दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पूर्व में होना चाहिए। ऐसा होने पर व्यक्ति उत्साहित रहता है।

    ताजे फूल शयन कक्ष में नहीं रखना चाहिए। सूखे फूलों को गुलदस्ते में से निकाल देना चाहिए। गुलदस्ते में फूल ताजे ही लगाएं। इसे दक्षिण में ही रखें। ऐसा करने से आपको सम्मान की प्राप्ति होती है।

    परिवार के सदस्यों के बीच संबंध सुधारने के लिए बैंगनी रंग के , बैंगनी गुलदस्ते में अग्नि कोण (संबंध क्षेत्र) में रखना ठीक रहता है। ध्यान रखें फूल अगर सूख जाएं तो इन्हें निकाल कर ताजे फूलों का उपयोग ही करना चाहिए।

    फूल पौधे के तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। लकड़ी तत्व का अर्थ है। विकास, उन्नति, फैलाव आदि। इसलिए ताजे फूलों को व्यवसाय या कार्यालय में रखना पसंद करते हैं। इसके नकारात्मक ऊर्जा संतुलित रहती है।

    विज्ञान कहता है कि ताजे फूल वातावरण को शुद्ध करते हैं। ये दरवाजे के पास रखे होना चाहिए। जिससे दरवाजे से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होती है।

    बोनसाई पौधे भले ही खूबसूरत हों पर इन्हें घर में नहीं रखना चाहिए। अगर इन्हें रखते हैं तो घर के अंदर के विकास को रोक देते हैं। इसलिए इनका उपयोग वास्तु और फेंगशुई दोनों में ही वर्जित माना गया है।

Monday, 23 June 2014

Who was the father of sita

हिंदू धार्मिक ग्रंथ रामायण के मुख्य पात्र श्रीराम हैं और सीता उनकी धर्मपत्नी। अक्सर लोगों को यह प्रश्न जिज्ञासा पैदा करता है कि सीता आखिर किसकी पुत्री थीं। ज़ाहिर तौर पर इसका उत्तर आप खोज रहें होंगे। जिसका उत्तर यहां आप को मिल ही जाएगा।

सीता किसकी पुत्री थीं। इसे जानने के लिए पहले हमें यह जानना बेहद जरूरी है कि उस काल में यानी श्रीराम जन्म के पहले का क्या घटित हो रहा था।

उस समय दशानन रावण तीनों लोकों पर न सिर्फ अधिकार प्राप्त करना चाहता था बल्कि अमर भी होना चाहता था। इसके लिए रावण ने कड़ी तपस्या की। रावण के तप से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और रावण को मनोकामनापूर्ति करने वाला वर दिया।

रावण ने ब्रह्माजी से वर मांगा कि- ' हे प्रभु! मुझे ऐसा वर दीजिए ताकि सुर, असुर, पिशाच, नाग, किन्नर या अप्सरा कोई भी मेरा वध न कर सके। इसके अतिरिक्त एक अन्य वर भी मांगता हूं।

जब मैं मोह के वशीभूत होकर अपनी ही कन्या से संसर्ग करने की प्रार्थना करूं और वह उसे अस्वीकार कर दे तभी मेरी मृत्यु हो। रावण को यह वरदान देकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए।

रावण वरदान पाकर घमंड से चूर हो गया। एक दिन वह घूमते हुए दंडकारण्य पर्वत पर गया। उसने वहां रहने वाले सभी ऋर्षि-मुनियों से कहा कि वह विश्व विजेता है। आप मुझे आशीर्वाद दें। यह कहकर उसने ऋर्षियों के शरीर पर तीर चुभोकर बहुत सारा रक्त निकालकर एक कलश भर लिया।

उन ऋर्षियों में से एक ऋर्षि गत्समद भी थे। वह सौ पुत्रों के पिता थे। उन्हें एक पुत्री की बड़ी ही लालसा थी। उन्होंने भगवान से इच्छा जाहिर की कि उनके यहां लक्ष्मी जी कन्या रूप में आएं। इस तरह उन्होंने दूध को अभिमंत्रित किया और कुश के अग्र भाग से एक कलश में रख दिया। इसके बाद वह वन में तपस्या के लिए चले गए।

संयोग से रावण भी उसी दिन वहां रावण आया और उसी कलश में ऋर्षियों का रक्त भरकर उसे लंका साथ ले गया। राजमहल में पहुंचकर उसने अपनी पत्नी मंदोदरी से कहा कि इस कलश में विषैला रक्त भरा है। अतः तुम इसकी रक्षा करो। मैनें मुनियों पर विजय प्राप्त की है और उनके रक्त को इस कलश में भर दिया है।

इसके बाद रावण ने देवताओं, दानवों, यक्षों और गंधर्वों की स्त्रियों की कन्याओं का अपहरण करके ले आया और उनके साथ पर्वतों पर विचरण करने लगा। मंदोदरी ने जब रावण को अन्य स्त्रियों के साथ रमण करते देख उसे अच्छा नहीं लगा। वह मरने के बारे में सोचने लगी और मंदोदरी ने कलश में रखे ऋर्षि-मुनियों के रक्त को पी लिया।

रक्त को पीते ही मंदोदरी को गर्भ ठहर गया। वह गर्भवती हो चुकी थी। उसने सोचा मेरे पति मेरे पास नहीं है। ऐसे में जब उन्हें इस बात का पता चलेगा। तो वह क्या सोचेंगे की इस बीच मेरा किसी और पुरुष के साथ संसर्ग हो गया है।

ऐसा विचार करते हुए मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र आ गई। वहां उसने गर्भ को निकालकर भूमि में दफना दिया। इसके बाद उसने सरस्वती नदी में स्नान किया और लंका वापस लौट गई।

कुछ समय बाद राजा जनक कुरुक्षेत्र गए और उन्होंने सोने के हल से उस भूमि को खोदा तो उन्हें एक कन्या मिली। उनके यहां कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने उस कन्या को अपना लिया।

हिंदू शास्त्रों में यह प्राचीन कहानी सीता के संबंध में मिलती है। सवाल फिर भी आज रहस्य बना हुआ है कि सीता आखिर किसकी पुत्री थीं। गत्समद ऋर्षि की, मंदोदरी की या फिर राजा जनक की?