Showing posts with label Horoscope 2014. Show all posts
Showing posts with label Horoscope 2014. Show all posts

Friday, 4 July 2014

Why not throw the stone on the money

एक बार महाराज रणजीत सिंह कहीं जा रहे थे। सामने से एक ईंट आकर उन्हें लगी। सिपाहियों नें चारों ओर नजर दौड़ाई, तो एक बुढ़िया दिखाई दी। उसे गिरफ्तार करके महाराज के सामने हाजिर किया गया।

बुढ़िया महाराज को देखते ही डर गई। वह बोली, सरकार, मेरा बच्चा कल से भूखा था। घर में खाने को कुछ न था। इसलिए पेड़ पर पत्थर मारकर कुछ फल तोड़ रही थी, किंतु एक पत्थर भूलवश आपको लग गया।

वह बोली कि मैं निर्दोष हुं क्यों कि यह गलती मुझसे जानबूझकर नहीं हुई है। महराज ने कुछ देर सोचा और कहा कि बुढ़िया को एक हजार रुपया देकर सम्मान पूर्वक विदा किया जाए। तब सभी दरबारी चुप हो गए। तब एक मंत्री ने पूछा जिसे दंड मिलना चाहता उसे आप सम्मान दे रहे हैं।

तब रणजीत सिंह बोले कि, यदि वृक्ष पत्थर लगने पर मीठा फल दे सकते है तो पंजाब का महाराज उसे खाली हाथ कैसे लौटा सकता है?

संक्षेप में

परोपकार करना हमें पेड़ों से सीखना चाहिए। जिन्हें हम पत्थर मारते हैं तो वह हमें फल देते हैं।


A temple was built by karan

देवधर के प्रखंड में एक दर्जन से अधिक शिवालय हैं। प्रखंड मुख्यालय स्थित कर्णेश्वर मंदिर इन्हीं में से एक है। अपने गौरवशाली इतिहास के कारण यह मंदिर श्रद्धालुओं के बीच आस्था व श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।

यहां सावन के महीने में दूरदराज के श्रद्धालु आकर पूजा करते हैं। दिन भर मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। रात्रि में भव्य शिवबारात निकाली जाती है। इसका हजारों भक्त गवाह बनते हैं।

भगवान विश्वकर्मा ने स्थापित किया था मंदिर- कर्णेश्वर मंदिर की स्थापना कब हुई। इसका कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने की थी। इसका नाम कर्णेश्वर मंदिर होने के पीछे भी एक पौराणिक कहानी प्रचलित है।

लगभग साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व यहां घना जंगल था। उस वक्त यहां के गांव को श्रीगंज के नाम से जाना जाता था। उस समय एक व्यक्ति की गाय खो गई। उसे खोजते वह व्यक्ति यहां आ पहुंचा। उसने देखा कि एक पठार पर गाय दूध दे रही है। इस घटना की सूचना अंग प्रदेश के राजा कर्ण को दी गई। उन्होंने जानकारों को यहां भेजा।

उन्होंने राजा को बताया कि यहां जमीन के नीचे शिवलिंग अवस्थित है। राजा कर्ण के आदेश पर इसके चारों ओर कर्णपुर नामक गांव बसा दिया गया। वहीं मंदिर को कर्णेश्वर नाम दिया गया। बाद में अंग्रेजों ने इस गांव का नाम करौं रख दिया।

Tuesday, 1 July 2014

If the conduct beautiful mind and body beautiful

बात उन दिनों की है जब भगवान श्रीराम अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान चित्रकूट में थे। भगवान राम एवं माता सीता कुटिया के बाहर बैठे हुए थे।

लक्ष्मणजी उनके चरणों में बैठे थे। तभी श्रीराम ने कहा कि लक्ष्मण यहां आओ मेरे और सीता के बीच एक झगड़ा हो गया है। इसलिए तुम न्याय करो।

लक्ष्मण जी मान गए। तब श्रीराम-' मैं कहता हूं कि मेरे चरण सुंदर हैं। सीता कहती हैं उनके चरण सुंदर हैं। तुम दोनों के चरणों की पूजा करते हो। अब तुम ही फैसला करो कि किसके चरण सुंदर हैं। लक्ष्मणजी बोले आप मुझे इस धर्म संकट में मत डालिए।

तब श्रीराम ने समझाया कि तुम बैरागी हो। निर्भय होकर कहो। किसके चरण सुंदर हैं। राम के चरणों को दिखाते हुए लक्ष्मणजी बोले कि माता, इन चरणों से आपके चरण सुंदर हैं। इतना कहते हुए लक्ष्मण जी चुप हो गए और माता सीता खुश।

इस पर लक्ष्मण जी बोले माता अधिक खुश मत होना। भगवान राम के चरण हैं, तभी आपके चरणों की कीमत है। इनके चरण न हों तो आपके चरण सुंदर नहीं लग सकते। रामजी खुश हो गए।

तब लक्ष्मणजी फिर बोले कि आप दोनों को खुश होने की जरूरत नहीं। आप दोनों के चरणों के अलावा भी एक चरण हैं जिसके कारण ही आपके चरणों की पूजा होती है यानी आचरण। आचरण की कोई कीमत नहीं। महराज, आपके चरण सुंदर हैं तो उसका कारण आपका महान आचरण है।

संक्षेप में

यदि व्यक्ति के आचरण अच्छे हों तो उसका तन और मन दोनों ही सुंदर होता है और वह संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाता है।

Tuesday, 24 June 2014

Eagle and serpent was mainly because of the hostility

अमूमन यह प्रश्न सदियों से उठता आ रहा है कि नागों की उत्पत्ति कैसे हुई। नाग और गरुड़ के बीच मतभेद सदियों से चला आ रहा है। दरअसल नागों के बारे में भागवत् पुराण में विस्तृत लेख मिलता है।

कहते हैं कि कश्यप ऋर्षि की दो पत्नियां थीं। एक का नाम बनिता और दूसरी पत्नी का नाम कद्रू था। एक बार कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों पत्नियों से वर मांगने को कहा। कद्रू ने एक हजार वीर नागों की माता होनें का वर मांगा और बनिता ने एक वर से दो पुत्र मांगे जो बाद में अरूण और गरुण के नाम से प्रसिद्ध हुए।

नागों की मां कद्रू को धरती का प्रतीक माना जाता है। गरुड़ और अरुण की मां बनिता को स्वर्ग की देवी माना जाता है।

एक दिन कश्यप दोनों पत्नियों में इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि सूर्य के अश्व श्यामवर्ण के हैं या श्वेत। बनिता ने उनका रंग श्वेत बताया, पर कद्रू नहीं मानीं। वह एक ही रट लगाए हुए थी कि अश्व श्याम वर्ण के हैं। बनिता ने आखिरी शर्त लगा दी कि अगर अश्वों का रंग श्वेत हुआ तो तुम और तुम्हारे पुत्र हमारे दास रहेगें। कद्रू ने स्वीकार कर लिया।

शाम हुई। जब कद्रू ने अपने पुत्रों से इसकी चर्चा की तब शेषनाग को छोड़कर शेष सभी पुत्रों ने कहा कि मां तुम चिंता मत करो। हम लोग जाकर अश्वों से लिपट जाएंगे जिससे वे दूर से श्यामवर्ण के दिखाई देने लगेंगे। यह बात सुनकर कद्रू प्रसन्न हो गई।

परंतु बाद में बनिता को यह भेद पता चल गया और तभी से गरुण और नागों की दुश्मनी चली आ रही है।

Monday, 23 June 2014

Om word glory

देखा जाए तो हर धर्म में कोई न कोई प्रतीक चिह्न हुआ ही करता है। हिंदुओं में ऊँ को पवित्र अक्षर माना जाता है। हर धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत ऊँ के उच्चारण से किया जाता है।

ऊँ शब्द तीन अक्षरों अ, उ और म से मिलकर बना है। पर इसमें ऐसा क्या खास है कि इसे हिन्दुओं ने अपना पवित्र धार्मिक प्रतीक मान लिया है। असंख्य शब्दों और चिह्नों में से ऊँ और स्वास्तिक को ही क्यों चुना गया। ये सवाल महत्त है। जरा देखें ओम के उच्चारण से क्या घटित और परिवर्तित होता है।

    ऊँ की ध्वनि मानव शरीर के लिए प्रतिकूल डेसीबल की सभी ध्वनियों को वातावरण से निष्प्रभावी बना देती है।

    विभिन्न ग्रहों से आनेवाली अत्यंत घातक अल्ट्रावायलेट किरणें ओम उच्चारित वातावरण में निष्प्रभावी हो जाती हैं।

    इसके उच्चारण से इंसान को वाक्य सिद्धि की प्राप्त होती है।

    चित्त एवं मन शांत एवं नियंत्रित हो जाते हैं।

    सनातन धर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ऊँ को महत्व प्राप्त है।

बौद्ध दर्शन में ऊँ का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार, ऊँ को मणिपुर चक्र में अवस्थितमाना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी ऊँ के महत्व को दर्शाया गया है। कबीर निर्गुण संत एवं कवि थे। उन्होंने भी ऊँ के महत्व को स्वीकारा और इस पर साखियां भी लिखीं।

गुरुनानक ने ऊँ के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा- ओम सतनाम कर्ता पुरुष निर्भोनिर्बेरअकालमूर्त। ऊँ सत्य नाम जपने वाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं अकाल-पुरुष के सदृश हो जाता है।

इस तरह ऊँ के महत्व को सभी संप्रदाय के धर्म-गुरुओं, उपासकों, चिंतकों ने प्रतिपादित किया है, क्योंकि यह एकाक्षरी मंत्र साधना में सरल है और फल प्रदान करने में सर्वश्रेष्ठ।

यह ब्रह्मांड का नाद है एवं मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक। किसी भी मंत्र के पहले ऊँ जाेडने से वह शक्ति संपन्न हो जाता है। एक बार ऊँ का जाप हजार बार किसी मंत्र के जाप से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

Friday, 20 June 2014

Broken Shivling

झारखंड का रामगढ़ जिला धार्मिक तीर्थ के रूप में जाना जाता है, क्यों कि यहां मां गंगा 24 घंटे महादेव का अभिषेक करती हैं। कहते हैं, जिसने भी मां के इस रूप के दर्शन कर लिए उसकी कोई भी मुराद बाकी नहीं रहती।

हिन्दू शास्त्रों के मुताबिक खंडित शिवलिंग की आराधना नहीं की जानी चाहिए, लेकिन यहां न केवल महादेव के इस चमत्कारी रूप की पूजा की जाती है बल्कि विधि-विधान का पालन भी किया जाता है। पूजा से पहले महादेव को शिवलिंग से निकलने वाले जल से ही स्नान कराया जाता है।

चमत्कार से कम नहीं

कहते हैं यह मंदिर 1925 में अस्तित्व में आया, जब अंग्रेज रेल लाइन बिछाने के लिए जमीन की खुदाई करवा रहे थे। खुदाई के दौरान उन्हें जमीन में गुंबदनुमा किसी चीज का अहसास हुआ। तभी से इसे भगवान शिव का चमत्कार मानते हैं।

गल्तेश्वर मंदिर में गुप्त गंगा

ऐसा ही एक मंदिर गुजरात के वडोदरा में है जिसे गल्तेश्वर मंदिर के नाम से जानते हैं। कहते हैं यहां गुप्त गंगा बहती है। जो गंगा महादेव के चरण धोती है। गंगा के यहां गलती नदी के नाम से पुकारते हैं भक्त। गल्तेश्वर महादेव के चरणों का स्पर्श करने के लिए मां गंगा यहां अपनी राह बदल कर आती हैं।

कलियुग में गंगा मां का यह रूप को देखकर मां नास्तिक को भी आस्तिक बना देती हैं। इस मंदिर में शिवलिंग के ठीक ऊपर मां गंगा विराजमान हैं। इनकी नाभि से 24 घंटे जल की धारा बहती है। यह धारा भोलेनाथ जो खंडित हैं उनके ऊपर गिरती है। ये जल कहां से आता है ये कोई नहीं जानता। सूखा हो या बरसात, सर्दी हो या गर्मी, गंगा की नाभि से जल बहना कभी बंद नहीं होता।

Receiving knowledge of the poet Kalidasa stripe Devi Temple

केदारनाथ यात्रा मार्ग के मुख्य पड़ाव श्रीनगर से महज 15 किमी की दूरी पर स्थित सिद्धपीठ मां धारी देवी का मंदिर। कहते हैं यहीं मां काली की कृपा से महाकवि कालिदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह तीर्थ श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का केंद्र रहता है। शक्ति पीठों में कालीमठ का वर्णन पुराणों में मिलता है।

मान्यता है कि कालीमठ मंदिर से ही मूर्ति का सिर वाला भाग बाढ़ से अलकनंदा नदी में बहकर धारी गांव नामक स्थान पर आ गया।

एक किंवदंति के अनुसार गांव की धुनार जाति व स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर सिर वाले भाग को समीपवर्ती ऊंची चट्टान पर स्थापित किया। मां काली कल्याणी की यह मूर्ति वर्तमान में अलकनंदा नदी पर जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के चलते नदी से ऊपर मंदिर बनाकर स्थापित की गई है।

धारी गांव के पांडे ब्राहमण मंदिर के पुजारी हैं। जनश्रुति है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप प्रात:काल कन्या, दोपहर युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती है। प्रतिवर्ष चैत्र व शारदीय नवरात्र में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों के लिए मंदिर में आते हैं। इसके अलावा चारधाम यात्रा के दौरान भी हर रोज सैकड़ों की तादात में श्रद्धालुगण मंदिर पहुंचते हैं।

यहां दिसंबर-जनवरी की सर्दी को छोड़कर वर्षभर सुहावना रहता है। यहां जाने के लिए चारधाम यात्रा मार्ग के मध्य स्थित होने के कारण यात्रा के सभी पड़ावों पर प्राइवेट, जीएमवीएन व बीकेटीसी के गेस्ट हाउस है।
वायु मार्ग के लिए 145 किमी दूर जौलीग्रांट हवाई अड्डा है। रेल मार्ग के लिए 115 किलोमीटर दूर ऋषिकेश निकटतम रेलवे स्टेशन। सड़क मार्ग से जाना चाहते हैं तो हरिद्वार, ऋषिकेश व देहरादून से मां धारी देवी मंदिर तक आसानी से छोटे-बडे़ वाहनों की उपलब्धता है।

It is prized statues of buddha

पिछले वर्ष बेल्जियम में धूम मचाने के बाद इस वर्ष मथुरा संग्रहालय की मूर्तियां कोरिया में धूम मचाएंगी। लेकिन कोरिया की टीम द्वारा पसंद की गई आठ मूर्तियों में से बुद्ध की दो मूर्तियों को प्रशासन ने कोरिया न भेजने का निर्णय लिया है। कारण है कि यह मूर्तियां बेशकीमती मानी जाती हैं।

कुछ दिन पहले कोरिया की टीम ने दिसंबर में लगने वाली प्रदर्शनी के लिए भगवान बुद्ध, कटरा बुद्धा, महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय, महात्मा बुद्ध का स्तूप, बुद्धा हेड, अभय मुद्रा में बुद्ध, चौकी पर महात्मा बुद्ध एवं महात्मा बुद्ध का स्वर्गावतरण मूर्तियों को पंसद किया था। लेकिन संग्रहालय प्रशासन ने महात्मा बुद्ध और कटरा बुद्ध को कोरिया न भेजने का निर्णय लिया है। बुद्ध हेड को भी न भेजने पर विचार चल रहा है। कारण है कि यह मूर्तियां बेशकीमती और मास्टर पीस मानी जाती हैं। राष्ट्रीय संग्रहालय कोरिया के एसोसिएट्स और सह एसोसिएट्स द्वारा पंसद की गई मूर्तियों को कोरिया भेजने से पहले राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली की टीम यहां आकर कीमत का आंकलन करेगी। ताकि इन मूर्तियों का बीमा कराया जा सके। संग्रहालय के सहायक निदेश डा.एसपी सिंह ने बताया कि भगवान बुद्ध और कटरा बुद्धा को कोरिया नहीं भेजा जाएगा। यह बहुत महत्वपूर्ण मूर्तिया हैं।

कटरा बुद्धा की मूर्ति। दूसरे चित्र में महात्मा बुद्ध की दुलर्भ मूर्ति।महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है।

महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है। महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है।

It was a great poet kalidasa achieve the knowledge

बदरीनाथ-केदारनाथ यात्रा मार्ग के मुख्य पड़ाव श्रीनगर से महज 15 किमी की दूरी पर स्थित सिद्धपीठ मां धारी देवी का मंदिर। कहते हैं यहीं मां काली की कृपा से महाकवि कालिदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह तीर्थ श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का केंद्र रहता है। शक्ति पीठों में कालीमठ का वर्णन पुराणों में मिलता है।

मान्यता है कि कालीमठ मंदिर से ही मूर्ति का सिर वाला भाग बाढ़ से अलकनंदा नदी में बहकर धारी गांव नामक स्थान पर आ गया।

एक किंवदंति के अनुसार गांव की धुनार जाति व स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर सिर वाले भाग को समीपवर्ती ऊंची चट्टान पर स्थापित किया। मां काली कल्याणी की यह मूर्ति वर्तमान में अलकनंदा नदी पर जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के चलते नदी से ऊपर मंदिर बनाकर स्थापित की गई है।

धारी गांव के पांडे ब्राहमण मंदिर के पुजारी हैं। जनश्रुति है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप प्रात:काल कन्या, दोपहर युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती है। प्रतिवर्ष चैत्र व शारदीय नवरात्र में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों के लिए मंदिर में आते हैं। इसके अलावा चारधाम यात्रा के दौरान भी हर रोज सैकड़ों की तादात में श्रद्धालुगण मंदिर पहुंचते हैं।

यहां दिसंबर-जनवरी की सर्दी को छोड़कर वर्षभर सुहावना रहता है। यहां जाने के लिए चारधाम यात्रा मार्ग के मध्य स्थित होने के कारण यात्रा के सभी पड़ावों पर प्राइवेट, जीएमवीएन व बीकेटीसी के गेस्ट हाउस है।

वायु मार्ग के लिए 145 किमी दूर जौलीग्रांट हवाई अड्डा है। रेल मार्ग के लिए 115 किलोमीटर दूर ऋषिकेश निकटतम रेलवे स्टेशन। सड़क मार्ग से जाना चाहते हैं तो हरिद्वार, ऋषिकेश व देहरादून से मां धारी देवी मंदिर तक आसानी से छोटे-बडे़ वाहनों की उपलब्धता।

So this is life euphoria

हमारे धर्म ग्रंथों में अक्सर इस बात का उल्लेख मिलता है कि ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य को परम आनंद की प्राप्ति होती है। आखिर ये परम आनंद क्या है? ये कहां मिलता है?

एक आम आदमी को इन दोनों प्रश्नों का उत्तर कभी नहीं मिल पाता और इसीलिए उसकी अध्यात्म के पथ पर उन्नति नहीं हो पाती।

परम आनंद के बारे में भगवान ने गीता में बताया है कि वह स्थिति जिसमें मनुष्य सुख, दुख, हानि, लाभ, क्रोध, मोह और अहंकार आदि से मुक्त होकर स्वयं में स्थापित हो चुका हो।

यानी मन का पूर्णतया निग्रह। मन, इंद्रियों द्वारा मनुष्य को संसार में लिप्त करके उसकी प्रवृत्ति को वाह्य बनाता है और वह संसार में इंद्रियों के द्वारा सुख की खोज में भटकता रहकर जीवन-मरण का चक्कर लगाता रहता है।

इसीलिए परमानंद की प्राप्ति के लिए सबसे पहले मन की प्रवृत्ति को अपने अंदर की ओर मोड़ना चाहिए। अज्ञानवश लोग मन को बलपूर्वक संसार से विरक्त करने की कोशिश करते हैं जो पूर्णतया निर्थक व गलत मार्ग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में जब भी मन का नियंत्रण ढीला पड़ता है वह दोबारा इंद्रिय भोग द्वारा संसार के भोगों में लिप्त हो जाता है।

आनंद के लिए पहले कदम के रूप में सर्वप्रथम मनुष्य को संसार का लेन-देन समाप्त करना चाहिए। लेन-देन केवल धन तक ही सीमित नहीं है बल्कि भावनात्मक पहलू धन से भी ज्यादा अहम व आवश्यक है।

नकारात्मक भावों के कारण वह कामना रूपी प्रेम, अहंकार, जलन, ईष्र्या और बदले की भावना व क्रोध से पीड़ित रहता है। नकारात्मक भावों के कारण ही उसे शारीरिक रोगों जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदयरोग होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।

भगवान का गीता में बताया गया यह कथन कि विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध से विवेक समाप्त होकर बुद्धि भी नष्ट हो जाती है। इस प्रकार मनुष्य का पतन हो जाता है।

सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन चक्र को नियंत्रित करने के लिए आश्रम व्यवस्था है। वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य को धीरे-धीरे अपने आपको गृहस्थ आश्रम व दुनियादारी के लेन-देन से मुक्त कर लेना चाहिए और जीवन के शेष भाग को सम स्थिति में रहकर परमानंद में स्थित हो जाना चाहिए।

Thursday, 19 June 2014

Guaranteed success are abhijit muhurat

हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक हर दिन का कुछ समय अति शुभ माना गया है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इस समय कोई भी कार्य करने पर विजय प्राप्त होती है।

ज्योतिर्विद और भागवत मर्मज्ञ पं. ओम वशिष्ठ बताते हैं कि वर्ष के 365 दिन में 11.45 से 12.45 तक का समय अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। इस मुहूर्त में अगर कोई भी कार्य किया जाए तो उसमें विजय प्राप्त होती है।

कहते है इसमें आप कुछ भी करें तो वह सर्वफलदायी होता है, सर्वाथसिद्धिदायक होता है। इस मुहूर्त या फिर तिथि में किया गया काम शुभ फलों को देता है। अतिशुभ फलों के इन्हीं आगमन के लिए हिंदू कैलेंडर में कुछ तिथियां हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा काल गणना के आधार पर निर्धारित की गई है।

अभिजीत मुहूर्त यानी एक ऐसा मुहूर्त जिसमें अगर काम शुरु किया गया तो विजय होनी तय है, सफलता की गारंटी पक्की होती है। इस बार 01-02 अप्रैल को अक्षय तृतीया का शुभ दिन है।

वैशाख महीने की गणना सबसे सर्वोत्तम महीनों में की जाती है। वैशाख मास की विशिष्टता इसमें पड़ने वाली अक्षय तृतीय के कारण अमर हो जाती है। भारतीय काल गणना के मुताबिक चार स्वयंसिद्ध अभिजित मुहूर्त माने गए है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा), आखातीज यानी अक्षय तृतीया, दशहरा और दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि।

अक्षय का अर्थ है

जिसका कभी क्षय नहीं हो यानी वह आपके पास हमेशा बना रहे। जिसका नाश ना हो यानी वह आपके पास स्थायी रहे। स्थायी वहीं रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। भारतीय संस्कृति में इस दिन का महत्व व्यापक है।

पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है। परशुरामजी की गिनती चिंरजीवी महात्माओं में की जाती है।

कहते हैं चारों युगों अर्थात सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन ही हुई थी इसलिए इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि यानी युर्गाद तिथि भी कहते हैं। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है।

इसी तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण और श्री केदारनाथधाम के पट खुलते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाए जाने वाले इस व्रत की बड़ी मान्यता है । इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र, आभूषण आदि बनवायें, खरीदें और धारण किए जाते हैं। नई भूमि को खरीदना, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

विवाह और मांगलिक कार्य

इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजीत शुभ मुहूर्त के कारण विवाह और मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। अक्षय तृतीया वाले दिन दिया गया दान अक्षय पुण्य के रूप में संचित होता है।

इसलिए इस दिन अपने सामर्थ्य के मुताबिक दान-पुण्य करना चाहिए। यानी इस दिन आप जो कुछ भी करते हैं उसका क्षय नहीं होता है। चाहे वह कोई शुभ कार्य हो या फिर आपके द्वारा किया गया दान-पुण्य।

अक्षय तृतीया को स्वर्ण युग की आरंभ तिथि भी मानी गई है। अक्षय का अर्थ है कि कभी समाप्त न होने वाला। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन खरीदा और धारण किए गए सोने और चांदी के गहने अखंड सौभाग्य का प्रतीक माने गए हैं। मान्यताओं के मुताबिक सोने और चांदी के आभूषण खरीदने से घर में बरकत ही बरकत आती है।

मान्यता है कि लक्ष्मी को स्थिर होना चाहिए ताकी घर में बरकत और खुशहाली की सदैव बारिश होती रहे। सोने के प्रति ज्योतिषियों का मानना है कि सोना के होने से घर में शुभ कारकों का उदय होता है जो परिवार में खुशहाली का माध्यम बनते हैं। इसलिए अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदने और पहनने की भी परंपरा है।

Tuesday, 17 June 2014

With diligence and patience will definitely get success

एक बार गौतम बुद्ध अपने अनुयायियों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। गर्मी का मौसम था। गांव पहुंचने से पहले ही बुद्ध के साथ जा रहे लोगों को जगह-जगह बहुत सारे गड्ढे खुदे हुए मिले।

तब उनके एक शिष्य ने गड्डे देखकर जिज्ञासा प्रकट की, आखिर इस तरह गढे का खुदे होने का तात्पर्य कया है? तब गौतम बुद्ध बोले, पानी की तलाश में किसी व्यक्ति ने इतनें गड्ढे खोदे है।

यदि वह धैर्यपूर्वक एक ही स्थान पर गड्ढा खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता।पर वह थोडी देर गड्ढा खोदता और पानी न मिलने पर दूसरा गड्ढा खोदना शुरू कर देता।

संक्षेप में

कहा गया है कि व्यक्ति को परिश्रम करने के साथ धैर्य भी रखना चाहिए। तभी उन्हें सफलता मिलती है।

Here is the couple wish to

समुद्र तल से 1350 मीटर की ऊंचाई पर कीलांचल पर्वत (ऋष्यलकु पर्वत) की तलहटी में स्थित सती मां अनुसूया मंदिर निः संतान दंपतियों बच्चों की इच्छा से आते हैं।

कहते हैं कि यहां तप करने वाले नि:संतान दंपती की गोद जरूर भरती है। यह मान्यता सदियों से चली आ रही है।

वैसे तो सालभर इस मंदिर के कपाट खुले रहते हैं, परंतु प्रत्येक वर्ष दिसंबर माह में दत्तात्रेय जयंती पर यहां दो दिन का विशाल मेला लगता है। चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर से 13 किलोमीटर सड़क मार्ग से मंडल पहुंचने के बाद पांच किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर कीलांचल पर्वत की तलहटी में होते हैं मां अनुसूया के दर्शन।

गर्भगृह में सती मां

इस मंदिर में एक शिला पर गणेश की मूर्ति स्थापित है। गर्भगृह में सती मां अनुसूया की मूर्ति चांदी के छत्रों से जड़ी हुई है। मंदिर प्रांगण में शिव, पार्वती, गणोश के अलावा सती मां अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय की त्रिमुखी प्रतिमा विराजमान है।

अनुसूया मंदिर के निकट ही महर्षि अत्रि की तपस्थली भी है। सती मां अनुसूया के बारे में कथा प्रचलित है कि इसी स्थान पर त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने मां के सतीत्व की परीक्षा लेनी चाही तो मां अनुसूया ने तीनों देवों को बालक बनाकर अपना स्तनपान कराया। यहां बारी प्रथा से पूजा-अर्चना की परंपरा है।

मंदिर में सुबह छह बजे स्नान, श्रृंगार, पूजा, 10 बजे रोट, आटे का चूरमा, मालपुआ का भोग और शाम सात से आठ बजे के बीच संध्या आरती संपन्न होने के बाद लगाया जाता है।

मौसम का मिजाज

यह मंदिर वर्षभर खुला रहता हैं। अप्रैल से सितंबर तक यहां का मौसम गर्म, बारिश, अक्टूबर से मार्च तक बारिश एवं बर्फबारी होती है।

देहरादून, ऋषिकेश व हरिद्वार रेलमार्ग के लिए ऋषिकेश निकटतम रेलवे स्टेशन है जिससे मंदिर की दूरी 253 किलोमीटर है।

Thursday, 12 June 2014

Statue of mother sita morality

राम-कथा में माता सीता का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। उनका चरित्र संयमी, साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए प्रेरित करता है। जिससे हर नारी को नैतिकता की शिक्षा मिलती है।

राम की शक्ति सीता जी नारी सशक्तीकरण का उदाहरण हैं। अपूर्व साहस, बल, धैर्य, मातृत्व, पति का सहयोग आदि गुण हमें आज के युग में भी प्रेरणा प्रदान करते हैं।

राम-कथा के अनुसार, मिथिलानगरी में सीरजध्वज जनक नाम के राजा को सीता भूमि को जोतते समय मिली थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी पुत्री स्वीकार किया। सीता में अपूर्व बल और साहस था।

कथा के अनुसार, उन्होंने शिव-जी का धनुष अपने हाथों से उठा लिया था, जिसे देखकर राजा जनक बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने घोषणा करवा दी कि जो भी शिव जी का धनुष तोड़ेगा, उससे ही सीता का विवाह किया जाएगा। जिस धनुष को सीता ने उठा लिया था, उसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा सके। श्रीराम ने उस धनुष को तोड़कर सीता से विवाह किया।

जब श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले चौदह वर्र्षो का वनवास दिया गया, तो सीता जी ने उनके साथ जाने का तत्काल निर्णय लिया। उन्होंने अपने पति को विपत्तियों में नहीं छोड़ा। श्रीराम द्वारा अयोध्या में ही रहने के आग्रह के बाद भी सीता जी ने सभी सुखों को छोड़कर श्रीराम के साथ वन में जाना ही उचित समझा।

यह एक पत्नी का कर्तव्य भी है कि वह पति के सुख-दुख में सहभागी बनें। सीता ने वही किया। आज की कामकाजी महिलाएं घर की आर्थिक स्थिति सुधारने और सशक्त बनने के लिए घर से बाहर निकलती हैं और काम करके पति का सहयोग करती है। सीता जी ने भी महल में रहने का मोह नहीं किया और वे पति के साथ कंकड़ भरे मार्ग पर निकल पड़ीं।

जब रावण ने अपनी माया से उनका हरण कर लिया, तब भी वे हताश-निराश नहीं हुईं। वे मानसिक रूप से इतनी सबल थीं कि तमाम धमकाने और माया का प्रभाव डालने पर भी उनका आत्मविश्वास नहीं डिगा और उन्होंने गलत प्रस्ताव के आगे समर्पण नहीं किया। वे सत्य के साथ ही रहीं। उनका आत्मविश्वास और धैर्य ही था कि अंतत: सत्य की जीत हुई।

सीता जब अपने पुत्रों लव-कुश के संग वाल्मीकि आश्रम में रहीं, वहां उन्होंने बच्चों लव-कुश को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। सीताजी का चरित्र हमें धैर्यवान, साहसी, आत्मविश्वासी और सहयोगी बनने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Saturday, 7 June 2014

Vedic period top 10 rishi

भगवद्गीता में कहा गया है कि जिनका मन दु:ख से घवराता नहीं , जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निश्चल बुद्धिवाले लोग ऋर्षि कहलता हैं।

राग-द्वेष-रहित संतों, साधुओं और ऋषियों को मुनि कहा गया है। मुनियों को यति, तपस्वी, भिक्षु और श्रमण भी कहा जाता है।

वैदिक काल में कुछ ऐसे ऋर्षि हुए हैं जो किसी न किसी वजह से प्रसिद्ध रहे हैं उन्हीं में से कुछ ऋर्षियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी कुछ इस तरह है।

    अंगिरा: ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

    विश्वामित्र : गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

    वशिष्ठ: ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्र्मो में उनकी सहभागी थीं।

    कश्यप : मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की 13 कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

    जमदग्नि : भृगुपुत्र जमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के 16 मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

    अत्रि : सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

    अपाला : अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

    नर और नारायण : ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

    पराशर : ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

    भारद्वाज : बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

Source: Spiritual News Stories & Aaj Ka Rashifal

Grahashanti removing impurities measures

अगर आपकी कुंडली में किसी भी ग्रह की दशा ठीक नहीं है तो उसकी शांति के लिए कुछ आसान से उपाय आजमा सकते हैं। आप रत्न धारण करने की तरह ही वनस्पति का प्रयोग कर सकते हैं।

जिस ग्रह की शांति के लिए जो जड़ बताई गई है। उसे उसी वार में विधिवत् लाकर धारण कर सकते हैं। ध्यान रखें कि जड़ एक इंच लंबी होनी चाहिए।

    सूर्यः सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ा रविवार को गुलाबी धागे स पीली धातु के कवर में धारण करें।

    चंद्रः चंद्र की शांति के लइ खिरनी की जड़ सोमवार को सफेद ऊन के धागे में लपेटकर धारण करें।

    मंगलः मंगल ग्रह की शांति के लिए अनन्तमूल की जड़ केवल मंगलवार को लाल धागे के साथ धारण करें।

    बुद्धः बुद्ध ग्रह की शांति के लिए विधारा की जड़ बुधवार को हरे धागे से चांदी के यंत्र के साथ धारण करें।

    गुरुः गुरु ग्रह की शांति के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे के साथ स्वर्ण के ताबीज के साथ ग्रहण करें।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए सरपुख की जड़ शुक्रवार को सफेद धागे के साथ धारण करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए सफेद चंदन की जड़ बुधवार को लोहे के यंत्र में धारण करें।

    केतूः केतू की शांति के लिए असगंध की जड़ गुरुवार को आसमानी धागे से चांदी के यंत्र में धारण करें।

वनस्पति से ग्रह शांति

    सूर्यः सूर्य की शांति के लिए कनेर, देवदार, केसर, इलायची, महुआ के फूल का चूर्ण पानी में डालकर स्नान करें। जल्द ग्रह शांति दोष दूर हो जाएगा।

    मंगलः मंगल की शांति के लिए सोंठ, सौंफ, लाल चंदन, के फूल पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    बुधः बुध की शांति के लिए बहेड़ा, चावल, आंवला, और शहद को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    गुरुः गुरु की शांति के लिए मुलेठी, सफेद सरसों को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए हड़,बहेड़ा, आंवला, इलायची, केसर पानी में डालकर स्नान करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए नागबेल, लोबान, तिल के पत्र को पानी में डालकर स्नान करने से ग्रह शांति दोष से मुक्ति मिल जाती है।

    केतुः केतु की शांति के लिए लोबान, बला, मोथा, प्रियंगु को पानी में डालकर स्नान करें।

Source: Spiritual News in Hindi & Horoscope 2014

Thursday, 5 June 2014

Learn to balance the mood of the boss

कहते हैं नौकरी पेंसिल की उस नोक की तरह होती है। जहां आप अगर खड़े हों तो फिसलने का डर हमेशा लगा रहता है। किसी भी नौकरी में आपके बॉस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर अपने बॉस का स्वभाव जान जाएं तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।

ज्योतिष में राशिफल के अनुसार बॉस के व्यवहार को परख सकते हैं। अहमदाबाद के ज्योतिर्विद व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि हर किसी का व्यवहार राशियों के अनुसार रहता है फिर चाहे वो आपका बॉस ही क्यो न हो? इसलिए आप अपने बॉस के नाम की राशि के अनुसार उनके व्यवहार को परख सकते हैं।

    मेष और वृश्चिक राशि को बॉस बड़े मजाकिया किंतु अनुशासित प्रकृति होते हैं। अपनी प्रशंसा सुनना संगीत नाटक व राजनीति में इनकी अधिक रूचि होती है। वृषभ व तुला राशि से इनका तालमेल कम होता है। ये जल्दी आवेश में आ जाते हैं और आक्रमक हो जाते हैं। इनसे बहुत ही प्यार से बोलकर काम निकालना आसान होता है।

    वृषभ व तुला राशि के बॉस स्वप्नलोक में विचरण करने वाले या कल्पनाशील प्रकृति के होते हैं। इनका स्वभाव जिद्दी अड़िअल किंतू नरम स्वभाव का होता है। एक बार कह दें तो यह वादा निभाना जानते हैं। प्यार में अक्सर धोखा खाते है। ऐसे बॉस अच्छे कवि, लेखक, सौंद्रर्य प्रेमी, दयालू और धार्मिक प्रकृति के होते हैं। किंतु वृश्चिक मिथुन राशि से नही बनती है। इनके शौक की प्रशंशा करते रहिए। यह इनकी कमजोरी है।

    मिथुन और कन्या राशि के बॉस गंभीर विचारशील प्रकृति के होते हैं। यह सहज व सरल किंतू अपने हित की पहले सोचने वाले होते हैं। ये पहले सोचते हैं फिर काम करते हैं। खिलाड़ी प्रकृति के होते हैं। प्यार में अक्सर सफल रहते हैं। अनुशासित व्यक्तित्व होता है। इनके ज्ञान व काम करने की प्रशंसा ये आप पर मेहरबान रहेंगे।

    कर्क राशि के जातक चालक परंतु भावुक होते हैं। इनका मन ईश्वर में लगा रहता है पर दिखावा पसंद करते हैं। इनको किसी पर भरोसा नहीं होता है। हर बार हर चीज को शंका से देखना इनकी फितरत में होता है । इसी स्वभाव से इनके आपसी संबध मजबूत नहीं रहते। इनके दुख में शामिल होकर आप इनको प्रभावित कर सकते हैं।

    सिंह राशि के व्यक्ति तेजस्वी ज्ञानी अनुशासित एवं नीति पर चलने वाले पारिवारिक किस्म के न्याय प्रिय होते हैं। दिल के साफ एवं ईमानदार मित्रता निभाना इनको बहुत आता है। तुला कुंभ मकर राशि से कम बनती। इनके साथ ईमानदारी से स्पष्ट बात कीजिए। चापलूसी इनको पसंद नहीं। कितु नास्तिक प्रकृति के होते हैं।

    धनु और मीन राशि के व्यक्ति संवेदनशील भावुक और धार्मिक प्रकृति के होते हैं। इसलिए अतिविश्वास पर बार- बार धोखा खाना नसीब में प्यार में धोखा खाते हैं। यह आस्तिक होते हैं और धर्म को मानते हैं। इनके साथ खुले मन के साथ बात कीजिए घुल- मिल जाएंगे। इनकी धार्मिक लोगों से बनती है।

    मकर और कुंभ राशि वाले व्यक्ति अनुशासित व्यक्ति होते हैं। संघर्ष करना और जीतना इन्हें पसंद है। अंदर से यह भावुक व दयालू होते हैं। बाहर से सख्त होने का दिखावा करते हैं। प्यार में ठोकर खाना बार-बार नसीब में होता है। दोस्ती निभाना इन्हें आती है। दिल की बात दोस्तों के साथ खुलकर करना और सभी तरह के शौक पूरा करना इनका स्वभाव होता है।

Source: Spiritual Hindi Stories & Rashifal Hindi 2014

Grahashanti removing impurities measures

अगर आपकी कुंडली में किसी भी ग्रह की दशा ठीक नहीं है तो उसकी शांति के लिए कुछ आसान से उपाय आजमा सकते हैं। आप रत्न धारण करने की तरह ही वनस्पति का प्रयोग कर सकते हैं।

जिस ग्रह की शांति के लिए जो जड़ बताई गई है। उसे उसी वार में विधिवत् लाकर धारण कर सकते हैं। ध्यान रखें कि जड़ एक इंच लंबी होनी चाहिए।

    सूर्यः सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ा रविवार को गुलाबी धागे स पीली धातु के कवर में धारण करें।

    चंद्रः चंद्र की शांति के लइ खिरनी की जड़ सोमवार को सफेद ऊन के धागे में लपेटकर धारण करें।

    मंगलः मंगल ग्रह की शांति के लिए अनन्तमूल की जड़ केवल मंगलवार को लाल धागे के साथ धारण करें।

    बुद्धः बुद्ध ग्रह की शांति के लिए विधारा की जड़ बुधवार को हरे धागे से चांदी के यंत्र के साथ धारण करें।

    गुरुः गुरु ग्रह की शांति के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे के साथ स्वर्ण के ताबीज के साथ ग्रहण करें।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए सरपुख की जड़ शुक्रवार को सफेद धागे के साथ धारण करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए सफेद चंदन की जड़ बुधवार को लोहे के यंत्र में धारण करें।

    केतूः केतू की शांति के लिए असगंध की जड़ गुरुवार को आसमानी धागे से चांदी के यंत्र में धारण करें।

वनस्पति से ग्रह शांति

    सूर्यः सूर्य की शांति के लिए कनेर, देवदार, केसर, इलायची, महुआ के फूल का चूर्ण पानी में डालकर स्नान करें। जल्द ग्रह शांति दोष दूर हो जाएगा।

    मंगलः मंगल की शांति के लिए सोंठ, सौंफ, लाल चंदन, के फूल पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    बुधः बुध की शांति के लिए बहेड़ा, चावल, आंवला, और शहद को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    गुरुः गुरु की शांति के लिए मुलेठी, सफेद सरसों को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए हड़,बहेड़ा, आंवला, इलायची, केसर पानी में डालकर स्नान करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए नागबेल, लोबान, तिल के पत्र को पानी में डालकर स्नान करने से ग्रह शांति दोष से मुक्ति मिल जाती है।

    केतुः केतु की शांति के लिए लोबान, बला, मोथा, प्रियंगु को पानी में डालकर स्नान करें।

Source: Spiritual Hindi News & Rashifal in Hindi 2014

Vaastu light colors to paint the house is so good

घर का वास्तु ठीक हो तो आपको परेशानियां स्पर्श भी नहीं कर सकती हैं। इन आसान से वास्तु टिप्स को आजमाकर आप हमेशा खुशी और हर्षोउल्लास से अपनी ज़िंदगी को और भी ज्यादा बेहतर तरीके से जी सकते हैं।

1. घर के मुख्य द्वारा की सजावट करें ऐसा करने से आपके धन की वृद्धि होती है।

2. घर की खिड़कियों में सुंदर कांच लगाएं, आपके संबंधों में मधुरता आएगी।

3. घर में दर्पण कुछ इस तरह से लटकाएं कि उसमें लॉकर या केश बॉक्स का प्रतिबिम्ब बने ऐसा करने से आपकी धन दौलत और शुभ अवसरों पर दो गुनी वृद्धि होती है।

4. अपने मास्टर बेडरूम को हल्के रंगों से पेंट करना चाहिए जैसे समुंदरी हरा, हल्का गुलाबी और हल्का नीला ये वो रंग हैं जो बेडरूम के लिहाज से अच्छे रहते हैं।

5. घर में रखी बेकार की वस्तुओं को समय-समय पर फेंकते रहना चाहिए। क्यों कि वास्तु के अनुसार घर में पड़ी वस्तुओं से प्रेम में बाधा पहुंचती है।


Tuesday, 3 June 2014

If you are a religious people always remain depression

विज्ञान ने भी यह साबित किया है कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोग अवसाद का शिकार कम होते हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसे लोगों के मस्तिष्क की बाहरी सतह यानी कॉर्टेक्स मोटी होती है। अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में यह जानकारी सामने आई है।

शोध का नेतृत्व कर रही डॉ माइरना वाइजमैन कहती हैं, 'हमारा मस्तिष्क हमारे विचारों और मनोदशाओं का आईना होता है। इमेजिंग की नई तकनीक से यह सब कुछ देखना संभव हुआ है। हमारा मस्तिष्क एक असाधारण अंग है, जो न सिर्फ हम पर नियंत्रण रखता है बल्कि हमारी मनोदशाओं से नियंत्रित भी होता है।'

नए शोध से पता चलता है कि मस्तिष्क की बाहरी सतह की मोटाई और आध्यात्मिकता में गहरा रिश्ता है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि जिन लोगों के मस्तिष्क के कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है वे आध्यात्मिक भी होते हैं।

यह तय है कि जो धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं उनके कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है। पता चला है कि जो लोग अवसाद का शिकार होते हैं उनके कॉर्टेक्स की सतह धार्मिक लोगों के मुकाबले पतली होती है।

इस शोध में ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनके माता-पिता या दादा-दादी अवसाद से संबंधित पहले के अध्ययन में शामिल थे। इनमें से कुछ के परिवार में अवसाद पीढ़ीगत बीमारी के रूप में थी। इस समूह की तुलना ऐसे लोगों के साथ की गई, जिनमें अवसाद के कोई लक्षण नहीं थे।

जिन बातों को हम पहले से जानते हैं, उन पर विज्ञान की मुहर लगती है तो उनमें हमारा विश्वास और प्रबल होता है।