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Saturday, 21 June 2014

Mango and lychee sad story

दो किसान थे। एक ने आम उगाए थे तो दूसरे ने लीची। अपने-अपने फल बाजार में बेचने के बाद उन दोनों ने अपने लिए पांच-पांच किलो फल बचा लिए थे। वापस लौटते समय दोनों रास्ते में मिले। दोनों में बात होने लगी।

आम वाला किसान बोला - मैंने फल बचा तो लिए, लेकिन इस बार खूब फसल हुई, हम लोगों ने खूब आम खाए। अब खाने का बिल्कुल भी मन नहीं है। लीची वाले किसान ने कहा यही हाल मेरा भी रहा। दोनों ने यह फैसला किया कि दोनों आपस में फल बदल लेते हैं।

आम वाले ने लीची ले लीं और लीची वाले किसान ने आम। लेकिन आम वाला किसान बहुत लालची था। उसने नजर बचाकर कुछ आम बचाकर रख लिए।

लीची वाला किसान आम पाकर बहुत खुश हुआ। घर जाकर उसने पूरे परिवार को आम खिलाए और उसे बड़ी अच्छी नींद आई। लेकिन आम वाला किसान बहुत व्यथित रहा।

उसे रात भर नींद नहीं आ सकी। उसे आत्मग्लानि नहीं हो रही थी, बल्कि उसे यह लग रहा था कि कहीं उसकी तरह लीची वाले किसान ने भी कुछ लीचियां छुपाकर तो नहीं रख ली हैं।

संक्षेप में

गलत काम करने वाले को दूसरा व्यक्ति भी गलत ही नजर आता है। इसी कारण उसे दुः ख मिलता है।

Justice anywhere in the justice of poku temple

उत्तरांखड और हिमाचल की सीमा पर उत्तरकाशी जिले के जौनसार-बावर इलाके के नैटवाड़ में न्याय प्रिय माने जाने वाले पोखू देवता के दरबार में दर्जनों लोग रोजाना अपनी फरियाद लेकर आते हैं।

मान्यता है कि पोखू देवता किसी को भी निराश नहीं करते। इस मंदिर में पूजा-पाठ की विधि भी अनूठी है। हिमालय पर्वत से निकली रुपीण और सुपीण नदी के संगम पर स्थित नैटवाड़ के पोखू मंदिर में पूरे साल यह क्रम चलता है।

किंवदंती है कि पोखू देवता के दरबार आए पीड़ित लोगों को हाथों-हाथ न्याय मिलता है। न्याय की आस में पोखू दरबार आए लोगों को मंदिर के कुछ नियम-कायदों का पालन करना होता है।

यहां भक्त खासकर, जमीन-जायजाद के विवाद के साथ अपनी तमाम समस्याएं लेकर आते हैं। लेकिन, उत्तराखंड में एक मात्र ऐसा मंदिर है, जहां सामाजिक प्रताड़ना और मुसीबतें झेलने के बाद निराश लोग हाथों-हाथ न्याय मिलने की उम्मीद में आते हैं।

पोखू हैं कुल देवता

सिंगतूर पट्टी के नैटवाड़, दड़गाण, कलाब, सुचियाण, पैंसर, पोखरी, पासा, खड़ियासीनी, लोदराला व कामड़ा समेत दर्जनभर गांव के लोग पोखू को अपना कुल आराध्य देव मानते हैं।

पौराणिक मान्यता

इस क्षेत्र के लोगों का जीवन पूरी तरह खेती बाड़ी पर निर्भर हैं। इसी वजह से यहां जमीन जायजाद के झगड़े ज्यादा होते हैं। सिविल मामलों की सुनवाई में ज्यादा लंबा वक्त लगने की वजह से लोगों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता था, इसी को देखते हुए लोग कोर्ट कचहरी की बजाय पोखू देवता के मंदिर में अपनी फरियाद लेकर जाने लगे। सदियों से यही परंपरा आगे बढ़ रही है।

इस परंपरा के पीछे सामाजिक मनोविज्ञान भी है। समाजशास्त्रियों का मत है कि पोखू देवता के त्वरित न्याय की मान्यता के चलते दूसरों की जमीन जायजाद हड़पने या चेष्टा करने वालों पर सामाजिक दबाव भी बनता है।

पूजा की अनूठी विधि

पोखू देवता मंदिर में पूजा-पाठ की विधि अनूठी है। मंदिर के पुजारी पोखू देवता की मूर्ति की तरफ मुख करने के बजाय पीठ घुमाकर पूजा करते हैं।

यहां प्रतिदिन सुबह-सायं दो बार पूजा होती है। पूजा से पहले पुजारी रुपीण नदी में स्नान करके सुराई-गढ़वे में पानी लाना होता है। इसके बाद आधे घंटे तक ढ़ोल के साथ मंदिर में पूजा होती है।

Friday, 20 June 2014

Guaranteed success are abhijit muhurat

हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक हर दिन का कुछ समय अति शुभ माना गया है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इस समय कोई भी कार्य करने पर विजय प्राप्त होती है।

ज्योतिर्विद और भागवत मर्मज्ञ पं. ओम वशिष्ठ बताते हैं कि वर्ष के 365 दिन में 11.45 से 12.45 तक का समय अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। इस मुहूर्त में अगर कोई भी कार्य किया जाए तो उसमें विजय प्राप्त होती है।

कहते है इसमें आप कुछ भी करें तो वह सर्वफलदायी होता है, सर्वाथसिद्धिदायक होता है। इस मुहूर्त या फिर तिथि में किया गया काम शुभ फलों को देता है। अतिशुभ फलों के इन्हीं आगमन के लिए हिंदू कैलेंडर में कुछ तिथियां हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा काल गणना के आधार पर निर्धारित की गई है।

अभिजीत मुहूर्त यानी एक ऐसा मुहूर्त जिसमें अगर काम शुरु किया गया तो विजय होनी तय है, सफलता की गारंटी पक्की होती है। इस बार 01-02 अप्रैल को अक्षय तृतीया का शुभ दिन है।

वैशाख महीने की गणना सबसे सर्वोत्तम महीनों में की जाती है। वैशाख मास की विशिष्टता इसमें पड़ने वाली अक्षय तृतीय के कारण अमर हो जाती है। भारतीय काल गणना के मुताबिक चार स्वयंसिद्ध अभिजित मुहूर्त माने गए है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा), आखातीज यानी अक्षय तृतीया, दशहरा और दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि।

अक्षय का अर्थ है

जिसका कभी क्षय नहीं हो यानी वह आपके पास हमेशा बना रहे। जिसका नाश ना हो यानी वह आपके पास स्थायी रहे। स्थायी वहीं रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। भारतीय संस्कृति में इस दिन का महत्व व्यापक है।

पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है। परशुरामजी की गिनती चिंरजीवी महात्माओं में की जाती है।

कहते हैं चारों युगों अर्थात सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन ही हुई थी इसलिए इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि यानी युर्गाद तिथि भी कहते हैं। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है।

इसी तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण और श्री केदारनाथधाम के पट खुलते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाए जाने वाले इस व्रत की बड़ी मान्यता है । इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र, आभूषण आदि बनवायें, खरीदें और धारण किए जाते हैं। नई भूमि को खरीदना, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

विवाह और मांगलिक कार्य

इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजीत शुभ मुहूर्त के कारण विवाह और मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। अक्षय तृतीया वाले दिन दिया गया दान अक्षय पुण्य के रूप में संचित होता है।

इसलिए इस दिन अपने सामर्थ्य के मुताबिक दान-पुण्य करना चाहिए। यानी इस दिन आप जो कुछ भी करते हैं उसका क्षय नहीं होता है। चाहे वह कोई शुभ कार्य हो या फिर आपके द्वारा किया गया दान-पुण्य।

अक्षय तृतीया को स्वर्ण युग की आरंभ तिथि भी मानी गई है। अक्षय का अर्थ है कि कभी समाप्त न होने वाला। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन खरीदा और धारण किए गए सोने और चांदी के गहने अखंड सौभाग्य का प्रतीक माने गए हैं। मान्यताओं के मुताबिक सोने और चांदी के आभूषण खरीदने से घर में बरकत ही बरकत आती है।

मान्यता है कि लक्ष्मी को स्थिर होना चाहिए ताकी घर में बरकत और खुशहाली की सदैव बारिश होती रहे। सोने के प्रति ज्योतिषियों का मानना है कि सोना के होने से घर में शुभ कारकों का उदय होता है जो परिवार में खुशहाली का माध्यम बनते हैं। इसलिए अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदने और पहनने की भी परंपरा है।

Tuesday, 17 June 2014

With diligence and patience will definitely get success

एक बार गौतम बुद्ध अपने अनुयायियों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। गर्मी का मौसम था। गांव पहुंचने से पहले ही बुद्ध के साथ जा रहे लोगों को जगह-जगह बहुत सारे गड्ढे खुदे हुए मिले।

तब उनके एक शिष्य ने गड्डे देखकर जिज्ञासा प्रकट की, आखिर इस तरह गढे का खुदे होने का तात्पर्य कया है? तब गौतम बुद्ध बोले, पानी की तलाश में किसी व्यक्ति ने इतनें गड्ढे खोदे है।

यदि वह धैर्यपूर्वक एक ही स्थान पर गड्ढा खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता।पर वह थोडी देर गड्ढा खोदता और पानी न मिलने पर दूसरा गड्ढा खोदना शुरू कर देता।

संक्षेप में

कहा गया है कि व्यक्ति को परिश्रम करने के साथ धैर्य भी रखना चाहिए। तभी उन्हें सफलता मिलती है।

Here is the couple wish to

समुद्र तल से 1350 मीटर की ऊंचाई पर कीलांचल पर्वत (ऋष्यलकु पर्वत) की तलहटी में स्थित सती मां अनुसूया मंदिर निः संतान दंपतियों बच्चों की इच्छा से आते हैं।

कहते हैं कि यहां तप करने वाले नि:संतान दंपती की गोद जरूर भरती है। यह मान्यता सदियों से चली आ रही है।

वैसे तो सालभर इस मंदिर के कपाट खुले रहते हैं, परंतु प्रत्येक वर्ष दिसंबर माह में दत्तात्रेय जयंती पर यहां दो दिन का विशाल मेला लगता है। चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर से 13 किलोमीटर सड़क मार्ग से मंडल पहुंचने के बाद पांच किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर कीलांचल पर्वत की तलहटी में होते हैं मां अनुसूया के दर्शन।

गर्भगृह में सती मां

इस मंदिर में एक शिला पर गणेश की मूर्ति स्थापित है। गर्भगृह में सती मां अनुसूया की मूर्ति चांदी के छत्रों से जड़ी हुई है। मंदिर प्रांगण में शिव, पार्वती, गणोश के अलावा सती मां अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय की त्रिमुखी प्रतिमा विराजमान है।

अनुसूया मंदिर के निकट ही महर्षि अत्रि की तपस्थली भी है। सती मां अनुसूया के बारे में कथा प्रचलित है कि इसी स्थान पर त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने मां के सतीत्व की परीक्षा लेनी चाही तो मां अनुसूया ने तीनों देवों को बालक बनाकर अपना स्तनपान कराया। यहां बारी प्रथा से पूजा-अर्चना की परंपरा है।

मंदिर में सुबह छह बजे स्नान, श्रृंगार, पूजा, 10 बजे रोट, आटे का चूरमा, मालपुआ का भोग और शाम सात से आठ बजे के बीच संध्या आरती संपन्न होने के बाद लगाया जाता है।

मौसम का मिजाज

यह मंदिर वर्षभर खुला रहता हैं। अप्रैल से सितंबर तक यहां का मौसम गर्म, बारिश, अक्टूबर से मार्च तक बारिश एवं बर्फबारी होती है।

देहरादून, ऋषिकेश व हरिद्वार रेलमार्ग के लिए ऋषिकेश निकटतम रेलवे स्टेशन है जिससे मंदिर की दूरी 253 किलोमीटर है।

Friday, 13 June 2014

Statue of mother sita morality

राम-कथा में माता सीता का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। उनका चरित्र संयमी, साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए प्रेरित करता है। जिससे हर नारी को नैतिकता की शिक्षा मिलती है।

राम की शक्ति सीता जी नारी सशक्तीकरण का उदाहरण हैं। अपूर्व साहस, बल, धैर्य, मातृत्व, पति का सहयोग आदि गुण हमें आज के युग में भी प्रेरणा प्रदान करते हैं।

राम-कथा के अनुसार, मिथिलानगरी में सीरजध्वज जनक नाम के राजा को सीता भूमि को जोतते समय मिली थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी पुत्री स्वीकार किया। सीता में अपूर्व बल और साहस था।

कथा के अनुसार, उन्होंने शिव-जी का धनुष अपने हाथों से उठा लिया था, जिसे देखकर राजा जनक बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने घोषणा करवा दी कि जो भी शिव जी का धनुष तोड़ेगा, उससे ही सीता का विवाह किया जाएगा। जिस धनुष को सीता ने उठा लिया था, उसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा सके। श्रीराम ने उस धनुष को तोड़कर सीता से विवाह किया।

जब श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले चौदह वर्र्षो का वनवास दिया गया, तो सीता जी ने उनके साथ जाने का तत्काल निर्णय लिया। उन्होंने अपने पति को विपत्तियों में नहीं छोड़ा। श्रीराम द्वारा अयोध्या में ही रहने के आग्रह के बाद भी सीता जी ने सभी सुखों को छोड़कर श्रीराम के साथ वन में जाना ही उचित समझा।

यह एक पत्नी का कर्तव्य भी है कि वह पति के सुख-दुख में सहभागी बनें। सीता ने वही किया। आज की कामकाजी महिलाएं घर की आर्थिक स्थिति सुधारने और सशक्त बनने के लिए घर से बाहर निकलती हैं और काम करके पति का सहयोग करती है। सीता जी ने भी महल में रहने का मोह नहीं किया और वे पति के साथ कंकड़ भरे मार्ग पर निकल पड़ीं।

जब रावण ने अपनी माया से उनका हरण कर लिया, तब भी वे हताश-निराश नहीं हुईं। वे मानसिक रूप से इतनी सबल थीं कि तमाम धमकाने और माया का प्रभाव डालने पर भी उनका आत्मविश्वास नहीं डिगा और उन्होंने गलत प्रस्ताव के आगे समर्पण नहीं किया। वे सत्य के साथ ही रहीं। उनका आत्मविश्वास और धैर्य ही था कि अंतत: सत्य की जीत हुई।

सीता जब अपने पुत्रों लव-कुश के संग वाल्मीकि आश्रम में रहीं, वहां उन्होंने बच्चों लव-कुश को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। सीताजी का चरित्र हमें धैर्यवान, साहसी, आत्मविश्वासी और सहयोगी बनने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Saturday, 7 June 2014

Grahashanti removing impurities measures

अगर आपकी कुंडली में किसी भी ग्रह की दशा ठीक नहीं है तो उसकी शांति के लिए कुछ आसान से उपाय आजमा सकते हैं। आप रत्न धारण करने की तरह ही वनस्पति का प्रयोग कर सकते हैं।

जिस ग्रह की शांति के लिए जो जड़ बताई गई है। उसे उसी वार में विधिवत् लाकर धारण कर सकते हैं। ध्यान रखें कि जड़ एक इंच लंबी होनी चाहिए।

    सूर्यः सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ा रविवार को गुलाबी धागे स पीली धातु के कवर में धारण करें।

    चंद्रः चंद्र की शांति के लइ खिरनी की जड़ सोमवार को सफेद ऊन के धागे में लपेटकर धारण करें।

    मंगलः मंगल ग्रह की शांति के लिए अनन्तमूल की जड़ केवल मंगलवार को लाल धागे के साथ धारण करें।

    बुद्धः बुद्ध ग्रह की शांति के लिए विधारा की जड़ बुधवार को हरे धागे से चांदी के यंत्र के साथ धारण करें।

    गुरुः गुरु ग्रह की शांति के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे के साथ स्वर्ण के ताबीज के साथ ग्रहण करें।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए सरपुख की जड़ शुक्रवार को सफेद धागे के साथ धारण करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए सफेद चंदन की जड़ बुधवार को लोहे के यंत्र में धारण करें।

    केतूः केतू की शांति के लिए असगंध की जड़ गुरुवार को आसमानी धागे से चांदी के यंत्र में धारण करें।

वनस्पति से ग्रह शांति

    सूर्यः सूर्य की शांति के लिए कनेर, देवदार, केसर, इलायची, महुआ के फूल का चूर्ण पानी में डालकर स्नान करें। जल्द ग्रह शांति दोष दूर हो जाएगा।

    मंगलः मंगल की शांति के लिए सोंठ, सौंफ, लाल चंदन, के फूल पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    बुधः बुध की शांति के लिए बहेड़ा, चावल, आंवला, और शहद को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    गुरुः गुरु की शांति के लिए मुलेठी, सफेद सरसों को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए हड़,बहेड़ा, आंवला, इलायची, केसर पानी में डालकर स्नान करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए नागबेल, लोबान, तिल के पत्र को पानी में डालकर स्नान करने से ग्रह शांति दोष से मुक्ति मिल जाती है।

    केतुः केतु की शांति के लिए लोबान, बला, मोथा, प्रियंगु को पानी में डालकर स्नान करें।

Source: Spiritual News in Hindi & Horoscope 2014

Thursday, 5 June 2014

Vaastu light colors to paint the house is so good

घर का वास्तु ठीक हो तो आपको परेशानियां स्पर्श भी नहीं कर सकती हैं। इन आसान से वास्तु टिप्स को आजमाकर आप हमेशा खुशी और हर्षोउल्लास से अपनी ज़िंदगी को और भी ज्यादा बेहतर तरीके से जी सकते हैं।

1. घर के मुख्य द्वारा की सजावट करें ऐसा करने से आपके धन की वृद्धि होती है।

2. घर की खिड़कियों में सुंदर कांच लगाएं, आपके संबंधों में मधुरता आएगी।

3. घर में दर्पण कुछ इस तरह से लटकाएं कि उसमें लॉकर या केश बॉक्स का प्रतिबिम्ब बने ऐसा करने से आपकी धन दौलत और शुभ अवसरों पर दो गुनी वृद्धि होती है।

4. अपने मास्टर बेडरूम को हल्के रंगों से पेंट करना चाहिए जैसे समुंदरी हरा, हल्का गुलाबी और हल्का नीला ये वो रंग हैं जो बेडरूम के लिहाज से अच्छे रहते हैं।

5. घर में रखी बेकार की वस्तुओं को समय-समय पर फेंकते रहना चाहिए। क्यों कि वास्तु के अनुसार घर में पड़ी वस्तुओं से प्रेम में बाधा पहुंचती है।


Tuesday, 3 June 2014

If you are a religious people always remain depression

विज्ञान ने भी यह साबित किया है कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोग अवसाद का शिकार कम होते हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसे लोगों के मस्तिष्क की बाहरी सतह यानी कॉर्टेक्स मोटी होती है। अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में यह जानकारी सामने आई है।

शोध का नेतृत्व कर रही डॉ माइरना वाइजमैन कहती हैं, 'हमारा मस्तिष्क हमारे विचारों और मनोदशाओं का आईना होता है। इमेजिंग की नई तकनीक से यह सब कुछ देखना संभव हुआ है। हमारा मस्तिष्क एक असाधारण अंग है, जो न सिर्फ हम पर नियंत्रण रखता है बल्कि हमारी मनोदशाओं से नियंत्रित भी होता है।'

नए शोध से पता चलता है कि मस्तिष्क की बाहरी सतह की मोटाई और आध्यात्मिकता में गहरा रिश्ता है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि जिन लोगों के मस्तिष्क के कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है वे आध्यात्मिक भी होते हैं।

यह तय है कि जो धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं उनके कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है। पता चला है कि जो लोग अवसाद का शिकार होते हैं उनके कॉर्टेक्स की सतह धार्मिक लोगों के मुकाबले पतली होती है।

इस शोध में ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनके माता-पिता या दादा-दादी अवसाद से संबंधित पहले के अध्ययन में शामिल थे। इनमें से कुछ के परिवार में अवसाद पीढ़ीगत बीमारी के रूप में थी। इस समूह की तुलना ऐसे लोगों के साथ की गई, जिनमें अवसाद के कोई लक्षण नहीं थे।

जिन बातों को हम पहले से जानते हैं, उन पर विज्ञान की मुहर लगती है तो उनमें हमारा विश्वास और प्रबल होता है।

Nirjla Ekadashi

एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्यास्त तक पानी न पीने का विधान होने के कारण इस एकादशी कहते हैं। वैसे तो एक महीने में दो बार एकादशी आती है। शास्त्रों में एकादशी का व्रत करने का विधान बताया गया है।

स्वास्थ्य, दीर्धायु, सामाजिक सुख तथा मोक्ष फल की प्राप्ति में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन आमरस दान करने के कारण इसे आम एकादशी भी कहते हैं।

ऐसे करें व्रत

ज्येष्ठ माह की में आने वाला निर्जला एकादशी व्रत के दिन पानी भी नहीं पीना चाहिए। इसलिए यह व्रत श्रमसाध्य होने के साथ संयम के साथ करना चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि वह जल को कलश से भरे। सफेद वस्त्र से उसे ढक दे। ढक्कर पर चीनी और दक्षिणा रख कर ब्राह्मणों को दान करें।

महिलाएं नथ पहनकर, ओढनी ओढ़ कर, मेंहदी लगाकर विधिपूर्वक शीतल जल से भरा मिट्टी का घड़ादान कर अपनी सास या अपने से बड़े लोगों के चरण स्पर्श करें।

एकादशी का व्रत करके अपने सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र, आम और अन्य फलों का दान करना चाहिए। इस दिन निर्जल व्रत को बहुत महत्व माना गया है। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर एकादशियों का लाभ प्राप्त होता है।

व्रत की कथा

एक दिन महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी का व्रत का विधान और फल बताया। इस दिन भोजन करने के दोषों की जब वे चर्चा करने लगे तो भीमसेन ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि इस दिन जब सारे लोग अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगे तो ये व्रत मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं तो बिना खाए-पीए नहीं रह सकता है। इसलिए मुझे कओ ऐसा व्रत बताइए जिसको करने के बार मुझे सारी एकादशियों का फल मिल जाए।

महर्षि व्यास जानते थे कि भीमसेन के उदम में वृक नामक अग्नि है। इसलिए अधिक भोजन करने पर भी उसकी भूख शांत नहीं होगी। भीमसेन के इस प्रकार के भावों को समझकर महर्षि व्यास ने आदेश दिया कि- भीम तुम ज्येष्ठ शुक्ल की एकादशी जिसे निर्जला एकादशी का व्रत अगर करो।

इस व्रत में आचमन में पानी पीने से दोष नहीं होता। इस दिन अन्न न खाकर, जितने पानी में एक माशा सोने की मुद्रा डूब जाए उतना ही अन्न ग्रहण करो। तो ऐसे में तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा और तुम्हें पूरी एकादशियों का पुण्य मिलेगा। इसलिए निर्जला एकादशी को एक किंवदंती के अनुसार भीमसेनी एकदशी भी कहते हैं।

Strange here amazing temple

भारत विभिन्न धर्मों का देश है। यहां हर संस्कृति और धर्म को आश्रय प्राप्त है। यहां लगभग सभी धर्मों में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और अन्य तीर्थ स्थल मिल जाएंगे। देश में कुछ ऐसे भी मंदिर हैं जो अद्भुत हैं अपने नाम से या वहां की जानी वाली पूजा से उन्हीं में से हैं ये मंदिर...

ओम बन्ना मंदिर

राजस्थान के जोधपुर में ओम बन्ना का मंदिर अन्य सभी मंदिरों से बिल्कुल ही अलग है। ओम बन्ना मंदिर की विशेषता है कि इसमें पूजा की जाने वाले भगवान की मूर्ति नहीं है बल्कि एक मोटरसाइकिल और उसके साथ ही ओम सिंह राठौर की फोटो रखी हुई है, लोग उन्हीं की पूजा करते हैं।

मोटरसाइकिल के बारे में कहा जाता है कि इसी मोटरसाइकिल से 1991 में ओम सिंह का एक्सिडेंट हो गया था। एक्सिडेंट में ओम सिंह की तत्काल मौत हो गई। लोकल पुलिस मोटरसाइकिल को पुलिस थाने लेकर चली गई लेकिन दूसरे दिन मोटरसाइकिल वापस एक्सिडेंट वाली जगह पर पहुंच गई।

चाइनीज काली मंदिर

कोलकाता के टांगरा में एक 60 साल पुराना चाइनीज काली मंदिर है। इस जगह को चाइनाटाउन भी कहते हैं। इस मंदिर में स्थानीय चीनी लोग पूजा करते हैं। यहीं नहीं दुर्गा पूजा के दौरान प्रवासी चीनी लोग भी इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। यहां आने वालों में ज्यादातर लोग या तो बौद्ध हैं या फिर ईसाई। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां आने वाले लोगों को प्रसाद में नूडल्स, चावल और सब्जियों से बनी करी परोसी जाती है।

कावी में स्थित स्तंभेश्वर महादेव मंदिर

आप यह कल्पना नहीं कर सकते लेकिन यह बात सच है कि यह मंदिर पल भर के लिए ओझल हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद अपने उसी जगह वापिस भी जाता है। यह मंदिर अरब सागर के बिल्कुल सामने है और वडोदरा से 40 मील की दूरी पर है। खास बात यह है कि आप इस मंदिर की यात्रा तभी कर सकते हैं जब समुद्र में ज्वार कम हो। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है।

Life is so beautiful then why suicide

मध्यप्रदेश के इंदौर में एक ही दिन में 6 लोगों के आत्महत्या कर ली। कारण अलग-अलग थे। बड़ी वजह परिवार का दबाव, बहुत ज्यादा नकारात्मकता और मानसिक तनाव था।

हर तरफ चर्चा है कि ऐसा क्यों हो रहा है और आज की पीढ़ी को इससे कैसे रोका जा सकता है? आमतौर पर देखा जाता है कि यदि आप धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्ति हैं तो इस तरह के विचार आप के मन में कभी नहीं पनपेंगे और आप इस तरह का कोई कदम नहीं उठाएंगे। यह बात शास्त्रों में तो पहले ही लिख दी गई थी, इसे अब विज्ञान भी मानता है।

दरअसल आधुनिक समाज में धर्म एवं धार्मिक भावना कम हो रही है। ऐसे में आत्महत्या जैसी बुराई के निवारण के लिए आवश्यक है कि ईश्वर भक्ति, योगा, चिंतन, मनन जैसे क्रियाकलाप रोज किए जाएं। ऐसा करने से आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा और आत्महत्या जैसे बुरे विचार आपके मस्तिष्क को छू भी नहीं पाएंगे।

वर्तमान दौर में किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति को असफलता सहज स्वीकार्य नहीं होती। किंतु यह स्थिति, किशोरावस्था व युवावस्था में बेहद संवेदनशील होती है। जब किसी युवा को लगने लगता है कि वह अपने अभिभावकों के स्वप्न को साकार नहीं कर पाएगा तो वह नकारात्मक सोच में डूब जाता है और इस तरह की परिस्थिति उसे कहीं न कहीं उसे आत्महत्या के लिए विवश करती है।

ज्योतिष की नजर से...

अहमदाबाद के ज्योतिषी व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा और चंद्रमा को मनु का कारक माना गया है। अष्टम चंद्रमा नीच राशि में अथवा राहु को शनि के साथ विष योग और केतु के साथ ग्रहण योग उत्पन्न करता है। ऐसे समय में मनुष्य की सोचने समझने में शक्ति कम कर देता है। उसकी वजह से वो अपनी निर्णय शक्ति खो देता है। अगर 12वें भाव में ऐसी युति होने पर फांसी या आत्महत्या का योग बनता है। इसी तरह अनन्य भाव में अलग- अलग परिणाम उत्पन करता है।

बचने के ये उपाय भी हैं कारगर

शास्त्रों में इससे बचने के लिए शिव स्तुति, महामृत्युंजय मंत्र, शिवकवच, देवीकवच और शिवाभिषेक सबसे सहज सरल और प्रभावी उपाय हैं। किसी भी ग्रह के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए शुभ ग्रह की स्तुति और नीच ग्रह का दान श्रेष्ठ रहता है।

जिन्हें आत्महत्या के विचार आते हों, ऐसे व्यक्तियों को मोती एवं स्फटिक धारण करना चाहिए, और नियमित भगवान शिव का जलाभिषेक करना लाभप्रद रहते हैं। इसके अलावा पांच अन्न(गेहूं, ज्वार, चावल, मूंग,जवा और बाजरा) दान करना चाहिए। इसके साथ ही पक्षियों को इन अन्न के दाने भी खिलाना चाहिए।

आत्महत्या का कारण वास्तु भी?

जिस घर में आत्महत्या होती है, उस घर में दो या दो से अधिक वास्तुदोष अवश्य होते हैं। इनमें से एक दोष घर के ईशान कोण (पूर्व- उत्तर) में होता है और दूसरा दक्षिण पश्चिम में होता है। घर में दक्षिण पश्चिम जगह कोण के वास्तुदोष जैसे भूमिगत पानी की टंकी, कुआं, बोरवेल, बेसमेंट या किसी भी प्रकार से इस कोने का फर्श नीचा हो।

इस दोष के साथ यदि उस घर के पश्चिम र्नैत्य कोण में मुख्य द्वार हो तो घर के पुरूष सदस्य के साथ और यदि मुख्य द्वार दक्षिण र्नैत्य कोण में हो तो उस घर की स्त्री द्वारा आत्महत्या की संभावना बलवती हो जाती है।

दूसरा वास्तुदोष घर के ईशान कोण में होता है। जैसे - घर का यह कोना अंदर दब जाए, कट जाए, गोल हो जाए या किसी कारण पूर्व आग्नेय (ईस्ट आफ साऊथ ईस्ट) की ओर दीवार आगे बढ़ जाए तो घर के पुरूष सदस्य द्वारा और यदि उत्तर वायव्य (नार्थ आफ द नार्थ वेस्ट) की दीवार आगे बढ़ जाए तो घर की स्त्री सदस्य द्वारा आत्महत्या की जा सकती है।

इसी प्रकार घर के दक्षिण र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां और पश्चिम र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो पुरूष उन्माद जैसे रोगों के शिकार होंगे और कहीं-कहीं वे आत्महत्या भी कर सकते हैं व पूर्व आग्नेय कोण ढंके तो पुरूष द्वारा और उत्तर वायव्य ढंके तो भी स्त्री द्वारा आत्महत्या करने की संभावना बन जाती है। उपरोक्त आत्महत्याओं जैसी दुःखद घटनाओं से बचने का एकमात्र उपाय है कि, घर के वास्तुदोषों को दूर किया जा सकता है।

कहता है विज्ञान

इंदौर के मनोचिकित्सक डॉ. अभय जैन बताते हैं कि आत्महत्या का मूल कारण दरअसल डिप्रेशन है। आत्महत्या के मानसिक, सामाजिक, साइकोलॉजिकल, बायोलॉजिकल एवं जेनेटिक कारण होते हैं। ऐसे व्यक्ति जिनमें आत्महत्या के जीन होते हैं, उनमें बायोकेमिकल परिवर्तन हो जाते हैं और वह आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाते हैं।

इसके कई कारण होते हैं जैसे तनावपूर्ण जीवन, घरेलू समस्याएं, मानसिक रोग आदि। जिन लोगों में आत्महत्या के बारे में सोचने की आदत (सुसाइडल फैंटेसी) होती है, वही आत्महत्या ज्यादा करते हैं। नकारात्मकता आत्महत्या की बहुत बड़ी वजह हैं क्योंकि इस समय आप सही सलाह नही ले पाते। वहीं आत्महत्या का विचार करने वाले लोग यदि धर्म और अध्यात्म का सहारा लें तो इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।

युवावस्था संक्रमण काल है, युवाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खासतौर से कॅरियर, जॉब, रिश्ते, खुद की इच्छाएं, व्यक्तिगत समस्याएं जैसे लव अफेयर, मैरिज, सैटलमेंट, भविष्य की पढ़ाई आदि।

जब वह इस अवस्था में आता है, तो बेरोजगारी का शिकार हो जाता है और भविष्य के प्रति अनिश्चितता बढ़ जाती है। अपरिपक्वता के कारण कई बार परेशानियां आती हैं। जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, सायकोसिस, पर्सनालिटी डिसऑर्डर की स्थिति बन जाती है।

महत्वपूर्ण तथ्य

आत्महत्या पर पहली संस्थागत रिसर्च 1958 में लॉस एंजिल्स में हुई थी।

आत्महत्या, दुनिया में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण है।

किशोरावस्था और 35 वर्ष से कम आयुवर्ग में आत्महत्या, असमय मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है।

हर साल दुनिया में एक से दो करोड़ से भी ज्यादा लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी मौत नहीं होती।

Thursday, 22 May 2014

Shanidev is the birthday of lord shani jayanti

इस बार शनि जयंती त्रिपर्व संयोग के साथ आ रही है। पहले दिन सोम प्रदोष, दूसरे दिन शिव चतुर्दशी और तीसरे दिन शनि जयंती मिलकर यह संयोग बना रहे हैं। सर्वार्थसिद्धि योग होने से यह दिन और खास बन गया है।

शनि जयंती 28 मई बुधवार को आएगी। अमावस्या मंगलवार रात 11.45 बजे से बुधवार रात 12.09 बजे तक रहेगी। सर्वार्थसिद्धि योग बुधवार सुबह 5.13 बजे से दिवस पर्यंत रहेगा। ज्योतिर्विद्‌ श्यामजी बापू के अनुसार हवन-पूजन और साधना की दृष्टि से सर्वार्थसिद्धि योग खास है।

शनि दशा से पीड़ित जातकों के लिए यह दिन मंगलकारी होगा। वर्तमान में शनि अपनी उच्च राशि तुला में है, जो 02 नवंबर तक रहेगा। इस दिन शाम 5.56 बजे रोहिणी नक्षत्र लगेगा।

न्याय के देवता हैं शनि

ज्योतिर्विद देवेंद्र सिंह कुशवाह के मुताबिक के मुताबिक शास्त्रों में शनि को न्याय का देवता कहा गया है। मान्यता है कि शनि जयंती पर दान-पूजन से जातक शनि दोष से मुक्त होता है। इस दिन तिल-उड़द, काले कपड़े, लोहे की सामग्री दान करने का विधान है।

साढ़े साती के जातकों के लिए महत्वपूर्ण

पं. धर्मेंद्र शास्त्री ने बताया कि शनि जयंती पर बने त्रिपर्व संयोग के चलते तीन दिन शिव और शनि आराधना के लिए खास हैं। 26 मई को सोम प्रदोष, 27 को शिव चतुर्दशी और 28 को शनि जयंती रहेगी।

शनि के अधिष्ठाता देव भगवान शिव हैं। दो दिन शिव पूजन और अंतिम दिन शनि पूजन शुभ फल प्रदान करेगा। शिव पूजन से शनि की प्रसन्नाता प्राप्त होगी। कन्या, तुला और वृश्चिक राशि के जातकों पर साढ़े साती और कर्क व मीन पर शनि का ढैया है। इन जातकों को तीन दिन पूजन करना हितकारी रहेगा।

Monday, 19 May 2014

Learn from shriram life management

वास्तव में मैनेजमेंट का मतलब लोगों को मैनेज करना होता है। एक कामयाब मैनेजर में कुछ विशेषताएं होती हैं। जैसे लक्ष्य जिसे पाने का ढंग, मूल्य, रणनीति, विश्वास, प्रोत्साहन, श्रेय, उपलब्धता और पारदर्शिता।

राम का लक्ष्य था सत्य और न्याय का शासन स्थापित करना। इसके लिए उन्होंने जो मूल्य चुने, उनमें पिता की आज्ञा का हृदय से पालन, शबरी और केवट के साथ सामाजिक समानता।

भगवान श्रीराम अपना हर काम लगभग मैनेजमेंट के जरिए ही करते थे और उनका मैनेजमेंट काफी कारगर सिद्ध होता था। राम ने रावण से युद्ध की तैयारियां दो साल तक कीं। चाहते तो एक नजर समुद्र को देखते और पुल बन जाता।

बीस दिन तक युद्ध चला और रावण मारा गया। वह चाहते तो लंका बिना जाए उसे खत्म कर देते। राम कहीं चमत्कार नहीं करते। चमत्कार हनुमान करते हैं। पर्वत उठा लाते हैं। दोनों भाइयों को कंधों पर बैठाकर निकल पडते हैं। अंगद चमत्कार करते हैं। पांव ऐसा जमाते हैं कि कोई उठा नहीं पाता।

राम ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा और न ही प्रवचन दिया। खुद को ईश्वर का अवतार बताकर समाज से बुराइयां मिटाने का अभियान भी नहीं चलाया। उन्होंने अपना जीवन ही ऐसा बनाया कि लोग उनसे सीखें।

राम ने रणनीति के तहत ही समुद्र पर वानरों, भालुओं से पुल बनवाया। इससे जनता को लगा कि उन्होंने खुद कुछ करके राक्षसों का नाश किया। इससे जनता के मन से राक्षसों का भय निकल गया। उनमें गजब का आत्मविश्वास था।

जब भरत अपनी सेना सहित उन्हें वन से वापस लेने आ रहे थे तो लक्ष्मण को लगा कि वह युद्ध करने आ रहे हैं, पर राम निश्चिंत थे। राम मोटीवेटर भी थे। मोटीवेशन न होता तो भालू और बंदर दो साल तक पुल बनाने में नहीं लग पाते। कब के भाग गए होते।

हनुमानजी को उनकी शक्तियां याद दिलाने के लिए तो राम को उन्हें जबरदस्त तरीके से प्रोत्साहित करना पडता था। लंका विजय का श्रेय भी राम ने नहीं लिया। वह जनता के लिए उपलब्ध रहते थे और उनके कार्यों में पारदर्शिता थी।

अगर राम से सफल मैनेजमेंट सीखकर कोई मैनेजर बनता है और अभिभूत होकर अपने इस मैनेजमेंट गुरु के आगे सिर झुकाता है तो ठीक है। हम ऐसा कर पाते हैं तो रामराज जाता नहीं आता है।
 

Thursday, 17 April 2014

If you do not sleep like this

चीनी वास्तुशास्त्र फेंग शुई का एक सिद्धांत है, कि जहां समस्या है वहां उसका समाधान भी है। वास्तु शास्त्र के सिद्धांत पूर्णतः वैज्ञानिक आधार पर बने हैं। इस बात की पुष्टि हम कुछ वास्तु सिद्धांतों के विश्लेषण से कर सकते हैं।

सोते समय सिर दक्षिण में

मनुष्य का सिर उत्तरी ध्रुव और पैर दक्षिण ध्रुव में होने से दोनों में विकर्षण पैदा होगा परिणामस्वरूप मनुष्य के शरीर में रक्त प्रवाह और नींद में बाधा पैदा होने से तनाव उत्पन्न होगा। इसी कारण वास्तु शास्त्र के अनुसार अच्छे स्वास्थ्य के लिए सोते समय सिर दक्षिण में व पैर उत्तर दिशा की ओर होने चाहिए।

पूर्व दिशा में आंगन

घर का आंगन पूर्व दिशा में बनाना चाहिए। क्यों कि सूर्य की जीवनदायी प्रातः काली किरणों का अधिक से अधिक लाभ आपको मिल सके, और प्रातः काल धूप स्नान स्नान किया जा सके।

पूर्व दिशा में पेड़

घर के पूर्व एवं ईशान दिशा में बड़ी शाखा एवं मोटी पत्तियों वाले बड़े पेड़ को नहीं लगाना चाहिए। यह पेड़ प्रातःकालीन सूर्य की सकारात्मक किरणों को घर में प्रवेश करने में रुकावट पैदा करतेहैं।

ईशान कोण में पानी

ईशान कोण में स्थित पानी के स्त्रोत पर पड़ने वाली प्रातःकालीन सूर्य की किरणें पानी में पैदा होने वाले हानिकारक वैक्टीरिया और कीटाणुओं आदि को नष्ट करती हैं। विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि सूर्य की किरणों में यह शक्ति होती है।

आग्नेय कोण में रसोईघर

आग्नेय कोण में स्थित रसोई घर में पूर्व दिशा से प्रातः कालीन सूर्य किरणें प्रवेश करती हैं। जो रसोई में पैदा होने वाले हानिकारण वैक्टीरिया एवं कीटाणुओं को नष्ट कर देती हैं।

दीवारें ऊंची व मोटी होनी चाहिए

प्रातः कालीन सूर्य की किरणें तो लाभदायक होती हैं परंतु दोपहर के समय जब सूर्य पश्चिम दिशा में ज्यादा तेज गर्मी फैला रहा होता है तब उस समय सूर्य की किरणें हानिकारण होती है। उन हानिकारक किरणों के संपर्क में हम कम से आएं, इस कारण वास्तुशास्त्र में दक्षिण-पश्चिम दिशा में ऊंची व मोटी दीवार बनाने की सलाह दी जाती है।

Monday, 7 April 2014

Mahagauri fulfill wishes of devotees

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी शक्ति की पूजा की जाती है। इनका रूप गौर वर्ण है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसलिए इन्हें श्वेताम्बरधरा कहा जाता है। मां की चार भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है।

इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किए हुए है। इनकी पूरी मुद्रा शांत है। शिव को पति रूप में पाने के लिए महागौरी ने तपस्या की थी। जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिमय बना दिया। यही वजह है कि वे महागौरी कहलाईं।

फल की प्राप्ति

मां महागाैरी की अाराधना अमोघ फलदायिनी है और उससे भक्तों के तमाम पाप नष्ट हो जाते हैं। महागौरी का पूजन, अर्चना, उपासना करने से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

इस मंत्र का करें जाप

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्धान्महादेवप्रमोददा।।

Wednesday, 26 March 2014

Relationship of god and spirituality

पूरी दुनिया में विद्वान लोग ईश्वर के प्रति एक खास नजरिया रखते हैं। उनका सोचना है कि ईश्वर निराकार है। हम उसे वैसे नहीं देख सकते हैं, जैसे अपने को आईने में देखते हैं। ईश्वर पूरी तरह से बोध का मामला है। जो उस बोध से गुज़र जाता है, वही बुद्ध हो जाता है।

सरल लोग, जिनकी दुनिया उनकी रोजी-रोटी के इर्द-गिर्द मंडराती रहती है, वे ईश्वर को निराकार नहीं मानते। उनका खयाल है कि ईश्वर हमारी तरह ही कहीं होगा और वहीं से हमारे ऊपर नज़र रख रहा होगा।

यही बात दर्शन और पौराणिक शब्दावली में कही जाए तो ईश्वर सगुण है। ठीक वैसे ही जैसे हम लोग सगुण हैं। वहीं विद्वानों ने ईश्वर को निर्गुण बना रखा है-'निरगुनिया'। अब यह दर्शनशात्र का बड़ा महत्वपूर्ण द्वंद्व है।

इस पर बड़ी बहसें हुई हैं। कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। ईश्वर निराकार भी है और साकार भी। ईश्वर निर्गुण भी है और सगुण भी है। भारतीय धर्मों में इसे बहुत शांत तरीके से बताया गया है।

अगर भगवान निराकार है, निर्गुण है तो वह सुपर ईश्वर है, उसके लिए हमने 'ब्रह्म' शब्द चुना है-'द एब्सल्यूट'। अगर भगवान साकार हैं, सगुण हैं तो उनके लिए ईश्वर शब्द चुना है।

ब्रह्म का केवल बोध किया जासकता है। यही बोध आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा होगा, जिसे हम परमतत्व या अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन सगुण ईश्वर के साथ हम रिश्ता जोड़ सकते हैं। यहां ईश्वर हमारे बहुत करीब आ जाता है और हम उसे थोड़ा नीचे ले आते हैं। जब ईश्वर थोड़ा और नीचे आता है तो अवतार के रूप में आ जाता है- कभी राम बनके, कभी श्याम बनके।

यहां से एक आम आदमी के लिए ईश्वर के साथ तादात्म्य बैठाना और सरल हो जाता है। पूरी दुनिया में भक्ति की मदद से ईश्वर की निकटता आम आदमी केलिए बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आने वाली बात हो जाती है।

अवतार की थियरी ईश्वर का सरलीकरण है। ईश्वर और आध्यात्मिकता के से संबंधित जितने सिंबल हैं, भारत में उनका बड़ा बेहतरीन प्रकटीकरण हुआ है।

ईश्वर को अगर वाणी में व्यक्त करें तो वह 'ऊँ' होगा। अगर आंखों से देखने वाली किसी ऑब्जेक्टिव चीज के रूप में व्यक्त करें तो वह प्रकाश होगा। यहां तक तो सब ठीक होगा, लेकिन जो निराकार हो, जिसका कोई आकार ही नहीं है

जो दिखता ही नहीं है, फिर उसे कैसे व्यक्त करेंगे? लेकिन भारतीय आध्यात्मिकता ने निराकार को भी व्यक्त करने के कुछ तरीके सोचे होंगे।

हमारी आध्यात्मिक परंपरा में ध्यान या मेडिटेशन निराकार को प्रकट करता है। भारतीय आध्यात्मिकता की विशिष्टता हैं। इस तरीके को ही हम ध्यान या मेडिटेशन के नाम से जानते हैं।

अगर आप भगवान के करीबी शिष्यों में शामिल होना चाहते हैं तो आपको उनके निराकार स्वरूप का बोध करना पड़ेगा, जो आप केवल मेडिटेशन से हासिल कर सकते हैं।

Friday, 21 March 2014

The beginning of chaitra shukla pratipada

धर्म-ग्रन्थों के अनुसार मनुष्य को सृष्टि में मात्र पांच हजार वर्ष पुराना बताया जाता था। जबकि इस्लामी दर्शन में इस विषय पर स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है। पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिक भी अपने धर्म-ग्रन्थों की भांति ही कहते हैं कि मानवीय सृष्टि का बहुत प्राचीन नहीं है।

हिन्दू जीवन-दर्शन के अनुसार इस सृष्टि का प्रारम्भ हुए 1 अरब, 97 करोड़, 29 लाख, 49 हजार, 11 वर्ष बीत चुके हैं और अब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से उसका 1 अरब, 97 करोड़, 29 लाख, 49 हजार, 12 वां वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। भूगर्भ से सम्बन्धित नवीनतम आविष्कारों के बाद तो पश्चिमी विद्वान और वैज्ञानिक भी इस तथ्य की पुष्टि करने की कोशिशों कर रहे हैं। उनका मानना है कि हमारी सृष्टि 2 अरब वर्ष पुरानी है।

हिन्दू जीवन-दर्शन की मान्यता है कि सृष्टिकर्ता भगवान ब्रम्हा जी द्वारा प्रारम्भ की गई है। कहते हैं कि मानवीय सृष्टि की कालगणना के अनुसार भारत में प्रचलित संवत केवल हिन्दुओं, भारतवासियों का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण संसार या समस्त मानवीय सृष्टि का संवत है। इसलिए यह ब्रम्हांड के लिए नव-वर्ष के आगमन का सूचक है।

ब्रम्हाजी ने की थी काल गणना

ब्रम्हाजी द्वारा की गई यह कालगणना प्रकृति पर आधारित होने के कारण पूरी तरह वैज्ञानिक है। अत: नक्षत्रों को आधार बनाकर जहां एक ओर विज्ञान सम्मत चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कात्तिर्क, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन नामक 12 मासों का विधान एक वर्ष में किया गया है, वहीं दूसरी ओर सप्ताह के सात दिवसों यानि रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार और शनिवार का नामकरण भी ब्रम्हाजी ने विज्ञान के आधार पर किया है।

सवाल कई है जैसे ब्रम्हाजी ने आधा चैत्र मास व्यतीत हो जाने पर नव सम्वत्सर और सूर्योदय से नवीन दिवस का प्रारम्भ होने का विधान क्यों किया ? इसी तरह सप्ताह का प्रथम दिवस सोमवार न होकर रविवार ही क्यों निर्धारित किया गया? इन सवालों का जबाव है कि मानवीय सृष्टि की रचना तथा कालगणना का पूरा उपक्रम निसर्ग या प्रकृति से तारतम्यता बनाए रखकर किया गया है।

जीवनदायिनी ऊर्जा शक्ति

सूर्य उदय के साथ इस पृथ्वी पर न केवल प्रकाश प्रारम्भ हुआ बल्कि सूर्य की जीवनदायिनी ऊर्जा शक्ति के प्रभाव से पृथ्वी तल पर जीव-जगत का जीवन भी सम्भव हो सका। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के स्थान पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वर्ष का आरम्भ, अर्द्धरात्रि के स्थान पर सूर्योदय से दिवस परिवर्तन की व्यवस्था तथा रविवार को सप्ताह का प्रथम दिवस घोषित करने का वैज्ञानिक आधार प्रकाश की अनुपम छटा बिखेरने के साथ सृजन को सम्भव बनाने की सूर्य की शक्ति में निहित है।

वैसे भी इंग्लैण्ड के ग्रीनविच नामक स्थान से दिन परिवर्तन की व्यवस्था में अर्द्ध रात्रि के 12 बजे को आधार इसलिए बनाया गया है। क्योंकि जब इंग्लैण्ड में रात्रि के 12 बजते हैं, तब भारत में भगवान सूर्यदेव के स्वागत के लिए भारत में प्रात: 5.30 बजे होते हैं।

सात दिनों का नामकरण

वारों के नामकरण की विज्ञान सम्मत प्रक्रिया में ब्रम्हाजी ने स्पष्ट किया कि आकाश में ग्रहों की स्थिति सूर्य से प्रारम्भ होकर क्रमश: बुध, शुक्र, चन्द्र, मंगल, गुरु और शनि की है। पृथ्वी के उपग्रह चन्द्रमा सहित इन्हीं अन्य छह ग्रहों को साथ लेकर ब्रम्हाजी ने सप्ताह के सात दिनों का नामकरण किया है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पृथ्वी अपने उपग्रह चन्द्रमा सहित स्वयं एक ग्रह है, किन्तु पृथ्वी पर उसके नाम से किसी दिवस का नामकरण नहीं किया जाएगा। उसके उपग्रह चन्द्रमा को इस नामकरण में इसलिए स्थान दिया जाएगा। क्योंकि पृथ्वी के निकटस्थ होने के कारण चन्द्रमा आकाश मण्डल की रश्मियों को पृथ्वी तक पहुँचाने में संचार उपग्रह का कार्य सम्पादित करता है।

उससे मानवीय जीवन बहुत गहरे रूप में प्रभावित होता है। लेकिन पृथ्वी पर यह गणना करते समय सूर्य के स्थान पर चन्द्र तथा चन्द्र के स्थान पर सूर्य अथवा रवि को रखा जाएगा।

एक दिन यानि 24 घण्टे

हम सभी यह जानते हैं कि एक अहोरात्र या दिवस में 24 घण्टे होते हैं। ब्रम्हाजी ने इन 24 घण्टों में से प्रत्येक होरा (घंटे) का स्वामी क्रमश: सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु और मंगल को घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि सृष्टि की कालगणना के प्रथम दिवस पर अन्धकार को विदीर्ण कर भगवान भास्कर की प्रथम घंटों से क्रमश: शुक्र की दूसरी, बुध की तीसरी, चन्द्रमा की चौथी, शनि की नौवीं, गुरु की छठी तथा मंगल की सातवें घंटे में होगी।

इस क्रम से इक्कीसवीं होरा (घंटा) पुन: मंगल की हुई। सूर्य की बाईसवीं, शुक्र की तेईसवीं और बुध की चौबीसवीं घंटो के साथ एक अहोरात्र या दिवस पूर्ण हो गया।

इसके बाद अगले दिन सूर्योदय के समय चन्द्रमा की होरा होने से दूसरे दिन का नामकरण सोमवार किया गया। अब इसी क्रम से चन्द्र की पहली, आठवीं और पंद्रहवीं, शनि की दूसरी, नववीं और सोलहवीं, गुरु की तीसरी, दशवीं और उन्नीसवीं, मंगल की चौथी, ग्यारहवीं और अठ्ठारहवीं, सूर्य की पाचवीं, बारहवीं और उन्नीसवीं, शुक्र की छठी, तेरहवीं और बीसवीं, बुध की सातवीं, चौदहवीं और इक्कीसवीं होरा होगी।

बाईसवीं होरा( घंटा) पुन: चन्द्र, तेईसवीं शनि और चौबीसवीं होरा गुरु की होगी। अब तीसरे दिन सूर्योदय के समय पहली होरा मंगल की होने से सोमवार के बाद मंगलवार होना सुनिश्चित हुआ। इसी क्रम से सातों दिवसों की गणना करने पर वे क्रमश: बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार तथा शनिवार घोषित किये गये; क्योंकि मंगल से गणना करने पर बारहवीं होरा गुरु पर समाप्त होकर बाईसवीं होरा मंगल, तेईसवीं होरा रवि और चौबीसवीं होरा शुक्र की हुई।

अब चौथे दिवस की पहली होरा बुध की होने से मंगलवार के बाद का दिन बुधवार कहा गया। अब बुधवार की पहली होरा से इक्कीसवीं होरा शुक्र की होकर बाईसवीं, तेईसवीं और चौबीसवीं होरा क्रमश: बुध, चन्द्र और शनि की होगी। तदुपरान्त पांचवें दिवस की पहली, होरा गुरु की होने से पांचवां दिवस गुरुवार हुआ।

पुन: छठा दिवस शुक्रवार होगा; क्योंकि गुरु की पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं और बाईसवीं होरा के पश्चात् तेईसवीं होरा मंगल और चौबीसवीं होरा सूर्य की होगी। अब छठे दिवस की पहली होरा शुक्र की होगी। सप्ताह का अन्तिम दिवस शनिवार घोषित किया गया; क्योंकि शुक्र की पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं और बाईसवीं होरा के उपरान्त बुध की तेईसवीं और चन्द्रमा की चौबीसवीं होरा पूर्ण होकर सातवें दिवस सूर्योदय के समय प्रथम होरा शनि की होगी।

संक्षेप में कहें तो ब्रम्हा जी की इस कालगणना में नक्षत्रों, ऋतुओं, मासों, दिवसों आदि का निर्धारण पूरी तरह प्रकृति पर आधारित वैज्ञानिक रूप से किया गया है। दिवसों के नामकरण को प्राप्त विश्वव्यापी मान्यता इसी तथ्य का प्रतीक है।

Get well soon baby

वैवाहिक सुख के बाद संतान सुख की चाह सभी को होती है। अगर आपके घर किसी भी कारण से बच्चें की किलकारियां नहीं गूंज पा रही हों तो आप संतान प्राप्ति की मनोकामना बप्पा के दर पर आकर पूरी कर सकते हैं। इसके लिए बस! निभानी होगी एक छोटी सी रस्म।

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के सुवासरा में बसे हैं 'मगरा गणेश'। यहां नास्तिक भी आस्था की गंगा में नहाए बिना नहीं रह पाता। यहां हर बुधवार को लगता है गोद भराई का मेला।

इस दिन विवाहित महिलाओं की गोद पारंपरिक तरीके से बप्पा के सामने भरी जाती है बप्पा के दरबार में इन महिलाओं को देते हैं संतान प्राप्ति का वरदान। कहते हैं बप्पा के दरबार में सूनी गोद भराई जाने के बाद जल्द ही संतानोत्पत्ति की प्राप्ति हो जाती है।

वैसे तो संकट हरता, बुद्दि विधाता गणपति के कई रूप हैं। जिसमें से एक है यहां हजारों वर्षों से विराजमान है। माना जाता है बुद्धिदाता की मूर्ति 5 हजार साल पुरानी है। जिसे पांडवों ने अपने हाथों से बनाया था।

अज्ञातवास के दौरान जब पांडव यहां से गुजरे तो उन्होंने गणेश जी की आराधना यहां करनी चाही। तब उन्होंने इस मगरे (पहाड़ की चट्टान) से बप्पा की मूर्ति को बनाया। पांडव रोज बप्पा की पूजा करते थे जिसके चलते उनके कष्ट कटते देर नहीं लगी। पहाड़ की चट्टान से बने होने के चलते गणपति को 'मगरा गणेश' कहा जाता है।

Chanakya and ambassador of greece

पाटलिपुत्र के मंत्री आचार्य चाणक्य बहुत ही विद्वान और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। वह एक सीधे आैर ईमानदार व्यकि् भी थे। वे इतने बडे साम्राज्य के महामंत्री होने के बावजूद छप्पर से ढकी कुटिया में रहते थे।

एक आम आदमी की तरह उनका रहन-सहन था। एक बार यूनान का राजदूत उनसे मिलने राजदरबार पहुंचा। राजनीति और कूटनीति में दक्ष चाणक्य की चर्चा सुनकर राजदूत मंत्रमुग्ध हो गया। राजदूत ने शाम को चाणक्य से मिलने का समय मांगा।

आचार्य ने कहा-'आप रात को मेरे घर आ सकते हैं।' राजदूत चाणक्य के व्यवहार से प्रसन्न हुआ। शाम को जब वह राजमहल परिसर में आमात्य निवास के बारे में पूछने लगा। तब राज प्रहरी ने बताया कि 'आचार्य चाणक्य तो नगर के बाहर रहते हैं।'

राजदूत ने सोचा शायद महामंत्री का नगर के बाहर सरोवर पर बना सुंदर महल होगा। राजदूत नगर के बाहर पहुंचा। एक नागरिक से पूछा कि चाणक्य कहां रहते हैं। एक कुटिया की ओर इशारा करते हुए नागरिक ने कहा-देखिए, वह सामने महामंत्री की कुटिया है।

राजदूत आश्चर्य चकित रह गया। उसने कुटिया में पहुंचकर चाणक्य के पांव छुए और शिकायत की-आप जैसा चतुर महामंत्री एक कुटिया में रहता है। चाणक्य ने कहा-अगर में जनता की कडी मेहनत और पसीने की कमाई से बने महलों से रहूंगा तो मेरे देश के नागरिक को कुटिया भी नसीब नहीं होगी। चाणक्य की ईमानदारी पर यूनान का राजदूत नतमस्तक हो गया।

संक्षेपः

विनम्रता में ही महानता छिपी हाेती है।