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Tuesday, 3 June 2014

Nirjla Ekadashi

एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्यास्त तक पानी न पीने का विधान होने के कारण इस एकादशी कहते हैं। वैसे तो एक महीने में दो बार एकादशी आती है। शास्त्रों में एकादशी का व्रत करने का विधान बताया गया है।

स्वास्थ्य, दीर्धायु, सामाजिक सुख तथा मोक्ष फल की प्राप्ति में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन आमरस दान करने के कारण इसे आम एकादशी भी कहते हैं।

ऐसे करें व्रत

ज्येष्ठ माह की में आने वाला निर्जला एकादशी व्रत के दिन पानी भी नहीं पीना चाहिए। इसलिए यह व्रत श्रमसाध्य होने के साथ संयम के साथ करना चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि वह जल को कलश से भरे। सफेद वस्त्र से उसे ढक दे। ढक्कर पर चीनी और दक्षिणा रख कर ब्राह्मणों को दान करें।

महिलाएं नथ पहनकर, ओढनी ओढ़ कर, मेंहदी लगाकर विधिपूर्वक शीतल जल से भरा मिट्टी का घड़ादान कर अपनी सास या अपने से बड़े लोगों के चरण स्पर्श करें।

एकादशी का व्रत करके अपने सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र, आम और अन्य फलों का दान करना चाहिए। इस दिन निर्जल व्रत को बहुत महत्व माना गया है। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर एकादशियों का लाभ प्राप्त होता है।

व्रत की कथा

एक दिन महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी का व्रत का विधान और फल बताया। इस दिन भोजन करने के दोषों की जब वे चर्चा करने लगे तो भीमसेन ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि इस दिन जब सारे लोग अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगे तो ये व्रत मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं तो बिना खाए-पीए नहीं रह सकता है। इसलिए मुझे कओ ऐसा व्रत बताइए जिसको करने के बार मुझे सारी एकादशियों का फल मिल जाए।

महर्षि व्यास जानते थे कि भीमसेन के उदम में वृक नामक अग्नि है। इसलिए अधिक भोजन करने पर भी उसकी भूख शांत नहीं होगी। भीमसेन के इस प्रकार के भावों को समझकर महर्षि व्यास ने आदेश दिया कि- भीम तुम ज्येष्ठ शुक्ल की एकादशी जिसे निर्जला एकादशी का व्रत अगर करो।

इस व्रत में आचमन में पानी पीने से दोष नहीं होता। इस दिन अन्न न खाकर, जितने पानी में एक माशा सोने की मुद्रा डूब जाए उतना ही अन्न ग्रहण करो। तो ऐसे में तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा और तुम्हें पूरी एकादशियों का पुण्य मिलेगा। इसलिए निर्जला एकादशी को एक किंवदंती के अनुसार भीमसेनी एकदशी भी कहते हैं।

Monday, 2 June 2014

Pram was the discovery of lingam which is the most rare

अरुणाचल प्रदेश के सुबंसरी जिले के जीरो में स्थित दुनिया में सबसे बड़े माने गए इस 25 फीट ऊंचे और 22 फीट चौड़े शिवलिंग की खोज जुलाई, 2004 में लकड़ी काटने वाले प्रेम सुब्बा ने की थी। सबसे ऊंचे शिवलिंग के अलावा ठीक उसी जगह पर उससे छोटे देवी पार्वती और कार्तिकेय मंदिर हैं।

इनके बायीं और भगवान गणेश और सामने की चट्टान पर नंदी की आकृति भी है। खास बात है कि शिवलिंग के निचले हिस्से में जल का अनवरत प्रवाह बना रहता है। शिवलिंग के ऊपरी हिस्से में स्फटिक की माला भी साफ दिखाई देती है।

ये सभी पूरी तरह से प्राकृतिक रूप में मौजूद हैं और इनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। इसके चारों ओर हमेशा हरा-भरा रहने वाला जंगल है। विडंबना देखिए कि बाबा अमरनाथ और केदारनाथ पर सियासत करने वाले दल भी इन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं।

चीन की सीमा के पास अरुणाचल को पूरे देश से सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से जोड़ने की क्षमता इस शिव परिवार में है। स्थानीय मंदिर प्रशासन ने इस स्थान का नाम 'सिद्धेस्वरनाथ मंदिर' रखा है। अब इस जगह पर हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

2004 में हुई थी खोज

शिवपुराण में दिए गए ब्योरे के अलावा इस शिव परिवार के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख और कहीं नहीं मिलता। शिवलिंग और शिव परिवार की उत्पत्ति ठीक उसी तरह हुई है, जैसा कि शिव पुराण में इसका उल्लेख है। शिव पुराण के नव खंड के 17वें अध्याय में इसका जिक्र है।

इसके मुताबिक सबसे ऊंचा शिवलिंग लिंगालय नाम की जगह पर पाया जाएगा। कालांतर में वह जगह अरुणाचल के नाम से जानी जाएगी। अरुणाचल प्रदेश को वर्ष 1954 से उत्तर-पूर्व फ्रंटियर एजेंसी (एनईएफए) के नाम से जाना जाता था। 20 फरवरी, 1987 को नाम बदलकर अरुणाचल प्रदेश रखा दया।

इसी राज्य में अब तक का सबसे बड़ा शिवलिंग पाया जाना भी अपने आप में अनोखा दैवीय संयोग है। राज्य में 1970 के करीब शुरू हुई पुरातात्विक खुदाई में हिंदू धार्मिक स्थलों के मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, यह उसमें सबसे ताजा है।

Thursday, 22 May 2014

How to awaken the kundalini

कुंडलिनी जाग्रत करने का अर्थ है मनुष्य को प्राप्त महानशक्ति को जाग्रत करना। यह शक्ति सभी मनुष्यों में सुप्त (सोई हुई) पड़ी रहती है। कुण्डली शक्ति उस ऊर्जा का नाम है जो हर मनुष्य में जन्मजात पाई जाती है।

यह शक्ति बिना किसी भेदभाव के हर मनुष्य को प्राप्त है। इसे जगाने के लिए प्रयास या साधना करनी पड़ती है। ठीक उसी तरह जिस प्रकार एक बीज में वृक्ष बनने की शक्ति या क्षमता होती है। हर मनुष्य में शक्तिशाली बनने की क्षमता होती है।

कुंडली जाग्रत करने के लिए साधक को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्तर पर साधना करनी पड़ती है। जप, तप, व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, योग आदि के माध्यम से साधक अपनी शारीरिक एवं मानसिक, अशुद्धियों, कमियों और बुराइयों को दूर कर सोई पड़ी शक्तियों को जगाता है।

योग और अध्यात्म की भाषा में इस कुंडलीनी शक्ति का निवास रीढ़ की हड्डी के समानांतर स्थित छ: चक्रों में माना गया है। कोई जीव उन शक्ति केंद्रों तक पहुंच सकता है। इन छ: अवरोधों को आध्यात्मिक भाषा में षट्-चक्र कहते हैं।

ये चक्र क्रमशः मूलधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र, आज्ञाचक्र। साधक क्रमश: एक-एक चक्र को जाग्रत करते हुए। अंतिम आज्ञाचक्र तक पहुंचता है। मूलाधार चक्र से प्रारंभ होकर आज्ञाचक्र तक की सफलतम यात्रा ही कुण्डलिनी जाग्रत करना कहलाता है।

    मूलाधार चक्रः यह गुदा और लिंग के बीच चार पंखुड़ी वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। यहां वीरता और आनन्द भाव का निवास है ।

    स्वाधिष्ठानः यह चक्र इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुड़ी हैं । इसके जाग्रत होने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है ।

    मणिपूर चक्रः नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । यह प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, आदि जमा रहते हैं ।

    अनाहत चक्रः हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है। यह सोता रहे तो कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता, मोह, दम्भ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा। जागृत होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे ।

    विशुद्धख्य चक्रः कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुड़ी वाला है। यहां सोलह कलाएं विद्यमान हैं।

    आज्ञाचक्रः भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, इस आज्ञा चक्र जाग्रत होने से यह सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं ।

    सहस्रार चक्रः सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है। यहां से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।

Monday, 28 April 2014

Live today as if he is not to touch relive the tension

एक बुनियादी स्तर पर, मनुष्य होने के नाते हम सब एक समान हैं, हम में से हर एक सुख की आकांक्षा रखता है और हम में से प्रत्येक दुख नहीं झेलना चाहता। आज, बढ़ती मान्यता, साथ ही ठोस वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो हमारी चित्त की स्थिति और सुख के बीच घनिष्ठ संबंध की पुष्टि करता है।

एक ओर हममें से कई ऐसे समाजों में रहते हैं जो भौतिक रूप से बहुत विकसित हैं, पर फिर भी हमारे बीच कई ऐसे हैं जो बहुत सुखी नहीं हैं। समृद्धि के सुन्दर धरातल के नीचे एक प्रकार की मानसिक अशांति है, जो निराशा, अनावश्यक झगड़े, नशीली दवाइयों या शराब पर निर्भरता, और सबसे बुरी स्थिति में आत्महत्या है।

ऐसी कोई गारंटी नहीं है कि केवल धन आपको आनंद अथवा जो तृप्ति आप चाहते हैं वह दे सकता है। यही आपके मित्रों के संबंध में भी कहा जा सकता है। जब आप क्रोध या घृणा की एक तीव्र अवस्था में होते हैं तो एक बहुत अंतरंग मित्र भी आपको एक प्रकार से ठंढा, सर्द, अलग और कष्टदायी प्रतीत हो सकता है।

परन्तु, मनुष्य के रूप में हमें यह अद्भुत मानव बुद्धि की भेंट मिली है। इसके अतिरिक्त, सभी मनुष्यों में दृढ़ संकल्प और उस दृढ़ता को वे जिस किसी दिशा में चाहें निर्धारित करने की क्षमता होती है। जब तक हम यह स्मरण रखें कि हमारे पास मानव बुद्धि की अनोखी भेंट है और दृढ़ता के विकास की क्षमता है और उसका उपयोग सकारात्मक ढंग से करते हैं, हम अपने अंतर्निहित मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कर पाएंगे।

यह अनुभव कि हममें यह महान मानव क्षमता है हमें आधारभूत शक्ति देता है। यह मान्यता ऐसे तंत्र के रूप में कार्य कर सकती है जो हमें बिना आशा खोए अथवा कम आत्म सम्मान की भावना में डूबे, किसी भी कठिनाई से निपटने के लिए क्षमता प्रदान करती है, फिर चाहे हम किसी भी प्रकार की परिस्थिति का सामना क्यों न कर रहे हों।..

Monday, 31 March 2014

Chaitra navratri will accompany the launch of the hindu new year

भारतीय सनातन धर्म में नववर्ष का शुभारंभ सोमवार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से हो रहा है। इसी दिन देवी आराधना का पर्व चैत्र नवरात्र का शुभारंभ होगा। नौ दिनों में रोजाना देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना होगी। पहले दिन शैलपुत्री की आराधना होगी। घरों-मंदिरों में शक्ति उपासना के लिए विशेष मुहूर्तोंमें घट स्थापित किए जाएंगे। महापर्व की शुरुआत देवी के शैल पुत्री स्वरूप की आराधना से होगी।

41वां नामक संवत्सर

हिंदू नव वर्ष विक्रम संवत् 2071 एवं संवत्सरों की श्रृंखला का 41वां नामक संवत्सर होगा। इस तिथि से विक्रम संवत् का प्रारंभ भी होता है। मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारंभ किया था। ग्रंथों के अनुसार उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के राजा विक्रमादित्य ने इसी तिथि से कालगणना के लिए विक्रम संवत् का प्रारंभ किया था। जो आज भी हिंदू कालगणना के लिए सर्वाेत्तम माना जाता है।

अबूझ मुहूर्त

हिंदी पंचाग काल गणना का प्रथम माह चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा अर्थात गुड़ी पड़वा जिसे अबूझ मुहूर्त बताया है अर्थात बिना पंचांग देखे ही कोई भी शुभ कार्य इस दिन प्रारंभ कर सकते हैं। भगवान विष्णु का प्रथम मत्स्यावतार भी इसी दिन हुआ है।

60 साल बाद आया परिवर्तन

ज्योतिषाचार्य पं. धर्मेंद्र शास्त्री के अनुसार सन् 1953 के बाद 2014 में 19 जून से 2 नवंबर तक न्याय व धर्म के प्रतीक ग्रह शनि तुला व गुरू कर्क दोनों ही अपनी-अपनी उच्च राशि में होंगे। 60 साल कई अनुठे शुभ परिवर्तन होंगे एवं गुरु कर्क उच्च राशि में आने से किसी भी राशि की कन्या को विवाह में गुरु के 4, 8, 12 होने पर भी कोई अवरोध नही आएगा।

चंद्रदेव निभाएंगे राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की भूमिका

ज्योतिषीय कालगणना के अनुसार प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है और विभिन्न् ग्रह इस संवत् के स्वामी, राजा व मंत्री होते हैं। जिसका असर वर्ष भर जन सामान्य पर दिखाई देता है। आकाशीय सत्ता के लिए ग्रहीय व्यवस्था के हिसाब से राजा, मंत्री और सहायक मंत्रियों का चयन हो चुका है। हिंदू पंचांग के हिसाब से नए साल से आकाशीय सत्ता की डोर चंद्र के हाथ में होगी। चंद्र राजा और मंत्री दोनों ही पदों पर रहेंगे। नये वर्ष राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भूमिका चंद्रदेव निभाएंगे। चंद्र के राजा होने से नववर्ष उत्तम फलदायी होगा।

पांच कार्य शुभ और पांच क्रूर ग्रहों के पास

इस बार आकाशीय सत्ता के पांच कार्य शुभ और पांच क्रूर ग्रहों के पास हैं। संवत्- 2071 राजा- चंद्र, मंत्री- चंद्र, धान्येश- गुरु-पूर्व दिशा, धान्येश- मंगल, मेघेश- सूर्य, रसेश- शनि, दुर्गेश- सूर्य, नीरसेश-बुध,फलेश-सूर्य, धनेश- बुध।

चैत्र नवरात्र में पांच दिन है खास योग-संयोग

ज्योतिषाचार्य पं. जगदीश शर्मा के अनुसार इस बार तीज-त्योहार व शुभ योगों का भी संयोग बन रहा है। अंतिम दिवस नवमी पुष्य नक्षत्र में आने के कारण यह दिन और भी खास हो गया है। प्रतिपदा से नवमी तक देवी के विभिन्न् स्वरूपों की पूजा का विधान है। नवरात्रि के 5 दिन खास योग-संयोग के कारण इस बार पर्व अतिशुभ हो गया है। इन दिनों में श्रद्धालु पूजा-अर्चना, साधना के साथ पुण्यलाभ ले सकते हैं।

पहले दिन गुड़ी पड़वा के दिन घटस्थापना, 1 अप्रैल को चैतीचांद सर्वार्थ सिद्धि योग व अमृत योग, 2 अप्रैल को सौभाग्य सुंदरी योग, 4 को श्रीराम राज्योत्सव, 8 अप्रैल को नवमीं के दिन पुष्य नक्षत्र योग खास होगा।

Saturday, 29 March 2014

Science at the sight of the glory of rudraksh

एक किंवदंती के अनुसार रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई है। शिव का यही प्रिय रुद्राक्ष अब वैज्ञानिकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हो गया है और देश-विदेश में इस पर रूद्राक्ष पर शोध अनुसंधान जारी है।

रुद्राक्ष को नीला संगमरमर भी कहा जाता है। इसके वृक्ष भारत (पूर्वी हिमालय) के साथ-साथ नेपाल, इंडोनेशिया, जकार्ता एवं जावा में भी पाए जाते हैं। वनस्पतिशास्त्र में इसे इलियोकार्पस गेनिट्रस कहते हैं। गोल, खुरदुरा, कठोर एवं लंबे समय तक खराब न होने वाला रुद्राक्ष एक बीज है। बीज पर धारियां पाई जाती हैं जिन्हें मुख कहा जाता है। पांचमुखी रुद्राक्ष बहुतायात से मिलता है जबकि एक व चौदह मुखी रुद्राक्ष दुर्लभ हैं।

प्राचीन ग्रंथों में इसे चमत्कारिक तथा दिव्यशक्ति स्वरूप बताया गया है। मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष धारण करने से दिल की बीमारी, रक्तचाप एवं घबराहट आदि से मुक्ति मिलती है। रुद्राक्ष के बताए चमत्कारिक गुण वास्तविक हैं या नहीं यह जानने हेतु देश-विदेश मेंकई शोध कार्य किए गए एवं कई गुणों की पुष्टि भी हुई।

सेंट्रल काउंसिल ऑफ आयुर्वेदिक रिसर्च नई दिल्ली में 1966 में आयुर्वेदिक औषधि में प्रकाशित किया गया जिसमें रुद्राक्ष थैरेपी की चर्चा की गई थी। अस्सी के दशक में बनारस के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने डॉ. एस. राय के नेतृत्व में रुद्राक्ष पर अध्ययन कर इसके विद्युत चुंबकीय, अर्धचुंबकीय तथा औषधीय गुणों को सही पाया।

वैज्ञानिकों ने माना है कि इसकी औषधीय क्षमता विद्युत चुंबकीय प्रभाव से पैदा होती है। रुद्राक्ष के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र एवं तेज गति की कंपन आवृत्ति स्पंदन से वैज्ञानिक भी आश्चर्य चकित हैं। इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी फ्लोरिडा के वैज्ञानिक डॉ. डेविड ली ने अनुसंधान कर बताया कि रुद्राक्ष विद्युत ऊर्जा के आवेश को संचित करता है जिससे इसमें चुंबकीय गुण विकसित होताहै। इसे डाय इलेक्ट्रिक प्रापर्टी कहा गया। इसकी प्रकृति इलेक्ट्रोमैग्नेटिक व पैरामैग्नेटिक है एवं इसकी डायनामिक पोलेरिटी विशेषता अद्भुत है।

भारतीय वैज्ञानिक डॉ. एस.के. भट्टाचार्य ने 1975 में रुद्राक्ष के फार्माकोलॉजिकल गुणों का अध्ययन कर बताया कि कीमोफार्माकोलॉजिकल विशेषताओं के कारण यह हृदयरोग, रक्तचाप एवं कोलेस्ट्रॉल स्तर नियंत्रण में प्रभावशाली है। स्नायुतंत्र (नर्वस सिस्टम) पर भी यह प्रभाव डालता है एवं संभवत: न्यूरोट्रांसमीटर्स के प्रवाह को संतुलित करता है।

वैज्ञानिकों द्वारा इसका जैव-रासायनिक (बायो कैमिकल) विश्लेषण कर इसमें कोबाल्ट, जस्ता, निकल, लोहा, मैग्नीज़, फास्फोरस, एल्युमिनियम, कैल्शियम, सोडियम, पोटैशियम, सिलिका एवं गंधक तत्वों की उपस्थिति देखी गई। इन तत्वों की उपस्थिति से घनत्व बढ़ जाता है एवं इसी के फलस्वरूप पानीमें रखने पर यह डूब जाता है।

पानी में डूबने वाले रुद्राक्ष को असली माना जाता है, कुछ लोग यह भी मानते हैं कि दो तांबों के सिक्कों के मध्यरखने पर यदि इसमें कंपन होता है, तो यह असली है। असल में इस कंपन का कारण विद्युत चुंबकीय गुण तथा डायनामिक पोलेरिटी हो सकता है। जैव वैज्ञानिकों ने रुद्राक्ष में जीवाणु (बैक्टीरिया), विषाणु (वायरस), फफूंद(फंगाई) प्रतिरोधी गुणों को पाया है। कुछ कैंसर प्रतिरोधी क्षमता का आकलन भी किया गया है।

चीन में हुए खोज कार्य दर्शाते हैं कि रुद्राक्ष यिन-यांग एनर्जी का संतुलन बनाए रखने में कारगर है। दुनियाभर के वैज्ञानिक रुद्राक्ष के इतने सारे गुणों को एक साथ देखकर आश्चर्यचकित हैं।

Friday, 28 March 2014

Note is awakened human consciousness

प्रशासन और प्रशासक का सच्चा और समर्थ होना आवश्यक है। वही सच्चा और समर्थ प्रशासक होता है, जो अपने नागरिकों की हर इच्छा पूरी कर सके और यह तब ही संभव है जब उसका प्रशासन उस सत्ता से हो रहा हो, जो समस्त संभावनाओं का क्षेत्र है।

मनुष्य ब्रह्म की प्रति-छबि है और उसके अंदर अपरिहार्य रूप से निहित ब्रह्मत्व को वैदिक शिक्षा द्वारा न केवल वैयक्तिक रूप से, बल्कि सामूहिक स्तर पर जागृत किया जा सकता है। भारत की सनातन सत्ता के अनुभव के आधार पर चला आ रहा है कि सफल प्रशासन के लिए वैदिक तकनीकों का अभ्यास आवश्यक है।

यह अभ्यास आनन्दमय है। अभ्यास में आनंद की जो वर्षा होती है, उससे व्यक्त जीवन का हर पक्ष खिल उठता है। जीवन का हर क्षेत्र आनंदमयी गुणों में परिणत हो जाता है। यह विज्ञान सिद्ध है। विज्ञान का अर्थ है किसी विषय का पूर्ण तार्किक विवेचन और टेक्नोलॉजी का अर्थ है, इन विवेचनों से प्रतिपादित सिद्धांतों का कार्यरूप में अमल लाना है।

वेद विज्ञान की विशेषता यह है कि उसमें विज्ञान और टेक्नोलॉजी दोनों की सत्ता एक ही है। वेद जिस भावातीत आत्मा का स्पंदन है, वह व्यक्त, अव्यक्त और व्यक्त एवं अव्यक्त की संधि रूप हमारी चेतना में अपरिहार्य रूप से विद्यमान होने के कारण मानवीय सीमा से कुछ भी बाहर नहीं रहने देती।

भावातीत ध्यान और यौगिक फ्लाइंग से मानवीय चेतना को उसकी मौलिकता और पूर्णता में जगाकर, जागी हुई भावातीत चेतना का प्रयोगकर जीवन के समस्त क्षेत्रों में पूर्णता प्रदान की जा सकती है। मनुष्य योनि में केवल भौतिक जीवन जीना अमूल्य जीवन की बर्बादी है।

जीवन की भौतिक उपलब्धियां शारीरिक श्रम और संघर्ष के बिना भी प्राप्त की जा सकती हैं। यह सही है कि जीवन को कर्म की दरकार होती है लेकिन कर्म जब अपने सूक्ष्मतर स्तर पर होता है, उस स्तर पर होता है जो मन की सूक्ष्माति सूक्ष्म उपाधियों बुद्धि,वैयक्तिक अहं और समष्टि के अहं का भी स्रोत है, तो जो चाहा जाता है वह शारीरिक स्तर पर बिना कुछ किए हासिल हो जाता है। वेद की भाषा में इसे ही संकल्पसिद्धि कहा जाता है।

God is formless of has a form

पूरी दुनिया में विद्वान लोग ईश्वर के प्रति एक खास नजरिया रखते हैं। उनका सोचना है कि ईश्वर निराकार है। हम उसे वैसे नहीं देख सकते हैं, जैसे अपने को आईने में देखते हैं। ईश्वर पूरी तरह से बोध का मामला है। जो उस बोध से गुज़रता है, वही बुद्ध हो जाता है।

सरल लोग, जिनकी दुनिया उनकी रोजी-रोटी के इर्द-गिर्द मंडराती रहती है, वे ईश्वर को निराकार नहीं मानते। उनका खयाल है कि ईश्वर हमारी तरह ही कहीं होगा और वहीं से हमारे ऊपर नज़र रख रहा होगा। यही बात दर्शन और पौराणिक शब्दावली में कही जाए तो ईश्वर सगुण है।

ठीक वैसे ही जैसे हम लोग सगुण हैं। वहीं विद्वानों ने ईश्वर को निर्गुण बना रखा है-निरगुनिया। अब यह दर्शन का बड़ा महत्वपूर्ण द्वंद्व है। इस पर बड़ी बहसें हुई हैं। कई सिद्धांतों का प्रतिदान किया गया है। ईश्वर निराकार भी है और साकार भी। ईश्वर निर्गुण भी है और सगुण भी है। भारतीय धर्मों में इसे बहुत शांत तरीके से बताया गया है।

अगर भगवान साकार हैं, सगुण हैं तो उनके लिए ईश्वर शब्द चुना है। ब्रह्म का केवल बोध किया जा सकता है। यही बोध आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा होगा, जिसे हम परमतत्व या अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। यहां ईश्वर हमारे बहुत करीब आ जाता है और हम उसे थोड़ा नीचे ले आते हैं।

जब ईश्वर थोड़ा और नीचे आता है तो अवतार के रूप में आ जाता है-कभी राम बनकर, कभी श्याम बनकर। यहां से एक आम आदमी के लिए ईश्वर के साथ तादात्म्य बैठाना और सरल हो जाता है।

पूरी दुनिया में भक्ति की मदद से ईश्वर की निकटता आम आदमी के लिए बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आने वाली बात हो जाती है। अवतार की थ्याेरी ईश्वर का सरलीकरण है। ईश्वर और आध्यात्मिकता से संबंधित जितने प्रतीक हैं उन पर भी गाैर करना चाहिए। ईश्वर को अगर वाणी में व्यक्त करें तो वह 'ऊँ' होगा।

अगर आंखों से देखने वाली किसी ऑब्जेक्टिव चीज़ के रूप में व्यक्त करें तो वह प्रकाश होगा। यहां तक तो सब ठीक होगा, लेकिन जो निराकार हो, जिसका कोई आकार ही नहीं है जो दिखता ही नहीं है, फिर उसे कैसे व्यक्त करेंगे? लेकिन भारतीय आध्यात्मिकता ने निराकार को भी व्यक्त करने के कुछ तरीके सोचे होंगे। हमारी आध्यात्मिक परंपरा में 'ध्यान या मेडिटेशन' निराकार को व्यक्त करता है।

इस तरीके को ही हम ध्यान या मेडिटेशन के नाम से जानते हैं। अगर आप भगवान के करीबी शिष्यों में शामिल होना चाहते हैं तो आपको उनके निराकार स्वरूप का बोध करना पड़ेगा, जो आप केवल मेडिटेशन से हासिल कर सकते हैं।

Wednesday, 26 March 2014

You must have faith in the mind for enlightenment

एक बार बालक नचिकेता ने अपने पिता से कहा, आप ब्राह्मणों को कृषि कार्य के लिए अनुपयोगी गाय दान में दे रहे हैं। पिता ने यह नहीं कहा कि हां, यह ठीक नहीं है परंतु वे समझ गए कि यह मेरी निंदा कर रहा है, मेरा अनादर कर रहा है, मेरे कृत्य की भर्त्सना कर रहा है।

नचिकेता ने पिता से कहा- शास्त्र कहते हैं कि अच्छी वस्तु, अच्छी निधि तथा अच्छी संपदा का दान करना चाहिए। अगर आप दान ही कर रहे हैं तो मुझको किसे दान में देंगे ?

पिता मौन हो गए, लेकिन बालक नचिकेता बार- बार टोकने लगा-पिताजी ! आप मुझे किसे दान में देंगे? आपने यह भी विचार किया होगा कि मुझे भी किसी को दान में देंगे। इस पर पिता ने क्रोध में कहा-मैं तुझे यमराज को दान में देता हूं। आज से तू यम की वस्तु हुआ। दान की गई वस्तु कभी ली नहीं जाती और कभी लौटाई भी नहीं जाती। अब तू मेरा नहीं रहा। चूंकि मैं तुझे दान कर चुका हूं इसलिए तू मेरे पास नहीं रहेगा।

बालक नचिकेता को यह बुरा नहीं लगा कि मेरे पिता ने मुझे कुछ कहा है। ऐसी श्रद्धा थी नचिकेता की अपने पिता के प्रति। यही श्रद्धा ज्ञान के लिए कारक बनी और नचिकेता को यमराज के द्वार पर ले गई। यमराज ने देखा कि यह सामान्य बालक नहीं, श्रद्धावान बालक है। जब हमारे पास श्रद्धा आती है तो वह हमें सक्षम बनाती है।

अपने श्रद्धा भाव से हम गुरु के पास जो गुरुत्व है, साधु के पास जो साधुत्व है, संन्यासी के पास जो संन्यास तत्व है, गंगा के पास जो गंगत्व है, देवताओं के पास जो देवत्व है और भगवान के पास जो भगवत्ता है, उसके स्वाभाविक रूप से अधिकारी बन जाते हैं। श्रद्धावान व्यक्ति स्वाभाविक रूप से योग्यता रखता है चूंकि उसके पास तर्क नहीं होते।

नचिकेता संकल्पित मन से यमराज की चौखट पर बैठ गया। यमराज ने कहा-तू तीन दिन से मेरे द्वार पर बैठा है, बड़ा हठी है। मांग क्या मांगना चाहता है? इस पर बालक नचिकेता ने कहा- मैं मृत्यु का भेद जानने आया हूं। जन्म-मृत्यु क्या है, यह भेद मुझे बता दीजिए।

यह सुनकर यमराज हतप्रभ हो गए। उन्होंने बालक नचिकेता के समक्ष ढेरों प्रलोभन रखते हुए कहा-तुम चक्रवर्ती सम्राट बनने, पृथ्वी पर प्रतिष्ठित और पूजित होने अथवा स्वर्ग की संपूर्ण संपदा प्राप्त करने का वर मांग लो। भला तुम्हारे इन प्रश्नों में क्या रखा है? बालक नचिकेता ने कहा-महाराज! मुझे यह सब कुछ नहीं चाहिए।मुझे वही चाहिए जिसके बारे में मैंने आपसे पूछा है।यमराज मजबूर हो गए।

श्रद्धा उसे भी कहते हैं जिसके सामने जगत के सारे आकर्षण गौण हो जाएं। श्रद्धा का एक अर्थ यह भी है कि जगत के सभी आकर्षण गौण हो गए हैं।श्रद्धा का एक अर्थ यह भी है कि जगत के आकर्षण आपके सामने शिथिल हो जाएं। श्रद्धा के बल पर ही बालक नचिकेता ने सब कुछ प्राप्त कर लिया।

अगर हमारे निवेश के लिए श्रद्धा की पूंजी है तो हम संसार की अलभ्य वस्तु भी प्राप्त कर सकते हैं। हमारी श्रद्धा होना चाहिए और मार्ग की सारी मुश्किलें स्वमेव ही समाप्त हो जाती हैं। श्रद्धा के बल पर ही पंगु पर्वत लांघने का साहस कर जाता है। यह हमारी श्रद्धा ही है जो हमें ज्ञानवान बनाती है। 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्'।

जब आप श्रद्धा के साथ कुछ प्राप्ति के लिए जाते हैं तो भले ही किसी में ज्यादा देने का सामर्थ्य न हो तब भी आप कुछ लेकर ही लौटेंगे।

संक्षेप में

ज्ञान की प्राप्ति के लिए मन में श्रद्धा होना बहुत ही जरूरी है। जब हम श्रद्धा के साथ कुछ पाने की कोशिश करते हैं तो भले ही हमें प्राप्त हो लेकिन हम निष्फल नहीं हो सकते हैं। ईश्वर, गुरु और वैद्य के समक्ष श्रद्धा भाव के साथ जाएंगे तो हमेशा कुछ लेकर ही लौटेंगे।

Thursday, 6 March 2014

Life wont get chocked in planning only

जब प्रेम होगा तो अपने-आप होगा, आपकी योजना के अनुसार नहीं। यह आपकी योजना का हिस्सा हो ही नहीं सकता क्योंकि योजना तो सिर्फ आपकी पिछली जानकारियों और अनुभवों से ही बनती है। अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के अनुसार ही चलती रहे तो कभी कोई नई चीज आपके जीवन को छू भी नहीं पाएगी।

दरअसल योजना वह चीज है जो आपके मन में होती है। पर करते आप वह हैं जो आपके हाथ में होता है। आप कितना समय योजना बनाने में लगाते हैं और कितना काम करने में यह हर व्यक्ति को अपने जीवन के अनुसार, अपने काम-काज अनुसार तय करना होता है।

अगर आप योजना आयोग में काम करते हैं तो आप केवल योजना ही बनाते रहते हैं क्योंकि वही आपका काम है। योजना को अमल में लाना किसी और का काम है। आपका काम चाहे जिस भी तरह का हो जीवन की प्रकृति ही ऐसी है कि आप बस इस वक्त में ही कुछ तय कर सकते हैं।

इस वक्त खाना खा सकते हैं, अभी सांस ले सकते हैं, इसी वक्त जी सकते हैं। योजना भी आप अभी बना सकते हैं। आप कल के बारे में योजना तो बना सकते हैं, लेकिन सबकुछ तय नहीं कर सकते। योजना महज एक विचार है। हम जो अब तक जानते हैं उसी के आधार पर आगे की योजना बनाते हैं।

यानी एक तरह से हमारी योजना हमारे अतीत का ही एक सुधरा हुआ रूप है। योजना तो अतीत के एक टुकड़े को ले कर उसे सजाने-धजाने जैसा काम है। यह जीने का सही तरीका नहीं है। हां, हमें योजना की जरूरत है लेकिन अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के मुताबिक ही चलती रहे तो इसका मतलब है कि आप एक बेचारगी वाला जीवन जी रहे हैं। आपके जीवन में कुछ ऐसा होना चाहिए जिसकी आपने कभी कल्पना भी न की हो।

जीवन की संभावना इतनी अपार है कि कोई भी उस हद तक योजना नहीं बना सकता। इसलिए योजना को एक सहारे की तरह रखिए और जीवन को घटित होने दीजिए, जीवन अभी जैसा है उसमें नई संभावनाएं ढूंढिए। पता नहीं कब क्या सामने आ जाए। हो सकता है आपके साथ कुछ ऐसा हो जाए जैसा आज तक किसी के साथ न हुआ हो।

अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के अनुसार ही चलती रहे तो वही बेतुकी चीजें आपके साथ भी होंगी जो आज तक इस दुनिया में होती रही हैं। आपके साथ कभी भी कुछ नया नहीं होगा। अगर आपका जीवन आपकी योजना के अनुसार चलता रहे तो आपको प्रेम नहीं हो पाएगा, आपको आनंद की अनुभूति नहीं होगी, और आत्मज्ञान का तो सवाल ही नहीं है, क्योंकि यह आपकी कल्पना के दायरे में ही नहीं है।

आप अपनी योजना के अनुसार औरों की तरह किसी लड़की या लड़के का हाथ थाम कर पेड़ के चारों ओर चक्कर लगा सकते हैं, गाना गा सकते हैं, लेकिन फिर भी आप नहीं जान पाएंगे कि प्रेम क्या होता है। आप अपनी योजना के अनुसार शादी तो कर सकते हैं लेकिन आप नहीं जान पाएंगे कि प्रेम क्या है।

आप संतान तो पैदा कर सकते हैं, फिर भी आप नहीं समझ पाएंगे कि प्रेम क्या है। जब प्रेम होगा तो अपने-आप होगा, आपकी योजना के अनुसार नहीं। यह आपकी योजना का हिस्सा हो ही नहीं सकता क्योंकि योजना तो सिर्फ आपकी पिछली जानकारियों और अनुभवों से ही बनती है। अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के अनुसार ही चलती रहे तो कभी कोई नई चीज आपके जीवन को छू भी नहीं पाएगी।

इसलिए आपको जानना होगा कि किस हद तक योजना बनाएं। अगर आपके पास किसी तरह की कोई योजना ही नहीं होगी तो आपको यह भी पता नहीं होगा कि कल क्या करना है। इसके लिए एक खास तरह का संतुलन बनाना होगा, एक खास समझदारी से यह तय करना होगा कि किस चीज की योजना बनाएं और किन चीजों को बस अपने आप होने दें। आप किसी महान दूरदर्शिता से अपनी योजना नहीं बनाते।

दरअसल भविष्य की अप्रत्याशित घटना को झेल न पाने के भय के कारण आप योजना बनाते हैं। मनुष्य को बस एक ही तकलीफ है कि उनका जीवन वैसा नहीं चल रहा जैसा उसके विचार से चलना चाहिए। बस इतनी सी बात है कि आपकी कोई बेकार-सी योजना साकार नहीं हो रही, कुछ उससे बहुत बड़ा साकार हो रहा है। आप सुबह-सुबह कॉफी पीना चाहते थे, कॉफी नहीं मिली तो आप दुखी हो गए। लेकिन जो इतना भव्य सूरज निकल रहा है उसे आप नहीं देख रहे हैं।

इस विशाल ब्रह्मांड में, जहां आपके चारों ओर जीवन का नृत्य चल रहा है, आपकी योजना एक निहायत मामूली-सी चीज है। उसको इतनी अहमियत मत दीजिए। हां, आपके पास इतनी योजना होनी चाहिए कि कल सुबह उठ कर क्या करना है, लेकिन कभी यह उम्मीद मत कीजिए कि आपकी योजना के अनुसार ही सब कुछ हो और सबसे खास बात यह कि हमेशा यह सपना देखिए और प्रार्थना कीजिए कि आपका जीवन आपकी योजना, आपकी कल्पना और आपकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा ले कर आए।

याद रखिए कि अगर आपका जीवन आपकी योजना के अनुसार चलता है तो फिर वह एक दुखी जीवन होगा, उसमें कुछ भी आश्चर्य और चकित करने वाला पल नहीं होगा। आश्चर्य के बिना जीवन नीरस है।