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Monday, 23 June 2014

Om word glory

देखा जाए तो हर धर्म में कोई न कोई प्रतीक चिह्न हुआ ही करता है। हिंदुओं में ऊँ को पवित्र अक्षर माना जाता है। हर धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत ऊँ के उच्चारण से किया जाता है।

ऊँ शब्द तीन अक्षरों अ, उ और म से मिलकर बना है। पर इसमें ऐसा क्या खास है कि इसे हिन्दुओं ने अपना पवित्र धार्मिक प्रतीक मान लिया है। असंख्य शब्दों और चिह्नों में से ऊँ और स्वास्तिक को ही क्यों चुना गया। ये सवाल महत्त है। जरा देखें ओम के उच्चारण से क्या घटित और परिवर्तित होता है।

    ऊँ की ध्वनि मानव शरीर के लिए प्रतिकूल डेसीबल की सभी ध्वनियों को वातावरण से निष्प्रभावी बना देती है।

    विभिन्न ग्रहों से आनेवाली अत्यंत घातक अल्ट्रावायलेट किरणें ओम उच्चारित वातावरण में निष्प्रभावी हो जाती हैं।

    इसके उच्चारण से इंसान को वाक्य सिद्धि की प्राप्त होती है।

    चित्त एवं मन शांत एवं नियंत्रित हो जाते हैं।

    सनातन धर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ऊँ को महत्व प्राप्त है।

बौद्ध दर्शन में ऊँ का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार, ऊँ को मणिपुर चक्र में अवस्थितमाना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी ऊँ के महत्व को दर्शाया गया है। कबीर निर्गुण संत एवं कवि थे। उन्होंने भी ऊँ के महत्व को स्वीकारा और इस पर साखियां भी लिखीं।

गुरुनानक ने ऊँ के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा- ओम सतनाम कर्ता पुरुष निर्भोनिर्बेरअकालमूर्त। ऊँ सत्य नाम जपने वाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं अकाल-पुरुष के सदृश हो जाता है।

इस तरह ऊँ के महत्व को सभी संप्रदाय के धर्म-गुरुओं, उपासकों, चिंतकों ने प्रतिपादित किया है, क्योंकि यह एकाक्षरी मंत्र साधना में सरल है और फल प्रदान करने में सर्वश्रेष्ठ।

यह ब्रह्मांड का नाद है एवं मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक। किसी भी मंत्र के पहले ऊँ जाेडने से वह शक्ति संपन्न हो जाता है। एक बार ऊँ का जाप हजार बार किसी मंत्र के जाप से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

If youre not certain when desired find happiness here

जब मनचाहे परिणाम न मिल रहे हों तो बहुत छोटी-छोटी बातों में खुशियां ढूंढना चाहिए। किसी भी अंतिम परिणाम से निराश होने के बजाय अपने प्रयासों पर ध्यान देना चाहिए। बुरे स्वप्नों को भूलकर आगे बढ़ने का यही मंत्र है।

हम सभी की जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जबकि परिणाम हमारे पक्ष में नहीं रहते। प्रयासों के बावजूद हम सही नतीजे तक नहीं पहुंच पाते। जिंदगी में सबसे कठिन क्षण ये ही होते हैं जबकि व्यक्ति वर्तमान से निराश होता है और भविष्य के प्रति भी कोई आशा नजर नहीं आती है।

ऐसे में कोई भी अपने प्रयासों को संदेह दृष्टि से देखने लगता है और उसी के परिणामस्वरूप नए कार्यों में लगने वाली ऊर्जा भी कम होने लगती है। यह याद रखना चाहिए कि जिंदगी एक सीधी सड़क की तरह नहीं हो सकती, इसमें कई तरह के मोड़ होते हैं और हर मोड़ थोड़ा चौंकाता है।

इन मोड़ों से गुजरते हुए कई बार ऐसी अप्रत्याशित स्थितियों से सामना होता है जिनके लिए हम तैयार नहीं होते और तब हम बहुत निराश महसूस करते हैं। हर मोड़ पर अपने मन का दृश्य मिले यह संभव नहीं है और इसलिए अप्रत्याशित घटनाओं का सहजता के साथ मुकाबला करना जरूरी है।

जीवन में जब अपने मन के अनुरूप कुछ भी न हो रहा हो तो हमें बहुत शांति के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। परीक्षा यही है कि हम ऐसी स्थितियों में भी अपनी क्षमताओं और स्वाभाविकताओं में बने रहें। जब कुछ भी हमारे मन का नहीं हो रहा हो तो यह विश्वास करना बहुत जरूरी है कि चीजें ठीक होंगी।

नकारात्मक परिणामों के बीच सकारात्मक रवैया बहुत ही जरूरी और महत्वपूर्ण है। उस वृक्ष का खयाल कीजिए जो पतझड़ में पूरी तरह सूखा दिखाई देता है लेकिन वसंत आते ही वह नए पत्तों से लद जाता है। जिंदगी में ऐसे पतझड़ी समय से निकलने के लिए आशा की बहुत जरूरत होती है। आशा ही कठिन वक्त में भी हमें प्रयासों से जोड़े रखती है।

फिर जब अपने मन के अनुरूप परिणाम नहीं आ रहे हों तो यह मौका होता है कि हम अपनी योजनाओं की तरफ फिर से देखें। अगर हम किसी एक ही चीज को बार-बार साबित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं और वह फिर भी ठीक से नहीं हो पा रही है तो हमें अपनी योजना में फेरबदल करके देखना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लंबे समय की अपनी योजनाएं या अपने अंतिम लक्ष्य को बदलना चाहिए बल्कि उन योजनाओं के रास्तों में

थोड़ा-सा बदलाव सही दिशा में आगे बढ़ने का मौका देगा और राह आसान बनाएगा। उन चीजों की तरफ ध्यान दें जिनके कारण सही परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं और देखें कि आप उन स्थितियों में कौन-सा वैकल्पिक मार्ग चुन सकते हैं। विकल्प तनावों और पड़ने वाले दबाव को भी बहुत हद तक कम कर देते हैं।

जब मनचाहे नतीजे नहीं मिल रहे हैं तो ऐसा समय धैर्य की परीक्षा होता है। ऐसे में चीजों के परिणामों के बारे में बहुत अधीर नहीं होना चाहिए और उन्हें समय देना चाहिए। परिणामों की हड़बड़ी या अति उत्सुकता भी हमारे मन की शांति को भंग करती हैं और ऐसे में धीरज के साथ आगे बढ़ना बहुत राहत देगा।

अधीरता की स्थिति में हम परिणामों के लिए अपना सबकुछ झोंक देते हैं और इसलिए भी निराशा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए जरूरी है कि धीरज के साथ परिणामों की प्रतीक्षा की जाए ताकि बहुत मुश्किल स्थितियां न बने।

चाहे हम कितना भी बुरा महसूस कर रहे हों लेकिन उन स्थितियों में भी खुद को प्रेरित बनाए रखना जरूरी है। अगर हम इसी शिकायत के साथ आगे बढ़ें कि हम जकडन महसूस कर रहे हैं तो धीरे-धीरे हम परिस्थितियों को और भी मुश्किल बना लेते हैं।

जब परिणाम मन के अनुरूप नहीं आ रहे हैं तो नए रास्तों को खोजने की तरफ बढ़ना और नई चीजों को आजमाने के लिए स्वयं को आगे बढ़ाना बहुत जरूरी होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हौसला न हारें। अंतरप्रेरणा होना चाहिए, फिर भले ही परिणाम आज पक्ष में न भी हों लेकिन भविष्य के प्रति उम्मीद तो बनी ही रहती है।

जब बड़े परिणाम हमारे पक्ष में नहीं आ रहे हैं तब लंबे समय बाद मिलने वाली किसी बड़ी सफलता के बारे में चिंतित न रहें बल्कि रोज मिलने वाले छोटे-छोटे पलों को पूरी तरह जिएं। अपने परिणाम पर ज्यादा निर्भरता या ज्यादा फोकस भी निराशा को बढ़ाता है।

इसकी बजाय आपको अपने छोटे-छोटे प्रयासों की सुंदरता को देखना चाहिए। इस तरह आप एक संतुलन पैदा कर सकते हैं और निराशा को खुद से दूर ले जा सकते हैं। हालांकि यह आसान नहीं होता लेकिन जब हम इस तरह आगे बढ़ेंगे तो कोई भी असफलता या निराशा हमारा उत्साह तोड़ नहीं पाएगी।

प्रयासों का महत्व समझें ऐसे समय में जबकि मनचाहे परिणाम नहीं मिल रहे हों तो अपने प्रयासों की उत्कृष्टता के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए। तब यही देखना हमें आगे बढ़ने में मदद करता है कि हमने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया और कुछ चीजें हमारी पहुंच से बाहर थीं।

अगर आप नकारात्मक ढंग से खुद के प्रति सोचने लगे तो शायद आगे कोई भी चीज बेहतर तरीके से अंजाम नहीं दे पाएंगे। आपको आने वाली चीजों को बेहतर करने के लिए खुद के प्रति आशावादी होना ही होगा। तभी अच्छा कर पाएंगे।

ये उपाय आजमाएं

    छोटा ब्रेक लेकर तैयारी करें।

    अपनी योजना का आकलन करें।

    दूसरे लोगों से भी सहयोग लें।

    नई योजना बनाएं।

    वैकल्पिक योजना तैयार रखें।

Saturday, 21 June 2014

Mango and lychee sad story

दो किसान थे। एक ने आम उगाए थे तो दूसरे ने लीची। अपने-अपने फल बाजार में बेचने के बाद उन दोनों ने अपने लिए पांच-पांच किलो फल बचा लिए थे। वापस लौटते समय दोनों रास्ते में मिले। दोनों में बात होने लगी।

आम वाला किसान बोला - मैंने फल बचा तो लिए, लेकिन इस बार खूब फसल हुई, हम लोगों ने खूब आम खाए। अब खाने का बिल्कुल भी मन नहीं है। लीची वाले किसान ने कहा यही हाल मेरा भी रहा। दोनों ने यह फैसला किया कि दोनों आपस में फल बदल लेते हैं।

आम वाले ने लीची ले लीं और लीची वाले किसान ने आम। लेकिन आम वाला किसान बहुत लालची था। उसने नजर बचाकर कुछ आम बचाकर रख लिए।

लीची वाला किसान आम पाकर बहुत खुश हुआ। घर जाकर उसने पूरे परिवार को आम खिलाए और उसे बड़ी अच्छी नींद आई। लेकिन आम वाला किसान बहुत व्यथित रहा।

उसे रात भर नींद नहीं आ सकी। उसे आत्मग्लानि नहीं हो रही थी, बल्कि उसे यह लग रहा था कि कहीं उसकी तरह लीची वाले किसान ने भी कुछ लीचियां छुपाकर तो नहीं रख ली हैं।

संक्षेप में

गलत काम करने वाले को दूसरा व्यक्ति भी गलत ही नजर आता है। इसी कारण उसे दुः ख मिलता है।

Justice anywhere in the justice of poku temple

उत्तरांखड और हिमाचल की सीमा पर उत्तरकाशी जिले के जौनसार-बावर इलाके के नैटवाड़ में न्याय प्रिय माने जाने वाले पोखू देवता के दरबार में दर्जनों लोग रोजाना अपनी फरियाद लेकर आते हैं।

मान्यता है कि पोखू देवता किसी को भी निराश नहीं करते। इस मंदिर में पूजा-पाठ की विधि भी अनूठी है। हिमालय पर्वत से निकली रुपीण और सुपीण नदी के संगम पर स्थित नैटवाड़ के पोखू मंदिर में पूरे साल यह क्रम चलता है।

किंवदंती है कि पोखू देवता के दरबार आए पीड़ित लोगों को हाथों-हाथ न्याय मिलता है। न्याय की आस में पोखू दरबार आए लोगों को मंदिर के कुछ नियम-कायदों का पालन करना होता है।

यहां भक्त खासकर, जमीन-जायजाद के विवाद के साथ अपनी तमाम समस्याएं लेकर आते हैं। लेकिन, उत्तराखंड में एक मात्र ऐसा मंदिर है, जहां सामाजिक प्रताड़ना और मुसीबतें झेलने के बाद निराश लोग हाथों-हाथ न्याय मिलने की उम्मीद में आते हैं।

पोखू हैं कुल देवता

सिंगतूर पट्टी के नैटवाड़, दड़गाण, कलाब, सुचियाण, पैंसर, पोखरी, पासा, खड़ियासीनी, लोदराला व कामड़ा समेत दर्जनभर गांव के लोग पोखू को अपना कुल आराध्य देव मानते हैं।

पौराणिक मान्यता

इस क्षेत्र के लोगों का जीवन पूरी तरह खेती बाड़ी पर निर्भर हैं। इसी वजह से यहां जमीन जायजाद के झगड़े ज्यादा होते हैं। सिविल मामलों की सुनवाई में ज्यादा लंबा वक्त लगने की वजह से लोगों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता था, इसी को देखते हुए लोग कोर्ट कचहरी की बजाय पोखू देवता के मंदिर में अपनी फरियाद लेकर जाने लगे। सदियों से यही परंपरा आगे बढ़ रही है।

इस परंपरा के पीछे सामाजिक मनोविज्ञान भी है। समाजशास्त्रियों का मत है कि पोखू देवता के त्वरित न्याय की मान्यता के चलते दूसरों की जमीन जायजाद हड़पने या चेष्टा करने वालों पर सामाजिक दबाव भी बनता है।

पूजा की अनूठी विधि

पोखू देवता मंदिर में पूजा-पाठ की विधि अनूठी है। मंदिर के पुजारी पोखू देवता की मूर्ति की तरफ मुख करने के बजाय पीठ घुमाकर पूजा करते हैं।

यहां प्रतिदिन सुबह-सायं दो बार पूजा होती है। पूजा से पहले पुजारी रुपीण नदी में स्नान करके सुराई-गढ़वे में पानी लाना होता है। इसके बाद आधे घंटे तक ढ़ोल के साथ मंदिर में पूजा होती है।

Friday, 20 June 2014

Receiving knowledge of the poet Kalidasa stripe Devi Temple

केदारनाथ यात्रा मार्ग के मुख्य पड़ाव श्रीनगर से महज 15 किमी की दूरी पर स्थित सिद्धपीठ मां धारी देवी का मंदिर। कहते हैं यहीं मां काली की कृपा से महाकवि कालिदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह तीर्थ श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का केंद्र रहता है। शक्ति पीठों में कालीमठ का वर्णन पुराणों में मिलता है।

मान्यता है कि कालीमठ मंदिर से ही मूर्ति का सिर वाला भाग बाढ़ से अलकनंदा नदी में बहकर धारी गांव नामक स्थान पर आ गया।

एक किंवदंति के अनुसार गांव की धुनार जाति व स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर सिर वाले भाग को समीपवर्ती ऊंची चट्टान पर स्थापित किया। मां काली कल्याणी की यह मूर्ति वर्तमान में अलकनंदा नदी पर जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के चलते नदी से ऊपर मंदिर बनाकर स्थापित की गई है।

धारी गांव के पांडे ब्राहमण मंदिर के पुजारी हैं। जनश्रुति है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप प्रात:काल कन्या, दोपहर युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती है। प्रतिवर्ष चैत्र व शारदीय नवरात्र में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों के लिए मंदिर में आते हैं। इसके अलावा चारधाम यात्रा के दौरान भी हर रोज सैकड़ों की तादात में श्रद्धालुगण मंदिर पहुंचते हैं।

यहां दिसंबर-जनवरी की सर्दी को छोड़कर वर्षभर सुहावना रहता है। यहां जाने के लिए चारधाम यात्रा मार्ग के मध्य स्थित होने के कारण यात्रा के सभी पड़ावों पर प्राइवेट, जीएमवीएन व बीकेटीसी के गेस्ट हाउस है।
वायु मार्ग के लिए 145 किमी दूर जौलीग्रांट हवाई अड्डा है। रेल मार्ग के लिए 115 किलोमीटर दूर ऋषिकेश निकटतम रेलवे स्टेशन। सड़क मार्ग से जाना चाहते हैं तो हरिद्वार, ऋषिकेश व देहरादून से मां धारी देवी मंदिर तक आसानी से छोटे-बडे़ वाहनों की उपलब्धता है।

It is prized statues of buddha

पिछले वर्ष बेल्जियम में धूम मचाने के बाद इस वर्ष मथुरा संग्रहालय की मूर्तियां कोरिया में धूम मचाएंगी। लेकिन कोरिया की टीम द्वारा पसंद की गई आठ मूर्तियों में से बुद्ध की दो मूर्तियों को प्रशासन ने कोरिया न भेजने का निर्णय लिया है। कारण है कि यह मूर्तियां बेशकीमती मानी जाती हैं।

कुछ दिन पहले कोरिया की टीम ने दिसंबर में लगने वाली प्रदर्शनी के लिए भगवान बुद्ध, कटरा बुद्धा, महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय, महात्मा बुद्ध का स्तूप, बुद्धा हेड, अभय मुद्रा में बुद्ध, चौकी पर महात्मा बुद्ध एवं महात्मा बुद्ध का स्वर्गावतरण मूर्तियों को पंसद किया था। लेकिन संग्रहालय प्रशासन ने महात्मा बुद्ध और कटरा बुद्ध को कोरिया न भेजने का निर्णय लिया है। बुद्ध हेड को भी न भेजने पर विचार चल रहा है। कारण है कि यह मूर्तियां बेशकीमती और मास्टर पीस मानी जाती हैं। राष्ट्रीय संग्रहालय कोरिया के एसोसिएट्स और सह एसोसिएट्स द्वारा पंसद की गई मूर्तियों को कोरिया भेजने से पहले राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली की टीम यहां आकर कीमत का आंकलन करेगी। ताकि इन मूर्तियों का बीमा कराया जा सके। संग्रहालय के सहायक निदेश डा.एसपी सिंह ने बताया कि भगवान बुद्ध और कटरा बुद्धा को कोरिया नहीं भेजा जाएगा। यह बहुत महत्वपूर्ण मूर्तिया हैं।

कटरा बुद्धा की मूर्ति। दूसरे चित्र में महात्मा बुद्ध की दुलर्भ मूर्ति।महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है।

महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है। महात्मा बुद्ध की मूर्ति संग्रहालय की जान मानी जाती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यह मूर्ति संग्रहालय के गेट पर भी लगाई जा रही है। यह मूर्ति 1860 में कचहरी के समीप जमालपुर टीला से निकली थी। भारतीय कला के सर्वेश्रेष्ठ उदाहरणों में मानी जाती है। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लम्बे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान की प्रकाश की किरणों को बिखेरता अलंकृत प्रभामंडल। सबसे महत्वपूर्ण है मूर्ति का ध्यानभाव। कटरा बुद्धा को मथुरा में भगवान बुद्ध की पहली बनी मूर्ति माना जाता है।

It was a great poet kalidasa achieve the knowledge

बदरीनाथ-केदारनाथ यात्रा मार्ग के मुख्य पड़ाव श्रीनगर से महज 15 किमी की दूरी पर स्थित सिद्धपीठ मां धारी देवी का मंदिर। कहते हैं यहीं मां काली की कृपा से महाकवि कालिदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह तीर्थ श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का केंद्र रहता है। शक्ति पीठों में कालीमठ का वर्णन पुराणों में मिलता है।

मान्यता है कि कालीमठ मंदिर से ही मूर्ति का सिर वाला भाग बाढ़ से अलकनंदा नदी में बहकर धारी गांव नामक स्थान पर आ गया।

एक किंवदंति के अनुसार गांव की धुनार जाति व स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर सिर वाले भाग को समीपवर्ती ऊंची चट्टान पर स्थापित किया। मां काली कल्याणी की यह मूर्ति वर्तमान में अलकनंदा नदी पर जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के चलते नदी से ऊपर मंदिर बनाकर स्थापित की गई है।

धारी गांव के पांडे ब्राहमण मंदिर के पुजारी हैं। जनश्रुति है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप प्रात:काल कन्या, दोपहर युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती है। प्रतिवर्ष चैत्र व शारदीय नवरात्र में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों के लिए मंदिर में आते हैं। इसके अलावा चारधाम यात्रा के दौरान भी हर रोज सैकड़ों की तादात में श्रद्धालुगण मंदिर पहुंचते हैं।

यहां दिसंबर-जनवरी की सर्दी को छोड़कर वर्षभर सुहावना रहता है। यहां जाने के लिए चारधाम यात्रा मार्ग के मध्य स्थित होने के कारण यात्रा के सभी पड़ावों पर प्राइवेट, जीएमवीएन व बीकेटीसी के गेस्ट हाउस है।

वायु मार्ग के लिए 145 किमी दूर जौलीग्रांट हवाई अड्डा है। रेल मार्ग के लिए 115 किलोमीटर दूर ऋषिकेश निकटतम रेलवे स्टेशन। सड़क मार्ग से जाना चाहते हैं तो हरिद्वार, ऋषिकेश व देहरादून से मां धारी देवी मंदिर तक आसानी से छोटे-बडे़ वाहनों की उपलब्धता।

Guaranteed success are abhijit muhurat

हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक हर दिन का कुछ समय अति शुभ माना गया है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इस समय कोई भी कार्य करने पर विजय प्राप्त होती है।

ज्योतिर्विद और भागवत मर्मज्ञ पं. ओम वशिष्ठ बताते हैं कि वर्ष के 365 दिन में 11.45 से 12.45 तक का समय अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। इस मुहूर्त में अगर कोई भी कार्य किया जाए तो उसमें विजय प्राप्त होती है।

कहते है इसमें आप कुछ भी करें तो वह सर्वफलदायी होता है, सर्वाथसिद्धिदायक होता है। इस मुहूर्त या फिर तिथि में किया गया काम शुभ फलों को देता है। अतिशुभ फलों के इन्हीं आगमन के लिए हिंदू कैलेंडर में कुछ तिथियां हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा काल गणना के आधार पर निर्धारित की गई है।

अभिजीत मुहूर्त यानी एक ऐसा मुहूर्त जिसमें अगर काम शुरु किया गया तो विजय होनी तय है, सफलता की गारंटी पक्की होती है। इस बार 01-02 अप्रैल को अक्षय तृतीया का शुभ दिन है।

वैशाख महीने की गणना सबसे सर्वोत्तम महीनों में की जाती है। वैशाख मास की विशिष्टता इसमें पड़ने वाली अक्षय तृतीय के कारण अमर हो जाती है। भारतीय काल गणना के मुताबिक चार स्वयंसिद्ध अभिजित मुहूर्त माने गए है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा), आखातीज यानी अक्षय तृतीया, दशहरा और दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि।

अक्षय का अर्थ है

जिसका कभी क्षय नहीं हो यानी वह आपके पास हमेशा बना रहे। जिसका नाश ना हो यानी वह आपके पास स्थायी रहे। स्थायी वहीं रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। भारतीय संस्कृति में इस दिन का महत्व व्यापक है।

पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है। परशुरामजी की गिनती चिंरजीवी महात्माओं में की जाती है।

कहते हैं चारों युगों अर्थात सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन ही हुई थी इसलिए इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि यानी युर्गाद तिथि भी कहते हैं। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है।

इसी तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण और श्री केदारनाथधाम के पट खुलते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाए जाने वाले इस व्रत की बड़ी मान्यता है । इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र, आभूषण आदि बनवायें, खरीदें और धारण किए जाते हैं। नई भूमि को खरीदना, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

विवाह और मांगलिक कार्य

इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजीत शुभ मुहूर्त के कारण विवाह और मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। अक्षय तृतीया वाले दिन दिया गया दान अक्षय पुण्य के रूप में संचित होता है।

इसलिए इस दिन अपने सामर्थ्य के मुताबिक दान-पुण्य करना चाहिए। यानी इस दिन आप जो कुछ भी करते हैं उसका क्षय नहीं होता है। चाहे वह कोई शुभ कार्य हो या फिर आपके द्वारा किया गया दान-पुण्य।

अक्षय तृतीया को स्वर्ण युग की आरंभ तिथि भी मानी गई है। अक्षय का अर्थ है कि कभी समाप्त न होने वाला। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन खरीदा और धारण किए गए सोने और चांदी के गहने अखंड सौभाग्य का प्रतीक माने गए हैं। मान्यताओं के मुताबिक सोने और चांदी के आभूषण खरीदने से घर में बरकत ही बरकत आती है।

मान्यता है कि लक्ष्मी को स्थिर होना चाहिए ताकी घर में बरकत और खुशहाली की सदैव बारिश होती रहे। सोने के प्रति ज्योतिषियों का मानना है कि सोना के होने से घर में शुभ कारकों का उदय होता है जो परिवार में खुशहाली का माध्यम बनते हैं। इसलिए अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदने और पहनने की भी परंपरा है।

Thursday, 19 June 2014

Guaranteed success are abhijit muhurat

हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक हर दिन का कुछ समय अति शुभ माना गया है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इस समय कोई भी कार्य करने पर विजय प्राप्त होती है।

ज्योतिर्विद और भागवत मर्मज्ञ पं. ओम वशिष्ठ बताते हैं कि वर्ष के 365 दिन में 11.45 से 12.45 तक का समय अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। इस मुहूर्त में अगर कोई भी कार्य किया जाए तो उसमें विजय प्राप्त होती है।

कहते है इसमें आप कुछ भी करें तो वह सर्वफलदायी होता है, सर्वाथसिद्धिदायक होता है। इस मुहूर्त या फिर तिथि में किया गया काम शुभ फलों को देता है। अतिशुभ फलों के इन्हीं आगमन के लिए हिंदू कैलेंडर में कुछ तिथियां हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा काल गणना के आधार पर निर्धारित की गई है।

अभिजीत मुहूर्त यानी एक ऐसा मुहूर्त जिसमें अगर काम शुरु किया गया तो विजय होनी तय है, सफलता की गारंटी पक्की होती है। इस बार 01-02 अप्रैल को अक्षय तृतीया का शुभ दिन है।

वैशाख महीने की गणना सबसे सर्वोत्तम महीनों में की जाती है। वैशाख मास की विशिष्टता इसमें पड़ने वाली अक्षय तृतीय के कारण अमर हो जाती है। भारतीय काल गणना के मुताबिक चार स्वयंसिद्ध अभिजित मुहूर्त माने गए है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा), आखातीज यानी अक्षय तृतीया, दशहरा और दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि।

अक्षय का अर्थ है

जिसका कभी क्षय नहीं हो यानी वह आपके पास हमेशा बना रहे। जिसका नाश ना हो यानी वह आपके पास स्थायी रहे। स्थायी वहीं रह सकता है जो सर्वदा सत्य है। भारतीय संस्कृति में इस दिन का महत्व व्यापक है।

पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ था इसलिए इनकी जयंतियां भी अक्षय तृतीया को मनाई जाती है। परशुरामजी की गिनती चिंरजीवी महात्माओं में की जाती है।

कहते हैं चारों युगों अर्थात सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन ही हुई थी इसलिए इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि यानी युर्गाद तिथि भी कहते हैं। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है।

इसी तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण और श्री केदारनाथधाम के पट खुलते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाए जाने वाले इस व्रत की बड़ी मान्यता है । इस तिथि को सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से व्रतोत्सव के साथ ही अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र, आभूषण आदि बनवायें, खरीदें और धारण किए जाते हैं। नई भूमि को खरीदना, भवन, संस्था आदि का प्रवेश इस तिथि को शुभ फलदायी माना जाता है।

विवाह और मांगलिक कार्य

इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयंसिद्ध अभिजीत शुभ मुहूर्त के कारण विवाह और मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। अक्षय तृतीया वाले दिन दिया गया दान अक्षय पुण्य के रूप में संचित होता है।

इसलिए इस दिन अपने सामर्थ्य के मुताबिक दान-पुण्य करना चाहिए। यानी इस दिन आप जो कुछ भी करते हैं उसका क्षय नहीं होता है। चाहे वह कोई शुभ कार्य हो या फिर आपके द्वारा किया गया दान-पुण्य।

अक्षय तृतीया को स्वर्ण युग की आरंभ तिथि भी मानी गई है। अक्षय का अर्थ है कि कभी समाप्त न होने वाला। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन खरीदा और धारण किए गए सोने और चांदी के गहने अखंड सौभाग्य का प्रतीक माने गए हैं। मान्यताओं के मुताबिक सोने और चांदी के आभूषण खरीदने से घर में बरकत ही बरकत आती है।

मान्यता है कि लक्ष्मी को स्थिर होना चाहिए ताकी घर में बरकत और खुशहाली की सदैव बारिश होती रहे। सोने के प्रति ज्योतिषियों का मानना है कि सोना के होने से घर में शुभ कारकों का उदय होता है जो परिवार में खुशहाली का माध्यम बनते हैं। इसलिए अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदने और पहनने की भी परंपरा है।

Tuesday, 17 June 2014

With diligence and patience will definitely get success

एक बार गौतम बुद्ध अपने अनुयायियों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। गर्मी का मौसम था। गांव पहुंचने से पहले ही बुद्ध के साथ जा रहे लोगों को जगह-जगह बहुत सारे गड्ढे खुदे हुए मिले।

तब उनके एक शिष्य ने गड्डे देखकर जिज्ञासा प्रकट की, आखिर इस तरह गढे का खुदे होने का तात्पर्य कया है? तब गौतम बुद्ध बोले, पानी की तलाश में किसी व्यक्ति ने इतनें गड्ढे खोदे है।

यदि वह धैर्यपूर्वक एक ही स्थान पर गड्ढा खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता।पर वह थोडी देर गड्ढा खोदता और पानी न मिलने पर दूसरा गड्ढा खोदना शुरू कर देता।

संक्षेप में

कहा गया है कि व्यक्ति को परिश्रम करने के साथ धैर्य भी रखना चाहिए। तभी उन्हें सफलता मिलती है।

Here is the couple wish to

समुद्र तल से 1350 मीटर की ऊंचाई पर कीलांचल पर्वत (ऋष्यलकु पर्वत) की तलहटी में स्थित सती मां अनुसूया मंदिर निः संतान दंपतियों बच्चों की इच्छा से आते हैं।

कहते हैं कि यहां तप करने वाले नि:संतान दंपती की गोद जरूर भरती है। यह मान्यता सदियों से चली आ रही है।

वैसे तो सालभर इस मंदिर के कपाट खुले रहते हैं, परंतु प्रत्येक वर्ष दिसंबर माह में दत्तात्रेय जयंती पर यहां दो दिन का विशाल मेला लगता है। चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर से 13 किलोमीटर सड़क मार्ग से मंडल पहुंचने के बाद पांच किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर कीलांचल पर्वत की तलहटी में होते हैं मां अनुसूया के दर्शन।

गर्भगृह में सती मां

इस मंदिर में एक शिला पर गणेश की मूर्ति स्थापित है। गर्भगृह में सती मां अनुसूया की मूर्ति चांदी के छत्रों से जड़ी हुई है। मंदिर प्रांगण में शिव, पार्वती, गणोश के अलावा सती मां अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय की त्रिमुखी प्रतिमा विराजमान है।

अनुसूया मंदिर के निकट ही महर्षि अत्रि की तपस्थली भी है। सती मां अनुसूया के बारे में कथा प्रचलित है कि इसी स्थान पर त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने मां के सतीत्व की परीक्षा लेनी चाही तो मां अनुसूया ने तीनों देवों को बालक बनाकर अपना स्तनपान कराया। यहां बारी प्रथा से पूजा-अर्चना की परंपरा है।

मंदिर में सुबह छह बजे स्नान, श्रृंगार, पूजा, 10 बजे रोट, आटे का चूरमा, मालपुआ का भोग और शाम सात से आठ बजे के बीच संध्या आरती संपन्न होने के बाद लगाया जाता है।

मौसम का मिजाज

यह मंदिर वर्षभर खुला रहता हैं। अप्रैल से सितंबर तक यहां का मौसम गर्म, बारिश, अक्टूबर से मार्च तक बारिश एवं बर्फबारी होती है।

देहरादून, ऋषिकेश व हरिद्वार रेलमार्ग के लिए ऋषिकेश निकटतम रेलवे स्टेशन है जिससे मंदिर की दूरी 253 किलोमीटर है।

Friday, 13 June 2014

Statue of mother sita morality

राम-कथा में माता सीता का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। उनका चरित्र संयमी, साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए प्रेरित करता है। जिससे हर नारी को नैतिकता की शिक्षा मिलती है।

राम की शक्ति सीता जी नारी सशक्तीकरण का उदाहरण हैं। अपूर्व साहस, बल, धैर्य, मातृत्व, पति का सहयोग आदि गुण हमें आज के युग में भी प्रेरणा प्रदान करते हैं।

राम-कथा के अनुसार, मिथिलानगरी में सीरजध्वज जनक नाम के राजा को सीता भूमि को जोतते समय मिली थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी पुत्री स्वीकार किया। सीता में अपूर्व बल और साहस था।

कथा के अनुसार, उन्होंने शिव-जी का धनुष अपने हाथों से उठा लिया था, जिसे देखकर राजा जनक बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने घोषणा करवा दी कि जो भी शिव जी का धनुष तोड़ेगा, उससे ही सीता का विवाह किया जाएगा। जिस धनुष को सीता ने उठा लिया था, उसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा सके। श्रीराम ने उस धनुष को तोड़कर सीता से विवाह किया।

जब श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले चौदह वर्र्षो का वनवास दिया गया, तो सीता जी ने उनके साथ जाने का तत्काल निर्णय लिया। उन्होंने अपने पति को विपत्तियों में नहीं छोड़ा। श्रीराम द्वारा अयोध्या में ही रहने के आग्रह के बाद भी सीता जी ने सभी सुखों को छोड़कर श्रीराम के साथ वन में जाना ही उचित समझा।

यह एक पत्नी का कर्तव्य भी है कि वह पति के सुख-दुख में सहभागी बनें। सीता ने वही किया। आज की कामकाजी महिलाएं घर की आर्थिक स्थिति सुधारने और सशक्त बनने के लिए घर से बाहर निकलती हैं और काम करके पति का सहयोग करती है। सीता जी ने भी महल में रहने का मोह नहीं किया और वे पति के साथ कंकड़ भरे मार्ग पर निकल पड़ीं।

जब रावण ने अपनी माया से उनका हरण कर लिया, तब भी वे हताश-निराश नहीं हुईं। वे मानसिक रूप से इतनी सबल थीं कि तमाम धमकाने और माया का प्रभाव डालने पर भी उनका आत्मविश्वास नहीं डिगा और उन्होंने गलत प्रस्ताव के आगे समर्पण नहीं किया। वे सत्य के साथ ही रहीं। उनका आत्मविश्वास और धैर्य ही था कि अंतत: सत्य की जीत हुई।

सीता जब अपने पुत्रों लव-कुश के संग वाल्मीकि आश्रम में रहीं, वहां उन्होंने बच्चों लव-कुश को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। सीताजी का चरित्र हमें धैर्यवान, साहसी, आत्मविश्वासी और सहयोगी बनने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Saturday, 7 June 2014

Vedic period top 10 rishi

भगवद्गीता में कहा गया है कि जिनका मन दु:ख से घवराता नहीं , जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निश्चल बुद्धिवाले लोग ऋर्षि कहलता हैं।

राग-द्वेष-रहित संतों, साधुओं और ऋषियों को मुनि कहा गया है। मुनियों को यति, तपस्वी, भिक्षु और श्रमण भी कहा जाता है।

वैदिक काल में कुछ ऐसे ऋर्षि हुए हैं जो किसी न किसी वजह से प्रसिद्ध रहे हैं उन्हीं में से कुछ ऋर्षियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी कुछ इस तरह है।

    अंगिरा: ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

    विश्वामित्र : गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

    वशिष्ठ: ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्र्मो में उनकी सहभागी थीं।

    कश्यप : मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की 13 कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

    जमदग्नि : भृगुपुत्र जमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के 16 मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

    अत्रि : सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

    अपाला : अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

    नर और नारायण : ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

    पराशर : ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

    भारद्वाज : बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

Source: Spiritual News Stories & Aaj Ka Rashifal

Grahashanti removing impurities measures

अगर आपकी कुंडली में किसी भी ग्रह की दशा ठीक नहीं है तो उसकी शांति के लिए कुछ आसान से उपाय आजमा सकते हैं। आप रत्न धारण करने की तरह ही वनस्पति का प्रयोग कर सकते हैं।

जिस ग्रह की शांति के लिए जो जड़ बताई गई है। उसे उसी वार में विधिवत् लाकर धारण कर सकते हैं। ध्यान रखें कि जड़ एक इंच लंबी होनी चाहिए।

    सूर्यः सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ा रविवार को गुलाबी धागे स पीली धातु के कवर में धारण करें।

    चंद्रः चंद्र की शांति के लइ खिरनी की जड़ सोमवार को सफेद ऊन के धागे में लपेटकर धारण करें।

    मंगलः मंगल ग्रह की शांति के लिए अनन्तमूल की जड़ केवल मंगलवार को लाल धागे के साथ धारण करें।

    बुद्धः बुद्ध ग्रह की शांति के लिए विधारा की जड़ बुधवार को हरे धागे से चांदी के यंत्र के साथ धारण करें।

    गुरुः गुरु ग्रह की शांति के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे के साथ स्वर्ण के ताबीज के साथ ग्रहण करें।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए सरपुख की जड़ शुक्रवार को सफेद धागे के साथ धारण करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए सफेद चंदन की जड़ बुधवार को लोहे के यंत्र में धारण करें।

    केतूः केतू की शांति के लिए असगंध की जड़ गुरुवार को आसमानी धागे से चांदी के यंत्र में धारण करें।

वनस्पति से ग्रह शांति

    सूर्यः सूर्य की शांति के लिए कनेर, देवदार, केसर, इलायची, महुआ के फूल का चूर्ण पानी में डालकर स्नान करें। जल्द ग्रह शांति दोष दूर हो जाएगा।

    मंगलः मंगल की शांति के लिए सोंठ, सौंफ, लाल चंदन, के फूल पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    बुधः बुध की शांति के लिए बहेड़ा, चावल, आंवला, और शहद को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    गुरुः गुरु की शांति के लिए मुलेठी, सफेद सरसों को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए हड़,बहेड़ा, आंवला, इलायची, केसर पानी में डालकर स्नान करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए नागबेल, लोबान, तिल के पत्र को पानी में डालकर स्नान करने से ग्रह शांति दोष से मुक्ति मिल जाती है।

    केतुः केतु की शांति के लिए लोबान, बला, मोथा, प्रियंगु को पानी में डालकर स्नान करें।

Source: Spiritual News in Hindi & Horoscope 2014

Thursday, 5 June 2014

Grahashanti removing impurities measures

अगर आपकी कुंडली में किसी भी ग्रह की दशा ठीक नहीं है तो उसकी शांति के लिए कुछ आसान से उपाय आजमा सकते हैं। आप रत्न धारण करने की तरह ही वनस्पति का प्रयोग कर सकते हैं।

जिस ग्रह की शांति के लिए जो जड़ बताई गई है। उसे उसी वार में विधिवत् लाकर धारण कर सकते हैं। ध्यान रखें कि जड़ एक इंच लंबी होनी चाहिए।

    सूर्यः सूर्य ग्रह की शांति के लिए बिल्व पत्र की जड़ा रविवार को गुलाबी धागे स पीली धातु के कवर में धारण करें।

    चंद्रः चंद्र की शांति के लइ खिरनी की जड़ सोमवार को सफेद ऊन के धागे में लपेटकर धारण करें।

    मंगलः मंगल ग्रह की शांति के लिए अनन्तमूल की जड़ केवल मंगलवार को लाल धागे के साथ धारण करें।

    बुद्धः बुद्ध ग्रह की शांति के लिए विधारा की जड़ बुधवार को हरे धागे से चांदी के यंत्र के साथ धारण करें।

    गुरुः गुरु ग्रह की शांति के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे के साथ स्वर्ण के ताबीज के साथ ग्रहण करें।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए सरपुख की जड़ शुक्रवार को सफेद धागे के साथ धारण करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए सफेद चंदन की जड़ बुधवार को लोहे के यंत्र में धारण करें।

    केतूः केतू की शांति के लिए असगंध की जड़ गुरुवार को आसमानी धागे से चांदी के यंत्र में धारण करें।

वनस्पति से ग्रह शांति

    सूर्यः सूर्य की शांति के लिए कनेर, देवदार, केसर, इलायची, महुआ के फूल का चूर्ण पानी में डालकर स्नान करें। जल्द ग्रह शांति दोष दूर हो जाएगा।

    मंगलः मंगल की शांति के लिए सोंठ, सौंफ, लाल चंदन, के फूल पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    बुधः बुध की शांति के लिए बहेड़ा, चावल, आंवला, और शहद को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    गुरुः गुरु की शांति के लिए मुलेठी, सफेद सरसों को पानी में डालकर स्नान करना चाहिए।

    शुक्रः शुक्र ग्रह की शांति के लिए हड़,बहेड़ा, आंवला, इलायची, केसर पानी में डालकर स्नान करें।

    राहुः राहु की शांति के लिए नागबेल, लोबान, तिल के पत्र को पानी में डालकर स्नान करने से ग्रह शांति दोष से मुक्ति मिल जाती है।

    केतुः केतु की शांति के लिए लोबान, बला, मोथा, प्रियंगु को पानी में डालकर स्नान करें।

Source: Spiritual Hindi News & Rashifal in Hindi 2014

Vaastu light colors to paint the house is so good

घर का वास्तु ठीक हो तो आपको परेशानियां स्पर्श भी नहीं कर सकती हैं। इन आसान से वास्तु टिप्स को आजमाकर आप हमेशा खुशी और हर्षोउल्लास से अपनी ज़िंदगी को और भी ज्यादा बेहतर तरीके से जी सकते हैं।

1. घर के मुख्य द्वारा की सजावट करें ऐसा करने से आपके धन की वृद्धि होती है।

2. घर की खिड़कियों में सुंदर कांच लगाएं, आपके संबंधों में मधुरता आएगी।

3. घर में दर्पण कुछ इस तरह से लटकाएं कि उसमें लॉकर या केश बॉक्स का प्रतिबिम्ब बने ऐसा करने से आपकी धन दौलत और शुभ अवसरों पर दो गुनी वृद्धि होती है।

4. अपने मास्टर बेडरूम को हल्के रंगों से पेंट करना चाहिए जैसे समुंदरी हरा, हल्का गुलाबी और हल्का नीला ये वो रंग हैं जो बेडरूम के लिहाज से अच्छे रहते हैं।

5. घर में रखी बेकार की वस्तुओं को समय-समय पर फेंकते रहना चाहिए। क्यों कि वास्तु के अनुसार घर में पड़ी वस्तुओं से प्रेम में बाधा पहुंचती है।


Tuesday, 3 June 2014

If you are a religious people always remain depression

विज्ञान ने भी यह साबित किया है कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोग अवसाद का शिकार कम होते हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसे लोगों के मस्तिष्क की बाहरी सतह यानी कॉर्टेक्स मोटी होती है। अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में यह जानकारी सामने आई है।

शोध का नेतृत्व कर रही डॉ माइरना वाइजमैन कहती हैं, 'हमारा मस्तिष्क हमारे विचारों और मनोदशाओं का आईना होता है। इमेजिंग की नई तकनीक से यह सब कुछ देखना संभव हुआ है। हमारा मस्तिष्क एक असाधारण अंग है, जो न सिर्फ हम पर नियंत्रण रखता है बल्कि हमारी मनोदशाओं से नियंत्रित भी होता है।'

नए शोध से पता चलता है कि मस्तिष्क की बाहरी सतह की मोटाई और आध्यात्मिकता में गहरा रिश्ता है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि जिन लोगों के मस्तिष्क के कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है वे आध्यात्मिक भी होते हैं।

यह तय है कि जो धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं उनके कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है। पता चला है कि जो लोग अवसाद का शिकार होते हैं उनके कॉर्टेक्स की सतह धार्मिक लोगों के मुकाबले पतली होती है।

इस शोध में ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनके माता-पिता या दादा-दादी अवसाद से संबंधित पहले के अध्ययन में शामिल थे। इनमें से कुछ के परिवार में अवसाद पीढ़ीगत बीमारी के रूप में थी। इस समूह की तुलना ऐसे लोगों के साथ की गई, जिनमें अवसाद के कोई लक्षण नहीं थे।

जिन बातों को हम पहले से जानते हैं, उन पर विज्ञान की मुहर लगती है तो उनमें हमारा विश्वास और प्रबल होता है।

Nirjla Ekadashi

एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्यास्त तक पानी न पीने का विधान होने के कारण इस एकादशी कहते हैं। वैसे तो एक महीने में दो बार एकादशी आती है। शास्त्रों में एकादशी का व्रत करने का विधान बताया गया है।

स्वास्थ्य, दीर्धायु, सामाजिक सुख तथा मोक्ष फल की प्राप्ति में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन आमरस दान करने के कारण इसे आम एकादशी भी कहते हैं।

ऐसे करें व्रत

ज्येष्ठ माह की में आने वाला निर्जला एकादशी व्रत के दिन पानी भी नहीं पीना चाहिए। इसलिए यह व्रत श्रमसाध्य होने के साथ संयम के साथ करना चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि वह जल को कलश से भरे। सफेद वस्त्र से उसे ढक दे। ढक्कर पर चीनी और दक्षिणा रख कर ब्राह्मणों को दान करें।

महिलाएं नथ पहनकर, ओढनी ओढ़ कर, मेंहदी लगाकर विधिपूर्वक शीतल जल से भरा मिट्टी का घड़ादान कर अपनी सास या अपने से बड़े लोगों के चरण स्पर्श करें।

एकादशी का व्रत करके अपने सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र, आम और अन्य फलों का दान करना चाहिए। इस दिन निर्जल व्रत को बहुत महत्व माना गया है। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर एकादशियों का लाभ प्राप्त होता है।

व्रत की कथा

एक दिन महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी का व्रत का विधान और फल बताया। इस दिन भोजन करने के दोषों की जब वे चर्चा करने लगे तो भीमसेन ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि इस दिन जब सारे लोग अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगे तो ये व्रत मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं तो बिना खाए-पीए नहीं रह सकता है। इसलिए मुझे कओ ऐसा व्रत बताइए जिसको करने के बार मुझे सारी एकादशियों का फल मिल जाए।

महर्षि व्यास जानते थे कि भीमसेन के उदम में वृक नामक अग्नि है। इसलिए अधिक भोजन करने पर भी उसकी भूख शांत नहीं होगी। भीमसेन के इस प्रकार के भावों को समझकर महर्षि व्यास ने आदेश दिया कि- भीम तुम ज्येष्ठ शुक्ल की एकादशी जिसे निर्जला एकादशी का व्रत अगर करो।

इस व्रत में आचमन में पानी पीने से दोष नहीं होता। इस दिन अन्न न खाकर, जितने पानी में एक माशा सोने की मुद्रा डूब जाए उतना ही अन्न ग्रहण करो। तो ऐसे में तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा और तुम्हें पूरी एकादशियों का पुण्य मिलेगा। इसलिए निर्जला एकादशी को एक किंवदंती के अनुसार भीमसेनी एकदशी भी कहते हैं।

Strange here amazing temple

भारत विभिन्न धर्मों का देश है। यहां हर संस्कृति और धर्म को आश्रय प्राप्त है। यहां लगभग सभी धर्मों में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और अन्य तीर्थ स्थल मिल जाएंगे। देश में कुछ ऐसे भी मंदिर हैं जो अद्भुत हैं अपने नाम से या वहां की जानी वाली पूजा से उन्हीं में से हैं ये मंदिर...

ओम बन्ना मंदिर

राजस्थान के जोधपुर में ओम बन्ना का मंदिर अन्य सभी मंदिरों से बिल्कुल ही अलग है। ओम बन्ना मंदिर की विशेषता है कि इसमें पूजा की जाने वाले भगवान की मूर्ति नहीं है बल्कि एक मोटरसाइकिल और उसके साथ ही ओम सिंह राठौर की फोटो रखी हुई है, लोग उन्हीं की पूजा करते हैं।

मोटरसाइकिल के बारे में कहा जाता है कि इसी मोटरसाइकिल से 1991 में ओम सिंह का एक्सिडेंट हो गया था। एक्सिडेंट में ओम सिंह की तत्काल मौत हो गई। लोकल पुलिस मोटरसाइकिल को पुलिस थाने लेकर चली गई लेकिन दूसरे दिन मोटरसाइकिल वापस एक्सिडेंट वाली जगह पर पहुंच गई।

चाइनीज काली मंदिर

कोलकाता के टांगरा में एक 60 साल पुराना चाइनीज काली मंदिर है। इस जगह को चाइनाटाउन भी कहते हैं। इस मंदिर में स्थानीय चीनी लोग पूजा करते हैं। यहीं नहीं दुर्गा पूजा के दौरान प्रवासी चीनी लोग भी इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। यहां आने वालों में ज्यादातर लोग या तो बौद्ध हैं या फिर ईसाई। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां आने वाले लोगों को प्रसाद में नूडल्स, चावल और सब्जियों से बनी करी परोसी जाती है।

कावी में स्थित स्तंभेश्वर महादेव मंदिर

आप यह कल्पना नहीं कर सकते लेकिन यह बात सच है कि यह मंदिर पल भर के लिए ओझल हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद अपने उसी जगह वापिस भी जाता है। यह मंदिर अरब सागर के बिल्कुल सामने है और वडोदरा से 40 मील की दूरी पर है। खास बात यह है कि आप इस मंदिर की यात्रा तभी कर सकते हैं जब समुद्र में ज्वार कम हो। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है।

Life is so beautiful then why suicide

मध्यप्रदेश के इंदौर में एक ही दिन में 6 लोगों के आत्महत्या कर ली। कारण अलग-अलग थे। बड़ी वजह परिवार का दबाव, बहुत ज्यादा नकारात्मकता और मानसिक तनाव था।

हर तरफ चर्चा है कि ऐसा क्यों हो रहा है और आज की पीढ़ी को इससे कैसे रोका जा सकता है? आमतौर पर देखा जाता है कि यदि आप धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्ति हैं तो इस तरह के विचार आप के मन में कभी नहीं पनपेंगे और आप इस तरह का कोई कदम नहीं उठाएंगे। यह बात शास्त्रों में तो पहले ही लिख दी गई थी, इसे अब विज्ञान भी मानता है।

दरअसल आधुनिक समाज में धर्म एवं धार्मिक भावना कम हो रही है। ऐसे में आत्महत्या जैसी बुराई के निवारण के लिए आवश्यक है कि ईश्वर भक्ति, योगा, चिंतन, मनन जैसे क्रियाकलाप रोज किए जाएं। ऐसा करने से आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा और आत्महत्या जैसे बुरे विचार आपके मस्तिष्क को छू भी नहीं पाएंगे।

वर्तमान दौर में किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति को असफलता सहज स्वीकार्य नहीं होती। किंतु यह स्थिति, किशोरावस्था व युवावस्था में बेहद संवेदनशील होती है। जब किसी युवा को लगने लगता है कि वह अपने अभिभावकों के स्वप्न को साकार नहीं कर पाएगा तो वह नकारात्मक सोच में डूब जाता है और इस तरह की परिस्थिति उसे कहीं न कहीं उसे आत्महत्या के लिए विवश करती है।

ज्योतिष की नजर से...

अहमदाबाद के ज्योतिषी व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा और चंद्रमा को मनु का कारक माना गया है। अष्टम चंद्रमा नीच राशि में अथवा राहु को शनि के साथ विष योग और केतु के साथ ग्रहण योग उत्पन्न करता है। ऐसे समय में मनुष्य की सोचने समझने में शक्ति कम कर देता है। उसकी वजह से वो अपनी निर्णय शक्ति खो देता है। अगर 12वें भाव में ऐसी युति होने पर फांसी या आत्महत्या का योग बनता है। इसी तरह अनन्य भाव में अलग- अलग परिणाम उत्पन करता है।

बचने के ये उपाय भी हैं कारगर

शास्त्रों में इससे बचने के लिए शिव स्तुति, महामृत्युंजय मंत्र, शिवकवच, देवीकवच और शिवाभिषेक सबसे सहज सरल और प्रभावी उपाय हैं। किसी भी ग्रह के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए शुभ ग्रह की स्तुति और नीच ग्रह का दान श्रेष्ठ रहता है।

जिन्हें आत्महत्या के विचार आते हों, ऐसे व्यक्तियों को मोती एवं स्फटिक धारण करना चाहिए, और नियमित भगवान शिव का जलाभिषेक करना लाभप्रद रहते हैं। इसके अलावा पांच अन्न(गेहूं, ज्वार, चावल, मूंग,जवा और बाजरा) दान करना चाहिए। इसके साथ ही पक्षियों को इन अन्न के दाने भी खिलाना चाहिए।

आत्महत्या का कारण वास्तु भी?

जिस घर में आत्महत्या होती है, उस घर में दो या दो से अधिक वास्तुदोष अवश्य होते हैं। इनमें से एक दोष घर के ईशान कोण (पूर्व- उत्तर) में होता है और दूसरा दक्षिण पश्चिम में होता है। घर में दक्षिण पश्चिम जगह कोण के वास्तुदोष जैसे भूमिगत पानी की टंकी, कुआं, बोरवेल, बेसमेंट या किसी भी प्रकार से इस कोने का फर्श नीचा हो।

इस दोष के साथ यदि उस घर के पश्चिम र्नैत्य कोण में मुख्य द्वार हो तो घर के पुरूष सदस्य के साथ और यदि मुख्य द्वार दक्षिण र्नैत्य कोण में हो तो उस घर की स्त्री द्वारा आत्महत्या की संभावना बलवती हो जाती है।

दूसरा वास्तुदोष घर के ईशान कोण में होता है। जैसे - घर का यह कोना अंदर दब जाए, कट जाए, गोल हो जाए या किसी कारण पूर्व आग्नेय (ईस्ट आफ साऊथ ईस्ट) की ओर दीवार आगे बढ़ जाए तो घर के पुरूष सदस्य द्वारा और यदि उत्तर वायव्य (नार्थ आफ द नार्थ वेस्ट) की दीवार आगे बढ़ जाए तो घर की स्त्री सदस्य द्वारा आत्महत्या की जा सकती है।

इसी प्रकार घर के दक्षिण र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां और पश्चिम र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो पुरूष उन्माद जैसे रोगों के शिकार होंगे और कहीं-कहीं वे आत्महत्या भी कर सकते हैं व पूर्व आग्नेय कोण ढंके तो पुरूष द्वारा और उत्तर वायव्य ढंके तो भी स्त्री द्वारा आत्महत्या करने की संभावना बन जाती है। उपरोक्त आत्महत्याओं जैसी दुःखद घटनाओं से बचने का एकमात्र उपाय है कि, घर के वास्तुदोषों को दूर किया जा सकता है।

कहता है विज्ञान

इंदौर के मनोचिकित्सक डॉ. अभय जैन बताते हैं कि आत्महत्या का मूल कारण दरअसल डिप्रेशन है। आत्महत्या के मानसिक, सामाजिक, साइकोलॉजिकल, बायोलॉजिकल एवं जेनेटिक कारण होते हैं। ऐसे व्यक्ति जिनमें आत्महत्या के जीन होते हैं, उनमें बायोकेमिकल परिवर्तन हो जाते हैं और वह आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाते हैं।

इसके कई कारण होते हैं जैसे तनावपूर्ण जीवन, घरेलू समस्याएं, मानसिक रोग आदि। जिन लोगों में आत्महत्या के बारे में सोचने की आदत (सुसाइडल फैंटेसी) होती है, वही आत्महत्या ज्यादा करते हैं। नकारात्मकता आत्महत्या की बहुत बड़ी वजह हैं क्योंकि इस समय आप सही सलाह नही ले पाते। वहीं आत्महत्या का विचार करने वाले लोग यदि धर्म और अध्यात्म का सहारा लें तो इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।

युवावस्था संक्रमण काल है, युवाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खासतौर से कॅरियर, जॉब, रिश्ते, खुद की इच्छाएं, व्यक्तिगत समस्याएं जैसे लव अफेयर, मैरिज, सैटलमेंट, भविष्य की पढ़ाई आदि।

जब वह इस अवस्था में आता है, तो बेरोजगारी का शिकार हो जाता है और भविष्य के प्रति अनिश्चितता बढ़ जाती है। अपरिपक्वता के कारण कई बार परेशानियां आती हैं। जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, सायकोसिस, पर्सनालिटी डिसऑर्डर की स्थिति बन जाती है।

महत्वपूर्ण तथ्य

आत्महत्या पर पहली संस्थागत रिसर्च 1958 में लॉस एंजिल्स में हुई थी।

आत्महत्या, दुनिया में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण है।

किशोरावस्था और 35 वर्ष से कम आयुवर्ग में आत्महत्या, असमय मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है।

हर साल दुनिया में एक से दो करोड़ से भी ज्यादा लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी मौत नहीं होती।