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Wednesday, 9 April 2014

Sri rama navami special article

राम के चरित्र की खूबियों के महासागर से यदि आज व्यक्ति मुट्ठी भर बातों का भी पालन करे तो देश में पनप रही तमाम बुराइयों का समाधान अपने आप ही संभव हो जाएगा। भारत की भाषाओं के साथ ही विदेशी भाषाओं में भी रामायण का अनुवाद हुआ है। भारत की लगभग हर लोक परंपरा में राम के जीवन और किंवदंती का उल्लेख मिलता ही है।

आलेख का शीर्षक स्वदेश फिल्म के गीत 'राम तेरे मन में हैं राम मेरे मन में हैं, मन से रावण जो निकाले राम उसके मन में हैं' की वो पंक्तियां हैं जिन्हें जावेद अख्तर ने राम की छवि को मर्यादा पुरुषोत्तम से भी आगे ले जाते हुए करुणा तथा शांति के प्रतीक के तौर पर लिखीं हैं। आज के इस अशांति और अराजकता के माहौल में राम की यह छवि और ज्यादा प्रभावित और प्रेरित करती है।

राम एक आदर्श शासक

देश में जब असत्य, लोभ, अहंकार की भावनाएं अपने उबाल पर हों, तब एक बार फिर राम जैसे अवतारी पुरुष की जरूरत महसूस होती है। हालांकि ईश्वरीय अवतारों में विश्वास न करने वाला पक्ष इस बात पर हंस भी सकता है और रामकथा को महज मिथक मानकर सिरे से खारिज भी कर सकता है।

यदि इन बातों को नजरअंदाज करते हुए सिर्फ राम के व्यक्तित्व का विश्लेषण किया जाए तो समकालीन परिस्थितियों में राम हमारे लिए और भी प्रसांगिक हो जाते हैं। आदर्श शिष्य, आदर्श पुत्र, आदर्श मित्र, आदर्श शासक और एक समाज सुधारक के रूप में राम हमेशा उल्लेखनीय हैं।

राम का चरित्र संपूर्णता का पर्याय रहा है। राम ने अपने संपूर्ण जीवन में अनुशासित और मर्यादित रहते हुए सदैव सत्य और न्याय की बात कही है। राम के चरित्र की खूबियों के महासागर से यदि आज व्यक्ति मुट्ठी भर बातों का भी पालन करें तो देश में पनप रहीं तमाम बुराइयों का समाधान अपने आप ही संभव हो जाएगा। राम पारिवारिक और सामाजिक जीवन की दृष्टि से भी हमारे समक्ष उच्चतम आदर्श स्थापित करते हैं।

राम एक आदर्श शिष्य

राम अपने गुरु विश्वामित्र की सेवा में सदैव तत्पर रहे हैं। सीता स्वयंवर के समय राम गुरु से आज्ञा मिलने के उपरांत ही खड़े हुए और उन्हें प्रमाण करके ही धनुष उठाने को गए। तुलसीदास जी रामायण में लिखते हैं कि...

'गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा।

द्वार जाय पद नावउ माथा।।

सादर अरघ देइ घर आने।

सोरह भांति पूजि सनमाने।।

गहे चरन सिय सहित बहोरी।

बोले राम कमल कर जोरी।

गुरु के आगमन की सूचना मिलते ही राम सीता के साथ द्वार पर आकर गुरु का सम्मान करते हैं।अगले दोहे में तुलसीदासजी लिखते हैं कि गुरु के घर आने पर राम प्रसन्नता व्यक्त करते हुए घर के पवित्र होने की बात कहते हैं। साथ ही राम यह भी कहते हैं कि आप समाचार भेज देते तो मैं स्वयं उपस्थित हो जाता। इस तरह गुरु से भावनात्मक जुड़ाव और सम्मान की सीख है। वर्चुअल माध्यमों से शिक्षा ग्रहण करने वाली पीढ़ी के लिए नैतिक मूल्यों की शिक्षा के लिए राम एक श्रेष्ठ आदर्श हैं।

राम एक आदर्श पुत्र

समस्त पौराणिक आख्यानों में राम एक आदर्श पुत्र सिद्ध हुए हैं। माता कैकयी के 14 वर्ष के वनवास की मांग को पूरा करने के लिए पिता दशरथ के आदेश पर राम सहर्ष वनवास जाने को तैयार हो गए। इस क्रम में ही वे माता कैकयी से कहते हैं, 'सुन जननी सोइ सुत बड़ भागी, जो पितुमातु वचन अनुरागी'।

वनवास जाने के पहले भी राम भरत को माता-पिताकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखनेकी प्रार्थना करते हैं। अपना राज-पाट भी भरत को सौंप देते हैं। माता-पिता के लिए त्याग की बात तो दूर, वर्तमान में लोग संयुक्त परिवार में रहने से भी कतराने लगे हैं। अत: ऐसे लोगों के लिए राम का चरित्र महानता की पराकाष्ठा है।

राम एक आदर्श शासक राम का चरित्र एक आदर्श राजा के रूप में भी हमारे समक्ष उभरता है। राम की अवधारणा थी कि जिस राजा के शासन में प्रजा दु:खी रहती है, वह नृप अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है।

राम एक आदर्श भाई

राम का अपने भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से भीगहरा प्रेम था। मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण के घायल होने पर राम अत्यंत भावुक हो उठे थे। सीता की रक्षा केलिए भाई के प्राण जाने की आशंका मात्र से उनका मनग्लानि से भर उठा।

भरत पर भी राम का अपार स्नेह था। भरत जब राम को लौटा लाने के लिए चित्रकूट पहुंचे तो राम ने उन्हें कर्तव्य की बात कहते हुए प्रेम से समझाया और निवेदन करने पर अपनी दोनों खड़ाऊ देकर प्रेम से विदा किया। भाई-भाई के आपस में विवाद और आपस में बढ़ती दूरियों के दौर में, मनमुटाव रखने वाले भाइयों के लिए राम का भ्रातृप्रेम एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

राम पर्यावरण हितैषी

चित्रकूट प्रवास के के दौरान राम ने वहां मौजूद वन्य-जीवों सेमित्रवत व्यवहार रखा। रामायण में तुलसीदासजी लिखते हैं कि हाथी, सिंह, बंदर और हिरण ये सभी बैर छोड़कर साथ-साथ विचरण करते थे। शिकार के लिए घूमते हुए पशुओं के समूह श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर विशेष आनंदित होते थे। राम ने अपनी सेना में वानर और पशुओं को भी सम्मान दिया।

पर्यावरण को सहेजना तो आज की पहली प्राथमिकता में शामिल हो जाना चाहिए। राम एक आदर्श मित्र और समाज सुधारक राम ने अपने जीवन में मित्रता की भी मिसाल पेश की है। विभीषण और सुग्रीव का उन्होंने हर परिस्थिति में साथ निभाया।

राम अपने संपूर्ण जीवन काल में छुआछूत, अस्पृश्यता और वर्ग भेद से परे रहे। छोटे-बड़े सभी के साथ राम ने समान व्यवहार रखा। शबरी के जूठे बेर भी राम ने स्नेह ग्रहण किए तो राम ने केवट को भी कृतार्थ किया। दोस्ती में स्वार्थ और बढ़ते जातिवाद को मिटाने के लिए राम एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं।



Tuesday, 8 April 2014

Worship meet siddhiratri eight siddhian

नवरात्रि के नवें दिन सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है। इनकी उपासना करने से अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा,प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वसित्व आठ सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से ये सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।

सिद्धिदात्री देवी की उपासना से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। देवी मां के दाहिने तरफ नीचे हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। मां की साधना करने से लौकिक, परलौकिक की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

फल की प्राप्ति

मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करना चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

इस मंत्र की करें स्तुति

सिद्धगंधर्वयक्षाद्घैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

Tuesday, 1 April 2014

God is formless of has a form

पूरी दुनिया में विद्वान लोग ईश्वर के प्रति एक खास नजरिया रखते हैं। उनका सोचना है कि ईश्वर निराकार है। हम उसे वैसे नहीं देख सकते हैं, जैसे अपने को आईने में देखते हैं। ईश्वर पूरी तरह से बोध का मामला है। जो उस बोध से गुज़रता है, वही बुद्ध हो जाता है।

सरल लोग, जिनकी दुनिया उनकी रोजी-रोटी के इर्द-गिर्द मंडराती रहती है, वे ईश्वर को निराकार नहीं मानते। उनका खयाल है कि ईश्वर हमारी तरह ही कहीं होगा और वहीं से हमारे ऊपर नज़र रख रहा होगा। यही बात दर्शन और पौराणिक शब्दावली में कही जाए तो ईश्वर सगुण है।

ठीक वैसे ही जैसे हम लोग सगुण हैं। वहीं विद्वानों ने ईश्वर को निर्गुण बना रखा है-निरगुनिया। अब यह दर्शन का बड़ा महत्वपूर्ण द्वंद्व है। इस पर बड़ी बहसें हुई हैं। कई सिद्धांतों का प्रतिदान किया गया है। ईश्वर निराकार भी है और साकार भी। ईश्वर निर्गुण भी है और सगुण भी है। भारतीय धर्मों में इसे बहुत शांत तरीके से बताया गया है।

अगर भगवान साकार हैं, सगुण हैं तो उनके लिए ईश्वर शब्द चुना है। ब्रह्म का केवल बोध किया जा सकता है। यही बोध आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा होगा, जिसे हम परमतत्व या अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। यहां ईश्वर हमारे बहुत करीब आ जाता है और हम उसे थोड़ा नीचे ले आते हैं।

जब ईश्वर थोड़ा और नीचे आता है तो अवतार के रूप में आ जाता है-कभी राम बनकर, कभी श्याम बनकर। यहां से एक आम आदमी के लिए ईश्वर के साथ तादात्म्य बैठाना और सरल हो जाता है।

पूरी दुनिया में भक्ति की मदद से ईश्वर की निकटता आम आदमी के लिए बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आने वाली बात हो जाती है। अवतार की थ्याेरी ईश्वर का सरलीकरण है। ईश्वर और आध्यात्मिकता से संबंधित जितने प्रतीक हैं उन पर भी गाैर करना चाहिए। ईश्वर को अगर वाणी में व्यक्त करें तो वह 'ऊँ' होगा।

अगर आंखों से देखने वाली किसी ऑब्जेक्टिव चीज़ के रूप में व्यक्त करें तो वह प्रकाश होगा। यहां तक तो सब ठीक होगा, लेकिन जो निराकार हो, जिसका कोई आकार ही नहीं है जो दिखता ही नहीं है, फिर उसे कैसे व्यक्त करेंगे? लेकिन भारतीय आध्यात्मिकता ने निराकार को भी व्यक्त करने के कुछ तरीके सोचे होंगे। हमारी आध्यात्मिक परंपरा में 'ध्यान या मेडिटेशन' निराकार को व्यक्त करता है।

इस तरीके को ही हम ध्यान या मेडिटेशन के नाम से जानते हैं। अगर आप भगवान के करीबी शिष्यों में शामिल होना चाहते हैं तो आपको उनके निराकार स्वरूप का बोध करना पड़ेगा, जो आप केवल मेडिटेशन से हासिल कर सकते हैं।

Kanya puja is done

नवरात्र में हवन करने के बाद कन्या पूजन करने का महत्तव है। बड़े पर्वों पर, पुण्य मुहूर्त में और महानवमी के दिन कन्या पूजन का बहुत महत्व माना गया है।

वेदों में कुंआरी कन्याओं को साक्षात् देवी का स्वरूप माना गया है। कन्या पूजन से सम्मान, लक्ष्मी, विद्या और तेज की प्राप्त होता है। कन्याएं विघ्न, भय और शत्रु का नाश करती हैं

शास्त्रों के अनुसार ये हैं कन्याएं

दो वर्ष कन्या की कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की बालिका, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शाम्भरी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलती हैं।

ग्यारह वर्ष से ऊपर की अवस्था की कन्याओं का पूजन वर्जित माना जाता है। कहा जाता है कि होम, जप, और दान से देवी इतनी प्रसन्न नहीं होती जितनी कि कन्या पूजन से होती हैं।

दुःख, दरिद्रता और शत्रु नाश के लिए कन्या पूजन सर्वोत्तम माना गया है। यह कोई आवश्यक नही कि नौ कन्याओं का ही पूजन किया जाए एक कन्या का पूजन भी उतना फलदायक होता है जितनी नौ कन्याओं का।

Here is why our great new year

भारतवर्ष में नया साल गुडी पडवा यानी संवत्सरी पडवा से ही माना जाता है। नए साल के इस पहले दिन को महाराष्ट्र व मध्यभारत् में गुडी पडवा, कर्नाटक व आंध्रप्रदेश में उगाडी, तमिलनाड़ू में पुथांडू, असम में बीहू, पंजाब में बैसाखी, उडीसा में पाना संक्रांत् व पश्चिम बंगाल में नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय संस्कृति में सृष्टि का आरंभ और नए साल का प्रारंभ क् जनवरी से नहीं, बल्कि चैत्र शुल प्रत्पिदा यानी गुडी पडवा पर्व से होना माना गया है। तर्क संगत बात ये है कि नए साल का शुभारंभ इसी दिन से माने जाने के पीछे कई पौराणिक व वैज्ञानिक त्थ्य हैं।

समूचे सौरमण्डल एवं धरामण्डल की इसी सच्चाई कव् कारण पाश्चात्य जगत् को भी अपने कैलेण्डर वर्ष् (१ जनवरी से ३१ दिसंबर) में बाद में संसोधन करना पडा और वित्तीय वर्ष (अप्रैल से मार्च के बीच) माना गया। यह वित्तीय वर्ष भारतीय चैत्री वर्ष लगभग समरूप ही है।

पृथ्वी प्राकृतिक फसल चक्र की ही नहीं बल्कि सपूर्ण सौरमण्डल में भी आज (चैत्र शुल प्रत्पिदा) से ही कालचक्र कव् परिवर्त्न और नए वर्ष का प्रारंभ का संकव्त् मिलता है। यही कारण है कि हमारे सूक्ष्मदर्शी खगोल एवं दर्शन शास्त्री वैज्ञानिक दृष्टि सपन्न ऋषियों ने सृष्टि संवत्, द्वापर श्रीकृष्ण संवत्, कलियुग संवत्, शक संवत्, विक्रम संवत् आदि इसी दिन से प्रारंभ होना माना है।

यहां ये समझना जरूरी है कि जब हमारा वार्ष्कि कैलेंडर इत्ना शास्त्रसम्मत, तर्कसंगत और प्रकृति सम्मत है तो फिर हमारे देश में पाश्चात्य कैलेंडर का इत्ना प्रभुत्व कैसे हो गया? इसका जवाब अंग्रेजों के शासन में मिलता है। दरअसल, अंग्रेजों ने भारत् सहित् तमाम औपनिवेशिक देशों में अपने शासन काल के दौरान अंग्रेजी पद्धति के गेगेरियन कैलेण्डर को अपनी साथ व चतुराई के बल पर लागू कर दिया। भारत् में तो इसे अंग्रेजी शासन के कई सालों के दौरान जबरन थोपा गया।

धीरे-धीरे कालगणना का यह चक्र हम भारतीयों की आदत में समावीष्ट हो गया और हम जनवरी से दिसंबर की अवधि को ही वर्ष मानने लगे।

सवाल यह है कि अपनी कालगणना में ही शामिल हो गए गुलामी कव् इस चिह्न को हम कब तक स्वाभिमान शून्य रहकर ढ़ोते रहेंगे? विज्ञानसम भारतीय काल गणना को अपने स्वदेशी गौरव के लिये हमें इस गुलामी के चिह्न को हटाना और अपनी स्वदेशी समृद्ध सर्वेष्ठ काल गणना (भारतीय पंचांग) का प्रयोग प्रचलन में लाना नितांत आवश्यक है। साथ ही हमें नए साल के प्रारंभ के रूप में गुडी पडवा पर्व को उत्सव के रूप में मनाने में भी गौरव का अनुभव करना चाहिये।

Monday, 31 March 2014

Mysterious shiva temple in ramgarh

झारखंड के रामगढ़ जिला में स्थित भगवान शिव का एक ऐसा रहस्मयी शिवमंदिर है, जिसके बारें में जानने के बाद हर श्रद्धालु इस मंदिर में एक बार जरूर जाना चाहता है।

यूं तो भगवान शिव को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन यहां आज भी भगवान के चमत्कार कभी-कभी देखने को मिल जाते हैं।

कहते हैं जब इस मंदिर की जानकारी अग्रेजों को हुई और उन्होंने यहां होने वाले चमत्कार को अपनी आंखों से देखा तो वह देखकर हैरान हो गए थे। इस तरह घटनाक्रम अकसर होने पर लोगों में भगवान के प्रति आस्था और मजबूत हो गई है।

यही वजह है कि इस मंदिर के बारे में लोग दूर-दूर से यहां दर्शन के लिए आते हैं। इस शिवमंदिर को पहले से ही टूटी झरना मंदिर के नाम से जानते हैं।

मंदिर में मौजूद शिवलिंग पर स्वतः 24 घंटे जलाभिषेक होता रहता है। दिलचस्प है कि यह जलाभिषेक कोई और नहीं बल्कि खुद मां गंगा निर्मल जल से करती हैं।

दरअसल शिवलिंग के ऊपर मां गंगा की एक प्रतिमा स्थापित है जहां से जल की धारा उनकी हथेलियों से होता हुआ शिवलिंग पर गिरता है। यह आज भी रहस्य बना हुआ है कि आखिर इस पानी का स्त्रोत कहां है?

When spring turns the water of temple

कश्मीर स्थित खीर भवानी मंदिर श्रीनगर से महज 27 किलोमीटर दूर तुल्ला मुल्ला गांव में स्थित है। इस मंदिर में मां को खीर प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है इसलिए इस मंदिर को खीर भवानी मंदिर कहा जाता है।

यहां खीर का एक विशेष महत्त्व है और इसका इस्तेमाल यहां प्रमुख प्रसाद के रूप में किया जाता है। मान्यता है कि अगर यहां मौजूद झरने के पानी का रंग बदल कर सफ़ेद से काला हो जाए तो पूरे क्षेत्र में अप्रत्याशित विपत्ति आती है।

मां दुर्गा को समर्पित इस मंदिर का निर्माण एक बहती हुई धारा पर किया गया है। इस मंदिर के चारों ओर चिनार के पेड़ और नदियों की धाराएं हैं, जो इस जगह की सुंदरता पर चार चांद लगाते हुए नज़र आते हैं।

ये मंदिर, कश्मीर के हिन्दू समुदाय की आस्था को बखूबी दर्शाता है। खीर भवानी देवी के मंदिर को कई नामों से जाना जाता है जैसे 'महाराग्य देवी', 'रग्न्या देवी', 'रजनी देवी', 'रग्न्या भगवती' मंदिर अन्य नाम भी प्रचलित हैं।

इस मंदिर का निर्माण 1912 में महाराजा प्रताप सिंह द्वारा करवाया गया जिसे बाद में महाराजा हरि सिंह द्वारा पूरा किया गया। इस मंदिर की एक ख़ास बात यह है कि यहां एक षट्कोणीय झरना है जिसे यहां के मूल निवासी देवी का प्रतीक मानते हैं।

किंवदंती है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने इस मंदिर में चौदह वर्ष के वनवास के समय पूजा की थी। वनवास की अवधि समाप्त होने के बाद भगवान हनुमानजी को एक दिन अचानक यह आदेश मिला कि वो देवी की मूर्ति को स्थापित करें।

हनुमानजी ने प्राप्त आदेश का पालन किया और देवी की मूर्ति को इस स्थान पर स्थापित किया, तब से लेकर आज तक मां की मूर्ति इसी स्थान पर है।

Chaitra navratri will accompany the launch of the hindu new year

भारतीय सनातन धर्म में नववर्ष का शुभारंभ सोमवार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से हो रहा है। इसी दिन देवी आराधना का पर्व चैत्र नवरात्र का शुभारंभ होगा। नौ दिनों में रोजाना देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना होगी। पहले दिन शैलपुत्री की आराधना होगी। घरों-मंदिरों में शक्ति उपासना के लिए विशेष मुहूर्तोंमें घट स्थापित किए जाएंगे। महापर्व की शुरुआत देवी के शैल पुत्री स्वरूप की आराधना से होगी।

41वां नामक संवत्सर

हिंदू नव वर्ष विक्रम संवत् 2071 एवं संवत्सरों की श्रृंखला का 41वां नामक संवत्सर होगा। इस तिथि से विक्रम संवत् का प्रारंभ भी होता है। मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारंभ किया था। ग्रंथों के अनुसार उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के राजा विक्रमादित्य ने इसी तिथि से कालगणना के लिए विक्रम संवत् का प्रारंभ किया था। जो आज भी हिंदू कालगणना के लिए सर्वाेत्तम माना जाता है।

अबूझ मुहूर्त

हिंदी पंचाग काल गणना का प्रथम माह चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा अर्थात गुड़ी पड़वा जिसे अबूझ मुहूर्त बताया है अर्थात बिना पंचांग देखे ही कोई भी शुभ कार्य इस दिन प्रारंभ कर सकते हैं। भगवान विष्णु का प्रथम मत्स्यावतार भी इसी दिन हुआ है।

60 साल बाद आया परिवर्तन

ज्योतिषाचार्य पं. धर्मेंद्र शास्त्री के अनुसार सन् 1953 के बाद 2014 में 19 जून से 2 नवंबर तक न्याय व धर्म के प्रतीक ग्रह शनि तुला व गुरू कर्क दोनों ही अपनी-अपनी उच्च राशि में होंगे। 60 साल कई अनुठे शुभ परिवर्तन होंगे एवं गुरु कर्क उच्च राशि में आने से किसी भी राशि की कन्या को विवाह में गुरु के 4, 8, 12 होने पर भी कोई अवरोध नही आएगा।

चंद्रदेव निभाएंगे राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की भूमिका

ज्योतिषीय कालगणना के अनुसार प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है और विभिन्न् ग्रह इस संवत् के स्वामी, राजा व मंत्री होते हैं। जिसका असर वर्ष भर जन सामान्य पर दिखाई देता है। आकाशीय सत्ता के लिए ग्रहीय व्यवस्था के हिसाब से राजा, मंत्री और सहायक मंत्रियों का चयन हो चुका है। हिंदू पंचांग के हिसाब से नए साल से आकाशीय सत्ता की डोर चंद्र के हाथ में होगी। चंद्र राजा और मंत्री दोनों ही पदों पर रहेंगे। नये वर्ष राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भूमिका चंद्रदेव निभाएंगे। चंद्र के राजा होने से नववर्ष उत्तम फलदायी होगा।

पांच कार्य शुभ और पांच क्रूर ग्रहों के पास

इस बार आकाशीय सत्ता के पांच कार्य शुभ और पांच क्रूर ग्रहों के पास हैं। संवत्- 2071 राजा- चंद्र, मंत्री- चंद्र, धान्येश- गुरु-पूर्व दिशा, धान्येश- मंगल, मेघेश- सूर्य, रसेश- शनि, दुर्गेश- सूर्य, नीरसेश-बुध,फलेश-सूर्य, धनेश- बुध।

चैत्र नवरात्र में पांच दिन है खास योग-संयोग

ज्योतिषाचार्य पं. जगदीश शर्मा के अनुसार इस बार तीज-त्योहार व शुभ योगों का भी संयोग बन रहा है। अंतिम दिवस नवमी पुष्य नक्षत्र में आने के कारण यह दिन और भी खास हो गया है। प्रतिपदा से नवमी तक देवी के विभिन्न् स्वरूपों की पूजा का विधान है। नवरात्रि के 5 दिन खास योग-संयोग के कारण इस बार पर्व अतिशुभ हो गया है। इन दिनों में श्रद्धालु पूजा-अर्चना, साधना के साथ पुण्यलाभ ले सकते हैं।

पहले दिन गुड़ी पड़वा के दिन घटस्थापना, 1 अप्रैल को चैतीचांद सर्वार्थ सिद्धि योग व अमृत योग, 2 अप्रैल को सौभाग्य सुंदरी योग, 4 को श्रीराम राज्योत्सव, 8 अप्रैल को नवमीं के दिन पुष्य नक्षत्र योग खास होगा।