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Monday, 5 May 2014

Where this temple women can get the children to bed

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला की लड़भडोल तहसील। यहां के सिमसा गांव में सिमसा देवी का एक ऐसा मंदिर है जहां पर निः संतान महिलाएं अगर मंदिर के फर्श पर सो जाएं तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है।

आधुनिक विज्ञान ये भले ही न मानें पर आस्था के बल पर ये संभव है। नवरात्रि के समय इस मंदिर हिमाचल पर्देश के पडोसी राज्यों पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ ऐसी सैकड़ों महिलाएं इस मंदिर आती हैं, जिनकी संतान नहीं होती है।

माता सिमसा या देवी सिमसा को संतान-दात्री के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रों में होने वाले इस विशेष उत्सव को स्थानीय भाषा में सलिन्दरा कहा जाता है। सलिन्दरा का अर्थ है 'स्वप्न आना' होता है।

माना जाता है कि जो महिलाएं माता सिमसा के प्रति मन में श्रद्धा लेकर से मंदिर में आती है माता सिमसा उन्हें स्वप्न में मानव रूप में या प्रतीक रूप में दर्शन देकर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती हैं।

कहते हैं कि कोई महिला स्वप्न में कोई कंद-मूल या फल प्राप्त करती है तो उस महिला को संतान का आशीर्वाद मिल जाता है। देवी सिमसा आने वाली संतान के लिंग-निर्धारण का भी संकेत देती है।

जैसे कि किसी महिला को अमरुद का फल मिलता है तो समझा जाता है पुत्र प्राप्त होगा। अगर किसी को स्वप्न में भिन्डी प्राप्त होती है तो समझा जाता है कि संतान के रूप में कन्या की प्राप्ति होगी। और यदि किसी को धातु, लकड़ी या पत्थर की बनी कोई वस्तु प्राप्त हो तो समझा जाता है कि उसको संतान नहीं होगी।

यह मंदिर बैजनाथ से 25 किलोमीटर और जोगिन्दर नगर से लगभग 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

Who is aghori

अघोरियों का जीवन जितना कठिन है, उतना ही रहस्यमयी भी। इनकी साधना विधि सबसे ज्यादा रहस्यमयी होती है जिसकी अपनी शैली, अपना विधान है, अपनी अलग विधियां हैं।

अघोरी का मतलब होता है घोर नहीं यानी वह बहुत सरल और सहज होते हैं। जिसके मन में कोई भेदभाव नहीं हो। अघोरी हर चीज को समान भाव से देखते हैं। वे सड़ते जीव के मांस को भी उतना ही स्वाद लेकर खा सकते हैं, जितना स्वादिष्ट पकवानों को स्वाद लेकर खाया जा सकता है।

कहते हैं कि अघोरियों की दुनिया निराली है। वे जिस पर प्रसन्न हो जाएं, उसे सब कुछ दे देते हैं। उनकी कई ऐसी बातें हैं, जिसे सुनकर आप हैरान हो सकते हैं।

1. अघोरी किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा किए बगैर नहीं छोड़ते। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं। अधिकांश अघोरियों की आंखें लाल होती हैं, जैसे वो गुस्से में हों, लेकिन उनका मन उतना ही शांत भी होता है। काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी गले में धातु की बनी नरमुंड की माला पहनते हैं।

2. वे अमूमन श्मशान में ही अपनी कुटिया बनाते हैं। वहां एक धूनी जलती रहती है। जानवरों में वो सिर्फ कुत्ता पालना पसंद करते हैं। उनके साथ उनके शिष्य रहते हैं। अघोरी अपनी बात के बहुत पक्के होते हैं। वे अगर किसी से कोई बात कह दें तो उसे जरूर पूरा करते हैं।

3. अघोरी तीन तरह की साधना करते हैं। शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पैरहै। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाई जाती है।

4. शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्मशान साधना। इसमें आम परिवार के लोग भी शामिल हो सकते हैं। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहां प्रसाद के रूप में मांस-मंदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता है।

5. अघोरी गाय का मांस छोड़ कर बाकी सभी चीजें खाते हैं। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है, इसलिए वे श्मशान में रहना ही ज्यादा पंसद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र फलदायक होता है। यहां आमतौर पर लोग जाते नहीं, इसीलिए साधना में विघ्न पड़ने का कोई प्रश्न नहीं उठता। उनके मन से अच्छे-बुरे का भाव निकल जाता है।

6. कम ही लोग जानते हैं कि अघोरियों की साधना में इतना बल होता है कि वो मुर्दे से भी बात कर सकते हैं। ये बातें पढ़ने-सुनने में भले ही अजीब लगें, लेकिन इन्हें पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। उनकी साधना को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती।

Saturday, 3 May 2014

It still sits under the feet of lord hanuman lnkini

महाकाल की नगरी उज्जैन। यहां के अखंड ज्योति मंदिर में बजरंगबली की मूर्ति से लेकर पूजन की बात ही निराली है। जहां एक तरफ बजरंगबली की सिंदूरी प्रतिमा भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है, तो वहीं पांव के नीचे दबी लंकिनी राक्षसी उनके पराक्रम की कहानी सुनाती है।

कहते हैं लक्ष्मण को बचाने के लिए जब हनुमान संजीवनी लेकर आ रहे थे तो लंकिनी नाम की राक्षसी ने उनका रास्ता रोक कर उन्हें जाने से रोका, जिसके बाद हनुमान, लंकिनी को अपने पैरों के नीचे दबाकर आगे बढ़ गए थे। इस मंदिर में महावीर के उसी रूप के दर्शन होते हैं जहां आज भी हनुमान के पैरों तले लंकिनी विराजमान है।

पूरे साज श्रृंगार के साथ बाल ब्रह्मचारी का ये रूप बड़ा ही मनमोहक है। दक्षिणामुखी हनुमान की इस प्रतिमा में उनके एक हाथ में संजीवनी तो कंधे पर गदा सुशोभित होती है। हाथों में बाजूबंद, पांव में पाजेब और कलाई में कड़े पहने हुए महावीर के दिव्य रूप के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

मंदिर के नाम के अनुरूप ही यहां जलता अखंड दिया भक्तों को बजरंबली के चमत्कार की कहानी सुनाता है। वैसे तो देखने में ये मंदिर हनुमान के अन्य मंदिरों की तरह ही है लेकिन मंदिर में सालों से जल रहे अखंड दीये में बजरंगबली की चमत्कारी शक्तियां समाहित हैं।

कहते हैं साढ़ेसाती से परेशान भक्त अगर इस मंदिर में आकर इस अखंड दीये के दर्शन कर लें और मंदिर में आटे का एक दीया जला दें तो शनि के प्रकोप से मुक्ति मिलते देर नहीं लगती।

भक्त हनुमान जी को यहां कई तरह के प्रसाद चढ़ाते हैं. कहते हैं भक्त यहां अपनी मनोकामना प्रसाद के माध्यम से लेकर आते हैं। अगर किसी को झगड़े, मकदमों से छुटकारा चाहिए तो एक नारियल के अर्पण मात्र से उसके तमाम कष्टों का निवारण हो जाता है। ठीक उसी तरह जिन भक्तों को संतान की कामना है वो अपनी शक्ति और भक्ति के अनुसार 1, 2 या 5 किलो तेल अखंड ज्योति में चढ़ाने का संकल्प लेते हैं।

चना-चिरौंजी से प्रसन्न होने वाले हनुमान को यहां विशेषतौर से अखरोट के प्रसाद का भोग लगाया जाता है. कहते हैं जिन भक्तों की मन्नत पूरी होती है वो यहां आकर आटे में गुड़ मिलाकर रोट का प्रसाद तैयार करते हैं और बजरंगबली को भोग लगाते हैं।

मंदिर में प्रतिदिन होने वाली आरती का गवाह बनने के लिए बड़ी संख्या में भक्तों सैलाब उमड़ता है। कहते हैं बल, विद्या और बुद्धि का वरदान पाने के लिए यहां हनुमान के संग उनकी दायीं ओर रखी हुई चंदन की गदा के दर्शन करना भी जरूरी है। मंगलवार और शनिवार को यहां पूजा करने का विशेष महत्व है।

Would be untimely death

इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में होती दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है। ताकि लोग अचानक मृत्यु के शिकार न हो। हालांकि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है।

जिस व्यक्ति ने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन जरूर मरना पड़ेगा। श्रीमदभागवत गीता में श्रीकृष्ण ने भी यही संदेश दिया है कि आत्मा अमर है और यह देह नश्वर है।

शिव पुराण के अनुसार असमय या अचानक होने वाली मृत्यु से बचने के लिए शनि आराधना सर्वश्रेष्ठ उपाय है। शनि देव असमय मृत्यु से बचाने में सक्षम हैं। शनि देव को प्रसन्न करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन है शनिवार।

इस दिन भगवान शनि के निमित्त पूजन करने वाले व्यक्ति को असमय मृत्यु का भय नहीं रहता है। इसके साथ ही ज्योतिष संबंधी कुंडली के कई दोष भी इनकी आराधना से शांत हो जाते हैं।

भगवान शिव के मंत्र 'ऊँ नमः शिवाय' का जाप अगर आप करते हैं तो भी असमय मृत्यु से बचा जा सकता है। सबसे क्रूर माने जाने वाले शनि से कृपा प्राप्त करने के लिए शनिवार के दिन विशेष पूजन करें।

शनि के निमित्त शनि की वस्तुओं का दान करें। इसके अतिरिक्त भगवान शिव को जल में तिल डालकर अर्पित करें। शिवजी के साथ ही शनिदेव की आराधना से व्यक्ति अकाल मृत्यु से बच सकते हैं।

प्रत्येक शनिवार को यह उपाय करने से अकाल मृत्यु का खतरा टल जाता है और व्यक्ति को लंबी आयु प्राप्त होती है। यह उपाय शिव पुराण में दिया गया है अत: इसमें शंका और संदेह न करें अन्यथा इस उपाय का उचित पुण्य प्राप्त नहीं हो सकेगा।

Saturday worship the shani dev

ज्योतिष के अनुसार शनि देव को न्यायाधीश का पद प्राप्त है। यानी सभी लोगों के अच्छे-बुरे कर्मों का फल शनिदेव ही देते हैं। यही वजह है कि से इन्हें क्रूर देवता माना जाता है।

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि अशुभ स्थिति में हो तो उसे जीवनभर संघर्ष करना पड़ता है। शनि के बुरे प्रभावों को दूर करने या कम करने के शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं।

माह के हर शनिवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में नीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर विशेष दीपक, तेल, रुई की बत्ती आदि पूजन सामग्री से पूजा करें और शनि देव का ध्यान करें और अशुभ प्रभावों को दूर करने की प्रार्थना करें।

ऐसे तैयार करें विशेष दीपक?

दीपक चार मुख (जिस दीपक को एक साथ चार जगह से जलाया जा सके) का होना चाहिए। इस प्रकार दीपक में दो रुई की लंबी बत्तियां लगाएं और दोनों बत्तियों के चार मुंह दीपक से बाहर निकालें। अब चारों ओर से दीपक को जलाएं। यह दीपक पीपल के वृक्ष के नीचे रखें और शनिदेव से प्रार्थना करें। इसके बाद पीपल के वृक्ष की सात परिक्रमा लगाएं।

घर लौटकर एक कटोरी में तेल लें, उसमें अपना चेहरा देखें और इस तेल का दान करें। इस प्रकार यह उपाय अपनाने से शनि दोषों का प्रभाव अवश्य कम हो जाएगा।

Saturday, 19 April 2014

Somewhere in your horoscope sum not kaal sarap yoga

यदि जन्मकुंडली में सभी ग्रह राहू और केतु के एक ही बाजू में स्थित हों तो ऐसी ग्रह स्थिति को कालसर्प योग कहते हैं।

यह योग ठीक नहीं माना जाता है। जिसकी कुंडली में यह योग होता है, उसमें शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता और निराशा की भावना बनी रहती है।

ऐसे में व्यक्ति अपने अंत की कामना करने लगता है। उसे आर्थिक तंगी परेशान करती है। पति-पत्नी के बीच मन-मुटाव बना रहता है।

पर इन सभी परेशानियों का कारण आपको कालसर्प योग लगता है, तो इसे दूर किया जा सकता है। बस, आप अगर इन उपायों को आजमाएं तो काफी हद तक इस समस्या से छुटकारा हासिल कर सकते हैं।

1. तांबे के किसी भी आकार की नाग प्रतिमा बनवाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर, शिवमंदिर में चढ़ाएं।

2. नियमित रूप से हनुमानजी की उपासना के साथ शनिवार को सुंदरकाण्ड के पाठ के साथ ऊँ हं हनुमंते रुद्रात्मकाये हुं फट् मंत्र का 1 माला जप करने से कालसर्प योग के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

3. महीने के पहले बुधवार को नीले कपड़े में काले उड़द बांधकर वट वृक्ष की 108 परिक्रमा आरंभ करें।

4. ग्रहणकाल में किसी ऐसे शिव मंदिर की पिंडी पर पांचमुखी नाग की तांबे की मूर्ति अपनी श्रद्धानुसार लगवाएं, जिस पर पहले से नागदेवता नहीं हों।

5. जिस व्यक्ति की कुंडली में कालसर्व योग हो, उसे कालसर्प योग लॉकेट धारण करना चाहिए।ऐसा यंत्र चांदी द्वारा निर्मित कराया जाता है। यंत्र का आकार सर्प के फैले हुए फन जैसा होता है।

Religious ideas for saturday

सप्ताह में मंगलवार और शनिवार दो ऐसे दिन हैं जो हर व्यक्ति के लिए बहुत खास होते हैं, क्योंकि इन दोनों दिन पूजा अर्चना करने का विशेष लाभ मिलता है। मंगलवार का दिन हनुमानजी और मंगल देवता की विशेष पूजा का दिन है तो शनिवार शनि और बजरंगबली की आराधना का दिन है।

कहते हैं हमारे कर्मों से ही समय बदल सकता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में बुरा समय चल रहा है तो वह ज्योतिष के अनुसार बताए गए कुछ उपाय अपनाकर बुरे दिनों को अच्छे दिनों में बदल सकते हैं। मंगलवार और शनिवार के दिन ऐसे ही कुछ आजमाने चाहिए।

1. शनिदेव की शुभ दृष्टि प्राप्त करने के लिए किसी भी शनिवार से यह उपाय शुरू करें। इस उपाय के अनुसार आपको लगातार सात शनिवार तक बिना किसी प्रकार की देर किए हुए एक-एक नारियल किसी पवित्र नदी में प्रवाहित करना चाहिए। साथ ही नारियल प्रवाहित करते समय एकाग्र मन से ऊँ रामदूताय नम: मंत्र का जप करें लाभ मिलेगा।

2. लगातार सात शनिवार इस प्रकार करने से समस्याओं का प्रभाव कम हो जाएगा और हनुमानजी के साथ ही शनिदेव की कृपा भी प्राप्त होगी। इसके अलावा हर मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।

3. मंगलवार के दिन हनुमानजी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार हनुमानजी का जन्म मंगलवार के दिन ही हुआ है और इसी वजह से इस दिन बजरंग बली की पूजा विशेष फल देने वाली मानी गई है।

4. मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और आपके पास पर्याप्त समय हो तो सुंदरकांड का पाठ करें। सुंदरकांड का पाठ करने वाले व्यक्ति पर हनुमानजी की कृपा बहुत जल्दी होती है।

Wednesday, 16 April 2014

May is the best for marriage

होलाष्टक पर 8 मार्च से विवाह के शुभ मुहूर्तों पर रोक लगी थी। करीब डेढ़ महीने बाद अब 16 अप्रैल से फिर विवाह के शुभ मुहूर्त शुरू हो रहे हैं।

परेशानी की बात यह है कि अप्रैल में जिस दिन विवाह का अंतिम मुहूर्त है, उससे दो दिन बाद राजधानी में लोकसभा का मतदान होगा। विवाह वाले दिन से वाहनों का अधिग्रहण शुरू हो जाएगा। इसके चलते बारात लाने-ले जाने की समस्या से लोगों को जूझना पड़ेगा।

अप्रैल में जहां पांच शुभ मुहूर्त में फेरे होंगे वहीं मई में सबसे ज्यादा 12 मुहूर्त हैं। मई में ही महामुहूर्त अक्षय तृतीया भी पड़ रही है, महामुहूर्त में सैकड़ों शादियां होंगी। जून में जहां 10 मुहूर्त हैं, वहीं जुलाई में मात्र तीन मुहूर्त हैं और 8 जुलाई से देवशयनी एकादशी के बाद फिर पांच महीने तक मुहूर्त नहीं है। दिसंबर में भी सिर्फ तीन मुहूर्त हैं।

तुलसी पूजा के बाद भी मुहूर्त नहीं

पं.मनोज शुक्ला कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के ज्यादातर पंडित व ज्योतिषी लड़का-लड़की की कुंडली और देव पंचाग के अनुसार विवाह का शुभ मुहूर्त निकालते हैं। छत्तीसगढ़ की भौगोलिक परिस्थितियों व ग्रह नक्षत्रों को ध्यान में रखकर देव पंचांग बनाया गया है। वर्ष 2014 के देव पंचांग के अनुसार जुलाई तक अनेक मुहूर्त हैं और फिर देवशयनी एकादशी पर भगवान के शयनकाल का समय शुरू होने से देवउठनी एकादशी तक विवाह नहीं किए जा सकेंगे। यहां तक कि 3 नवंबर को तुलसी पूजा देवउठनी एकादशी के बाद भी विवाह मुहूर्त नहीं है। पूरे नवंबर में एक भी श्रेष्ठ मुहूर्त नहीं है। दिसंबर के पहले पखवाड़े में तीन मुहूर्त हैं और इसके बाद खरमास लग जाएगा और फिर अगले साल संक्रांति तक लोगों को विवाह के लिए इंतजार करना पड़ेगा।

देव पंचांग के अनुसार मुहूर्त

माह कुल दिन तारीख

अप्रैल 5 दिन 16, 18, 20, 21 और 22

मई 12 दिन 1, 2, 4, 10, 11, 15, 17, 19, 24, 25, 29 व 30

जून 10 दिन 4, 6, 7, 10, 11, 12, 13, 15, 20, 21,

जुलाई 5 दिन 1, 2, 3, 4, व 5

अगस्त, सितंबर, अक्टूबर व नवंबर में मुहूर्त नहीं

दिसंबर 3 दिन 6, 8 व 12

The reasons why saint take mausoleum

ध्यान की वह अवस्था जब व्यक्ति ईश्वर या अपने आराध्य में एकाकार हो जाता है समाधि कहलाती है। इस अवस्था में व्यक्ति को स्पर्श, रस, गंध, रूप एवं शब्द इन 5 विषयों की इच्छा नहीं रहती तथा उसे भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि का आभास भी नहीं होता। ऐसा व्यक्ति शक्ति संपन्न बनकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। उसके जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।

यही है कैवल्य ज्ञान

जैन धर्म में समाधि को कैवल्य ज्ञान और बौद्ध धर्म में निर्वाण कहा गया है। योग में इसे समाधि कहते हैं। इसके कई स्तर होते हैं।

योग का अंतिम पड़ाव

समाधि योग का सबसे अंतिम पड़ाव है। यह तभी प्राप्त हो सकता है जब व्यक्ति सभी योग साधनाओं को करने के बाद मन को बाहरी वस्तुओं से हटाकर निरंतर ध्यान करते हुए उसी में लीन होने लगता है।

संयम करना ही समाधि

पूर्ण रूप से सांस पर नियंत्रण और मन स्थिर व सन्तुलित हो जाता है, तब समाधि की स्थिति कहलाती है। प्राणवायु को 5 सेकंड तक रोककर रखना 'धारणा' है, 60 सेकंड तक मन को किसी विषय पर केंद्रित करना 'ध्यान' है और 12 दिनों तक प्राणों का निरंतर संयम करना ही समाधि है।

समाधि के प्रकार

भगवान श्री कृष्ण ने भी भागवत गीता में समाधि के बारे में विस्तार से बताया है। योग में समाधि के दो प्रकार बताए गए हैं- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।

भक्ति सागर में समाधि के 3 प्रकार बताए गए है- 1.भक्ति समाधि, 2.योग समाधि, 3.ज्ञान समाधि।

पुराणों में समाधि के 6 प्रकार बताए गए हैं जिन्हें छह मुक्ति कहा गया है- 1. साष्ट्रि, (ऐश्वर्य), 2. सालोक्य (लोक की प्राप्ति), 3. सारूप (ब्रह्मस्वरूप), 4. सामीप्य, (ब्रह्म के पास), 5. साम्य (ब्रह्म जैसी समानता) 6. लीनता या सायुज्य (ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म हो जाना)।

ऐसे शुरू की जाती है समाधि

जब व्यक्ति प्राणायाम, प्रत्याहार को साधते हुए धारणा व ध्यान का अभ्यास पूर्ण कर लेता है तब वह समाधि के योग्य बन जाता है। समाधि के लिए व्यक्ति के मन में किसी भी प्रकार के बाहरी विचार नहीं होते।

व्यक्ति का मन पूर्ण स्थिर रहकर आंतरिक आत्मा में लीन हो जाता है तब समाधि घटित होती है। इसलिए समाधि से पहले ध्यान के अभ्यास को बताया गया है। ध्यान से ही चित्त (मन) विचार शून्य हो जाने की अवस्था में समाधि घटित होती है।

समाधि प्राप्त व्यक्ति का व्यवहार सामान्य व्यक्ति से अलग हो जाता है, वह सभी में ईश्वर को ही देखता है और उसकी दृष्टि में ईश्वर ही सत्य होता है। समाधि में लीन होने वाले योगी को अनेक प्रकार के दिव्य ज्योति और आलौकिक शक्ति का ज्ञान प्राप्त स्वत: ही होता है।

क्यों जरूरी है मोक्ष

शरीर के जन्म और मरण के चक्र से बाहर निकलकर स्वयं को कहीं भी किसी भी रूप में अभिव्यक्त करने की ताकत और सच मानो तो इस ब्रह्मांड से अलग रहने की ताकत। ब्रह्मांड से अलग वही रह सकता है, जो ब्रह्म स्वरूप शुद्ध चैतन्य है।

Tuesday, 8 April 2014

Shri ram navmi special ram in your mind in my mind

राम के चरित्र की खूबियों के महासागर से यदि आज व्यक्ति मुट्ठी भर बातों का भी पालन करे तो देश में पनप रही तमाम बुराइयों का समाधान अपने आप ही संभव हो जाएगा। भारत की भाषाओं के साथ ही विदेशी भाषाओं में भी रामायण का अनुवाद हुआ है। भारत की लगभग हर लोक परंपरा में राम के जीवन और किंवदंती का उल्लेख मिलता ही है।

आलेख का शीर्षक स्वदेश फिल्म के गीत 'राम तेरे मन में हैं राम मेरे मन में हैं, मन से रावण जो निकाले राम उसके मन में हैं' की वो पंक्तियां हैं जिन्हें जावेद अख्तर ने राम की छवि को मर्यादा पुरुषोत्तम से भी आगे ले जाते हुए करुणा तथा शांति के प्रतीक के तौर पर लिखीं हैं। आज के इस अशांति और अराजकता के माहौल में राम की यह छवि और ज्यादा प्रभावित और प्रेरित करती है।

राम एक आदर्श शासक

देश में जब असत्य, लोभ, अहंकार की भावनाएं अपने उबाल पर हों, तब एक बार फिर राम जैसे अवतारी पुरुष की जरूरत महसूस होती है। हालांकि ईश्वरीय अवतारों में विश्वास न करने वाला पक्ष इस बात पर हंस भी सकता है और रामकथा को महज मिथक मानकर सिरे से खारिज भी कर सकता है।

यदि इन बातों को नजरअंदाज करते हुए सिर्फ राम के व्यक्तित्व का विश्लेषण किया जाए तो समकालीन परिस्थितियों में राम हमारे लिए और भी प्रसांगिक हो जाते हैं। आदर्श शिष्य, आदर्श पुत्र, आदर्श मित्र, आदर्श शासक और एक समाज सुधारक के रूप में राम हमेशा उल्लेखनीय हैं।

राम का चरित्र संपूर्णता का पर्याय रहा है। राम ने अपने संपूर्ण जीवन में अनुशासित और मर्यादित रहते हुए सदैव सत्य और न्याय की बात कही है। राम के चरित्र की खूबियों के महासागर से यदि आज व्यक्ति मुट्ठी भर बातों का भी पालन करें तो देश में पनप रहीं तमाम बुराइयों का समाधान अपने आप ही संभव हो जाएगा। राम पारिवारिक और सामाजिक जीवन की दृष्टि से भी हमारे समक्ष उच्चतम आदर्श स्थापित करते हैं।

राम एक आदर्श शिष्य

राम अपने गुरु विश्वामित्र की सेवा में सदैव तत्पर रहे हैं। सीता स्वयंवर के समय राम गुरु से आज्ञा मिलने के उपरांत ही खड़े हुए और उन्हें प्रमाण करके ही धनुष उठाने को गए। तुलसीदास जी रामायण में लिखते हैं कि...

'गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा।

द्वार जाय पद नावउ माथा।।

सादर अरघ देइ घर आने।

सोरह भांति पूजि सनमाने।।

गहे चरन सिय सहित बहोरी।

बोले राम कमल कर जोरी।

गुरु के आगमन की सूचना मिलते ही राम सीता के साथ द्वार पर आकर गुरु का सम्मान करते हैं।अगले दोहे में तुलसीदासजी लिखते हैं कि गुरु के घर आने पर राम प्रसन्नता व्यक्त करते हुए घर के पवित्र होने की बात कहते हैं। साथ ही राम यह भी कहते हैं कि आप समाचार भेज देते तो मैं स्वयं उपस्थित हो जाता। इस तरह गुरु से भावनात्मक जुड़ाव और सम्मान की सीख है। वर्चुअल माध्यमों से शिक्षा ग्रहण करने वाली पीढ़ी के लिए नैतिक मूल्यों की शिक्षा के लिए राम एक श्रेष्ठ आदर्श हैं।

राम एक आदर्श पुत्र

समस्त पौराणिक आख्यानों में राम एक आदर्श पुत्र सिद्ध हुए हैं। माता कैकयी के 14 वर्ष के वनवास की मांग को पूरा करने के लिए पिता दशरथ के आदेश पर राम सहर्ष वनवास जाने को तैयार हो गए। इस क्रम में ही वे माता कैकयी से कहते हैं, 'सुन जननी सोइ सुत बड़ भागी, जो पितुमातु वचन अनुरागी'।

वनवास जाने के पहले भी राम भरत को माता-पिताकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखनेकी प्रार्थना करते हैं। अपना राज-पाट भी भरत को सौंप देते हैं। माता-पिता के लिए त्याग की बात तो दूर, वर्तमान में लोग संयुक्त परिवार में रहने से भी कतराने लगे हैं। अत: ऐसे लोगों के लिए राम का चरित्र महानता की पराकाष्ठा है।

राम एक आदर्श शासक राम का चरित्र एक आदर्श राजा के रूप में भी हमारे समक्ष उभरता है। राम की अवधारणा थी कि जिस राजा के शासन में प्रजा दु:खी रहती है, वह नृप अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है।

राम एक आदर्श भाई

राम का अपने भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से भीगहरा प्रेम था। मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण के घायल होने पर राम अत्यंत भावुक हो उठे थे। सीता की रक्षा केलिए भाई के प्राण जाने की आशंका मात्र से उनका मनग्लानि से भर उठा।

भरत पर भी राम का अपार स्नेह था। भरत जब राम को लौटा लाने के लिए चित्रकूट पहुंचे तो राम ने उन्हें कर्तव्य की बात कहते हुए प्रेम से समझाया और निवेदन करने पर अपनी दोनों खड़ाऊ देकर प्रेम से विदा किया। भाई-भाई के आपस में विवाद और आपस में बढ़ती दूरियों के दौर में, मनमुटाव रखने वाले भाइयों के लिए राम का भ्रातृप्रेम एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

राम पर्यावरण हितैषी

चित्रकूट प्रवास के के दौरान राम ने वहां मौजूद वन्य-जीवों सेमित्रवत व्यवहार रखा। रामायण में तुलसीदासजी लिखते हैं कि हाथी, सिंह, बंदर और हिरण ये सभी बैर छोड़कर साथ-साथ विचरण करते थे। शिकार के लिए घूमते हुए पशुओं के समूह श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर विशेष आनंदित होते थे। राम ने अपनी सेना में वानर और पशुओं को भी सम्मान दिया।

पर्यावरण को सहेजना तो आज की पहली प्राथमिकता में शामिल हो जाना चाहिए। राम एक आदर्श मित्र और समाज सुधारक राम ने अपने जीवन में मित्रता की भी मिसाल पेश की है। विभीषण और सुग्रीव का उन्होंने हर परिस्थिति में साथ निभाया।

राम अपने संपूर्ण जीवन काल में छुआछूत, अस्पृश्यता और वर्ग भेद से परे रहे। छोटे-बड़े सभी के साथ राम ने समान व्यवहार रखा। शबरी के जूठे बेर भी राम ने स्नेह ग्रहण किए तो राम ने केवट को भी कृतार्थ किया। दोस्ती में स्वार्थ और बढ़ते जातिवाद को मिटाने के लिए राम एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

Circulation ram coins in 300 years

भगवान राम को देव स्वरूप में स्थापित करने के 2200 साल पुराने प्रमाण प्रकाश में आए हैं। ये प्रमाण हैं दुर्लभ सिक्के संग्रहित करने के शौकीन शहर के रिटायर्ड प्रोफेसर डीएल नीमा के पास। ऐसे ही एक सिक्के पर दो शोधपत्र भी लिखे गए हैं। यह सिक्कामहेश्वर में नर्मदा से मिला था।

इस प्रकार के सिक्कों का चलन मौर्य वंश की समाप्ति के बाद शुंग काल में करीब 300 साल रहा। इनमें से एक अंडाकार सिक्का 4.15 ग्राम का है, जो प्रोटीन धातु (लेड, टिन और कॉपर) का बना है। इस पर राम-लक्ष्मण और सीता का वनगमन का दृश्य है। यह अपनी तरह का एकमात्र ज्ञात सिक्का है। यह सिक्का अध्ययन की दृष्टि से भी खास है।

बुरहानपुर में है मिलता-जुलता सिक्का

इस सिक्के पर दो शोधपत्र लिखने वाले मुद्रा शास्त्री और पंजाब यूनिवर्सिटी के विभाग प्रमुख डॉ. देवेंद्र हांडा के अनुसार यह सिक्का ईसा से दूसरी शताब्दी पूर्व का है। इस पर वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड का दृश्य उकेरा गया है। इससे मिलता-जुलता एक अन्य सिक्का तांबे का है जो बुरहानपुर के डॉ. गुप्ता के पास है। मुद्रा शास्त्री के अनुसार किसी भी सिक्के को नापने के छह पैमाने होते हैं। इस आधार पर इस सिक्के को वेरी गुड (बहुत अच्छा) की श्रेणी में रखा गया है।

5 हजार सिक्कों का संग्रह

मुझे सिक्कों के संग्रह का शौक है और करीब 5 हजार विभिन्न सिक्कों का संग्रह मेरे पास है। सिक्का करीब 2200 हजार साल पुराना है। मूर्तिकला के हिसाब से राम-लक्ष्मण, सीता के जो प्रतिबिंब हैं, उनमें यह सबसे प्राचीन है। कई विषय के जानकार अध्ययन और शोध की दृष्टि से मेरे पास इन्हें देखने के लिए आते हैं। भगवान राम की उपलब्ध मूर्तिया भी इसके बाद की है।

Worship meet siddhiratri eight siddhian

नवरात्रि के नवें दिन सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है। इनकी उपासना करने से अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा,प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वसित्व आठ सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से ये सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।

सिद्धिदात्री देवी की उपासना से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। देवी मां के दाहिने तरफ नीचे हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। मां की साधना करने से लौकिक, परलौकिक की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

फल की प्राप्ति

मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करना चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

इस मंत्र की करें स्तुति

सिद्धगंधर्वयक्षाद्घैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

Be the first true human being you will become wealthy themselves

मैं धर्म के बारे में क्या बोलूं? किससे बोलूं? जब तक समाज नैतिक नहीं बनेगा। तुम सच्चे इंसान नहीं बन सकते हो। तब तक मैं धर्म का मार्ग कैसे बताऊंगा?

जिस दिन तुम सच्चे इंसान बन गए, उस दिन तुम स्वयं धनवान बन जाओगे। ये विचार राष्ट्रसंत मुनिश्री पुलक सागर महाराज ने सोमवार को महावीर जयंती महोत्सव समिति द्वारा जैन छात्रावास में आयोजित ज्ञान गंगा महोत्सव में व्यक्त किए।

मुनिश्री ने कहा कि एक गंगा हिमालय से निकलती है। यह गंगा मनुष्य की प्यास बुझाती है। एक गंगा मेरे हृदय से निकलती है। यह गंगा प्यास जगाती है।

मैं तुम्हारे भीतर धर्म की प्यास जगाने आया हूं। मनुष्य प्यार करना भूल गया है। जीवन को सफल बनाने के लिए नम्रता का स्वभाव धारण कर लो। यही कल्याण का मार्ग है। इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

Monday, 24 March 2014

There are 28 thousand manuscripts of vedas

वेद हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं, जो मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन लिखित साहित्यिक धरोहर हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियां आज भी पुणे के भंडारग्रह ओरियंटल रिसर्च संस्था में उपलब्ध हैं।

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी ऋग्वेद को विश्व विरासत में स्थान दिया है। सनातन हिंदू धर्म का मूल सिद्धांत कर्म और पुनर्जन्म सिद्धांत हैं।

हिंदुओं के पवित्र ग्रंथो के दो विभाग हैं- एक है 'श्रुति' और दूसरा 'स्मृति'। श्रुति ईश्वर निर्मित और स्मृति मानव निर्मित है। श्रुति शब्द में वेद अभिप्रेत हैं। वेद को 4 भागों में संपादित किया गया है।

(1) संहिता या मंत्र

(2) ब्राह्मण-यज्ञयागादि कर्मकांड

(3) अरण्यक में चिंतन और उपासना विधि

(4) उपनिषद।

उपनिषदों का विषय ब्रम्हा विद्या है। ये वेदों के आरण्यक भाग के अंत में आते हैं, इसलिए वेदों के इन उपसंहारात्मक और तत्वज्ञान विषयक विभाग को वेदांत कहते हैं। उपनिषद कम से कम 4000 वर्ष पूर्व के हैं। उपनिषदों की कुल संख्या 1179 है। उसमें से 108 महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें से 11 उपनिषद जिनमें भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा भाष्य लिखा गया है वे प्रमुख हैं। उपनिषदों के रचियताअज्ञात हैं।

हिंदू धर्म के तीन आधार ग्रंथ हैं।

(1) उपनिषद

(2) गीता

(3) ब्रम्हासूत्र

इन तीनों को प्रस्थान त्रयी कहते हैं। उपनिषद शब्द का अर्थ श्री शंकराचार्य द्वारा कठोपनिषद में स्पष्ट किया गया है।

इसका सरल अर्थ यह है वह ज्ञान जो परम सत्य को अपने निकट निश्चयात्मक रूप से ले जाकर वहां स्थित कर देता है, पर संक्षेप में उपनिषद के और भी अर्थ हैं, अभिन्न पर संक्षेप में उपनिषद वह ज्ञान है जो परमात्मा अभिन्नता से ज्ञान करा देता है।

इसलिए हैं वेद उपयोगी

आज उपनिषदों का अध्ययन कम होता जा रहा है। हजारों वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने जो ज्ञान स्मरण रखकर परंपरा से आज तक हमें उपलब्ध कराया है उसके लिए हमें कृतज्ञ होना चाहिए और इस ज्ञान का हमें निरंतरता के साथ अध्ययन जारी रखना चाहिए।

वेदों और उपनिषद का अध्ययन न केवल आपको ज्ञान बढ़ता है बल्कि आपको सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जो हर मुश्किल में आपके लिए एक अमृत की तरह काम करता है।

Why people eat last nights food on sheetala saptami

धर्मशास्त्र में बासे भोजन को त्याज्य यानी त्यागने योग्य कहा गया है। यह तामसी होने से बुद्धि को मंद करने वाला होता है। लेकिन यह कुछ विशेष परिस्थितयों में यह औषधि कार्य करता है।

दरअसल शीतला सप्तमी-अष्टमी बासा भोजन करने से रक्त के दबाव यानी ब्लड प्रेशर पर नियंत्रण होता है। जिससे रोगी को आराम मिलता है।

गधा है वाहन

मां शीतला शीत की देवी हैं। मां का वाहन गधा है। वह इसलिए क्योंकि गर्दभ (गधा) चंद्र शक्ति प्रधान जीव है। चंद्र शक्ति प्रधान जीवों की विशेषता रहती है कि वे चंचल, चुलबुले, तत्काल बिगड़ उठने वाले और असहनशील नहीं होते हैं। यह शांत स्वभाव के होते हैं।

मां शीतला का वाहन गधा संकेत देता है कि आक्रमण के समय अधीर नहीं होना चाहिए। कहते हैं कि शीतला रोग (छोटी माता) में गर्दभी का दूध, गधा जहां लोटता है उस स्थान की मिट्टी और गधों के संपर्क का वातावरण ठीक माना जाता है।

Friday, 7 March 2014

Do not inclined blowing innocent

यूं तो किसी भी देव या देवी की पूजा शंख की ध्वनि के बिना अधूरी मानी जाती है। पर भगवान शंकर की पूजा में न तो शंख बजाया जाता है और न ही इससे जल चढ़ाया जाता है। कहते हैं शंख 14 रत्नों में से एक है। समुद्र मंथन के समय इसको निकाला गया था।

शंख अपने आप में दिव्य और पवित्र है। शंख की ध्वनि संपूर्ण वातावरण को निर्मल और चेतन्य बनाती है। प्रत्येक साधना में शंख को विशेष स्थान दिया जाता है। उसके अंदर पंचामृत भरकर के सभी लोगों के ऊपर छिड़का जाता है। इसे भगवान विष्णु ने स्वयं अपने हाथों में धारण किया है।

इसलिए शंख को वरदायक और बहुत ही शक्तिशाली माना गया है। शंख में त्रिदेवों और त्रिदेवियों का निवास माना गया है। इसलिए सभी देवी देवताओं की पूजा में शंख का उपयोगह किया जाता है।

शंख कई तरह के होते हैं जिनमें से तीन प्रमुख माने गए हैं। जो कि क्रमशः दक्षिणावृत्ति शंख, वामवर्ति शंख, मध्यवर्ती शंख। इसके अतिरिक्त भी शंख के अनेक प्रकार है जिनमें प्रमुख रूप से कांटेदार शंख इसे सूर्य शंख भी कहा जाता है।

शंख की आकृति का भी एक गहरा रहस्य है। अगर बहुत छोटे छोटे शंख हों तो उन्हें इच्छापूर्ति वाले शंख माना गया है। मध्यम शंख सिद्धि वृत्ति के लिए माने गए हैं। और बड़े शंख अध्यात्मिक उन्नति पूजा पाठ के लिए माने गए हैं।

शंख जिसके बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी गई है। जिसके बारे में धार्मिक ग्रंथों में भी काफी लिखा गया है। क्यों कि पूजा में शंख बजाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

शंख को निधि (धन) का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि शंख को घर में रखने से अनिष्ट का नाश होता है। और सौभाग्य में वृद्धि होती है। शंख बजाने से दूराचार दूर होते हैं। पाप गरीबी दूषित विचार का नाश होता है।

कहते हैं कि अगर शंख में जल भरकर भगवान का अभिषेक कर दिया जाए तो देवता शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान विष्णु को शंख बहुत ही प्रिय है। शंख से जल अर्पित करने पर विष्णु जी अतिप्रसन्न हो जाते हैं।

लेकिन देवों के देव महादेव की पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित है। भगवान शिव की पूजा में शंख का उपयोग नहीं होता है। ना ही शिव का शंख से अभिषेक किया जाता है और न ही शंख बजाया जाता है।

कहते हैं कि एक बार राधा गोकुल से कहीं बाहर गईं थीं। उस समय कृष्ण अपनी विरजा नाम की सखी के साथ विहार कर रहे थे। संयोगवश राधा वहां आ गईं। विरजा के साथ कृष्ण को देख राधा क्रोधित हो गईं और कृष्ण और विरजा को भला बुरा कहने लगीं। लज्जा वश विरजा नदी बनकर बहने लगीं।

कृष्ण के प्रति राधा के क्रोध को देखकर भगवान श्री कृष्ण के एक मित्र आवेश में आ गए। वह राधा से आवेश पूर्ण शब्दों में बात करने लगे। मित्र के इस व्यवहार को देख कर राधा नाराज हो गईं। राधा ने श्री कृष्ण के सखा को दानव रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। तब उन्होने भी राधा को मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया।

राधा के श्राप से कृष्ण का मित्र शंखचूड़ नाम का दानव बना। जिसने दंभ नाम के राक्षस के घर जन्म लिया। दंभ ने भगवान विष्णु की तपस्या कर शंखचूड़ को पुत्र रूप में पाया था। जल्द ही शंख चूड़ तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा।

वह साधू संतों को परेशान करने लगा। इस कारण से भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध कर दिया। चूकिं वह भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी का भक्त था तो उन्होनें शंखचूड़ की अस्थियों से शंख का निर्माण किया।

शिव ने शंख चूड़ को मारा था। यही वजह है कि शंख भगवान शिव की पूजा में वर्जित माना गया है।