Monday, 23 June 2014

Please erase my memory

यौगिक परंपरा में हमारा मन या चित्त एक बड़े डाटाबेस की तरह है। जानते-बूझते हुए या अनजाने में किया गया कोई भी अनुभव हमारे चित्त में सहेज लिया जाता है, यह वहां छप और अटक जाता है।

एक योरपीय अदालत में भूल जाने के अधिकार (राइट टू बी फॉरगॉटन) को लेकर एक आधुनिक किस्म की लड़ाई बहुत जोरों पर है। जबकि हमारे अस्तित्व से जुड़े समस्त डेटा पर डिजिटल टेक्नोलॉजी का दबदबा है, जैसे फेसबुक, टि्वटर, इंस्टाग्राम, जीमेल, हर गली-मुहल्ले में लगे सरकारी और निजी सीसीटीवी कैमरे, यहां तक कि सैटेलाइट कैमरे हमारे घर तक घुस आए हैं तो ऐसी स्थिति में नागरिक भूलने के अधिकार की मांग कर रहे हैं।

यह बातचीत शिव की तरफ हमारा ध्यान खींचती है जिन्हें स्मर-हर्ता कहा गया है। वे हमारी स्मरण शक्ति को नष्ट कर सकते हैं। स्मृति को पोंछ सकने की उनकी योग्यता ही उन्हें योग का देव, योगेश्वर बनाती है।

योगिक परंपरा में हमारा मस्तिष्क या चित्त एक बड़े डेटाबेस की तरह है। जानबूझकर या अनजाने में हम जो भी अनुभव करते हैं, वे हमारे चित्त में सहेज लिए जाते हैं, वहां छप जाते हैं और संग्रहित हो जाते हैं। इसीलिए, हमने जो भी चीजें अनुभूत की हैं उन सभी की याददाश्त हमारे मन में रहती है और न केवल इस जीवन की बल्कि पूर्वजन्म की भी। यह हमारे दिमाग को गूंथती रहती है और वास्तविकता की हमारी समझ को बिगाड़ती है। हमें दुनिया को एक खास तरह से देखने की नजर देती है। जब तक इस तरह से हमारा चित्त गूंथा जाता रहेगा तब तक हम अप्रसन्ना ही रहेंगे।

तो हम प्रसन्न कैसे हो सकते हैं?

आसान तरीका तो यह है कि जिस तरह शिव अपनी चिलम से औषधियों के धुएं का पान करते हैं वैसा ही हम भी करें लेकिन शिव के सदृश ऐसी रसायन द्वारा उत्पन्ना प्रसन्नता ज्यादा समय टिक नहीं सकती। इस तरह की प्रसन्नाता की अवस्था को पार्टियों में देखा जा सकता है या खरीदारी में।

एक और तरीका यह है कि हम अपने मस्तिष्क को उन बारंबार होने वाली और अर्थहीन गतिविधियों से हटा लें जो हमें सोचने से रोकती हैं हमारा समय बोध विस्मृत कर देती हैं जैसे कि वीडियो गेम्स या परंपराएं।

यह उस डमरू या डुगडुगी की तरह है जिसे शिव अपने हाथों में धारण करते हैं, जो बंदरों को बस में करने के काम भी आती है, जबकि डुगडुगी किसी बच्चे को कुछ देर के लिए भरमा लेती है। बॉलीवुड और टेलीविजन के कार्यक्रम इसी तरह की प्रसन्नाता के स्रोत हैं।

चित्त में कोई चक्कर अक्सर हमें यह महसूस करवाता है कि हम शोषित हैं और इसलिए अक्सर हम इस जगत से वैसे ही जुड़ते हैं जैसे पीड़ित। अधिकांशत: हम दुखी आत्मा के तौर पर संसार से जुड़ते है।

किसी दूसरे समय पर उस नायक की तरह जो दुनिया को एक बेहतर जगह में बदलने के लिए प्रयासरत है। एक उलझा हुआ चित्त ही हमें उसकी प्रशंसा से रोकता है कि दुनिया में बहुत कुख्यात खलनायक भी खुद को एक शोषित/दुखी आत्मा या नायक की तरह समझता है। एक कानूनी संस्था या मनोवैज्ञानिक की भूमिका निभाने वाला ही संसार की ऐसी समझ को न्यायोचित और तर्कसंगत ढंग (नासमझी) से देख सकता है।

यह हमारी स्मृतियों तक आता है जो कि हमारे होने में पैठी हैं और जो दुनिया के प्रति हमारे दृष्टिकोण को बनाती है। क्या हम इसे पोंछ सकते हैं? योग कहता है कि बिलकुल, जबकि वह अष्ट स्तरीय रास्ता सुझाता है। योग को 'चित्त वृद्धि निरोध" के रूप में भी पारिभाषित किया गया है।

जो अष्ट स्तरीय मार्ग द्वारा हमारे मस्तिष्क की गुत्थियों को सुलझाता है। इसमें शामिल है, दूसरों के साथ हमारे संबंधों की समीक्षा (यम), हमारे व्यवहार की समीक्षा (नियम), हमारे हाव-भाव की समीक्षा (आसन), हमारी श्वास की समीक्षा (प्राणायाम), किसी बाह्य व्यवधान के बिना अपना आत्ममूल्यांकन (प्रत्याहार), जागरूकता (धारणा), अवधान (ध्यान) और अंतत: उन सभी स्मृतियों को पोंछ देना जो हमारे मन में किसी भी तरह का विभाजन, अंतर और स्तर रचती हैं, जो हमें बंधा हुआ, एकाकी और परित्यक्त (समाधिस्थ) बनाती हैं। इस तरह धुल-पुछ जाना हमें चैतन्य बनाता है।

चैतन्य यानी ऐसा व्यक्ति जिसका मन पुरानी सारी स्मृतियों से शुद्ध हो गया है। हम दुनिया को नई नजर से देखते हैं, ऐसे साफ-सुथरे मन से जो किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से मुक्त है। क्या योरपीय कोर्ट ऐसी स्थिति को प्राप्त करेगा?

Vrat tyohar decided to increase your virtue

योगिनी एकादशी का व्रत रखने से संसार के पुण्य दोगुने हो जाते हैं। यानी अगर आपने सारे वर्ष में दस पुण्य कार्य किए हैं तो योगिनी एकादशी व्रत रखने से इनका फल बीस के बराबर हो जाता है।

हिंदू धर्म में एकादशी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष में आता है। जिसे योगिनी एकादशी कहते हैं। आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है।

ऐसे करें व्रत

इस बार 23 जून सोमवार को योगिनी एकादशी का व्रत है। इसलिए रात्रि से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन यथा संभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें, संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।साफ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर संकल्प लें।

मंत्र उच्चारण

मम सकल पापक्षयपूर्वक कुष्ठादिरोग निवृत्तिकामनया योगिन्येकादशीव्रतमहं करिष्ये।

इसके बाद भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़के और उस चरणामृत को पिए। माना जाता है कि इससे विशेष रूप से कुष्ठ रोगी की पीड़ा खत्म होती है और वह रोगमुक्त हो जाता है।

व्रत का महत्व

योगिनी व्रत की कथा श्रवण का फल अट्ठासी सहस्त्र ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान माना गया है. इस व्रत से समस्त पाप दूर होते है। भगवान नारायण की मूर्ति को स्नान कराकर पुष्प, धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए तथा भोग लगाना चाहिए। इस दिन गरीब लोगों को दान देना चाहिए।

व्रत की कथा

कहते हैं कि स्वर्गधाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह शिव भक्त था और प्रतिदिन शिव की पूजा किया करता था।

हेम नाम का एक माली पूजन के लिए उसके यहाँ फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य-विनोद तथा रमण करने लगा।

राजा उसकी दोपहर तक राह देखता रहा। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के न आने का कारण पता करो, क्योंकि वह अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया।

सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी अतिकामी है, अपनी स्त्री के साथ विनोद और रमण कर रहा होगा। यह सुनकर कुबेर ने क्रोधित होकर उसे बुलाया।

हेम माली राजा के भय से कांपता हुआ ‍आया। राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा- तुमने मेरे परम पूजनीय ईश्वरों के ईश्वर श्री शिवजी महाराज का अनादर किया है, इस‍लिए मैं तुझे शाप देता हूं कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी होगा।

कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गया। भूतल पर आते ही उसके शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया। उसकी स्त्री भी उसी समय अंतर्ध्यान हो गई। मृत्युलोक में आकर माली ने महान दु:ख भोगे, भयानक जंगल में जाकर बिना अन्न और जल के भटकता रहा।

रात को नींद भी नहीं आती थी, परंतु शिवजी की पूजा के प्रभाव से उसको पिछले जन्म की स्मृति का ज्ञान अवश्य रहा। घूमते-घ़ूमते एक दिन वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुंच गया, जो ब्रह्मा से भी अधिक वृद्ध थे और जिनका आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान लगता था। हेम माली वहां जाकर उनके पैरों में पड़ गया।

उसे देखकर मारर्कंडेय ऋषि बोले तुमने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके प्रभाव से यह हालत हो गई। हेम माली ने सारा वृत्तांत कह ‍सुनाया। यह सुनकर ऋषि बोले- निश्चित ही तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहे हैं, इसलिए तेरे उद्धार के लिए मैं एक व्रत बताता हूँ। यदि तूम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सब पाप नष्ट हो जाएंगे।

यह सुनकर हेम माली ने अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने उसे स्नेह के साथ उठाया। हेम माली ने मुनि के कथनानुसार विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से अपने पुराने स्वरूप में आकर वह अपनी स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

भगवान कृष्ण ने कहा- हे राजन! यह योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है। इसके व्रत से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अंत में स्वर्ग प्राप्त होता है।

If youre not certain when desired find happiness here

जब मनचाहे परिणाम न मिल रहे हों तो बहुत छोटी-छोटी बातों में खुशियां ढूंढना चाहिए। किसी भी अंतिम परिणाम से निराश होने के बजाय अपने प्रयासों पर ध्यान देना चाहिए। बुरे स्वप्नों को भूलकर आगे बढ़ने का यही मंत्र है।

हम सभी की जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जबकि परिणाम हमारे पक्ष में नहीं रहते। प्रयासों के बावजूद हम सही नतीजे तक नहीं पहुंच पाते। जिंदगी में सबसे कठिन क्षण ये ही होते हैं जबकि व्यक्ति वर्तमान से निराश होता है और भविष्य के प्रति भी कोई आशा नजर नहीं आती है।

ऐसे में कोई भी अपने प्रयासों को संदेह दृष्टि से देखने लगता है और उसी के परिणामस्वरूप नए कार्यों में लगने वाली ऊर्जा भी कम होने लगती है। यह याद रखना चाहिए कि जिंदगी एक सीधी सड़क की तरह नहीं हो सकती, इसमें कई तरह के मोड़ होते हैं और हर मोड़ थोड़ा चौंकाता है।

इन मोड़ों से गुजरते हुए कई बार ऐसी अप्रत्याशित स्थितियों से सामना होता है जिनके लिए हम तैयार नहीं होते और तब हम बहुत निराश महसूस करते हैं। हर मोड़ पर अपने मन का दृश्य मिले यह संभव नहीं है और इसलिए अप्रत्याशित घटनाओं का सहजता के साथ मुकाबला करना जरूरी है।

जीवन में जब अपने मन के अनुरूप कुछ भी न हो रहा हो तो हमें बहुत शांति के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। परीक्षा यही है कि हम ऐसी स्थितियों में भी अपनी क्षमताओं और स्वाभाविकताओं में बने रहें। जब कुछ भी हमारे मन का नहीं हो रहा हो तो यह विश्वास करना बहुत जरूरी है कि चीजें ठीक होंगी।

नकारात्मक परिणामों के बीच सकारात्मक रवैया बहुत ही जरूरी और महत्वपूर्ण है। उस वृक्ष का खयाल कीजिए जो पतझड़ में पूरी तरह सूखा दिखाई देता है लेकिन वसंत आते ही वह नए पत्तों से लद जाता है। जिंदगी में ऐसे पतझड़ी समय से निकलने के लिए आशा की बहुत जरूरत होती है। आशा ही कठिन वक्त में भी हमें प्रयासों से जोड़े रखती है।

फिर जब अपने मन के अनुरूप परिणाम नहीं आ रहे हों तो यह मौका होता है कि हम अपनी योजनाओं की तरफ फिर से देखें। अगर हम किसी एक ही चीज को बार-बार साबित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं और वह फिर भी ठीक से नहीं हो पा रही है तो हमें अपनी योजना में फेरबदल करके देखना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लंबे समय की अपनी योजनाएं या अपने अंतिम लक्ष्य को बदलना चाहिए बल्कि उन योजनाओं के रास्तों में

थोड़ा-सा बदलाव सही दिशा में आगे बढ़ने का मौका देगा और राह आसान बनाएगा। उन चीजों की तरफ ध्यान दें जिनके कारण सही परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं और देखें कि आप उन स्थितियों में कौन-सा वैकल्पिक मार्ग चुन सकते हैं। विकल्प तनावों और पड़ने वाले दबाव को भी बहुत हद तक कम कर देते हैं।

जब मनचाहे नतीजे नहीं मिल रहे हैं तो ऐसा समय धैर्य की परीक्षा होता है। ऐसे में चीजों के परिणामों के बारे में बहुत अधीर नहीं होना चाहिए और उन्हें समय देना चाहिए। परिणामों की हड़बड़ी या अति उत्सुकता भी हमारे मन की शांति को भंग करती हैं और ऐसे में धीरज के साथ आगे बढ़ना बहुत राहत देगा।

अधीरता की स्थिति में हम परिणामों के लिए अपना सबकुछ झोंक देते हैं और इसलिए भी निराशा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए जरूरी है कि धीरज के साथ परिणामों की प्रतीक्षा की जाए ताकि बहुत मुश्किल स्थितियां न बने।

चाहे हम कितना भी बुरा महसूस कर रहे हों लेकिन उन स्थितियों में भी खुद को प्रेरित बनाए रखना जरूरी है। अगर हम इसी शिकायत के साथ आगे बढ़ें कि हम जकडन महसूस कर रहे हैं तो धीरे-धीरे हम परिस्थितियों को और भी मुश्किल बना लेते हैं।

जब परिणाम मन के अनुरूप नहीं आ रहे हैं तो नए रास्तों को खोजने की तरफ बढ़ना और नई चीजों को आजमाने के लिए स्वयं को आगे बढ़ाना बहुत जरूरी होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हौसला न हारें। अंतरप्रेरणा होना चाहिए, फिर भले ही परिणाम आज पक्ष में न भी हों लेकिन भविष्य के प्रति उम्मीद तो बनी ही रहती है।

जब बड़े परिणाम हमारे पक्ष में नहीं आ रहे हैं तब लंबे समय बाद मिलने वाली किसी बड़ी सफलता के बारे में चिंतित न रहें बल्कि रोज मिलने वाले छोटे-छोटे पलों को पूरी तरह जिएं। अपने परिणाम पर ज्यादा निर्भरता या ज्यादा फोकस भी निराशा को बढ़ाता है।

इसकी बजाय आपको अपने छोटे-छोटे प्रयासों की सुंदरता को देखना चाहिए। इस तरह आप एक संतुलन पैदा कर सकते हैं और निराशा को खुद से दूर ले जा सकते हैं। हालांकि यह आसान नहीं होता लेकिन जब हम इस तरह आगे बढ़ेंगे तो कोई भी असफलता या निराशा हमारा उत्साह तोड़ नहीं पाएगी।

प्रयासों का महत्व समझें ऐसे समय में जबकि मनचाहे परिणाम नहीं मिल रहे हों तो अपने प्रयासों की उत्कृष्टता के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए। तब यही देखना हमें आगे बढ़ने में मदद करता है कि हमने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया और कुछ चीजें हमारी पहुंच से बाहर थीं।

अगर आप नकारात्मक ढंग से खुद के प्रति सोचने लगे तो शायद आगे कोई भी चीज बेहतर तरीके से अंजाम नहीं दे पाएंगे। आपको आने वाली चीजों को बेहतर करने के लिए खुद के प्रति आशावादी होना ही होगा। तभी अच्छा कर पाएंगे।

ये उपाय आजमाएं

    छोटा ब्रेक लेकर तैयारी करें।

    अपनी योजना का आकलन करें।

    दूसरे लोगों से भी सहयोग लें।

    नई योजना बनाएं।

    वैकल्पिक योजना तैयार रखें।

Walk on the spiritual path in life

सामान्यत: हमारी गतिविधियां मन से ही संचालित होती हैं और इसलिए जीवन में आध्यात्मिक राह के लिए अपने मन को साधने का अभ्यास बहुत ही जरूरी है।

हमारा जीवन कैसा हो यह हमारे आध्यात्मिक हृदय (मन या दिमाग) पर निर्भर करता है। जैसा हमारा मन होगा वैसा ही हमारा व्यक्तित्व होगा। अगर हमारा मन दुविधाग्रस्त है तो हमारे व्यक्तित्व में भी यह दुविधा दिखेगी। अगर मन में गुस्सा है तो हम स्वभाव से गुस्सैल दिखेंगे। अगर मन दुख से भरा है तो हम दुखी नजर आएंगे।

अगर मन में खुशी है तो हम प्रसन्न रहते हैं। हमारा मन या जिसे हम आध्यात्मिक हृदय कहते हैं वही हमारे व्यवहार को तय करता है। इसलिए सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक अभ्यास है कि अपने मन को सहज और शांत बनाया जाए। उसे बेकार की चीजों से खाली किया जाए।

लेकिन जब मन व्यथित होता है तो हम क्या करते हैं? तो हम कुछ गोलियां लेते हैं। या जैसा कि सभी धर्मों में सिखाया जाता है कि मन की शांति के लिए एक माला लीजिए और भगवान का नाम उच्चारण कीजिए, तो सभी यही करने लगते हैं। लेकिन जब कभी आपके पास समय की कमी है तो आप जल्दी-जल्दी माला करते हैं। एक हड़बड़ी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। माला भी करना है और कहीं जाना भी है।

ऐसी स्थिति में लोग बहुत चिढ़े हुए रहते हैं। ऐसे लोग व्यथित भी हो सकते हैं। ऐसे लोगों को कभी शांति नहीं मिलती क्योंकि मन की शांति ऐसी माला से आ ही नहीं आ सकती। मन की शांति कैसे पाएं यह हमें सीखने की जरूरत है।

हमें जीवन में हर चीज सीखने की जरूरत होती है। यहां तक कि अच्छी चपाती किस तरह बनाई जाए वह भी हमें सीखना होता है। लेकिन जब विचारने की बात आती है, मन को शांत करने की बात आती है तो हम कुछ सीखने का प्रयास नहीं करते।

हमारे दिमाग में विचारों के भरे होने से ही हमें विचारक नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि अगर किसी जगह बहुत सारे पेड़ हैं तो उसे कोई गार्डन नहीं कहेगा, वह जंगल ही होगा। जंगल में कोई भी पेड़ कहीं भी उग जाता है। जबकि गार्डन में हर पेड़ को हम बहुत तरीके और सुव्यवस्था के साथ पाते हैं।

यहां हम उसकी छंटाई, कटाई और सिंचाई की एक व्यवस्था देखते हैं। इसी तरह जब हम अपने मन में गोता लगाएंगे तो हम बहुत हताश हो जाते हैं क्योंकि वहां जंगल है। कई बार जब दफ्तरों में वर्माजी गुप्ताजी के पास पहुंचते हैं और पूछते हैं, क्या हो रहा है?

गुप्ताजी प्रतिक्रिया में कहते हैं- आइए, वर्माजी कैसे आना हुआ? वर्माजी- मैं अकेले बोर हो रहा था तो सोचा चलो आपसे बात कर ली जाए। इस तरह के संवाद हमारे जीवन में बहुत आम हैं। अगर हम किसी और के द्वारा बोर होते हैं तो यह बात समझी जा सकती है लेकिन जब हम अपने आप से ही बोर होने लगें तो यह कितनी विकट स्थिति है। जब कोई व्यक्ति अपनी ही उपस्थिति से परेशान होने लगे तो इससे बुरा क्या होगा।

हम अपने आप से इसलिए बोर होते हैं क्योंकि हमारा दिमाग पूरी तरह भरा है और हमने उसे बेकार की चीजों से खाली नहीं किया है। ऐसी स्थिति में हमें किसी के साथ की जरूरत होती है और तभी हम टेक्नोलॉजी का सहारा लेते है। तभी हम फेसबुक पर समय बिताते रहते हैं।

अपनी प्रसन्नता के लिए हम दुनिया की सारी चीजों पर ध्यान देते हैं लेकिन अपने मन पर ध्यान नहीं देते। जब हम अपने मन को नियंत्रण में रखेंगे तो बहुत अच्छे से काम कर पाएंगे। 24 घंटे भी काम करेंगे तो भी खुश रहेंगे लेकिन मन को बेकार की चीजों से मुक्त करो। अपने मन को साधने की कई तकनीक सुझाई गई हैं। इसकी दो प्रमुख तकनीकें मैं आपके साथ बांटता हूं। पहली खुद से बात करना बंद करो।

कोई माला-वाला मत करो। और दूसरी यह कि किसी भी अन्य से बात करने से पहले खुद से पूछो कि क्या बात करना बहुत जरूरी है। अगर आपको जवाब मिलता है नहीं, तो चुप रहो। अगर आप इस तरह अपने मन को नियंत्रित करते हैं तो उसका संबंध आपकी शांति से जुड़ेगा।

जब भी हम बात करते हैं तो भविष्य के बारे में ही बात करते हैं और परेशान हो जाते हैं। युवा हो सकता है कि इस बात से सहमत नहीं हों कि चुप रहना चाहिए लेकिन जरा एक नजर बुजुर्गों को देखिए कि वे तमाम तरह के आकर्षणों से छूट गए हैं।

इस उम्र में उनकी ज्यादा इच्छाएं नहीं रहीं लेकिन फिर भी वे कहते हैं मन शांत नहीं रहता। मन में कुछ व्याकुलता है। इसलिए मन को शांत करने के लिए प्रयास करना चाहिए। वही हमारा लक्ष्य हो तो जीवन सहज बन सकता है।

(स्वामीजी के व्याख्यान का संपादित अंश)

Saturday, 21 June 2014

Two years after fire, Mantralaya finally putting damage behind

Two years after a fire ravaged Mantralaya, the state secretariat building in south Mumbai, several of the offices which had shifted elsewhere have now returned. The renovation bill is estimated to be around Rs 230 crore, against Rs 138 crore as approved initially. 

The blaze which started on the afternoon of June 21, 2012 with a short circuit on the fourth floor spread to fifth, sixth and seventh floor, claiming five lives. Around 5,000 employees and visitors were evacuated from the building. Apart from the furniture and fittings, hundreds of files were gutted in the fire. However, some 2.27 lakh files had already been digitised, which minimised the impact of damage. 

Several departments were temporarily shifted elsewhere. Ministers whose offices were gutted worked from their official residences. Renovation began in November 2012. There was a delay of three months as the lowest bid of Rs 168 crore by Unity Infrastructure was much higher than the state's estimation. The firm revised the estimate down to Rs 138 crore and bagged the contract. 

However, the cost escalated after the work began and the final bill would come to around Rs 230 crore, a senior official said today. Two years on, most of the renovation work on the 4th, 5th and 6th floors is complete. Among other things, the refurbished building will have an advanced fire-fighting system. 

Source: Hindi News

8-year-old girl raped in UP

An eight-year-old girl was allegedly raped by a man in Jaisinghpur area here. The child was sleeping outside her house last night when a man named Avnindra Singh took away the child and raped her, police said.

The girl was later found in unconscious state by her family members, who lodged an FIR against the accused. Search is on to arrest the accused who is absconding, police said. 

Source: Hindi News

Jalpaiguri bifurcated, Bengal to get its 20th district

Aimed at expediting government services, West Bengal's Jalpaiguri district is being bifurcated to create a new district of Alipurduar, Chief Minister Mamata Banerjee said on Friday. 

Announcing the decision in the state assembly, Banerjee said the state's 20th district will come into existence June 25. While the Jalpaiguri Sadar and Mal Bazar subdivisions will continue to be in Jalpaiguri district, the Alipurduar subdivision will be carved out to be a new district. 

Of the 17 excising police stations, nine will remain in Jalpaiguri while the other eight will now be under the new district of Alipurduar. Banerjee said that the bifurcation of the district was a long standing demand of people of the district. "Being far from the district headquarters, people faced delays in delivery of government services. 

They had to spend a considerable time in coming to district headquarters. The bifurcation will help the people of the district," she said. 

Source: Hindi Samachar