Tuesday, 24 June 2014

Unenviable final exam

एक बार गुरुकुल में तीन शिष्यों की विदाई का अवसर आया तो आचार्य बहुश्रुत ने कहा की सुबह मेरी कुटिया में आना। तुम्हारी अंतिम परीक्षा होगी। आचार्य बहुश्रुत ने रात्रि में कुटिया के मार्ग पर कांटे बिखेर दिए।

सुबह तीनों शिष्य अपने-अपने घर से गुरु के निवास की ओर चल पड़े। मार्ग पर कांटे थे। लेकिन शिष्य भी कमजोर नहीं थे। पहला शिष्य कांटों की चुभन के बावजूद कुटिया तक पहुंच गया। दूसरा शिष्य कांटो से बचकर आया। फिर भी एक कांटा तो चुभ ही गया। तीसरे शिष्य ने कांटे देखे तो कांटों की डालियों को घसीट कर दूर फेंक दिया।

फिर हाथ मुंह धोकर कुटिया तक तीनों गए। आचार्य बहुश्रुत तीनों की गतिविधियां गौर से देख रहे थे। तीसरा शिष्य ज्यों ही आया, त्यों ही उन्होंने कुटिया के द्वार खोल दिए और बोले- वत्स, तुम मेरी अंतिम परीक्षा में उतीर्ण हो गए हो।

गुरु ने कहा कि ज्ञान वही है जो व्यवहार में काम आए। तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक हो गया है। तुम संसार में रहोगे तो तुम्हें कांटे नहीं चुभेंगे और तुम दूसरों को भी चुभने नहीं दोगे। फिर पहले और दूसरे शिष्य की ओर देखकर बोले, तुम्हारी शिक्षा अभी अधूरी है।

संक्षेप में

ज्ञान वही है जो व्यावहारिक रूप से उपयोग में लिया जा सके। इसलिए सदैव हमें व्यावहारिकता को पहले पायदान में रखना चाहिए। कुछ समय और परिस्थितयां अपवाद स्वरूप बन सकती हैं।

I do not heron

महाभारत दुनिया का सबसे बड़ा ग्रंथ हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं। महाभारत में कई कथाओं का उल्लेख मिलता है। कहते हैं एक बार पांडव जब वनवास पर थे तब उनके घर मार्कण्डेय मुनि आए।

इस दौरान युधिष्ठिर स्त्रियों के गुणों की चर्चा करते हुए बोले- 'स्त्रियों की सहनशीलता और सतीत्व से बढ़कर आश्चर्य की बात संसार में और क्या हो सकती है? बच्चे को जन्म देने से पहले स्त्री को कितना कष्ट उठाना पढ़ता है? पति के अत्याचार सहती है? बच्चे का लालन-पालन करती हैं? यह एक आश्चर्यजनक बात ही है।'

यह सुनकर मार्कण्डेय मुनि ने युधिष्ठिर को एक कथा सुनाई। कथा कुछ इस तरह थी। एक गांव में कौशिक नाम का एक ब्रह्मण रहता था। वह ब्रह्मचर्य व्रत पर अटल था। एक दिन वह पेड़ की छांव में बैठा बात कर रहा था। उसके सर पर किसी पक्षी ने बीट कर दी। कौशिक ने ऊपर देखा तो एक बगुला बैठा हुआ था।

ब्रह्मण ने सोचा , इसी बगुले ने यह करतूत की है। उन्हें क्रोध आ गया। उनकी क्रोध भरी दृष्टि से उस बगुले को भस्म कर दिया। बगुले के मरे शरीर देखकर ब्रह्मण को पछतावा हुआ। कौशिक इस घटना के बाद से काफी दुखी हो गए कि मैनें एक निर्दोष पक्षी को मार दिया।

वह यह सोच ही रहे थे कि भिक्षा का समय हो गया। वह एक घर के बाहर खड़े थे और भिक्षा की याचना करते हुए आवाज देने लगे। जिस घर में गए थे। वहां का मुखिया आ गया। मुखिया की पत्नी ने अपने पति को खाना खिलाया। मुनि की तरफ ध्यान नहीं दिया।

कौशिक द्वार पर ही खड़े रहे जब वह महिला भिक्षा देने आई। उसने मुनि से क्षमा मांगी। मुनि काफी गुस्सा थे। मुनि ने कहा कि बहुत देर से मैं यहां था। तब वह महिला बोली। ब्रह्मण श्रेष्ठ पति की सेवा में लगी रही इसलिए देर हो गई।

कौशिक ने कहा तुम्हें अपनी पतिव्रता पर घमंड है। तब स्त्री ने कहा कि नाराज न हों मुनि, आपसे प्रार्थना है कि मुझे पेड़ वाला बुगुला समझने की गलती न कीजिएगा। आपका क्रोध पति की सेवा में रत सती का कुछ नही बिगाड़ सकता। मैं बगुला नहीं हूं।

स्त्री की बातें सुनकर मुनि चौंक गए। उन्हें बड़ा अचरज हुआ कि इस स्त्री को बगुले के बारे में कैसे पता चल गया। तब वह स्त्री बोली की मुनि आपने धर्म का मर्म न जाना। शायद आपको इस बात का भी पता नहीं कि क्रोध एक ऐसा शत्रु है जो मनुष्य के शरीर के अंदर रहते हुए उसका नाश कर देता है।

Eagle and serpent was mainly because of the hostility

अमूमन यह प्रश्न सदियों से उठता आ रहा है कि नागों की उत्पत्ति कैसे हुई। नाग और गरुड़ के बीच मतभेद सदियों से चला आ रहा है। दरअसल नागों के बारे में भागवत् पुराण में विस्तृत लेख मिलता है।

कहते हैं कि कश्यप ऋर्षि की दो पत्नियां थीं। एक का नाम बनिता और दूसरी पत्नी का नाम कद्रू था। एक बार कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों पत्नियों से वर मांगने को कहा। कद्रू ने एक हजार वीर नागों की माता होनें का वर मांगा और बनिता ने एक वर से दो पुत्र मांगे जो बाद में अरूण और गरुण के नाम से प्रसिद्ध हुए।

नागों की मां कद्रू को धरती का प्रतीक माना जाता है। गरुड़ और अरुण की मां बनिता को स्वर्ग की देवी माना जाता है।

एक दिन कश्यप दोनों पत्नियों में इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि सूर्य के अश्व श्यामवर्ण के हैं या श्वेत। बनिता ने उनका रंग श्वेत बताया, पर कद्रू नहीं मानीं। वह एक ही रट लगाए हुए थी कि अश्व श्याम वर्ण के हैं। बनिता ने आखिरी शर्त लगा दी कि अगर अश्वों का रंग श्वेत हुआ तो तुम और तुम्हारे पुत्र हमारे दास रहेगें। कद्रू ने स्वीकार कर लिया।

शाम हुई। जब कद्रू ने अपने पुत्रों से इसकी चर्चा की तब शेषनाग को छोड़कर शेष सभी पुत्रों ने कहा कि मां तुम चिंता मत करो। हम लोग जाकर अश्वों से लिपट जाएंगे जिससे वे दूर से श्यामवर्ण के दिखाई देने लगेंगे। यह बात सुनकर कद्रू प्रसन्न हो गई।

परंतु बाद में बनिता को यह भेद पता चल गया और तभी से गरुण और नागों की दुश्मनी चली आ रही है।

Facing troubles the mind wanders

कुछ छोटे लेकिन कारगर उपायों पर अमल करके मन की शांति तलाशी जा सकती है। बहुत सारी चुनौतियों के बीच, उलझनों और भटकावों से जूझते हुए मन अशांत रहने लगता है।

मन की शांति पाने के लिए कोशिश इसलिए भी जरूरी है कि मन शांत नहीं है तो मिलने वाली सफलताओं में भी आपका मन नहीं लगेगा। जब हमारा मन शांत होता है तो हम चीजों को सही रूप में देख पाते हैं। उनके नए अर्थ और आशय तलाश पाते हैं।

सहज और शांत मन के जरिए ही हम जीवन को जी सकते हैं। मन की शांति के लिए कुछ छोटे कदम मददगार साबित हो सकते हैं।

कुछ समय अकेले रहें

किसी शांत जगह पर कुछ देर अकेले बैठें और अपने बारे में सोचें। अपनी जिंदगी, अपने विश्वासों, अपनी इच्छाओं और अपनी भावनाओं को लेकर विचार करें। अपनी जिंदगी के सभी पक्षों के बारे में विचार से आपको अपने लिए सही दिशा तलाशने में मदद भी मिलेगी।

गुणों और दोषों पर विचार

अपने गुणों का विस्तार करने की दिशा में सोचें और अपनी कमियों को सुधारने की तरफ ध्यान दें। अगर आप अपनी कमियों को किसी तरह अपनी खासियत में बदल सकते हैं तो उस दिशा में भी सोचें। अपने गुणों और अपनी कमियों के बारे में जानकर आप अधिक बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे।

नई चीजों के साथ जुड़ें

खुद को नई गतिविधियों और नई संस्कृति में ढालने का प्रयास करें। इस तरह आप अपने ईगो के बारे में भी जान पाएंगे और उसे संभालना भी सीखेंगे। अगर आप नए लोगों के बीच भी असहजता महूसस नहीं करेंगे तो आप अपने कठिन समय में भी शांति तलाश सकेंगे।

ध्यान की मदद लें

ध्यान के जरिए आप भटकते हुए मन को एकाग्र करने का सामर्थ्य जुटा सकेंगे। ध्यान आपको आंतरिक शांति और अपने बारे में जानने में मदद करता है। ध्यान के जरिए आप कठिनाइयों के हल तक पहुंच पाते हैं। यह भटकाव को खत्म करने और स्व पर केंद्रित करने में मदद करता है। ध्यान के जरिए हम अपने मानसिक सामर्थ्य का भी विस्तार करते हैं।

प्रेमभाव से जीवन को देखें

अपने आसपास की चीजों, प्रकृति और संसार को प्रेमभाव के साथ देखें। उनकी बहुत छोटी-छोटी विशेषताओं पर गौर करें। बिना किसी शर्त के अपने मित्रों के प्रति प्रेम व्यक्त करें। दुनिया की आलोचना करना बंद करें। दूसरों के दोषों को नहीं उनकी खासियत तलाशें। ऐसा करते ही आप पाएंगे कि अब कोई भी द्वंद्व नहीं है और जीवन शांत अवस्था में है।

दूसरों के प्रति आभारी रहें

अपनी जिंदगी, परिजनों, प्रियजनों, मित्रों और अन्य साथियों के प्रति आभारी रहें। वे किस तरह आपकी जिंदगी को खुशनुमा बनाते हैं उसके लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करें। यह आभार शब्दों में नहीं बल्कि आपके व्यवहार और आपके उनके प्रति प्रेम द्वारा व्यक्त होना चाहिए। इससे सच्ची शांति मिलेगी।

Monday, 23 June 2014

Who was the father of sita

हिंदू धार्मिक ग्रंथ रामायण के मुख्य पात्र श्रीराम हैं और सीता उनकी धर्मपत्नी। अक्सर लोगों को यह प्रश्न जिज्ञासा पैदा करता है कि सीता आखिर किसकी पुत्री थीं। ज़ाहिर तौर पर इसका उत्तर आप खोज रहें होंगे। जिसका उत्तर यहां आप को मिल ही जाएगा।

सीता किसकी पुत्री थीं। इसे जानने के लिए पहले हमें यह जानना बेहद जरूरी है कि उस काल में यानी श्रीराम जन्म के पहले का क्या घटित हो रहा था।

उस समय दशानन रावण तीनों लोकों पर न सिर्फ अधिकार प्राप्त करना चाहता था बल्कि अमर भी होना चाहता था। इसके लिए रावण ने कड़ी तपस्या की। रावण के तप से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और रावण को मनोकामनापूर्ति करने वाला वर दिया।

रावण ने ब्रह्माजी से वर मांगा कि- ' हे प्रभु! मुझे ऐसा वर दीजिए ताकि सुर, असुर, पिशाच, नाग, किन्नर या अप्सरा कोई भी मेरा वध न कर सके। इसके अतिरिक्त एक अन्य वर भी मांगता हूं।

जब मैं मोह के वशीभूत होकर अपनी ही कन्या से संसर्ग करने की प्रार्थना करूं और वह उसे अस्वीकार कर दे तभी मेरी मृत्यु हो। रावण को यह वरदान देकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए।

रावण वरदान पाकर घमंड से चूर हो गया। एक दिन वह घूमते हुए दंडकारण्य पर्वत पर गया। उसने वहां रहने वाले सभी ऋर्षि-मुनियों से कहा कि वह विश्व विजेता है। आप मुझे आशीर्वाद दें। यह कहकर उसने ऋर्षियों के शरीर पर तीर चुभोकर बहुत सारा रक्त निकालकर एक कलश भर लिया।

उन ऋर्षियों में से एक ऋर्षि गत्समद भी थे। वह सौ पुत्रों के पिता थे। उन्हें एक पुत्री की बड़ी ही लालसा थी। उन्होंने भगवान से इच्छा जाहिर की कि उनके यहां लक्ष्मी जी कन्या रूप में आएं। इस तरह उन्होंने दूध को अभिमंत्रित किया और कुश के अग्र भाग से एक कलश में रख दिया। इसके बाद वह वन में तपस्या के लिए चले गए।

संयोग से रावण भी उसी दिन वहां रावण आया और उसी कलश में ऋर्षियों का रक्त भरकर उसे लंका साथ ले गया। राजमहल में पहुंचकर उसने अपनी पत्नी मंदोदरी से कहा कि इस कलश में विषैला रक्त भरा है। अतः तुम इसकी रक्षा करो। मैनें मुनियों पर विजय प्राप्त की है और उनके रक्त को इस कलश में भर दिया है।

इसके बाद रावण ने देवताओं, दानवों, यक्षों और गंधर्वों की स्त्रियों की कन्याओं का अपहरण करके ले आया और उनके साथ पर्वतों पर विचरण करने लगा। मंदोदरी ने जब रावण को अन्य स्त्रियों के साथ रमण करते देख उसे अच्छा नहीं लगा। वह मरने के बारे में सोचने लगी और मंदोदरी ने कलश में रखे ऋर्षि-मुनियों के रक्त को पी लिया।

रक्त को पीते ही मंदोदरी को गर्भ ठहर गया। वह गर्भवती हो चुकी थी। उसने सोचा मेरे पति मेरे पास नहीं है। ऐसे में जब उन्हें इस बात का पता चलेगा। तो वह क्या सोचेंगे की इस बीच मेरा किसी और पुरुष के साथ संसर्ग हो गया है।

ऐसा विचार करते हुए मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र आ गई। वहां उसने गर्भ को निकालकर भूमि में दफना दिया। इसके बाद उसने सरस्वती नदी में स्नान किया और लंका वापस लौट गई।

कुछ समय बाद राजा जनक कुरुक्षेत्र गए और उन्होंने सोने के हल से उस भूमि को खोदा तो उन्हें एक कन्या मिली। उनके यहां कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने उस कन्या को अपना लिया।

हिंदू शास्त्रों में यह प्राचीन कहानी सीता के संबंध में मिलती है। सवाल फिर भी आज रहस्य बना हुआ है कि सीता आखिर किसकी पुत्री थीं। गत्समद ऋर्षि की, मंदोदरी की या फिर राजा जनक की?


Om word glory

देखा जाए तो हर धर्म में कोई न कोई प्रतीक चिह्न हुआ ही करता है। हिंदुओं में ऊँ को पवित्र अक्षर माना जाता है। हर धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत ऊँ के उच्चारण से किया जाता है।

ऊँ शब्द तीन अक्षरों अ, उ और म से मिलकर बना है। पर इसमें ऐसा क्या खास है कि इसे हिन्दुओं ने अपना पवित्र धार्मिक प्रतीक मान लिया है। असंख्य शब्दों और चिह्नों में से ऊँ और स्वास्तिक को ही क्यों चुना गया। ये सवाल महत्त है। जरा देखें ओम के उच्चारण से क्या घटित और परिवर्तित होता है।

    ऊँ की ध्वनि मानव शरीर के लिए प्रतिकूल डेसीबल की सभी ध्वनियों को वातावरण से निष्प्रभावी बना देती है।

    विभिन्न ग्रहों से आनेवाली अत्यंत घातक अल्ट्रावायलेट किरणें ओम उच्चारित वातावरण में निष्प्रभावी हो जाती हैं।

    इसके उच्चारण से इंसान को वाक्य सिद्धि की प्राप्त होती है।

    चित्त एवं मन शांत एवं नियंत्रित हो जाते हैं।

    सनातन धर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ऊँ को महत्व प्राप्त है।

बौद्ध दर्शन में ऊँ का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार, ऊँ को मणिपुर चक्र में अवस्थितमाना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी ऊँ के महत्व को दर्शाया गया है। कबीर निर्गुण संत एवं कवि थे। उन्होंने भी ऊँ के महत्व को स्वीकारा और इस पर साखियां भी लिखीं।

गुरुनानक ने ऊँ के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा- ओम सतनाम कर्ता पुरुष निर्भोनिर्बेरअकालमूर्त। ऊँ सत्य नाम जपने वाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं अकाल-पुरुष के सदृश हो जाता है।

इस तरह ऊँ के महत्व को सभी संप्रदाय के धर्म-गुरुओं, उपासकों, चिंतकों ने प्रतिपादित किया है, क्योंकि यह एकाक्षरी मंत्र साधना में सरल है और फल प्रदान करने में सर्वश्रेष्ठ।

यह ब्रह्मांड का नाद है एवं मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक। किसी भी मंत्र के पहले ऊँ जाेडने से वह शक्ति संपन्न हो जाता है। एक बार ऊँ का जाप हजार बार किसी मंत्र के जाप से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

Spirituality-and-music

हमारे दर्शन में नाद को ब्रह्म माना गया है। नाद मतलब ध्वनि और ध्वनि मतलब संगीत क्योंकि शोर और आवाज़ के बीच बहुत फर्क है, फासला है। आवाज़ का मतलब ध्वनि से है। संगीत ध्वनि का ही नाजुक, खुशनुमा हिस्सा है।

वैसे तो हर धर्म में आराधना-उपासना की एक खास पद्धति हुआ करती है, लेकिन संगीत उसका एक अहम हिस्सा हुआ करता है। चाहे आप उसे कुछ भी कह लें ध्यान का साधना कह लें या फिर आराधना का तरीका, संगीत उसका हिस्सा होता है।

अमूमन मंदिरों में या फिर घरों में पूजा या फिर किसी भी दूसरी तरह के धार्मिक अनुष्ठानों में इन सारे वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है। जिन घरों में मंदिर हैं, उन घरों में गरूड़जी और मंजीरा मंदिरों का एक अहम हिस्सा हुआ करते हैं। संगीत हमारे जीवन की अंतर्धारा है। हर अवसर पर शगुन, शुभ और उत्सव की अभिव्यक्ति संगीत के माध्यम से की जाती है।

    जप : यदि नाम ही जपा जा रहा है तो उसे भी सस्वर किया जाता है।

    मंत्रजाप : मंत्रों का जाप तो सस्वर होता ही है। एक विशेष लय में मंत्रजाप थोड़ी देर में सुनने वाले और जपने वालों को स्थिर मनोदशा में ले जाने में कामयाब हुआ करता है।

    भजन : ईश्वर की भक्ति में भजन गाना एक तरह से ध्यान में जाने का ही उपक्रम है। भक्ति में लीन होने का खुद में डूब जाने का या फिर यूं कह लें कि सबसे अलग हो जाने में भजन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।

    आरती : सस्वर आरती... पूजा के समापन की परंपरा है। ये भी संगीत का ही एक रूप है। आरती पूजा के पूर्णाहुति मानी जानी चाहिए। औपचारिक तौर पर पूजा का समापन।

    सामूहिक कीर्तन : भजन से आगे बढ़कर कीर्तन भी हमारे यहां भक्ति का एक रूप है। जब समूह में भजन गाए जाते हैं, वाद्य-यंत्रों के साथ तो वह कीर्तन का रूप ले लेता है। ये सामूहिक ध्यान का सर्वोत्तम पद्धति है।

ये तो सारे धार्मिक अनुष्ठानों के हिस्से हैं, लेकिन हमारी परंपरा और संस्कृति का संगीत से गहरा संबंध है। जीवन के हर हिस्से में संगीत उत्साह और उत्सव की अभिव्यक्ति संगीत के माध्यम से हुआ करती है।

शायद दुनिया भर में हर कहीं संगीत भीतर के उत्साह का व्यक्त करने का माध्यम हुआ करता है। किस तरह हमारे यहां हर शुभ अवसर के लिए खास तरह के संगीत की व्यवस्था है, ये सिद्ध करता है कि संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह आत्मा का परिष्कार है।

    गणपति : शादी के शगुन गीतों की शुरुआत गणपति से हुआ करता है। हमारे यहां गणपति की स्तुति से हर शुभ अवसर की शुरुआत की जाती है। तो शादी के मौके पर गणपति गाए जाने की परंपरा शुभ अवसर पर उन्हें आमंत्रित करना है।

    बन्ना-बन्नी : शादी के संगीत का अहम हिस्सा रहा है। अब चाहे इसकी जगह महिला संगीत ने ले ली है, लेकिन बन्नाा-बन्नाी गाया जाना भी विवाह उत्सव के उत्साह की अभिव्यक्ति है।

    मेंहदी : मेंहदी गीत भी विवाह-संगीत की एक परंपरा है।

    विदाई : विदाई गीत एक किस्म के कैथार्सिस का तरीका है। बेटी की विदाई पर चूंकि बेटी सहित परिजनों का मन भरा हुआ होता है, ऐसे में माहौल को हल्का करने के लिए और उस विछोह को व्यक्त करने के लिए विदाई गीत गाए जाते हैं। विदाई गीतों में खासतौर पर बेटी को नए घर में रहने, इस घर में रहने की यादें और उसके साथ के दिनों में प्रेम और स्मृति की अभिव्यक्ति की जाती है।

हमारे जीवन के हर हिस्से में संगीत का शुमार यूं ही नहीं है। असल में संगीत उस नाद ब्रह्म का हिस्सा है, जिसे हमने एक विधा के तौर पर ईजाद किया है।

संगीत का लक्ष्य सिर्फ मनोरंजन नहीं है, ये ध्यान की एक विधि है, अध्यात्म के चरम पर पहुंचने और आनंद की अनुभूति का साधन है... यहां से परमात्मा के अहसास का रास्ता निकलता है।