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Tuesday, 25 February 2014

Love the scent of her identity

कहते हैं कि 'जब अन्य चीजों को सीखने के प्रयास खत्म हो जाते हैं वहीं प्रेम प्रकट होता है। आप तभी प्रेम कर सकते हैं जबकि आप आधिपत्य की कोशिश नहीं करते हैं।'

जब आपका दिल, दिमाग की चीजों चालाकियों से नहीं भरा होता, तब प्रेम से भरा होता है। एकमात्र और अकेला प्रेम ही है जो निवर्तमान दुनिया के पागलपन, उसकी भ्रष्टता को खत्म कर सकता है। प्रेम के सिवा, कोई भी संकल्पना, सिद्धांत, वाद दुनिया को नहीं बदल सकते।

आप तभी प्रेम कर सकते हैं जब आप आधिपत्य करने की कोशिश नहीं करते, ईर्ष्यालु या लालची नहीं होते। जब आप में लोगों के प्रति आदर होता है, करूणा होती है, हार्दिक स्नेह उमड़ता है तब आप प्रेम में होते हैं। जब आप अपनी पत्नी, प्रेमिका, अपने बच्चों, अपने पड़ोसी, अपने बदकिस्मत सेवकों के बारे में सद्भावपूर्ण ख्यालों में होते हैं तब आप प्रेम में होते हैं।

प्रेम ऐसी चीज नहीं जिसके बारे में सोचा विचारा जाए, कृत्रिम रूप से उसे उगाया जाए, प्रेम ऐसी चीज नहीं जिसका अभ्यास कर कर के सीखा जाए। विश्वबंधुत्व और भाईचारा आदि सीखना दिमागी बाते हैं प्रेम कतई नहीं।

जब भाईचारा, विश्वबंधुत्व, दया, करूणा और समर्पण सीखना पूर्णत: रूक जाता है, बनावटीपन ठहर जाता है तब असली प्रेम प्रकट होता है। प्रेम की सुगंध ही उसका परिचय होता है।

रेगिस्तान की तरह शुष्क आज के सभ्य विश्व में जहाँ भौतिक सुख और इच्छाएं ही प्रमुख हो गए हैं प्रेम नहीं बचा है। लेकिन फिर भी प्रेम के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं। आपके पास प्यार ही नहीं जब तक सुन्दरता न हो।

सुन्दरता वह नहीं जो आप बाहर देखते हैं-कोई सुन्दर वृक्ष, एक सुन्दर तस्वीर, एक भव्य सुन्दर इमारत या एक सुन्दर स्त्री बल्कि सुन्दरता आपका वह अन्त:करण है जो आपकी आंख बाहर को प्रक्षेपित करती है।

जब आपके दिल दिमाग जानते हैं कि प्रेम क्या है केवल तब ही सुन्दरता का अहसास हो सकता है। बिना प्रेम और सौन्दर्य बोध के किसी प्रकार की सच्ची नैतिकता का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। आप और हम सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि बिना प्रेम के आप कुछ भी करें, समाज सुधार करें, भूखों को खिलायें आप और अधिक पाखंड, वैषम्य और उलझनों में पड़ेंगे।प्रेम का अभाव ही हमारी कुरूपता, दिल और दिमाग की कंगाली का कारण है।

जब प्रेम और सौन्दर्य आपके मन में होता है तब आप जो भी करते हैं लयबद्ध होता है, विधिसम्मत होता है। यदि आप जानते हैं कि प्रेम कैसे करना है, तब आप कुछ भी करें यह अवश्य ही सभी समस्याओं का हल बन जाता है।

Dead are in paradise

अजर अमर शिवशंकर के बारे में कहा भी जाता है कि ' भगवान शिव की आराधना मात्र से ही सभी के रोग, शोक और दुःख दूर हो जाते हैं और महादेव की नाम लेने से बिगड़े काम भी बन जाते हैं।'

शिव के कई रूप और कई नाम है और कई चमत्कार पर भक्त उन्हें जिस रूप में भी अपनी आस्था और श्रद्धा से उनका ध्यान करता है भगवान भोलेनाथ उस भक्त की हर मनोकामना पूरी करते हैं। ऐसा ही है महाशिवरात्रि का यह अनोखा प्रसंग जिसमें एक निर्दयी भील भी करुणा करके अपने जीवन को तार लेता है।

शिव महापुराण के अनुसार सर्वप्रथम भगवान शिव ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुए थे। वह मार्गशीर्ष मास में आद्ध नक्षत्र से युक्त प्रतिपदा का समय था। सबसे पहले ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान शिव के दर्शन किए थे और इसी दिन को महाशिवरात्रि के रूप में तीनों लोक में मनाया जाने लगा। यह दिन बहुत शुभ होता है। इस दिन भक्त रात्रि जागरण कर शिव कृपा पाने के लिए पूजा करते हैं।

महाशिवरात्रि पर कई कथाओं का उल्लेख पुराणों में मिलता है पर गुरुदुरु की कथा सर्वमान्य है वह इसलिए क्योंकि इस कथा के बारे में स्वयं भगवान महाकाल ने शिव महापुराण में देवर्षि नारद जी को बताया था। इस कथा को महाशिवरात्रि पर सुनने और पढ़ने मात्र से बहुत पुण्य मिलता है।

बहुत समय पहले एक आदिवासी भील गुरुदुरु पृथ्वीलोक पर निवास करता था। गुरुदुरु वन में रहकर पशु पक्षियों का शिकार करके अपने कुटुम्ब का पेट भरता था। वह एक हिरणी पर लक्ष्य साधे उसके पीछे-पीछे भाग रहा था। देखते ही देखते हिरणी अदृश्य हो गई। तब गुरुदुरु थकान से बेहाल होकर एक वृक्ष पर चढ़ गया। वह वृक्ष विल्ब वृक्ष था।

इस बिल्व वृक्ष के नीचे एक प्राकृतिक शिवलिंग बना हुआ था। तभी अचानक उसे वह हिरणी दिखाई दी गुरुदुरु हिरणी पर निशाना साधने को ही था कि उसका मन बोला कि 'तू क्यों इस निरीह प्राणी के प्राण हरना चाह रहा है। इसने तेरा क्या बिगाड़ा है।'

इसी समय वह हिरणी बोली कि मेरे पति मेरे बच्चे मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे मैं एक बार मिल आऊं तब तुम मुझे अपना शिकार बना सकते हो। गुरुदुरु धर्मसंकट में फंस गया एक तरफ तो सामने आया हुआ शिकार था जिस पर वह प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पा रहा था दूसरी तरफ उसका भूखा परिवार जो उसकी राह देख रहा होगा। आखिर उसने हिरणी को जाने दिया।

अब वह बिल्व वृक्ष के पत्ते तोड़कर नीचे गिराता गया। इसी समय अचानक एक और हिरणी दिखाई दी जैसे ही गुरुदुरु उसे मारने के लिए आतुर हुआ तो वह बोली कि मैं अपनी बहन को ढूंढने आई हूं। एक बार उससे मिलकर मैं आपके पास जरुर आऊंगी। यह सुनकर गुरुदुरु ने उसे जाने दिया।

गुरुदुरु मन में सोच रहा था कि आज उसे ऐसा क्या अचानक हो गया है उसके अंदर दया, ममता, करुणा के भाव जागृत होने लगे हैं। जब यह बात गुरुदुरु सोच रहा था तभी एक हिरण उसे दिखाई दिया उसने भी दोनों हिरणियों की तरह अपने परिवार को एक बार देख आने की गुजारिश की और गुरुदुरु ने भी उसे जाने दिया।

भील ने सोचा की वो दोनों हिरणियां यहां अब नहीं आएंगी। दोनों मुर्ख बनाकर चली गईं। तभी अचानक भील गुरुदुरु ने पेड़ से नीचे उतरा उसने बिल्व पत्र हटाए तो एक शिवलिंग पाया। उसने भगवान से प्रार्थना की कि वह क्या करे? निर्दोष जीवों की हत्या करना उसे अच्छा नहीं लगता है परंतु परिवार का भरण पोषण करने के लिए यह पाप भी करना पड़ता है। अब आप ही बताइए प्रभु मैं क्या करूं । मुझ पापी का कल्याण कीजिए।

इस बीच हिरण परिवार अपने वचन के अनुसार भील के पास आ पहुंचा पर भील बोला मैं तुम्हें नहीं मारुंगा। भील बोला मुझे परिवार का भूख से मरना स्वीकार है तुम निर्दोषों को मारना स्वीकार नहीं है।

इसी दौरान भील गुरुदुरु के समक्ष भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और तीनों हिरणों को आशीर्वाद देकर भोलेनाथ गुरुदुरु से बोले 'आज से तुम्हें ऐसा काम नहीं करना पड़ेगा। यह काम तुम्हें पाप और आत्मग्लानि के बोझ तले दबाता जा रहा है।' भील शिवशंकर से बोला 'इतनी कृपा मुझ दीन हीन पर क्यों प्रभु ? अजर त्रिकालदर्शी भगवान शिव ने कहा कि आज महाशिवरात्रि है। आज के दिन बिल्व पत्रों से मेरी पूजा करने के फलस्वरूप तुम्हारा यह काया कल्प हुआ है और तीनों हिरणों ने अपना वचन पूरा कर दिखाया। अब ये हमेशा दिव्य रूप में रहेंगे।

भगवन बोले गुरुदुरु तुमने शिव के भक्तों में अपना नाम अमर कर दिया है। जो भक्त तुम्हारी यह कथा महाशिवरात्रि के दिन सुनेगा। उसे वही सुख मिलेगा जो तुम्हें मिला है।

Monday, 24 February 2014

You can become rich with remembering

संसार के लगभग हर धर्म में माला जपने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है। मालाएं कई तरह की होतीं हैं कोई माला मोतियों माणिक की बनी होती है तो कोई तुलसी के काष्ठ (लकड़ी) की।

मान्यता है कि इनमें पत्थर से बनी माला काफी शुभ है। प्रत्येक साधना में अलग-अलग मालाओं का उल्लेख रहता है। इसका कारण यही है, मालाएं तो सभी एक सी ही हैं। जिस साधना विशेष के लिए जिस माला का प्रयोग बताया जाता है उस साधना के लिए वही माला प्रयुक्त करनी चाहिए।

कहते हैं कि मालाओं का पूजा के समय उपयोग करने पर आपको धन की प्राप्ति होती है। और लक्ष्मी जी की कृपा हमेशा आप पर बनी रहती है।

श्री लक्ष्मी साधना के लिए हमेशा सिद्ध की गई माला से लक्ष्मी साधना संपन्न होती है। अगर बगैर सिद्ध की हुई माला से प्रयास किया भी जाए तो असफलता ही मिलेगी जो मुख्य बात होती है वह माला में नहीं बल्कि इस बात में होती है कि वह किन मंत्रो से और किस पद्धति से प्राण प्रतिष्ठित की गई है।

महत्व मंत्र उर्जा एवं प्राणश्चेतना का ही होता है शेष माला का पदार्थ एक आधार का काम करता है। वैसे बाजार में सभी प्रकार की मालाएं मिलती हैं बिना मंत्र सिद्ध की हुई माला चेतना के नाम पर वे निष्प्राण होती हैं और इसी कारण साधना के लिए यह विफल हो जाती हैं।
 

Sunday, 23 February 2014

Dirt cheap sand

एक बंजारा था। वह बैलों पर मिट्टी ( मुल्तानी मिट्टी) लादकर दिल्ली की तरफ आ रहा था। रास्ते में कई गांवो से गुजरते समय उसकी बहुत-सी मिट्टी बिक गई। बैलों की पीठ पर लदे बोरे आधे तो खाली हो गए और आधे भरे रह गए। अब वे बैलों की पीठ पर कैसे टिकें? क्योंकि भार एक तरफ ज्यादा हो गया था।

नौकरों ने पूछा कि क्या करें ? बंजारा बोला- 'अरे ! सोचते क्या हो, बोरों के एक तरफ रेत (बालू) भर लो। यह राजस्थानी जमीन है, यहां रेत बहुत है।' नौकरों ने वैसा ही किया। बैलों की पीठ पर एक तरफ आधे बोरे में मिट्टी हो गई और दूसरी तरफ आधे बोरे में रेत हो गई।

दिल्ली से एक सज्जन उधर आ रहे थे। उन्होंने बैलों पर लदे बोरों में से एक तरफ रेत गिरते हुए देखी तो बोले कि बोरों में एक तरफ रेत क्यों भरी है ? नौकरों ने कहा- 'सन्तुलन करने के लिये।' वे सज्जन बोले- 'अरे यह तुम क्या मूर्खता करते हो ?

तुम्हारा मालिक और तुम एक से ही हो। बैलों पर मुफ्त में ही भार ढोकर उनको मार रहे हो मिट्टी के आधे-आधे दो बोरों को एक ही जगह बांध दो तो कम-से-कम आधे बैल तो बिना भार के चलेंगे।'

नौकरों ने कहा कि आपकी बात तो ठीक जंचती है, पर हम वही करेंगे, जो हमारा मालिक कहेगा। आप जाकर हमारे मालिक से यह बात कहो और उनसे हमें आदेश दिलवाओ। वह राहगीर (बंजारे) से मिला और उससे बात कही। बंजारे ने पूछा कि आप कहां के हैं ? कहां जा रहे हैं ?

उसने कहा कि मैं भिवानी का रहने वाला हूं रुपए कमाने के लिए दिल्ली गया था। कुछ दिन वहां रहा, फिर बीमार हो गया। जो थोड़े रुपए कमाए थे, वे खर्च हो गये। व्यापार में घाटा लग गया। पास में कुछ रहा नहीं तो विचार किया कि घर चलना चाहिये।

उसकी बात सुनकर बंजारा नौकरों से बोला कि इनकी सलाह मत लो। अपने जैसे चलते हैं, वैसे ही चलो। इनकी बुद्धि तो अच्छी दिखती है, पर उसका नतीजा ठीक नहीं निकलता नहीं तो ये अबतक धनवान हो जाते। हमारी बुद्धि भले ही ठीक न दिखे, पर उसका नतीजा ठीक होता है। मैंने कभी अपने काम में घाटा नहीं उठाया।

बंजारा अपने बैलों को लेकर दिल्ली पहुंचा। वहां उसने जमीन खरीदकर मिट्टी और रेत दोनों का अलग-अलग ढेर लगा दिया और नौकरों से कहा कि बैलों को जंगल में ले जाओ और जहां चारा-पानी हो, वहां उनको रखो। यहां उनको चारा खिलायेंगे तो नफा कैसे कमाएंगे ? मिट्टी बिकनी शुरु हो गई।

उधर दिल्ली का बादशाह बीमार हो गया। बादशाह के हकीम ने सलाह दी कि अगर बादशाह राजस्थान के धोरे (रेत के टीले) पर रहें तो उनका शरीर ठीक हो सकता है। रेत में शरीर को निरोग करने की शक्ति होती है। इसलिए बादशाह को राजस्थान भेज देना ठीक रहेगा।

तब एक दरबारी ने कहा कि- 'राजस्थान क्यों भेजें ? वहां की रेत यहीं मंगा लेते हैं, अरे ! यह दिल्ली का बाजार है, यहां सब कुछ मिलता है मैंने एक जगह रेत का ढेर लगा हुआ देखा है।'बादशाह- 'अच्छा ! तो फिर जल्दी रेत मंगवा लो।'

बादशाह के आदमी बंजारे के पास गए और उससे पूछा कि रेत क्या भाव है ? बंजारा बोला कि चाहे मिट्टी खरीदो, चाहे रेत खरीदो, एक ही भाव है। दोनों बैलों पर बराबर तुलकर आए हैं।

बादशाह के - कारिंदों ने वह सारी रेत खरीद ली। अगर बंजारा दिल्ली से आए उस सज्जन की बात मानता तो ये मुफ्त के रुपए कैसे मिलते ? जाहिर तौर पर बंजारे की बुद्धि ठीक काम करती थी।

it is given in a court of devotees gods punishment

देवी और देवताओं की जन्मस्थली भारत में सदियों से कई प्रथाएं और परंपराए रही हैं। अपनी हर समस्या के निदान के लिए धर्म के प्रति आस्था रखने वाले लोग देवताओं के मंदिरों में नतमस्तक होनेआते हैं।

मान्यता है कि बस्तर के लोग जनअपेक्षाओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरने वाले देवताओं को दंडित करने का जज्बा रखते हैं। यह दंड आर्थिक जुर्माने, अस्थायी निलंबन या फिर हमेशा के लिए देवलोकसे देवी-देवताओं की विदाई के रूप में होता है और फैसला लेती है 'जनता की अदालत'।

छत्तीसगढ़ के स्तर जिले के केशकाल कस्बे में हर साल भादों जात्रा उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यहां की भंगाराम देवी 9 परगना के 55 राजस्व ग्रामों में रहने वाले लोगों और देवी-देवता का दर्जा प्राप्त मानवों की आराध्य देवी हैं।

इस वर्ष भादो जात्रा माह उत्सव 31 अगस्त को केशकाल में आयोजित हुआ था। भादो जात्रा में सांप्रदायिकता की मिसाल भी मिलती है। भंगाराम देवी के मंदिर के समीप डॉक्टर खान को देवता का दर्जा प्राप्त है। उन पर पूरे 9 परगना के लोगों को बीमारियों से बचाए रखने की जिम्मेदारी है।

कहते हैं कि वर्षो पहले क्षेत्र में कोई डाक्टर खान थे, जो बीमारों का इलाज पूरे सेवाभाव और नि:स्वार्थ रूप से किया करते थे। उनके न रहने पर उनकी सेवा भावना के कारण उन्हें यहां की जनता ने देव रूप में स्वीकार कर लिया और उनकी पूजा की जाने लगी।

जहां अन्य देवताओं को भेंट स्वरूप बलि दी जाती है, वहीं डाक्टर खान देव को अंडा और नींबू अर्पित किया जाता है। बस्तर का आदिवासी समाज जागरूक है। वह आंख मूंदकर अपने पूजित देवी-देवताओं पर विश्वास करने के बजाय ठोंक बजाकर उन्हें जांचता-परखता है।

अकर्मण्य और गैरजिम्मेदार देवी-देवताओं को सफाई पेश करने का मौका देकर जनअदालत में उन्हें सजा भी सुनाता है। सजा देने वाले होते हैं भगवान के भक्त। यह स्थिति तब निर्मित होती है, जब इलाके का जनमानस किसी भी वजह से दुखी और पीड़ित होता है।

भक्तों की जन अदालत में देवताओं के खिलाफ लिए गए फैसलों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पूजित देवताओं के प्रति समर्पित भक्त का यदि अहित हो तो यह भक्त का अधिकार है कि वह अपने आराध्य को कटघरे में खड़ा करे।

शास्त्रों के अनुसार, भगवान भक्त के अधीन होते हैं। इसी के अनुरूप आदिम प्रजाति में इस परंपरा का प्रादुर्भाव हुआ होगा।

बाहरी दुनिया की सभ्य संस्कृति के लोग भले ही ऐसा न कर सकें, लेकिन बस्तर के जनजातीय समुदाय के लोग जैसे पूरे देश में विरले ही होंगे, जो भगवान को भी जनअदालत के कटघरे में खड़ा कर उन्हें सजा भी सुनाते हों।

भादो के आखिरी शनिवार को हर साल केशकाल में लगने वाली जनअदालत में जिन देवी-देवताओं को सजा सुनाई जाती है, उनकी वापसी का भी प्रावधान है, लेकिन उनके चरण तभी पखारे जा सकते हैं।

जब वे अपनी गलतियों को सुधारते हुए भविष्य में लोककल्याण के कार्यों को प्राथमिकता से करने का वचन देते हैं।

सजा पाए देवी-देवता संबंधित पुजारी को स्वप्न में वचन देते हैं। कि वह उनके सभी कार्यों को पूरा कर देंगे।

Wednesday, 19 February 2014

Try this perfect recipe for happy living

ज़िंदगी के दो पहलू होते हैं सुख और दुःख। इन दोनों पहलुओं से होते हुए इंसान आगे की ओर बढ़ता जाता है।

जिंदगी जीने के फलसफे को समझने के बहुत ही रोचक तरीके हैं। एक तो यही है कि सुख व दुख यह जिदंगी के दो निश्चित पहलू है जिसे आज सुख मिल रहा है वह कल दुखी हो सकता है और जो आज दुखी है वह सुखी होगा। यह क्रिया मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से चलती आ रही है।

इन दोनों में से चित्त ही है जो हममें से अधिकांश को सबसे अधिक प्रभावित करता है। या तो हम बहुत ही गंभीर रूप से बीमार हों या फिर आधारभूत आवश्यकताओं से वंचित हो जाएं,हमारी शारीरिक स्थिति की भूमिका जीवन में गौण होती है। यदि हमारा शरीर संतुष्ट हो तो हम असल में उसकी उपेक्षा करते हैं। परन्तु चित्त प्रत्येक घटना को दर्ज कर लेता है फिर चाहे वह घटना कितनी ही छोटी ही क्यों न हो।

कहते हैं कि मेरे अपने सीमित अनुभव के आधार पर मैंने देखा है कि आंतरिक शांति की अधिकतम मात्रा प्रेम तथा करुणा के विकास से आती है।

हम दूसरों के सुख के विषय में जितना अधिक सावधान रहते हैं, हमारे अपने कल्याण की भावना उतनी अधिक होती है। दूसरों के प्रति एक सद्भाव का विकास करना अपने चित्त में स्वाभाविक रूप से चित्त को सहजता देता है। यह हममें जो भी भय अथवा असुरक्षा की भावना हो, उसे दूर करने में सहायक होता है और हमें किसी भी आने वाली बाधा का सामना करने की शक्ति देता है। यह जीवन में सफलता का परम स्रोत है।

इस संसार में जब तक हम जीवित हैं तब तक बाधाओं का सामना करना हमारे लिए कर्म की तरह है। यदि ऐसे अवसरों पर हम आशा छोड़ कर निरुत्साहित हो जाएं, तो हम अपनी कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता को कम करते हैं।

केवल हम ही नहीं,बल्कि प्रत्येक को दुःखों का सामना करना पड़ता है तो यह यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य हमारी कठिनाइयों पर काबू पाने के निश्चय और क्षमता को और बढ़ाएगा। निश्चित रूप से इस प्रकार की मनोवृत्ति से,प्रत्येक बाधा हमारे चित्त में सुधार लाने के लिए एक और बहुमूल्य अवसर प्रतीत होगा।

अर्थात् हम दूसरों के दुःखों के प्रति सच्ची करुणा की भावना और उनकी पीड़ा दूर करने के लिए निश्चय की भावना का विकास कर सकते हैं। फलस्वरूप, हमारी अपनी शांति और आंतरिक शाक्ति अधिक होगी।

अगर हम लोभ, मोह, माया, तृष्णा को छोड़ परमपिता परमात्मा की आराधना में डूब जाएं तो दुख हमको स्पर्श भी नहीं कर सकेगा। याद रखें कि 'दुनिया में कर्म ही पूजा है और यह कर्म ही आपको चिरकाल के लिए महान बनाता है।'

Miracles of gurus three lesson

न्यायप्रिय राजा हरि सिंह बेहद बुद्धिमान था। वह प्रजा के हर सुख-दुख की चिंता अपने परिवार की तरह करता था। लेकिन कुछ दिनों से उसे स्वयं के कार्य से असंतुष्टि हो रही थी। उसने बहुत प्रयत्न किया कि वह अभिमान से दूर रहे पर वह इस समस्या का हल निकालने में असमर्थ था।

एक दिन राजा जब राजगुरु प्रखरबुद्धि के पास गए तो राजगुरू राजा का चेहरा देखते ही उसके मन मे हो रही इस परेशानी को समझ गए। उन्होंने कहा, 'राजन् यदि तुम मेरी तीन बातों को हर समय याद रखोगे तो जिंदगी में कभी भी असफल नहीं हो सकते।

प्रखरबुद्धि बोले, 'पहली बात, रात को मजबूत किले में रहना। दूसरी बात, स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करना और तीसरी, सदा मुलायम बिस्तर पर सोना।' गुरु की अजीब बातें सुनकर राजा बोला, 'गुरु जी, इन बातों को अपनाकर तो मेरे अंदर अभिमान और भी अधिक उत्पन्न होगा।' इस पर प्रखरबुद्धि मुस्करा कर बोले, 'तुम मेरी बातों का अर्थ नहीं समझे। मैं तुम्हें समझाता हूं।

पहली बात-सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। कभी बुरी आदत के आदी मत होना। । दूसरी बात, कभी पेट भरकर मत खाना जो भी मिले उसे प्रेमपूर्वक खाना। खूब स्वादिष्ट लगेगा।

और तीसरी बात, कम से कम सोना। अधिक समय तक जागकर प्रजा की रक्षा करना। जब नींद आने लगे तो राजसी बिस्तर का ध्यान छोड़कर घास, पत्थर, मिट्टी जहां भी जगह मिले वहीं गहरी नींद सो जाना। ऐसे में तुम्हें हर जगह लगेगा कि मुलायम बिस्तर पर हो। बेटा, यदि तुम राजा की जगह त्यागी बनकर अपनी प्रजा का ख्याल रखोगे तो कभी भी अभिमान, धन व राजपाट का मोह तुम्हें नहीं छू पाएगा।'

संक्षेप में :

अहंकार बुद्धि को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। राजा को भी अहंकार होने लगा था। ऐसे में राजा ने तो राजगुरू से परामर्श कर अपनी परेशानी का हल निकाल लिया पर अगर आप इस परेशानी से जूझ रहे हों तो जल्द ही अपने मन के रावण रूपी अहंकार को निकाल कर राम नाम का जप कर जिंदगी को खुशहाल बनाएं ताकि आप हमेशा खुशी के पलों को महसूस कर सकें।

Tuesday, 18 February 2014

knowledge of art and then pride

एक युवा ब्रह्यचारी ने दुनिया के कई देशों में जाकर अनेक कलाएं सीखीं। एक देश में उसने धनुष बाण बनाने और चलाने की कला सीखी और कुछ दिनों के बाद वह दूसरे देश की यात्रा पर गया।

वहां उसने जहाज बनाने की कला सीखी क्योंकि वहां जहाज बनाए जाते थे। फिर वह किसी तीसरे देश में गया और कई ऐसे लोगों के संपर्क में आया, जो घर बनाने का काम करते थे।

इस प्रकार वह सोलह देशों में गया और कई कलाओं को अर्जित करके लौटा। अपने घर वापस आकर वह अहंकार में भरकर लोगों से पूछा- 'इस संपूर्ण पृथ्वी पर मुझ जैसा कोई गुणी व्यक्ति है ?'

लोग हैरत से उसे देखते। धीरे-धीरे यह बात भगवान बुद्ध तक भी पहुंची। बुद्ध उसे जानते थे। वह उसकी प्रतिभा से भी परिचित थे। वह इस बात से चिंतित हो गए कि कहीं उसका अभिमान उसका नाश न कर दे। एक दिन वे एक भिखारी का रूप धरकर हाथ में भिक्षापात्र लिए उसके सामने गए।

ब्रह्यचारी ने बड़े अभिमान से पूछा- कौन हो तुम ? बुद्ध बोले- मैं आत्मविजय का पथिक हूं। ब्रह्यचारी ने उनके कहे शब्दों का अर्थ जानना चाहा तो वे बोले- एक मामूली हथियार निर्माता भी बाण बना लेता है, नौ चालक जहाज पर नियंत्रण रख लेता है, गृह निर्माता घर भी बना लेता है।

केवल ज्ञान से ही कुछ नहीं होने वाला है, असल उपलब्धि है निर्मल मन। अगर मन पवित्र नहीं हुआ तो सारा ज्ञान व्यर्थ है। अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही ईश्वर को पा सकता है। यह सुनकर ब्रह्यचारी को अपनी भूल का अहसास हो गया।

संक्षेप में :

अहंकार बुद्धि को नष्ट कर देता है इसलिए अहंकार रहित ही रहना चाहिए।

Sunday, 16 February 2014

jyotirlinga where tridev resides

महाराष्ट्र के प्रमुख शहर नासिक से महज 28 किलोमीटर की दूरी पर त्रयंबकेश्वर (तीन नेत्र वाले ईश्वर) ज्योतिर्लिंग मंदिर स्थित है। इस मंदिर को लेकर ऐसा माना जाता है कि यहां त्रिदेव विराजमान हैं।

यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जहां केवल भगवान शिव नहीं बल्कि भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा भी हैं। इसी मंदिर के नजदीक ब्रह्मगिरि नामक पर्वत है जहां से गोदावरी नदी का उद्गम माना जाता है।

इस सुंदर मंदिर की छटा दूर से ही देखते बनती है। इसे देखकर ऐसा लगता है कि मानों इसने कई सालों का इतिहास अपने अंदर दबाकर रखा हुआ है।

पौराणिक कथा

त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रतिष्ठापना के बारे में उल्लेख है कि कभी यहां महर्षि गौतम निवास करते थे। एक बार उनके आश्रम में ब्राह्मणों और ऋषियों के छल से उन पर गो-हत्या का अपराध लग गया।

गो-हत्यारे महर्षि गौतम की भारी भर्त्सना की जाने लगी। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत आश्चर्यचकित और दु:खी थे।

उनके ऊपर सभी ब्राह्मणों का आश्रम छोड़ने का दबाव था। विवश होकर ऋषि गौतम ब्रह्मगिरी पर्वत पर चले गए और वहां भगवान शंकर का घोर तप किया। भगवान शंकर उनसे प्रभावित हुए और प्रकट होकर उनसे वर मांगने को कहा।

महर्षि गौतम ने उनसे कहा भगवान मैं यही चाहता हूं कि आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्त कर दें। भगवान शिव ने कहा - गौतम ! तुम सर्वथा निष्पाप हो। गो-हत्या का अपराध तुम पर छलपूर्वक लगाया गया था। इसलिए तुम पहले से पाप मुक्त हो। गौतम मुनि की प्रार्थना पर भगवान शंकर ब्रह्मगिरी की तलहटी में त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।


जीर्णोद्धार

इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था और 31 साल के लंबे समय के बाद 1786 में जाकर पूरा

हुआ। कहा जाता है कि इस भव्य मंदिर के निर्माण में करीब 16 लाख रुपए खर्च किए गए थे, जो उस समय काफी बड़ी रकम मानी जाती थी।


संरचना

गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर काले पत्थरों से बना है। मंदिर का स्थापत्य अद्भुत है। इस भव्य मंदिर में पूर्व की ओर सबसे बड़ा चौकोर मंडप है। इसके चारो ओर दरवाजे हैं। पश्चिमी

द्वार को छोड़कर बाकी तीनों से इसमें प्रवेश कर सकते हैं। इसका पश्चिमी द्वार श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्व अवसरों पर खोला जाता है। सभी द्वारों पर द्वार-मंडप हैं। गर्भगृह अंदर से चौकोर और बाहर से

बहुकोणीय तारे जैसा है। गर्भगृह के ऊपर शिखर है, जिसके अंत में स्वर्ण कलश लगा है।

अन्य स्थल

त्रयंबकेश्वर मंदिर ब्रह्मगिरि नामक पहाड़ी की तलहटी में स्थित है, जो अपने आप दर्शनीय स्थल है। ब्रह्मगिरि की बायीं ओर नीलगिरि की पहाड़ी है। इस पर नीलांबिका, नीलकंठेश्वर और भगवान दत्तात्रेय के मंदिर हैं। त्रयंबकेश्वर मंदिर के दर्शन के लिए आने वाले भक्तजन इन मंदिरों का भी दर्शन जरूर करते हैं।

इस तरह पहुंचें

नासिक से 28 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद त्रयंबकेश्वर मंदिर यातायात से पूरी तरह से जुड़ा हुआ है। यदि आप बस से पहुंचना चाहते हैं तो नासिक से सुबह पांच से लेकर रात नौ बजे तक हर 15

मिनट में सरकारी बसें चलाई जाती हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए कई निजी लग्जरी बसें भी उपलब्ध हैं। त्रयंबकेश्वर मंदिर का नजदीकी रेलवे स्टेशन नासिक ही है जो पूरे देश से रेल के जरिए जुड़ा हुआ है।

Thursday, 13 February 2014

Management guru lord krishna

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा श्रीमद् भागवत गीता में कहे गए ज्ञान का हर एक वाक्य हमें कर्म करने और जीने की कला सिखाता है। हमें हर काम में मैनेजमेंट की बेहद ज्यादा जरूरत है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने हर काम मैनेजमेंट से किया इसलिए वह सफल रहे।

कान्हा की बुद्धिमत्ता, चातुर्य, युद्धनीति, आकर्षण, प्रेमभाव, गुरुत्व, सुख-दुख आदि में खुश रहना और विशेष योग्यता के चलते उन्हें मैनेजमेंट गुरु कहा जाता है। आप भी मुरलीवाले के मैनेजमेंट को आजमाकर सफलता के नए आयाम रच सकते हैं।

1. अगर कंपनी मैनेजर श्रेष्ठ हो, तब वह किसी भी प्रकार के कर्मचारियों से काम करवा सकता है।

2. कंपनी के पास केवल श्रेष्ठ कर्मचारी हैं और नेतृत्वकर्ता को खुद ही सही दिशा का ज्ञान नहीं है ऐसे में सभी कर्मचारी अपनी बुद्धि के अनुसार काम तो करेंगे तो बेहतर होगा।

3. गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'युद्ध नैतिक मूल्यों के लिए भी लड़ा जाता है। कौरव व पांडव के बीच युद्ध के दौरान अर्जुन को कौरवों के रूप में अपने ही लोग नजर आ रहे थे। ऐसे में वह धनुष उठाने से मनाकर देते हैं। तब श्रीकृष्ण यद्ध के मैदान में ही अर्जुन को अपने उपदेशों के माध्यम से नैतिकता और अनैतिकता का पाठ पठाते हैं,और युद्ध के लिए प्रोत्साहित करते हैं।' कहने का आशय हर काम को प्रोत्साहित जरूर करें ऐसे में उत्पाद पर फर्क जरूर आता है।

4. प्रबंधकों को भी असंभव लक्ष्य पूरा करने के लिए दिए जाते है। ऐसे में कृष्ण जैसे प्रोत्साहनकर्ता की भी जरूरत है। गीता में कहा गया है कि 'अहंकार के कारण नुकसान होता है। कई बार प्रबंधक लगातार सफलता प्राप्त करने के बाद अपनी ही पीठ ठोंकता रहता है। यह समझने लगता है कि अब सफलता उसके बाएं हाथ का खेल है। इसके बाद जब उसे असफलता मिलती है।'

5. प्रबंधन में रहते हुए प्रबंधक को उद्दण्ड तथा अक्षम सहायक को भी क्षमा करना चाहिए तथा बार-बार उसे आगाह करते रहना चाहिए परंतु जब वह सीमा पार करने लगे और दण्ड देने के अतिरिक्त कोई चारा न हो तो ऐसा दण्ड दिया जाना चाहिए जो दूसरों के लिए भी उदाहरण का काम करे। प्रबंधनकर्ता को हमेशा धैर्य से काम लेना चाहिए।

6. छोटी-छोटी चीजों पर उसे अपना आपा नहीं खोना चाहिए, जल्दबाजी से दूर ही रहें। प्रबंधक को विशाल ह्वदय का होना चाहिए। यही आज की आवश्यकता पडने पर अनुशासन को बनाए रखने के दृष्टिकोण से किसी तरह की कोमलता भी नहीं दिखानी चाहिए।

7. महाभारत के युद्ध के दौरान जब अर्जुन के मन में कृष्ण के को लेकर सवाल पैदा होता है और श्रीकृष्ण से वह पूछ बैठते हैं कि प्रभु आप कौन हैं? इस प्रश्न पर कृष्ण अपना दिव्य स्वरूप प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण के इस विराट स्वरूप वाले दृश्य से हमें यह सीख मिलती है कि मैनेजर को अपना स्वरूप कैसा रखना चाहिए।

दरअसल,कृष्ण ने संपूर्ण सौंदर्य के बारे में कहा है कि मन की शुद्धता के साथ ही तन का वैभव भी नजर आना चाहिए।

Source: Spiritual News in Hindi & Horoscope 2014       

These persons see smile in every particle of nature

जीवन परमात्मा का प्रसाद होता है। इसे यों भी कह सकते हैं कि जीवन पूर्ण परमात्मा की आंशिक अभिव्यक्ति है। इसलिए हम मानते हैं कि हमारे अंतर्मन में परमात्मा निवास करता है। परमात्मा प्राणरूप में हमारे सूक्ष्म और स्थूल शरीर का संचालन करता है। इसलिए जीवात्मा को परमात्मा भी कहते हैं।

हमारी आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता, यह अतिसूक्ष्म है, शक्तिरूप है। लेकिन जब कभी बाहर का प्रभाव अंतर्मन पर पड़ने लगता है, तो आत्मा की दिव्यता कम होने लगती है। इसीलिए हमारे साधक साधना करते हैं ताकि बाहर की विकृति अंतर्मन को दूषित न कर सके। सच कहा जाए, तो हमारा जीवन एक महोत्सव है। यह आनंदस्वरूप है, केवल ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हमारे आनंद के सागर में विकारों की लहरें न उठें।

पतंजलि संयम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि के अभ्यास की बात कहते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर जीवन को रसपूर्ण बनाना है, तो साधना की अग्नि में उसे तपाना पड़ेगा तभी जीवन को दिव्य बनाया जा सकता है। सामान्यत: लोग अपने ही विकारों से जीवन की दिव्यता को धूमिल बना लेते हैं क्योंकि सारे विकार स्वअर्जित होते हैं। अगर थोड़ी सी सतर्कता बरती जाए, तो हमारा जीवन आनंदपूर्ण बन सकता है।

अनेक लोग अकारण निराशावादी बन जाते हैं, कई लोग तनावग्रस्त और चिंतित रहने लगते हैं। अगर इनके कारणों पर विचार किया जाए तो इनके तनाव और चिंता का कोई प्रबल कारण नहीं दिखता। अकारण चिंतित होकर कई लोग अपने जीवन के आनंद से वंचित रह जाते हैं। इसलिए प्रसन्न रहने का अभ्यास किया जाना चाहिए।

संसार में न केवल दुख है और न सुख ही सुख है। हमारा दृष्टिकोण जैसा होता है, संसार उसी तरह दिखने लगता है। आशावादी व्यक्ति को चारों ओर प्रकृति की मुस्कान दिखती है और निराशावादी व्यक्ति को इस संसार में केवल कांटे ही दिखते हैं। हमें जीने का नजरिया बदलना होगा, हमें जीवन जीने की विधि सीखनी होगी, तभी हम जीवन का सार्थक उपयोग कर सकते हैं। जीवन का एक-एक पल कीमती है, आनंदपूर्ण है।

Cemetery relation to architect of house

घर के प्रवेश द्वार के सामने यदि कोई रोड, गली या टी जक्शन हो, तो ये गंभीर वास्तुदोष माने जाते हैं। खासकर उन घरों या इमारतों में जो दक्षिण व पश्चिम मुखी होते हैं। ऐसे घर में निवास करने वाले लोगों को लगभग हर काम में असफलता ही मिलती है।

1. किसी कमरे में सोने पर तरह-तरह के भयावह सपने आते हैं और इस वजह से आपको रात में नींद नहीं आती हो, ऐसी समस्या से छुटकारा पाने के लिए कमरे में एक जीरो वॉट का पीले रंग का नाइट लैम्प या बल्ब जलाए रखें।

2. घर या ऑफिस के किसी भी कमरे की खिड़की, दरवाजा या गैलरी ऐसी दिशा में खुले, जिस ओर कोई खंडहरनुमा पुराना मकान या ऐतिहासिक इमारत स्थित हो या फिर श्मशान, कब्रिस्तान स्थित हो, तो यह अत्यंत अशुभ है।ऐसे मकान में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए किसी शीशे की प्लेट में कुछ छोटे-छोटे फिटकरी के टुकड़े आदि खिड़की या दरवाजे या गैलरी के पास रख दें और उन्हें हर महीने नियम से बदलते रहें, तो वास्तुदोष से मुक्ति मिलती है।

3. घर के बाहर अगर टी स्टॉल है तो उसकी तरफ 6 इंच का एक अष्टकोण आईने पर लटका दें। ऐसा करने से दक्षिण एवं पश्चिम दिशाओं की टी स्टॉल का सम्पूर्ण वास्तुदोष ठीक हो जाता है।

4. कभी-कभी बच्चों को मकान के किसी कमरे में अकेले जाने से डर लगता है, ऐसे में बेड या पलंग के सिरहाने के पास वाले दोनों किनारों में तांबे के तार से बने स्प्रिंगनुमा छल्ले डाल दें।

5.किसी मकान की छत पर पूर्व, उत्तर या पूर्वोत्तर दिशाओं में कमरा, स्टोर आदि बने हों तो ऐसा मकान गृह स्वामी को कभी सुख नहीं देता। गृह स्वामी हमेशा परेशान व दुखी रहता है। ऐसा गृह स्वामी अपने जीवन में नौकरियां बदलते रहता है अथवा व्यापार में भाग्य आजमाते रहता है।

इस वास्तुदोष से छुटकारा पाने के लिए मकान के दक्षिण-पश्चिम कोने में छत पर एक पतला-सा लोहे का पाइप एवं उस पर पीली या लाल रंग की झंडी लटका दें। इस तरह के छोटे-मोटे कई उपाय करके नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में तब्दील किया जा सकता है।

Wednesday, 12 February 2014

Ramayana is single story but many granth

श्रीराम भगवान के चरित्र पर कई भाषाओं में रामकथाएं लिखी गई हैं। इनमें से महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण सर्वोपरि है।

वाल्मीकि रामायण जो कि मूलतः संस्कृत भाषा में लिखी गई है। इसे पढ़कर ऐसा नहीं लगता मानो उन्होंने श्रीराम के बारे में जो कुछ भी देखा और सुना उसे उन्होंने वेदों की भाषा में अंकित किया है।

वाल्मीकि रामायण के अलावा अन्य रामायण भी लोकप्रिय हैं, उनमें 'अध्यात्म रामायण', 'आनंद रामायण', 'अद्भुत रामायण' तथा तुलसीदास कृत 'श्री रामचरितमानस' आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

गोस्वामी तुलसीदास ने अनेकानेक रामायण ग्रंथ लिखे जाने के संदर्भ में कहा है कि- 'रामायन सतकोटि अपारा।'

वाल्मीकि रामायण के उपरांत रामकथा में दूसरा प्राचीन ग्रंथ है 'अध्यात्म रामायण।' इसमें राम का ईश्वरत्व उभरता दृष्टिगत होता है।

इस रामायण को राम कथा के उत्तर खंड के रूप में भी स्वीकारा जाता है। 'आनंद रामायण' में भक्ति की प्रधानता है। इसमें राम की विभिन्न लीलाओं तथा उपासना संबंधी अनुष्ठानों की विशेष चर्चा है।

रामायण में सीता की महत्ता

'अद्भुत रामायण' अपने नाम के अनुरूप कथा प्रसंगों और वर्णन शैली में अद्भुत है। इसमें सीता की महत्ता विशेष रूप से प्रस्तुत की गई है। उन्हें 'आदिशक्ति' और 'आदिमाया' बताया गया है, जिसकी प्रस्तुति स्वयं राम भी सहस्त्रनाम स्तोत्र द्वारा करते हैं। लोकप्रियता की दृष्टि से तुलसी कृत 'रामचरितमानस' सबसे आगे है।

लोकभाषा में होने के कारण इसने रामकथा को जनसाधारण में अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया। रामलीलाओं के मंचन की दृष्टि से राधेश्याम कृत रामायण का भी विशेष स्थान है। हिंदी क्षेत्रों की अपेक्षाकृत कम पढ़ी-लिखी जनता के बीच इस रामायण को काफी लोकप्रियता प्राप्त हुई।

रामायण कई प्रादेशिक भाषाओं में भी लिखी गई, जिसका आधार विभिन्न संस्कृत ग्रंथ रहे हैं। नौवीं शताब्दी में कवि कंबन ने तमिल भाषा में 'कंब रामायण' की रचना की। रंगनाथ रामायण, कवयित्री मोल्डा रचित मोल्डा रामायण और 'भास्कर' तेलुगू भाषा में लिखी गई रामायण हैं।

प्रादेशिक भाषाओं में रामकथा पर आधारित सबसे पुरानी रामायण उड़िया में लिखी गई 'रूइपादकातेणपदी रामायण' है, जो नौवीं शताब्दी में लिखी गई।

मुस्लिम देशों में भी है लोकप्रिय

मुस्लिम देश इंडोनेशिया में तो रामायण को राष्ट्रीय पवित्र पुस्तक का गौरव प्राप्त है। वहां अदालतों में प्राय: रामायण पर ही हाथ रखकर शपथ ली जाती है। वहां इस ग्रंथ का नाम है 'काकविन रामायण'।

थाइलैंड में रामकथा को 'रामकियेन' या 'रामकीतिर' कहा जाता है। कंबोडिया में रामकथा को 'रामकेर' कहा जाता है।

जावा के मंदिरों में वाल्मीकि रामायण के श्लोक उद्धृत हैं। इसके साथ ही लाओस, वियतनाम, सुमात्रा तथा बाली आदि दक्षिण पूर्व अनेक एशियाई देशों में भी रामकथा का प्रभाव दिखता है।

मुगल काल में भी नहीं रही अछूती

मुगल काल में रामायण का फारसी अनुवाद (मसीही रामायण) भी प्रकाशित हुआ था, जो रामकथा की लोकप्रियता का एक उदाहरण है। 1623 ईसवी में फारसी के प्रसिद्ध कवि शेख साद मसीह ने भी 'दास्ताने राम व सीता' शीर्षक से रामकथा लिखी थी।

उर्दू में रामकथा पर एक ग्रंथ रघुवंशी 'उर्दू रामायण' भी है, जिसके लेखक हैं बाबू सिंह बालियान हैं। इसमें सभी प्रकार की उपलब्ध रामकथाओं तथा उनके लेखकों का विवरण दिया गया है।

राम कण - कण में हैं

कहते हैं कि 'राम हर कण कण में मौजूद हैं। मन से जो रावण निकाले राम उसके मन में हैं।' भगवान राम की लोकप्रियता का कारण उनका चरित्र है श्रीराम ने ईसा मसीह, पैगंबर मोहम्मद, गुरु नानक, गौतम बुद्ध की तरह कोई नया धर्म नहीं शुरु किया बल्कि वह सनातन धर्म की पताका फहराते रहे।

एक कारण यह भी है कि लोग उनके आदर्शों के कारण भी उन्हें अपने आदर्श मानते हैं।

In the present age of kalpvriksha

भगवान को कहीं खोजने की जरूरत नहीं है वह हम सब के ह्रदयों में मौजूद है, अगर जरूरत है तो सिर्फ महसूस करने की। वह मुझमें भी है और तुममे भी वहां आदिकाल से इस नश्वर जीव जगत में एक उजाले की तरह है जो अंधेरा(पाप) बढ़ने पर जरुर आता है।

जिस दिन हमारा मन भगवान की सच्ची भक्ति में लग जायेगा उसी दिन से हमें भगवान की उपस्थिति महसूस होने लगेगी।जिस भागवत कथा को हम सुनते हैं हमें मालूम होना चाहिए भगवान भी इस कथा को सुनने के लिए मृत्युलोक आए थे।

श्रीमद भागवत हमें सीधे श्री कृष्ण के दर्शन कराती है। श्रीमद भागवत एक ऐसा कल्पवृक्ष है जिससे हम जो भी मागेंगे वो हमें अवश्य मिलेगा लेकिन उससे पहले हमें भगवान पर विश्वास करना होगा उसके बाद देखना भगवान हमारे जीवन को इतना अनमोल बना देंगे की हर व्यक्ति प्रभु से जिंदगी जीने के लिए और कई दिन मागेगा।

मानव जीवन हमें बार–बार नहीं मिलता इसका हमें दुरूपयोग नहीं अपितु सदुपयोग करना चाहिए। आज हमारे देश में गंगा मैया,यमुना मैया,गौ माता कुछ भी सुरक्षित नहीं है क्यों ?

क्योंकि आज हम अपनी संस्कृति को भूलकर संसार की मोह माया में लिप्त हो चुके हैं। जिस कार्य के लिए भगवान ने हमें यह मनुष्य योनि दी है। उससे हम भटक चुके हैं।

इस दुनिया के हमारे सभी मित्र भोगी और लालची हैं तो हम ऐसे मित्रों को क्यों अपना बनाये जो हमें धर्म से अधर्म की ओर ले जाएं,सभ्य रास्ते पर ले जाने की बजाय असभ्य रास्ते की ओर ले जाएं।

इसलिए हमें दुनिया के लोगों को अपना मित्र बनाने की बजाय सर्वेश्वर श्री कृष्ण भगवान को अपना बनाना चाहिए, वही आपका सच्चा मित्र और आपका सब कुछ है।

Tuesday, 11 February 2014

Attention to the windows of the house

घर की खिड़कियां, घर के भीतर कई तरह की ऊर्जा को अंदर लाती हैं। ऐसे में जरूरत यह है कि घर में हमेशा सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश हो।

ऐसा तभी होगा जब आप अपने घर की खिड़कियों को वास्तु शास्त्र के लिहाज से बनवाएंगे। यहां आपको विभिन्न ग्रंथों में वर्णित वास्तुशास्त्र के मुख्य नियम दिए गए हैं। जिन्हें आजमाकर आप न केवल अपने घर बल्कि अपनी ज़िंदगी को भी खुशहाल बना सकते हैं।

1. खिड़कियां अंदर की ओर खुलनी चाहिए।

2. घर में खिड़कियां का मुख्य लक्ष्य, भवन में शुद्ध वायु के निरंतर प्रवाह के लिए होता है।

3. खिड़कियां द्वार के समक्ष होनी चाहिए ताकि चुम्बकीय चक्र पूर्ण हो सके, इससे घर में सुख-शांति रहती है।

4. खिड़कियों का निर्माण संधि भाग में नहीं होना चाहिए।

5.पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी दीवारों पर खिड़कियों का निर्माण शुभ होता है।

6. उत्तर दिशा में अधिक खिड़कियां परिवार में धन-धान्य की वृद्धि करती हैं। लक्ष्मी कुबेर की कृपादृष्टि बनी रहती है।

7.खिड़कियां सदैव दीवार में ऊपर-नीचे न बनाकर एक ही लाइन में बनानी चाहिए।

Source:  Spiritual News