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Monday, 3 February 2014

City of saraswati where gayatri mantra is composed


वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है, मानव तो क्या पेड़-पौधे तथा पशु-पक्षी भी उल्लास से भर जाते हैं। इस दिन नई उमंग से सूर्योदय होता है और नई चेतना प्रदान कर सूर्य अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।

अलग-अलग ऋतुओं को हमारे जन-जीवन, पर्वों व धार्मिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है। वसंत ऋतु का भी अपना महत्व है। वसंत ऋतु का अपना ही पौराणिक और साहित्यिक महत्व है। मां सरस्वती को विद्या, ज्ञान, वाणी, संगीत व बुद्धि की देवी माना जाता है। सुरों की देवी की वसंत पंचमी के दिन देशभर में वंदना की जाती है।

पौराणिक नगर पिहोवा (कुरुक्षेत्र) में वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है। पिहोवा को सरस्वती का नगर भी कहा गया है। यहां प्राचीन समय से ही सरस्वती सरिता प्रवाहित होती रही है। सरस्वती सरिता के तट पर इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन तीर्थ हैं।

सरस्वती सरिता के तट पर विश्वामित्र जी ने गायत्री छंद की रचना पिहोवा में की थी। पिहोवा का सबसे मुख्य तीर्थ सरस्वती घाट है जहां सरस्वती सरिता बहती है। वहां मां सरस्वती का अति प्राचीन मंदिर है। शताब्दियों प्राचीन इन मंदिरों में देशभर के श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते हैं तथा सरस्वती घाट पर स्नान करते हैं। भव्य शोभायात्रा निकलती है।

यह दिन अनेक साहित्यकारों तथा महापुरुषों से भी जुड़ा है। वसंत पंचमी वाले दिन वीर हकीकत राय जी का वध इसलिए कर दिया गया था क्योंकि इस वीर बालक ने अपना धर्म त्यागने से इनकार कर दिया था। हिंदी के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का जन्मदिवस भी इसी दिन मनाया जाता है।

सरसों के पीले-पीले फूलों से सुशोभित खेत और पलाश के फूल इस ऋतु में मन को मोह लेते हैं। इस दिन पीत वस्त्र धारण कर, पीले पुष्प व पीले चावल मां सरस्वती पर अर्पित किए जाते हैं। जहां बंगाल में सरस्वती जयंती पर लोग सरस्वती की पूजा करते हैं वहीं उड़ीसा में इस दिन से बच्चों को विद्या दान की शुरुआत की जाती है।

बिहार के लोग मां सरस्वती की पूजा-अर्चना कर प्रतिमाओं को जल में विसर्जित करते हैं। देशभर में आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है। क्या बच्चे व क्या जवान, सभी पतंगबाजी का आनंद उठाते हैं।

Rare temple of goddess saraswati

वसंत पंचमी हमारे देश के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, मॉरीशस सहित कई देशों में मनाई जाती है। भारत में भी इसे विविध तरीकों से मनाया जाता है।

सरस्वती पूजन के जरिए कला संस्कृति और विद्या जैसे रचनात्मक क्षेत्रों में और भी अच्छा काम करने की कामना की जाती है। यहां हम ऐसे ही कुछ धार्मिक स्थलों के बारे में आपको बता रहे हैं जहां मां सरस्वती की पूजा वर्षों से की जा रही है। जहां वसंत पंचमी पर जाना अति शुभकारी माना गया है।

1. मैहर का शारदा मंदिर

मध्यप्रदेश के चित्रकूट से लगे सतना जिले में मैहर शहर की लगभग 600 फुट की ऊंचाई वाली त्रिकुटा पहाड़ी पर मां दुर्गा के शारदीय रूप देवी शारदा का मंदिर है। मां मैहर देवी के मंदिर तक पहुंचने के लिए 1063 सीढ़ियों तय करनी पड़ती हैं। महावीर आल्हा और उदल को वरदान देने वाली मां शारदा देवी को पूरे देश में मैहर की शारदा माता के नाम से जाना जाता है।

2. श्रृंगेरी का मंदिर

यहां का शारदा मंदिर भी लोकप्रिय है। इसे शरादाम्बा मंदिर के नाम से जाना जाता है। ज्ञान और कला की देवी को समर्पित, शरादाम्बा, दक्शनाम्नाया पीठ को आचार्य श्री शंकर भागावात्पदा द्वारा 7 वीं शताब्दी में बनाया गया था। किंवदंतियों के अनुसार, 14 वीं शताब्दी के दौरान इष्टदेव की चंदन की प्राचीन प्रतिमा को सोने और पत्थर से अंकित कर प्रतिस्थापित किया गया था।

3. पुष्कर का सरस्वती मंदिर

राजस्थान के पुष्कर में विद्या की देवी सरस्वती का मंदिर है। यहां वे नदी भी हैं और उन्हें उर्वरता व शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि सदियों से लेखक, कलाकार अपनी-अपनी कलाओं को निखारने के लिए पुष्कर आते हैं।

4. श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर

यह देश के प्रमुख सरस्वती मंदिर में से एक है। यह आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में स्थित है। बासर मंदिर निजामाबाद से 50 किलोमीटर दूर गोदारी नदी के किनारे स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद ऋषि व्यास शांति की खोज में निकले।

पढ़ें : ऋतुराज वसंत की दस्तक से प्रकृति का श्रृंगार

वे गोदारी नदी के किनारे कुमारचला पहाड़ी पर पहुंचे और देवी की आराधना की। उनसे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें दर्शन दिए। देवी के आदेश पर उन्होंने प्रतिदिन तीन जगह तीन मुट्ठी रेत रखी। चमत्कार स्वरूप रेत के ये तीन ढेर तीन देवियों की प्रतिमा में बदल गए जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली कहलाईं।

5. कोट्टयम का सरस्वती मंदिर

केरल का अकेला ऐसा मंदिर है जो देवी सरस्वती को समर्पित है। इस मंदिर को दक्षिण मूकाम्बिका के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर चिंगावनम के पास स्थित है। लोगों की मान्यता है कि इस मंदिर को किझेप्पुरम नंबूदिरी ने स्थापित किया था।

पढ़ें : यहां है मां सरस्वती का नगर जहां हुई थी गायत्री छंद की रचना

उन्होंने इस प्रतिमा को खोजा और इसे पूर्व की तरफ मुख करके स्थापित किया । पश्चिम की तरफ मुख करके एक और प्रतिमा की स्थापना की गई लेकिन उसका कोई आकार नहीं है। प्रतिमा के पास एक दीया है जो हर वक्त जलकर प्रकाश प्रज्वलित करता रहता है।

Sunday, 2 February 2014

Mantra to please goddess saraswati


वाग्देवी सरस्वती वाणी, विद्या, ज्ञान-विज्ञान एवं कला-कौशल आदि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। वे प्रतीक हैं मानव में निहित उस चैतन्य शक्ति की, जो उसे अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करती है।

सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में सरस्वती के दो रूपों का दर्शन होता है- प्रथम वाग्देवी और द्वितीय सरस्वती। इन्हें बुद्धि से संपन्न, प्रेरणादायिनी एवं प्रतिभा को तेज करने वाली शक्ति बताया गया है। ऋग्वेद संहिता के सूक्त संख्या 8/100 में वाग्देवी की महिमा का वर्णन किया गया है।

ऋग्वेद संहिता के दशम मंडल का 125वां सूक्त पूर्णतया वाणी को समर्पित है। इस सूक्त की आठ ऋचाओं के माध्यम से स्वयं वाकशक्ति अपनी सामर्थ्य, प्रभाव, सर्वव्यापकता और महत्ता का उद्घोष करती हैं।

वाणी का महत्व

बृहदारण्यक उपनिषद् में राजा जनक महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछते हैं- जब सूर्य अस्त हो जाता है, चंद्रमा की चांदनी भी नहीं रहती और आग भी बुझ जाती है, उस समय मनुष्य को प्रकाश देने वाली कौन-सी वस्तु है? ऋषि ने उत्तर दिया- वह वाक है। तब वाक ही मानव को प्रकाश देता है।

मानव के लिए परम उपयोगी मार्ग दिखाने वाली शक्ति वाक की अधिष्ठात्री हैं सरस्वती। छांदोग्य उपनिषद् (7-2-1) के अनुसार, यदि वाणी का अस्तित्व न होता तो अच्छाई-बुराई का ज्ञान नहीं हो पाता, सच-झूठ का पता न चलता, सहृदय और निष्ठुर में भेद नहीं हो पाता। अत: वाणी की उपासना करो।

ज्ञान का एकमात्र अधिष्ठान वाक है। प्राचीनकाल में वेदादि समस्त शास्त्र कंठस्थ किए जाते रहे हैं। आचार्यो द्वारा शिष्यों को शास्त्रों का ज्ञान उनकी वाणी के माध्यम से ही मिलता है। शिष्यों को गुरु-मंत्र उनकी वाणी से ही मिलता है। वाग्देवी सरस्वती की आराधना की प्रासंगिकता आधुनिक युग में भी है। मोबाइल द्वारा वाणी (ध्वनि) का संप्रेषण एक स्थान से दूसरे स्थान होता है। ये ध्वनि-तरंगें नाद-ब्रह्म का ही रूप हैं।

वागीश्वरी जयंती

जीभ सिर्फ रसास्वादन का माध्यम ही नहीं, बल्कि वाग्देवी का सिंहासन भी है। देवी भागवत के अनुसार, वाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती देवी का आविर्भाव श्रीकृष्ण की जिह्वा के अग्रभाग से हुआ था। परमेश्वर की जिह्वा से प्रकट हुई वाग्देवी सरस्वती कहलाई।

वैदिक काल की वाग्देवी कालांतर में सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हो गई। ग्रंथों में माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी) को वाग्देवी के प्रकट होने की तिथि माना गया है। इसी कारण वसंत पंचमी के दिन वागीश्वरी जयंती मनाई जाती है, जो सरस्वती-पूजा के नाम से प्रचलित है।

वाणी की महत्ता

वाग्देवी की आराधना में छिपा आध्यात्मिक संदेश है कि आप जो भी बोलिए, सोच-समझ कर बोलिए। हम मधुर वाणी से शत्रु को भी मित्र बना लेते हैं, जबकि कटुवाणी अपनों को भी पराया बना देती है।

Source: Spiritual News  & Rashifal 2014

Friday, 31 January 2014

If you are a religious people always remain depression

विज्ञान ने भी यह साबित किया है कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोग अवसाद का शिकार कम होते हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसे लोगों के मस्तिष्क की बाहरी सतह यानी कॉर्टेक्स मोटी होती है। अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में यह जानकारी सामने आई है।

शोध का नेतृत्व कर रही डॉ माइरना वाइजमैन कहती हैं, 'हमारा मस्तिष्क हमारे विचारों और मनोदशाओं का आईना होता है। इमेजिंग की नई तकनीक से यह सब कुछ देखना संभव हुआ है। हमारा मस्तिष्क एक असाधारण अंग है, जो न सिर्फ हम पर नियंत्रण रखता है बल्कि हमारी मनोदशाओं से नियंत्रित भी होता है।'

नए शोध से पता चलता है कि मस्तिष्क की बाहरी सतह की मोटाई और आध्यात्मिकता में गहरा रिश्ता है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि जिन लोगों के मस्तिष्क के कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है वे आध्यात्मिक भी होते हैं।

यह तय है कि जो धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं उनके कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है। पता चला है कि जो लोग अवसाद का शिकार होते हैं उनके कॉर्टेक्स की सतह धार्मिक लोगों के मुकाबले पतली होती है।

इस शोध में ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनके माता-पिता या दादा-दादी अवसाद से संबंधित पहले के अध्ययन में शामिल थे। इनमें से कुछ के परिवार में अवसाद पीढ़ीगत बीमारी के रूप में थी। इस समूह की तुलना ऐसे लोगों के साथ की गई, जिनमें अवसाद के कोई लक्षण नहीं थे।

जिन बातों को हम पहले से जानते हैं, उन पर विज्ञान की मुहर लगती है तो उनमें हमारा विश्वास और प्रबल होता है।