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Thursday, 19 June 2014

Karaka of the mass of jupiter and the system is very good for both

भारत की आर्थिक उन्नति में ग्रहों का एक अलग ही योगदान रहता है। ऐसा ही कुछ गुरुवार को होने जा रहा है। दरअसल गुरु ग्रह कर्क राशि में भ्रमण आरंभ करने जा रहा है। ऐसा होने पर खासतौर पर देश के विकास में काफी इजाफा होने के उम्मीद की जा रही है।

अहमदाबाद के ज्योतिषी व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि गुरु का कर्क राशि में प्रवेश होने से देश और राशि आधारित जातकों को लाभ मिलेगा। जिन जातको की जन्मकुंडली में कर्क, तुला, मकर, मेष लग्न में गुरु का साथ है। उन्हें शुभदायक रहेगा, साथ ही वृश्चिक एवं मीन राशि के लिए विदेश यात्रा, व्यापार, विवाह, उच्च शिक्षा हेतु शुभ रहेगा।

भारत के लिए गुरु का कर्क राशि में प्रवेश शुभ है। क्यों कि यह अस्त मिथुन राशि से निकल कर उच्च कर्क राशि में प्रवेश कर रहा है। इससे भारक के तीसरे पराक्रम स्थान में इसका भ्रमण से पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध बनने के आसार हैं। विदेश-नीति में परिवर्तन होने की संभावना है।

भाग्य स्थान को नीच दृष्टि से देखने के कारण शनि की दृष्टि आने के कारण शत्रु कुछ देशों के कारण देश की प्रगति को बाधित करेगी। वहीं जुलाई में कालाधन, शेयर बाजार व अन्य स्त्रोंतो से देश में विभिन्न तरीकों से घूसखोरी कर सफेद धन करने का दुःसाहस पूंजीपति कर सकते हैं। देश के आय स्थान पर गुरु की दृष्टि होने से देश में लाभजनक व्यापार होगा। किंतु राहू की दृष्टि लाभ स्थान पर होने से ये लाभ कृत्रिम रहेंगे।

कर्क का गुरु राशि में आने से राशियों पर पढ़ने वाला प्रभावः

    मेषः राशि के चतुर्थ भाव में गूरु होने से भ्रमण, भूमि, भवन, माता को सुख, लोक प्रियता, में जबरदस्त लाभ मिलेगा। इसके साथ ही मन प्रसन्न रहेगा। उन्नति और काया निरोगी रहेगी।

    वृषभः तृतीय स्थान पर गुरु होने से विदेश यात्रा, व्यापार, धार्मिक अनुष्ठान से लाभ मिलेगा। भाग्य परिवर्तन में गुरु कारक रहेगा।

    मिथुनः धन स्थान में भ्रमण से धन, कुटुम्ब की वृद्धि, सम्मान व परिवार में सम्मान का योग है। अचानक धन प्राप्त हो सकता है।

    कर्कः इस राशि के जातकों के लोगों का स्वास्थ्य निरोगी रहेंगे। प्रेम-विवाह के योग हैं। संतान की प्राप्ति होगी। आर्थिक उन्नति व भाग्योदय के नए द्वार खुलेंगे।

    सिंहः फिजूल खर्च व भागदौड़ भरा दिन रहेगा। मान सम्मान में कमी रहेगी। इसलिए कोई भी काम सोच समझकर ही करें इससे आपको लाभ मिलेगा।

    कन्याः आकस्मिक लाभ मिलेगा। बड़े भाई, स्त्री, एवं मित्रों को आपकी वजह से लाभ मिलेगा। जो उनकी उन्नति में सहायक रहेगा।

    तुलाः आकस्मिक लाभ होगा। स्थानांतरण होने के आसार हैं। उच्च पद, प्रमोशन के लाभ के साथ मेहनत का कई गुना लाभ प्राप्त के योग हैं।

    वृश्चिकः इस राशि में गुरु नवम भाग में है। यह आपकी प्रगति के संदेश दे रहा है। अच्छा स्वास्थ्य, विदेश, व्यापार में वृद्धि देगा। धार्मिक कार्यों के योग है।

    धनुः स्वास्थ्य को संभालें। गुरु अष्टम में भ्रमण के कारण आपको वंशानुगत धन संपत्ति के योग है। खेती में लाभ मिलेगा।

    मकरः राशि में गुरु सप्तम भाव में होने से विवाह योग, भागीदारी योग, व्यापार में अच्छे योग के आसार हैं।

    कुंभः यात्रा न करें परेशानी हो सकती है। कानूनी कार्य से दूर रहें। ननिहाल पक्ष से हानि होगी। इसलिए सजग रहने की आवश्यकता है।

    मीनः विद्या प्राप्ति के श्रेष्ठ योग हैं। भविष्य का निवेश हानिप्रद रहेगा। परिवार से लाभ मिलेगा।

Wednesday, 5 February 2014

The reasons why saint take mausoleum

ध्यान की वह अवस्था जब व्यक्ति ईश्वर या अपने आराध्य में एकाकार हो जाता है समाधि कहलाती है। इस अवस्था में व्यक्ति को स्पर्श, रस, गंध, रूप एवं शब्द इन 5 विषयों की इच्छा नहीं रहती तथा उसे भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि  का आभास भी नहीं होता। ऐसा व्यक्ति शक्ति संपन्न बनकर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। उसके जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।

यही है कैवल्य ज्ञान

जैन धर्म में समाधि को कैवल्य ज्ञान और बौद्ध धर्म में निर्वाण कहा गया है। योग में इसे समाधि कहते हैं। इसके कई स्तर होते हैं। इस मोक्ष को ही मोक्ष एक ऐसी दशा है।

योग का अंतिम पड़ाव

समाधि योग का सबसे अंतिम पड़ाव है। यह तभी प्राप्त हो सकता है जब व्यक्ति सभी योग साधनाओं को करने के बाद मन को बाहरी वस्तुओं से हटाकर निरंतर ध्यान करते हुए उसी में लीन होने लगता है।

संयम करना ही समाधि

पूर्ण रूप से सांस पर नियंत्रण और मन स्थिर व सन्तुलित हो जाता है, तब समाधि की स्थिति कहलाती है। प्राणवायु को 5 सेकंड तक रोककर रखना 'धारणा' है, 60 सेकंड तक मन को किसी विषय पर केंद्रित करना 'ध्यान' है और 12 दिनों तक प्राणों का निरंतर संयम करना ही समाधि है।

समाधि के प्रकार

भगवान श्री कृष्ण ने भी भागवत गीता में समाधि के बारे में विस्तार से बताया है। योग में समाधि के दो प्रकार बताए गए हैं- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।

भक्ति सागर में समाधि के 3 प्रकार बताए गए है- 1.भक्ति समाधि, 2.योग समाधि, 3.ज्ञान समाधि।

पुराणों में समाधि के 6 प्रकार बताए गए हैं जिन्हें छह मुक्ति कहा गया है- 1. साष्ट्रि, (ऐश्वर्य), 2. सालोक्य (लोक की प्राप्ति), 3. सारूप (ब्रह्मस्वरूप), 4. सामीप्य, (ब्रह्म के पास), 5. साम्य (ब्रह्म जैसी समानता) 6. लीनता या सायुज्य (ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म हो जाना)।

ऐसे शुरू की जाती है समाधि

जब व्यक्ति प्राणायाम, प्रत्याहार को साधते हुए धारणा व ध्यान का अभ्यास पूर्ण कर लेता है तब वह समाधि के योग्य बन जाता है। समाधि के लिए व्यक्ति के मन में किसी भी प्रकार के बाहरी विचार नहीं होते।

व्यक्ति का मन पूर्ण स्थिर रहकर आंतरिक आत्मा में लीन हो जाता है तब समाधि घटित होती है। इसलिए समाधि से पहले ध्यान के अभ्यास को बताया गया है। ध्यान से ही चित्त (मन) विचार शून्य हो जाने की अवस्था में समाधि घटित होती है।

समाधि प्राप्त व्यक्ति का व्यवहार सामान्य व्यक्ति से अलग हो जाता है, वह सभी में ईश्वर को ही देखता है और उसकी दृष्टि में ईश्वर ही सत्य होता है। समाधि में लीन होने वाले योगी को अनेक प्रकार के दिव्य ज्योति और आलौकिक शक्ति का ज्ञान प्राप्त स्वत: ही होता है।

क्यों जरूरी है मोक्ष

शरीर के जन्म और मरण के चक्र से बाहर निकलकर स्वयं को कहीं भी किसी भी रूप में अभिव्यक्त करने की ताकत और सच मानो तो इस ब्रह्मांड से अलग रहने की ताकत। ब्रह्मांड से अलग वही रह सकता है, जो ब्रह्म स्वरूप शुद्ध चैतन्य है।