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Friday, 4 July 2014

Why not throw the stone on the money

एक बार महाराज रणजीत सिंह कहीं जा रहे थे। सामने से एक ईंट आकर उन्हें लगी। सिपाहियों नें चारों ओर नजर दौड़ाई, तो एक बुढ़िया दिखाई दी। उसे गिरफ्तार करके महाराज के सामने हाजिर किया गया।

बुढ़िया महाराज को देखते ही डर गई। वह बोली, सरकार, मेरा बच्चा कल से भूखा था। घर में खाने को कुछ न था। इसलिए पेड़ पर पत्थर मारकर कुछ फल तोड़ रही थी, किंतु एक पत्थर भूलवश आपको लग गया।

वह बोली कि मैं निर्दोष हुं क्यों कि यह गलती मुझसे जानबूझकर नहीं हुई है। महराज ने कुछ देर सोचा और कहा कि बुढ़िया को एक हजार रुपया देकर सम्मान पूर्वक विदा किया जाए। तब सभी दरबारी चुप हो गए। तब एक मंत्री ने पूछा जिसे दंड मिलना चाहता उसे आप सम्मान दे रहे हैं।

तब रणजीत सिंह बोले कि, यदि वृक्ष पत्थर लगने पर मीठा फल दे सकते है तो पंजाब का महाराज उसे खाली हाथ कैसे लौटा सकता है?

संक्षेप में

परोपकार करना हमें पेड़ों से सीखना चाहिए। जिन्हें हम पत्थर मारते हैं तो वह हमें फल देते हैं।


A temple was built by karan

देवधर के प्रखंड में एक दर्जन से अधिक शिवालय हैं। प्रखंड मुख्यालय स्थित कर्णेश्वर मंदिर इन्हीं में से एक है। अपने गौरवशाली इतिहास के कारण यह मंदिर श्रद्धालुओं के बीच आस्था व श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।

यहां सावन के महीने में दूरदराज के श्रद्धालु आकर पूजा करते हैं। दिन भर मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। रात्रि में भव्य शिवबारात निकाली जाती है। इसका हजारों भक्त गवाह बनते हैं।

भगवान विश्वकर्मा ने स्थापित किया था मंदिर- कर्णेश्वर मंदिर की स्थापना कब हुई। इसका कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने की थी। इसका नाम कर्णेश्वर मंदिर होने के पीछे भी एक पौराणिक कहानी प्रचलित है।

लगभग साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व यहां घना जंगल था। उस वक्त यहां के गांव को श्रीगंज के नाम से जाना जाता था। उस समय एक व्यक्ति की गाय खो गई। उसे खोजते वह व्यक्ति यहां आ पहुंचा। उसने देखा कि एक पठार पर गाय दूध दे रही है। इस घटना की सूचना अंग प्रदेश के राजा कर्ण को दी गई। उन्होंने जानकारों को यहां भेजा।

उन्होंने राजा को बताया कि यहां जमीन के नीचे शिवलिंग अवस्थित है। राजा कर्ण के आदेश पर इसके चारों ओर कर्णपुर नामक गांव बसा दिया गया। वहीं मंदिर को कर्णेश्वर नाम दिया गया। बाद में अंग्रेजों ने इस गांव का नाम करौं रख दिया।

Tuesday, 1 July 2014

If the conduct beautiful mind and body beautiful

बात उन दिनों की है जब भगवान श्रीराम अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान चित्रकूट में थे। भगवान राम एवं माता सीता कुटिया के बाहर बैठे हुए थे।

लक्ष्मणजी उनके चरणों में बैठे थे। तभी श्रीराम ने कहा कि लक्ष्मण यहां आओ मेरे और सीता के बीच एक झगड़ा हो गया है। इसलिए तुम न्याय करो।

लक्ष्मण जी मान गए। तब श्रीराम-' मैं कहता हूं कि मेरे चरण सुंदर हैं। सीता कहती हैं उनके चरण सुंदर हैं। तुम दोनों के चरणों की पूजा करते हो। अब तुम ही फैसला करो कि किसके चरण सुंदर हैं। लक्ष्मणजी बोले आप मुझे इस धर्म संकट में मत डालिए।

तब श्रीराम ने समझाया कि तुम बैरागी हो। निर्भय होकर कहो। किसके चरण सुंदर हैं। राम के चरणों को दिखाते हुए लक्ष्मणजी बोले कि माता, इन चरणों से आपके चरण सुंदर हैं। इतना कहते हुए लक्ष्मण जी चुप हो गए और माता सीता खुश।

इस पर लक्ष्मण जी बोले माता अधिक खुश मत होना। भगवान राम के चरण हैं, तभी आपके चरणों की कीमत है। इनके चरण न हों तो आपके चरण सुंदर नहीं लग सकते। रामजी खुश हो गए।

तब लक्ष्मणजी फिर बोले कि आप दोनों को खुश होने की जरूरत नहीं। आप दोनों के चरणों के अलावा भी एक चरण हैं जिसके कारण ही आपके चरणों की पूजा होती है यानी आचरण। आचरण की कोई कीमत नहीं। महराज, आपके चरण सुंदर हैं तो उसका कारण आपका महान आचरण है।

संक्षेप में

यदि व्यक्ति के आचरण अच्छे हों तो उसका तन और मन दोनों ही सुंदर होता है और वह संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाता है।

Tuesday, 24 June 2014

Eagle and serpent was mainly because of the hostility

अमूमन यह प्रश्न सदियों से उठता आ रहा है कि नागों की उत्पत्ति कैसे हुई। नाग और गरुड़ के बीच मतभेद सदियों से चला आ रहा है। दरअसल नागों के बारे में भागवत् पुराण में विस्तृत लेख मिलता है।

कहते हैं कि कश्यप ऋर्षि की दो पत्नियां थीं। एक का नाम बनिता और दूसरी पत्नी का नाम कद्रू था। एक बार कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों पत्नियों से वर मांगने को कहा। कद्रू ने एक हजार वीर नागों की माता होनें का वर मांगा और बनिता ने एक वर से दो पुत्र मांगे जो बाद में अरूण और गरुण के नाम से प्रसिद्ध हुए।

नागों की मां कद्रू को धरती का प्रतीक माना जाता है। गरुड़ और अरुण की मां बनिता को स्वर्ग की देवी माना जाता है।

एक दिन कश्यप दोनों पत्नियों में इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि सूर्य के अश्व श्यामवर्ण के हैं या श्वेत। बनिता ने उनका रंग श्वेत बताया, पर कद्रू नहीं मानीं। वह एक ही रट लगाए हुए थी कि अश्व श्याम वर्ण के हैं। बनिता ने आखिरी शर्त लगा दी कि अगर अश्वों का रंग श्वेत हुआ तो तुम और तुम्हारे पुत्र हमारे दास रहेगें। कद्रू ने स्वीकार कर लिया।

शाम हुई। जब कद्रू ने अपने पुत्रों से इसकी चर्चा की तब शेषनाग को छोड़कर शेष सभी पुत्रों ने कहा कि मां तुम चिंता मत करो। हम लोग जाकर अश्वों से लिपट जाएंगे जिससे वे दूर से श्यामवर्ण के दिखाई देने लगेंगे। यह बात सुनकर कद्रू प्रसन्न हो गई।

परंतु बाद में बनिता को यह भेद पता चल गया और तभी से गरुण और नागों की दुश्मनी चली आ रही है।

Thursday, 19 June 2014

Karaka of the mass of jupiter and the system is very good for both

भारत की आर्थिक उन्नति में ग्रहों का एक अलग ही योगदान रहता है। ऐसा ही कुछ गुरुवार को होने जा रहा है। दरअसल गुरु ग्रह कर्क राशि में भ्रमण आरंभ करने जा रहा है। ऐसा होने पर खासतौर पर देश के विकास में काफी इजाफा होने के उम्मीद की जा रही है।

अहमदाबाद के ज्योतिषी व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि गुरु का कर्क राशि में प्रवेश होने से देश और राशि आधारित जातकों को लाभ मिलेगा। जिन जातको की जन्मकुंडली में कर्क, तुला, मकर, मेष लग्न में गुरु का साथ है। उन्हें शुभदायक रहेगा, साथ ही वृश्चिक एवं मीन राशि के लिए विदेश यात्रा, व्यापार, विवाह, उच्च शिक्षा हेतु शुभ रहेगा।

भारत के लिए गुरु का कर्क राशि में प्रवेश शुभ है। क्यों कि यह अस्त मिथुन राशि से निकल कर उच्च कर्क राशि में प्रवेश कर रहा है। इससे भारक के तीसरे पराक्रम स्थान में इसका भ्रमण से पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध बनने के आसार हैं। विदेश-नीति में परिवर्तन होने की संभावना है।

भाग्य स्थान को नीच दृष्टि से देखने के कारण शनि की दृष्टि आने के कारण शत्रु कुछ देशों के कारण देश की प्रगति को बाधित करेगी। वहीं जुलाई में कालाधन, शेयर बाजार व अन्य स्त्रोंतो से देश में विभिन्न तरीकों से घूसखोरी कर सफेद धन करने का दुःसाहस पूंजीपति कर सकते हैं। देश के आय स्थान पर गुरु की दृष्टि होने से देश में लाभजनक व्यापार होगा। किंतु राहू की दृष्टि लाभ स्थान पर होने से ये लाभ कृत्रिम रहेंगे।

कर्क का गुरु राशि में आने से राशियों पर पढ़ने वाला प्रभावः

    मेषः राशि के चतुर्थ भाव में गूरु होने से भ्रमण, भूमि, भवन, माता को सुख, लोक प्रियता, में जबरदस्त लाभ मिलेगा। इसके साथ ही मन प्रसन्न रहेगा। उन्नति और काया निरोगी रहेगी।

    वृषभः तृतीय स्थान पर गुरु होने से विदेश यात्रा, व्यापार, धार्मिक अनुष्ठान से लाभ मिलेगा। भाग्य परिवर्तन में गुरु कारक रहेगा।

    मिथुनः धन स्थान में भ्रमण से धन, कुटुम्ब की वृद्धि, सम्मान व परिवार में सम्मान का योग है। अचानक धन प्राप्त हो सकता है।

    कर्कः इस राशि के जातकों के लोगों का स्वास्थ्य निरोगी रहेंगे। प्रेम-विवाह के योग हैं। संतान की प्राप्ति होगी। आर्थिक उन्नति व भाग्योदय के नए द्वार खुलेंगे।

    सिंहः फिजूल खर्च व भागदौड़ भरा दिन रहेगा। मान सम्मान में कमी रहेगी। इसलिए कोई भी काम सोच समझकर ही करें इससे आपको लाभ मिलेगा।

    कन्याः आकस्मिक लाभ मिलेगा। बड़े भाई, स्त्री, एवं मित्रों को आपकी वजह से लाभ मिलेगा। जो उनकी उन्नति में सहायक रहेगा।

    तुलाः आकस्मिक लाभ होगा। स्थानांतरण होने के आसार हैं। उच्च पद, प्रमोशन के लाभ के साथ मेहनत का कई गुना लाभ प्राप्त के योग हैं।

    वृश्चिकः इस राशि में गुरु नवम भाग में है। यह आपकी प्रगति के संदेश दे रहा है। अच्छा स्वास्थ्य, विदेश, व्यापार में वृद्धि देगा। धार्मिक कार्यों के योग है।

    धनुः स्वास्थ्य को संभालें। गुरु अष्टम में भ्रमण के कारण आपको वंशानुगत धन संपत्ति के योग है। खेती में लाभ मिलेगा।

    मकरः राशि में गुरु सप्तम भाव में होने से विवाह योग, भागीदारी योग, व्यापार में अच्छे योग के आसार हैं।

    कुंभः यात्रा न करें परेशानी हो सकती है। कानूनी कार्य से दूर रहें। ननिहाल पक्ष से हानि होगी। इसलिए सजग रहने की आवश्यकता है।

    मीनः विद्या प्राप्ति के श्रेष्ठ योग हैं। भविष्य का निवेश हानिप्रद रहेगा। परिवार से लाभ मिलेगा।

Thursday, 12 June 2014

Statue of mother sita morality

राम-कथा में माता सीता का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। उनका चरित्र संयमी, साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए प्रेरित करता है। जिससे हर नारी को नैतिकता की शिक्षा मिलती है।

राम की शक्ति सीता जी नारी सशक्तीकरण का उदाहरण हैं। अपूर्व साहस, बल, धैर्य, मातृत्व, पति का सहयोग आदि गुण हमें आज के युग में भी प्रेरणा प्रदान करते हैं।

राम-कथा के अनुसार, मिथिलानगरी में सीरजध्वज जनक नाम के राजा को सीता भूमि को जोतते समय मिली थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी पुत्री स्वीकार किया। सीता में अपूर्व बल और साहस था।

कथा के अनुसार, उन्होंने शिव-जी का धनुष अपने हाथों से उठा लिया था, जिसे देखकर राजा जनक बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने घोषणा करवा दी कि जो भी शिव जी का धनुष तोड़ेगा, उससे ही सीता का विवाह किया जाएगा। जिस धनुष को सीता ने उठा लिया था, उसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा सके। श्रीराम ने उस धनुष को तोड़कर सीता से विवाह किया।

जब श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले चौदह वर्र्षो का वनवास दिया गया, तो सीता जी ने उनके साथ जाने का तत्काल निर्णय लिया। उन्होंने अपने पति को विपत्तियों में नहीं छोड़ा। श्रीराम द्वारा अयोध्या में ही रहने के आग्रह के बाद भी सीता जी ने सभी सुखों को छोड़कर श्रीराम के साथ वन में जाना ही उचित समझा।

यह एक पत्नी का कर्तव्य भी है कि वह पति के सुख-दुख में सहभागी बनें। सीता ने वही किया। आज की कामकाजी महिलाएं घर की आर्थिक स्थिति सुधारने और सशक्त बनने के लिए घर से बाहर निकलती हैं और काम करके पति का सहयोग करती है। सीता जी ने भी महल में रहने का मोह नहीं किया और वे पति के साथ कंकड़ भरे मार्ग पर निकल पड़ीं।

जब रावण ने अपनी माया से उनका हरण कर लिया, तब भी वे हताश-निराश नहीं हुईं। वे मानसिक रूप से इतनी सबल थीं कि तमाम धमकाने और माया का प्रभाव डालने पर भी उनका आत्मविश्वास नहीं डिगा और उन्होंने गलत प्रस्ताव के आगे समर्पण नहीं किया। वे सत्य के साथ ही रहीं। उनका आत्मविश्वास और धैर्य ही था कि अंतत: सत्य की जीत हुई।

सीता जब अपने पुत्रों लव-कुश के संग वाल्मीकि आश्रम में रहीं, वहां उन्होंने बच्चों लव-कुश को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। सीताजी का चरित्र हमें धैर्यवान, साहसी, आत्मविश्वासी और सहयोगी बनने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Thursday, 5 June 2014

Learn to balance the mood of the boss

कहते हैं नौकरी पेंसिल की उस नोक की तरह होती है। जहां आप अगर खड़े हों तो फिसलने का डर हमेशा लगा रहता है। किसी भी नौकरी में आपके बॉस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर अपने बॉस का स्वभाव जान जाएं तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।

ज्योतिष में राशिफल के अनुसार बॉस के व्यवहार को परख सकते हैं। अहमदाबाद के ज्योतिर्विद व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि हर किसी का व्यवहार राशियों के अनुसार रहता है फिर चाहे वो आपका बॉस ही क्यो न हो? इसलिए आप अपने बॉस के नाम की राशि के अनुसार उनके व्यवहार को परख सकते हैं।

    मेष और वृश्चिक राशि को बॉस बड़े मजाकिया किंतु अनुशासित प्रकृति होते हैं। अपनी प्रशंसा सुनना संगीत नाटक व राजनीति में इनकी अधिक रूचि होती है। वृषभ व तुला राशि से इनका तालमेल कम होता है। ये जल्दी आवेश में आ जाते हैं और आक्रमक हो जाते हैं। इनसे बहुत ही प्यार से बोलकर काम निकालना आसान होता है।

    वृषभ व तुला राशि के बॉस स्वप्नलोक में विचरण करने वाले या कल्पनाशील प्रकृति के होते हैं। इनका स्वभाव जिद्दी अड़िअल किंतू नरम स्वभाव का होता है। एक बार कह दें तो यह वादा निभाना जानते हैं। प्यार में अक्सर धोखा खाते है। ऐसे बॉस अच्छे कवि, लेखक, सौंद्रर्य प्रेमी, दयालू और धार्मिक प्रकृति के होते हैं। किंतु वृश्चिक मिथुन राशि से नही बनती है। इनके शौक की प्रशंशा करते रहिए। यह इनकी कमजोरी है।

    मिथुन और कन्या राशि के बॉस गंभीर विचारशील प्रकृति के होते हैं। यह सहज व सरल किंतू अपने हित की पहले सोचने वाले होते हैं। ये पहले सोचते हैं फिर काम करते हैं। खिलाड़ी प्रकृति के होते हैं। प्यार में अक्सर सफल रहते हैं। अनुशासित व्यक्तित्व होता है। इनके ज्ञान व काम करने की प्रशंसा ये आप पर मेहरबान रहेंगे।

    कर्क राशि के जातक चालक परंतु भावुक होते हैं। इनका मन ईश्वर में लगा रहता है पर दिखावा पसंद करते हैं। इनको किसी पर भरोसा नहीं होता है। हर बार हर चीज को शंका से देखना इनकी फितरत में होता है । इसी स्वभाव से इनके आपसी संबध मजबूत नहीं रहते। इनके दुख में शामिल होकर आप इनको प्रभावित कर सकते हैं।

    सिंह राशि के व्यक्ति तेजस्वी ज्ञानी अनुशासित एवं नीति पर चलने वाले पारिवारिक किस्म के न्याय प्रिय होते हैं। दिल के साफ एवं ईमानदार मित्रता निभाना इनको बहुत आता है। तुला कुंभ मकर राशि से कम बनती। इनके साथ ईमानदारी से स्पष्ट बात कीजिए। चापलूसी इनको पसंद नहीं। कितु नास्तिक प्रकृति के होते हैं।

    धनु और मीन राशि के व्यक्ति संवेदनशील भावुक और धार्मिक प्रकृति के होते हैं। इसलिए अतिविश्वास पर बार- बार धोखा खाना नसीब में प्यार में धोखा खाते हैं। यह आस्तिक होते हैं और धर्म को मानते हैं। इनके साथ खुले मन के साथ बात कीजिए घुल- मिल जाएंगे। इनकी धार्मिक लोगों से बनती है।

    मकर और कुंभ राशि वाले व्यक्ति अनुशासित व्यक्ति होते हैं। संघर्ष करना और जीतना इन्हें पसंद है। अंदर से यह भावुक व दयालू होते हैं। बाहर से सख्त होने का दिखावा करते हैं। प्यार में ठोकर खाना बार-बार नसीब में होता है। दोस्ती निभाना इन्हें आती है। दिल की बात दोस्तों के साथ खुलकर करना और सभी तरह के शौक पूरा करना इनका स्वभाव होता है।

Source: Spiritual Hindi Stories & Rashifal Hindi 2014

Thursday, 22 May 2014

Why spend consumed

तिलक धारण करने के पहले भस्म लगाने की परंपरा है। क्योंकि भस्म में दुर्गंध नाशक और मन को उत्तेजित करने वाले अनेक रासायनिक घटक होते हैं। इससे शरीर की सुंदरता और तेजस्विता बढ़ जाती है।

भस्म लेपन से शरीर के रंध्र बंद हो जाते है ऐसी गलतफमियां लोगों में काफी प्रचारित हैं। वास्तविकता स्थिति से अलग है।

दरअसल भस्म में शरीर के अंदर स्थित दूषित द्वव्य सोख लेने की क्षमता होती है। इस कारण शरीर के संधि, कपाल, छाती के दोनों हिस्से तथा पीठ आदि पर भस्म लेपन करने से कई तरह के चर्म रोग नहीं होते हैं।

शरीर पर भस्म लगाते समय पारंपरिक विविध मंत्रों का उच्चारण भी किया जाता है। भस्म हाथ पर लेकर थोड़ा गीला करके तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियों से लगाएं। यो तीनों अगुंलियां पितृ, आत्म और देव तीर्थों के रूप में मानी गई हैं।

Shanidev is the birthday of lord shani jayanti

इस बार शनि जयंती त्रिपर्व संयोग के साथ आ रही है। पहले दिन सोम प्रदोष, दूसरे दिन शिव चतुर्दशी और तीसरे दिन शनि जयंती मिलकर यह संयोग बना रहे हैं। सर्वार्थसिद्धि योग होने से यह दिन और खास बन गया है।

शनि जयंती 28 मई बुधवार को आएगी। अमावस्या मंगलवार रात 11.45 बजे से बुधवार रात 12.09 बजे तक रहेगी। सर्वार्थसिद्धि योग बुधवार सुबह 5.13 बजे से दिवस पर्यंत रहेगा। ज्योतिर्विद्‌ श्यामजी बापू के अनुसार हवन-पूजन और साधना की दृष्टि से सर्वार्थसिद्धि योग खास है।

शनि दशा से पीड़ित जातकों के लिए यह दिन मंगलकारी होगा। वर्तमान में शनि अपनी उच्च राशि तुला में है, जो 02 नवंबर तक रहेगा। इस दिन शाम 5.56 बजे रोहिणी नक्षत्र लगेगा।

न्याय के देवता हैं शनि

ज्योतिर्विद देवेंद्र सिंह कुशवाह के मुताबिक के मुताबिक शास्त्रों में शनि को न्याय का देवता कहा गया है। मान्यता है कि शनि जयंती पर दान-पूजन से जातक शनि दोष से मुक्त होता है। इस दिन तिल-उड़द, काले कपड़े, लोहे की सामग्री दान करने का विधान है।

साढ़े साती के जातकों के लिए महत्वपूर्ण

पं. धर्मेंद्र शास्त्री ने बताया कि शनि जयंती पर बने त्रिपर्व संयोग के चलते तीन दिन शिव और शनि आराधना के लिए खास हैं। 26 मई को सोम प्रदोष, 27 को शिव चतुर्दशी और 28 को शनि जयंती रहेगी।

शनि के अधिष्ठाता देव भगवान शिव हैं। दो दिन शिव पूजन और अंतिम दिन शनि पूजन शुभ फल प्रदान करेगा। शिव पूजन से शनि की प्रसन्नाता प्राप्त होगी। कन्या, तुला और वृश्चिक राशि के जातकों पर साढ़े साती और कर्क व मीन पर शनि का ढैया है। इन जातकों को तीन दिन पूजन करना हितकारी रहेगा।

Monday, 19 May 2014

Significant correlation between friday and columbus

कोलम्बस जिसका पूरा नाम था क्रिस्टोफर कोलम्बस। शुक्रवार का दिन कोलम्बस के लिए काफी भाग्यशाली रहा था क्योंकि उसने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खोज शुक्रवार के दिन की थी।

अगर माह की किसी भी तारीख का मूलांक निकाला जाए तो वह किसी न किसी के लिए जरूर शुभ होता है। हो सकता है यह अंक किसी खास वार को ही आता हो।

ये वार भी अंकशास्त्र के अनुसार आपके लिए बहुत शुभ हो सकता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण प्रसिद्ध खोजकर्ता कोलम्बस के जीवन काल को देखने पर मिलता है।

कोलम्बस एक समुद्री-नाविक, उपनिवेशवादी, खोजी यात्री था। उसने अटलांटिक महासागर में बहुत सी समुद्री यात्राएं कीं और अमेरिकी महाद्वीप के बारे में बताया। हालांकि अमेरिका पहुंचने वाला वह प्रथम यूरोपीय नहीं था किन्तु कोलम्बस ने यूरोपवासियों और अमेरिका के मूल निवासियों के बीच विस्तृत सम्पर्क को बढ़ावा दिया।

कोलम्बस शुक्रवार के दिन पर बहुत श्रद्धा रखता था। इसका कारण यह था कि उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं शुक्रवार को ही हुईं। वह 3 अगस्त 1492 को अपनी लंबी यात्रा के लिए रवाना हुआ। इस दिन शुक्रवार ही था।

कोलम्बस ने शुक्रवार को ही एक द्वीप के आस-पास पक्षियों को देखा उसने अनुमान लगाया कि पास में कोई आबादी है। समुद्री यात्रा करते हुए जब भूमि दिखाई दी तो उसे बड़ा ही सुखद अनुभव हुआ।

70 दिन लगातार चलने के बाद शुक्रवार को वह एक छोटे से अमेरिकन द्वीप पर उतरा। तब शुक्रवार 17 मई को उसने वारसेलोना में विजय प्राप्त की। शुक्रवार 30 नवम्बर को ही उसने पियोरतोसान्तो में क्राॅस की स्थापना की और शुक्रवार 4 जनवरी को ही वह स्पेन के लिए रवाना हुआ। कोलम्बस का जीवन अंकशास्त्र की दृष्टि से देखें तो काफी मिलता-जुलता लगता है।

हालांकि पाश्चात्य मत पहले दिया जा चुका है कि किस तारीख में उत्पन्न व्यक्ति के लिए कौन सा विशेष वार शुभ होगा। भारतीय मतानुसार जिसकी जन्मकुंडली में जो ग्रह बलवान होगा वह लग्नेश और चंद्रराशीश का मित्र होगा। वह शुभ होगा। पर निर्णय के लिए जन्मकुंडली की आवश्यकता होती है।

इस कारण अपने अनुभव के आधार पर निश्चय कर सकते हैं कौन सा वार शुभ और कौन सा अशुभ होगा।

Tuesday, 13 May 2014

Who are the best in between religion and politics

धर्म जीवन को जीने की कला है। जीवन जीने का विज्ञान है। हम जीवन को उसके पूरे अर्थों में कैसे जिएं, धर्म उसकी खोजबीन है। धर्म यदि जीवन-कला की आत्मा है, तो राजनीति जीवन-कला का शरीर है। धर्म अगर प्रकाश है तो राजनीति पृथ्वी है।

भारत में राजनीति और धर्म दोनों जैसे विरोधी रहे हैं। यह एक दूसरे की तरफ पीठ किए हुए हैं। यह आज की ही बात नहीं है, हजारों वर्षों से ऐसा होता आ रहा है और इसका परिणाम हमने भोगा है। एक हजार वर्ष की गुलामी इसका एक बेहद संजीदा उदाहरण है। हिंदुस्तान गुलाम हुआ, क्योंकि हिंदुस्तान के धार्मिक लोगों के मन में ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कुछ करना चाहिए।

हजारों वर्षों तक धार्मिक आदमी कहता रहा कि राजनीति से हमें कुछ लेना-देना नहीं है। धर्म से हमें कुछ-लेना देना नहीं है। लेकिन कोई राज नीति धर्म निरपेक्ष कैसे हो सकती है? राजनीति के धर्म निरपेक्ष होने का क्या अर्थ हो सकता है? एक ही अर्थ हो सकता है कि जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, जो भी श्रेष्ठ है, राजनीति को उससे कोई प्रयोजन नहीं।

दरअसल धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ होता है सत्य से निरपेक्ष होना, प्रेम से निरपेक्ष होना, जीवन के गहनतम ज्ञान से निरपेक्ष होना। कोई भी राजनीति अगर धर्म से निरपेक्ष होगी, तो वह मनुष्य के शरीर से ज्यादा गहरा प्रवेश नहीं कर सकती है और जो समाज केवल शरीर के आस-पास जीने में लगा रहता है, उस समाज के जीवन में उसी तरह की दुर्गंध पैदा हो जाएगी।

अगर हम पुराना इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि हिंदुस्तान के धार्मिक लोगों ने भी राजनीति के साथ इतना ही गलत व्यवहार किया है। वे आज तक कह रहे हैं कि राजनीति से धर्म राजनीति से निरपेक्ष है।

धर्म का राजनीति से कोई संबंध न था और न ही है। स्वाभाविक था कि जब धर्म, राजनीति से इतना निरपेक्ष रहा हो तो धर्म से भी हमें कुछ लेना देना न रहा हो। धर्म एक चुनौती है, ऊपर उठाने के लिए धर्म एक पुकार है इसलिए निरंतर ऊपर उठते रहो धर्म एक आह्वान है ताकि मनुष्य ऊंचे शिखरों पर चढ़ता रहे।

राजनीति धर्म से अलग होकर सिर्फ कूटनीति रह जाती है। वह पॉलिटिक्स नहीं होती, सिर्फ डिप्लोमेसी हो जाती है। वहां झूठ और सच में कोई फर्क नहीं रह जाता। हिटलर ने अपने कमरे के ऊपर लिख रखा था कि सत्य के अतिरिक्त और कोई नियम नहीं और उसने अपने कमरे के बाहर लिख रखा था कि हिटलर से ज्यादा झूठ बोलने वाला आदमी पृथ्वी पर कभी नहीं रहा।

राजनीतिज्ञ सदा चाहता है कि धर्म से दूर रहे, क्योंकि धर्म के सामने उसे आत्मग्लानि होनी शुरू हो जाती है। पर वर्तमान हालात ऐसे नहीं हैं।

Monday, 12 May 2014

Unsolved mysteries of the mahabharata

महाभारत को पांचवां वेद कहा गया है। यह भारत की गाथा है। इस ग्रंथ में तत्कालीन भारत (आर्यावर्त) का समग्र इतिहास वर्णित है। अपने आदर्श पात्राें के सहारे यह हमारे देश के जन-जीवन को प्रभावित करता रहा है। इसमें सैकड़ों पात्रों, स्थानों, घटनाओं तथा विचित्रताओं व विडंबनाओं का वर्णन है।

महाभारत में कई घटना, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत है, चाहे वह कौरव, पांडव, कर्ण और कृष्ण हो या धृष्टद्युम्न, शल्य, शिखंडी और कृपाचार्य हो। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं।

उस समय मौजूद थे परमाणु अस्त्र

मोहनजोदड़ो में कुछ ऐसे कंकाल मिले थे जिसमें रेडिएशन का असर था। महाभारत में सौप्तिक पर्व के अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिए गए हैं। हिंदू इतिहास के जानकारों के मुताबिक 3 नवंबर 5561 ईसापूर्व छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र परमाणु बम ही था?

18 का अंक का जादू

कहते हैं कि महाभारत युद्ध में 18 संख्‍या का बहुत महत्व है। महाभारत की पुस्तक में 18 अध्याय हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया। गीता में भी 18 अध्याय हैं।18 दिन तक ही युद्ध चला। कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिणी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिणी सेना थी। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे। सवाल यह उठता है कि सब कुछ 18 की संख्‍या में ही क्यों होता गया?

कौरवों का जन्म एक रहस्य

कौरवों को कौन नहीं जानता। धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था। कुरु वंश के होने के कारण ये कौरव कहलाए। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थी, तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए।

गांधारी ने वेदव्यास से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर लिया। गर्भ धारण के पश्चात भी दो वर्ष व्यतीत हो गए, किंतु गांधारी काे कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई। इस पर क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट पर जोर से मुक्के का प्रहार किया जिससे उसका गर्भ गिर गया।

वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल ही जान लिया। वे गांधारी के पास आकर बोले- 'गांधारी! तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र ही सौ कुंड तैयार करवाओ और उनमें घृत (घी) भरवा दो।'वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुए के बराबर सौ टुकड़े हो गए।

वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए हुए सौ कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश देकर अपने आश्रम चले गए। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। फिर उन कुंडों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दु:शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ।

महान योद्धा बर्बरीक

बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री 'कामकंटकटा' के उदर से भी इनके जन्म होने की बात कही गई है। महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए।

बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह जानकर भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक उनका शीश मांग लिया।

बर्बरीक ने कृष्ण से प्रार्थना की कि वे अंत तक युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर सबसे ऊंची जगह पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर रख दिया गया, जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।

राशियां नहीं थीं ज्योतिष का आधार

महाभारत के दौर में राशियां नहीं हुआ करती थीं। ज्योतिष 27 नक्षत्रों पर आधारित था, न कि 12 राशियों पर। नक्षत्रों में पहले स्थान पर रोहिणी था, न कि अश्विनी। जैसे-जैसे समय गुजरा, विभिन्न सभ्यताओं ने ज्योतिष में प्रयोग किए और चंद्रमा और सूर्य के आधार पर राशियां बनाईं और लोगों का भविष्य बताना शुरू किया, जबकि वेद और महाभारत में इस तरह की विद्या का कोई उल्लेख नहीं मिलता जिससे कि यह पता चले कि ग्रह नक्षत्र व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं।

विदेशी भी शामिल हुए थे लड़ाई में

महाभारत के युद्ध में विदेशी भी शामिल हुए थे। इस आधार पर यह माना जाता है कि महाभारत प्रथम विश्व युद्ध था।

28वें वेदव्यास ने लिखी महाभारत

ज्यादातर लोग यह जानते हैं कि महाभारत को वेदव्यास ने लिखा है लेकिन यह अधूरा सच है। वेदव्यास कोई नाम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी, जो वेदों का ज्ञान रखने वालाें काे दी जाती थी। कृष्णद्वैपायन से पहले 27 वेदव्यास हो चुके थे, जबकि वे खुद 28वें वेदव्यास थे। उनका नाम कृष्णद्वैपायन इसलिए रखा गया, क्योंकि उनका रंग सांवला (कृष्ण) था और वे एक द्वीप पर जन्मे थे।

तीन चरणों में लिखी महाभारत

वेदव्यास की महाभारत तीन चरणों में लिखी गई। पहले चरण में 8,800 श्लोक, दूसरे चरण में 24 हजार और तीसरे चरण में एक लाख श्लोक लिखे गए। वेदव्यास की महाभारत के अलावा भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे की संस्कृत महाभारत सबसे प्रामाणिक मानी जाती है।

अंग्रेजी में संपूर्ण महाभारत दो बार अनुदित की गई थी। पहला अनुवाद 1883-1896 के बीच किसारी मोहन गांगुली ने किया था और दूसरा मनमंथनाथ दत्त ने 1895 से 1905 के बीच। 100 साल बाद डॉ. देबरॉय तीसरी बार संपूर्ण महाभारत का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं।

Love yourself

जब आप खुद से प्रेम करने लगते हैं तो चीजें एकाएक सुंदर और अर्थवान दिखाई देने लगती हैं। प्रसन्नता,

उत्कृष्टता और प्रेरणा के लिए अपने आप से प्रेम करना बहुत जरूरी है। अपने प्रति अच्छा भाव आपको अपने अन्य कामों में भी बेहतर प्रदर्शन का मौका देता है।

अपने प्रति अच्छा महसूस करने पर हम शांति और सकारात्मकता के साथ अपने कामों को पूरा कर पाते हैं। बहुत छोटी-छोटी चीजों के सहारे हम यह देख सकते हैं कि हम खुद को बेहतर नजर के साथ देख पा रहे हैं या नहीं।

अक्सर हम दूसरों के साथ व्यवहार में इतने ज्यादा व्यस्त होते हैं कि अपने प्रति ईमानदारी से एकाग्र नहीं हो पाते हैं लेकिन जब हम खुद के लिए समय निकालते हैं तो दुनिया पहले से ज्यादा बेहतर बन सकती है।

हमारी समस्याओं, तनावों और चिंताओं का हल तभी निकल सकता है जबकि हम खुद से प्यार करें। तभी हम अपने को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। अपने को समझे बिना और अपनी खूबियों के एहसास के बिना कोई भी व्यक्ति आनंद की अवस्था में नहीं पहुंचता है। जब आप अपनी जरूरतों को जान लेते हैं तो ज्यादा बेहतर काम कर पाते हैं। यह अपने सहारे संसार को बदलने का प्रयास भी है।

कैसे जांचें स्वयं से प्रेम है

अपने सपनों को आप प्राथमिकता देते हैं और वे ही चीजें करते हैं जो आपको प्रेरित करती हैं और अच्छा महसूस करने में मदद करती हैं।

जिन चीजों से आप सहमत नहीं होते या जो आपकी योजना में ठीक नहीं बैठती उनके लिए स्पष्ट रूप से ना"कहते हैं।

आप उन लोगों के साथ समय बिताते हैं जो आपका समर्थन करते हैं, आपको प्रेरित करते हैं और आपकी अच्छी चीजों को बढ़ावा देते हैं।

आप अपने विचारों के साथ जाना पसंद करते हैं और दूसरों को प्रसन्ना करने के लिए कोई काम नहीं करना चाहते।

आप अपने आप से बात करते हुए शांति के साथ रह पाते हैं और खुद से आपको चिढ़ नहीं होती।

आप उन नई चीजों के साथ प्रयोग का साहस कर पाते हैं जिनका अनुभव आप हमेशा से लेना चाहते थे।

आप अपने भोजन, व्यायाम और एकांत के लिए समय निकाल पाते हैं।

अपने सत्य के पक्ष में खड़े रह पाते हैं। पैसा उन चीजों में खर्च करते हैं जो आपको आश्चर्य महसूस करने में मदद करती हैं।

अच्छी चीजों को देखना और उन चीजों से दूरी रखना जो आपको नीचे ले जाती हैं।

खुद से रिश्ता बदले दुनिया

जब आप अपने से प्यार करने लगते हैं तो आप शंका और चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। हम अपनी भावनाओं और निर्णयों पर विश्वास करते हैं। यह हमें ज्यादा साहसी और प्रामाणिक बनाता है।

हम दिल से जीने लगते हैं और जिंदगी को ज्यादा उदार तरीके से देखने लगते हैं। हम अपने लिए तय की गईं सीमाओं से बाहर देखने लगते हैं और ज्यादा बड़े सपनों में विश्वास करने लगते हैं।

हम नकारात्मक पक्षों पर ध्यान देना बंद देते हैं और अपनी संभावनाओं पर ध्यान देकर अपने लिए आगे की राह खोज पाते हैं। हम यह देखते हैं कि हमारा जीवन कितने नई चीजों से भरा हुआ है।

हम सकारात्मकता, शांति, आत्मविश्वास और प्रसन्नता के साथ अपने काम में आगे बढ़ने लगते हैं। हमारे व्यवहार में एक खास तरह की तन्मयता झलकने लगती है।

Monday, 5 May 2014

Where this temple women can get the children to bed

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला की लड़भडोल तहसील। यहां के सिमसा गांव में सिमसा देवी का एक ऐसा मंदिर है जहां पर निः संतान महिलाएं अगर मंदिर के फर्श पर सो जाएं तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है।

आधुनिक विज्ञान ये भले ही न मानें पर आस्था के बल पर ये संभव है। नवरात्रि के समय इस मंदिर हिमाचल पर्देश के पडोसी राज्यों पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ ऐसी सैकड़ों महिलाएं इस मंदिर आती हैं, जिनकी संतान नहीं होती है।

माता सिमसा या देवी सिमसा को संतान-दात्री के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रों में होने वाले इस विशेष उत्सव को स्थानीय भाषा में सलिन्दरा कहा जाता है। सलिन्दरा का अर्थ है 'स्वप्न आना' होता है।

माना जाता है कि जो महिलाएं माता सिमसा के प्रति मन में श्रद्धा लेकर से मंदिर में आती है माता सिमसा उन्हें स्वप्न में मानव रूप में या प्रतीक रूप में दर्शन देकर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती हैं।

कहते हैं कि कोई महिला स्वप्न में कोई कंद-मूल या फल प्राप्त करती है तो उस महिला को संतान का आशीर्वाद मिल जाता है। देवी सिमसा आने वाली संतान के लिंग-निर्धारण का भी संकेत देती है।

जैसे कि किसी महिला को अमरुद का फल मिलता है तो समझा जाता है पुत्र प्राप्त होगा। अगर किसी को स्वप्न में भिन्डी प्राप्त होती है तो समझा जाता है कि संतान के रूप में कन्या की प्राप्ति होगी। और यदि किसी को धातु, लकड़ी या पत्थर की बनी कोई वस्तु प्राप्त हो तो समझा जाता है कि उसको संतान नहीं होगी।

यह मंदिर बैजनाथ से 25 किलोमीटर और जोगिन्दर नगर से लगभग 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

Who is aghori

अघोरियों का जीवन जितना कठिन है, उतना ही रहस्यमयी भी। इनकी साधना विधि सबसे ज्यादा रहस्यमयी होती है जिसकी अपनी शैली, अपना विधान है, अपनी अलग विधियां हैं।

अघोरी का मतलब होता है घोर नहीं यानी वह बहुत सरल और सहज होते हैं। जिसके मन में कोई भेदभाव नहीं हो। अघोरी हर चीज को समान भाव से देखते हैं। वे सड़ते जीव के मांस को भी उतना ही स्वाद लेकर खा सकते हैं, जितना स्वादिष्ट पकवानों को स्वाद लेकर खाया जा सकता है।

कहते हैं कि अघोरियों की दुनिया निराली है। वे जिस पर प्रसन्न हो जाएं, उसे सब कुछ दे देते हैं। उनकी कई ऐसी बातें हैं, जिसे सुनकर आप हैरान हो सकते हैं।

1. अघोरी किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा किए बगैर नहीं छोड़ते। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं। अधिकांश अघोरियों की आंखें लाल होती हैं, जैसे वो गुस्से में हों, लेकिन उनका मन उतना ही शांत भी होता है। काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी गले में धातु की बनी नरमुंड की माला पहनते हैं।

2. वे अमूमन श्मशान में ही अपनी कुटिया बनाते हैं। वहां एक धूनी जलती रहती है। जानवरों में वो सिर्फ कुत्ता पालना पसंद करते हैं। उनके साथ उनके शिष्य रहते हैं। अघोरी अपनी बात के बहुत पक्के होते हैं। वे अगर किसी से कोई बात कह दें तो उसे जरूर पूरा करते हैं।

3. अघोरी तीन तरह की साधना करते हैं। शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पैरहै। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाई जाती है।

4. शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्मशान साधना। इसमें आम परिवार के लोग भी शामिल हो सकते हैं। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहां प्रसाद के रूप में मांस-मंदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता है।

5. अघोरी गाय का मांस छोड़ कर बाकी सभी चीजें खाते हैं। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है, इसलिए वे श्मशान में रहना ही ज्यादा पंसद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र फलदायक होता है। यहां आमतौर पर लोग जाते नहीं, इसीलिए साधना में विघ्न पड़ने का कोई प्रश्न नहीं उठता। उनके मन से अच्छे-बुरे का भाव निकल जाता है।

6. कम ही लोग जानते हैं कि अघोरियों की साधना में इतना बल होता है कि वो मुर्दे से भी बात कर सकते हैं। ये बातें पढ़ने-सुनने में भले ही अजीब लगें, लेकिन इन्हें पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। उनकी साधना को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती।

Saturday, 3 May 2014

It still sits under the feet of lord hanuman lnkini

महाकाल की नगरी उज्जैन। यहां के अखंड ज्योति मंदिर में बजरंगबली की मूर्ति से लेकर पूजन की बात ही निराली है। जहां एक तरफ बजरंगबली की सिंदूरी प्रतिमा भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है, तो वहीं पांव के नीचे दबी लंकिनी राक्षसी उनके पराक्रम की कहानी सुनाती है।

कहते हैं लक्ष्मण को बचाने के लिए जब हनुमान संजीवनी लेकर आ रहे थे तो लंकिनी नाम की राक्षसी ने उनका रास्ता रोक कर उन्हें जाने से रोका, जिसके बाद हनुमान, लंकिनी को अपने पैरों के नीचे दबाकर आगे बढ़ गए थे। इस मंदिर में महावीर के उसी रूप के दर्शन होते हैं जहां आज भी हनुमान के पैरों तले लंकिनी विराजमान है।

पूरे साज श्रृंगार के साथ बाल ब्रह्मचारी का ये रूप बड़ा ही मनमोहक है। दक्षिणामुखी हनुमान की इस प्रतिमा में उनके एक हाथ में संजीवनी तो कंधे पर गदा सुशोभित होती है। हाथों में बाजूबंद, पांव में पाजेब और कलाई में कड़े पहने हुए महावीर के दिव्य रूप के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

मंदिर के नाम के अनुरूप ही यहां जलता अखंड दिया भक्तों को बजरंबली के चमत्कार की कहानी सुनाता है। वैसे तो देखने में ये मंदिर हनुमान के अन्य मंदिरों की तरह ही है लेकिन मंदिर में सालों से जल रहे अखंड दीये में बजरंगबली की चमत्कारी शक्तियां समाहित हैं।

कहते हैं साढ़ेसाती से परेशान भक्त अगर इस मंदिर में आकर इस अखंड दीये के दर्शन कर लें और मंदिर में आटे का एक दीया जला दें तो शनि के प्रकोप से मुक्ति मिलते देर नहीं लगती।

भक्त हनुमान जी को यहां कई तरह के प्रसाद चढ़ाते हैं. कहते हैं भक्त यहां अपनी मनोकामना प्रसाद के माध्यम से लेकर आते हैं। अगर किसी को झगड़े, मकदमों से छुटकारा चाहिए तो एक नारियल के अर्पण मात्र से उसके तमाम कष्टों का निवारण हो जाता है। ठीक उसी तरह जिन भक्तों को संतान की कामना है वो अपनी शक्ति और भक्ति के अनुसार 1, 2 या 5 किलो तेल अखंड ज्योति में चढ़ाने का संकल्प लेते हैं।

चना-चिरौंजी से प्रसन्न होने वाले हनुमान को यहां विशेषतौर से अखरोट के प्रसाद का भोग लगाया जाता है. कहते हैं जिन भक्तों की मन्नत पूरी होती है वो यहां आकर आटे में गुड़ मिलाकर रोट का प्रसाद तैयार करते हैं और बजरंगबली को भोग लगाते हैं।

मंदिर में प्रतिदिन होने वाली आरती का गवाह बनने के लिए बड़ी संख्या में भक्तों सैलाब उमड़ता है। कहते हैं बल, विद्या और बुद्धि का वरदान पाने के लिए यहां हनुमान के संग उनकी दायीं ओर रखी हुई चंदन की गदा के दर्शन करना भी जरूरी है। मंगलवार और शनिवार को यहां पूजा करने का विशेष महत्व है।

Would be untimely death

इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में होती दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है। ताकि लोग अचानक मृत्यु के शिकार न हो। हालांकि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है।

जिस व्यक्ति ने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन जरूर मरना पड़ेगा। श्रीमदभागवत गीता में श्रीकृष्ण ने भी यही संदेश दिया है कि आत्मा अमर है और यह देह नश्वर है।

शिव पुराण के अनुसार असमय या अचानक होने वाली मृत्यु से बचने के लिए शनि आराधना सर्वश्रेष्ठ उपाय है। शनि देव असमय मृत्यु से बचाने में सक्षम हैं। शनि देव को प्रसन्न करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन है शनिवार।

इस दिन भगवान शनि के निमित्त पूजन करने वाले व्यक्ति को असमय मृत्यु का भय नहीं रहता है। इसके साथ ही ज्योतिष संबंधी कुंडली के कई दोष भी इनकी आराधना से शांत हो जाते हैं।

भगवान शिव के मंत्र 'ऊँ नमः शिवाय' का जाप अगर आप करते हैं तो भी असमय मृत्यु से बचा जा सकता है। सबसे क्रूर माने जाने वाले शनि से कृपा प्राप्त करने के लिए शनिवार के दिन विशेष पूजन करें।

शनि के निमित्त शनि की वस्तुओं का दान करें। इसके अतिरिक्त भगवान शिव को जल में तिल डालकर अर्पित करें। शिवजी के साथ ही शनिदेव की आराधना से व्यक्ति अकाल मृत्यु से बच सकते हैं।

प्रत्येक शनिवार को यह उपाय करने से अकाल मृत्यु का खतरा टल जाता है और व्यक्ति को लंबी आयु प्राप्त होती है। यह उपाय शिव पुराण में दिया गया है अत: इसमें शंका और संदेह न करें अन्यथा इस उपाय का उचित पुण्य प्राप्त नहीं हो सकेगा।

Saturday worship the shani dev

ज्योतिष के अनुसार शनि देव को न्यायाधीश का पद प्राप्त है। यानी सभी लोगों के अच्छे-बुरे कर्मों का फल शनिदेव ही देते हैं। यही वजह है कि से इन्हें क्रूर देवता माना जाता है।

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि अशुभ स्थिति में हो तो उसे जीवनभर संघर्ष करना पड़ता है। शनि के बुरे प्रभावों को दूर करने या कम करने के शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं।

माह के हर शनिवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में नीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर विशेष दीपक, तेल, रुई की बत्ती आदि पूजन सामग्री से पूजा करें और शनि देव का ध्यान करें और अशुभ प्रभावों को दूर करने की प्रार्थना करें।

ऐसे तैयार करें विशेष दीपक?

दीपक चार मुख (जिस दीपक को एक साथ चार जगह से जलाया जा सके) का होना चाहिए। इस प्रकार दीपक में दो रुई की लंबी बत्तियां लगाएं और दोनों बत्तियों के चार मुंह दीपक से बाहर निकालें। अब चारों ओर से दीपक को जलाएं। यह दीपक पीपल के वृक्ष के नीचे रखें और शनिदेव से प्रार्थना करें। इसके बाद पीपल के वृक्ष की सात परिक्रमा लगाएं।

घर लौटकर एक कटोरी में तेल लें, उसमें अपना चेहरा देखें और इस तेल का दान करें। इस प्रकार यह उपाय अपनाने से शनि दोषों का प्रभाव अवश्य कम हो जाएगा।

Friday, 2 May 2014

Searching in enjoy work

एक गांव में कुछ मजदूर पत्थर के खंभे बना रहे थे। उधर से एक संत गुजरे। उन्होंने एक मजदूर से पूछा- यहां क्या बन रहा है? उसने कहा- देखते नहीं पत्थर काट रहा हूं? संत ने कहा- हां, देख तो रहा हूं। लेकिन यहां बनेगा क्या? मजदूर झुंझला कर बोला- मालूम नहीं।

यहां पत्थर तोड़ते-तोड़ते जान निकल रही है और इनको यह चिंता है कि यहां क्या बनेगा। साधु आगे बढ़े। एक दूसरा मजदूर मिला। संत ने पूछा- यहां क्या बनेगा? मजदूर बोला- देखिए साधु बाबा, यहां कुछ भी बने।

चाहे मंदिर बने या जेल, मुझे क्या। मुझे तो दिन भर की मजदूरी के रूप में 100 रुपए मिलते हैं। बस शाम को रुपए मिलें और मेरा काम बने। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि यहां क्या बन रहा है। साधु आगे बढ़े तो तीसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे पूछा- यहां क्या बनेगा? मजदूर ने कहा- मंदिर।

इस गांव में कोई बड़ा मंदिर नहीं था। इस गांव के लोगों को दूसरे गांव में उत्सव मनाने जाना पड़ता था। मैं भी इसी गांव का हूं। ये सारे मजदूर इसी गांव के हैं। मैं एक- एक छेनी चला कर जब पत्थरों को गढ़ता हूं तो छेनी की आवाज में मुझे मधुर संगीत सुनाई पड़ता है। मैं आनंद में हूं।

कुछ दिनों बाद यह मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा और यहां धूमधाम से पूजा होगी। मेला लगेगा। कीर्तन होगा। मैं यही सोच कर मस्त रहता हूं। मेरे लिए यह काम, काम नहीं है। मैं हमेशा एक मस्ती में रहता हूं। मंदिर बनाने की मस्ती में। मैं रात को सोता हूं तो मंदिर की कल्पना के साथ और सुबह जगता हूं तो मंदिर के खंभों को तराशने के लिए चल पड़ता हूं।

बीच-बीच में जब ज्यादा मस्ती आती है तो भजन गाने लगता हूं। जीवन में इससे ज्यादा काम करने का आनंद कभी नहीं आया। साधु ने कहा- यही जीवन का रहस्य है मेरे भाई। बस नजरिया का फर्क है।

संक्षेप में

आप जो भी काम करें उसमें आनंद ढूंढ लें। काम स्वतः ही आनंदमय हो जाएगा। गीता में भी कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा मत करो, अगर कर्म अच्छे हैं तो फल स्वतः ही मिल जाएगें।

There is giu village of old saint mysterious mummy

हिमाचल का गीयू गांव। यहां है 550 साल पुरानी एक संत कि प्राकृतिक ममी। जिसके बाल और नाखून अभी भी बड़ते हैं। जिसे लोग देखकर हैरान हैं। गोवा के बीम जीसस चर्च के संत फ्रांसिस जेवियर की मौत के बाद उनके शव को केमिकल्स से संरक्षित करके ममी बनाई गई थी।

यह ममी हिमाचल प्रदेश के लाहुल स्पीति जिले के गीयू गांव में रखी हुई है। यह ममी लगभग 550 साल पुरानी है। इस ममी के बाल और नाखून आज भी बढ रहे हैं।

तिब्बत से 2 किमी दूर

ये ममी बैठी हुई अवस्था में है जबकि दुनिया में पाई गईं बाकी ममी लेटी हुई अवस्था में मिलती हैं। गीयू गांव हर साल में 6 से 8 हीने बर्फ की वजह से बाकी दुनिया से कटा रहता है। क्योकि यह गांव काफी ऊंचाई पर स्थित है और ये तिब्बत से मात्र 2 किलोमीटर दूर है ।

गांव वालो की मानें तो ये ममी पहले गांव में ही रखी हुई थी और एक स्तूप में स्थापित थी, पर 1974 में भूकम्प आया तो ये कहीं पर दब गई । उसके बाद सन 1995 में आईटीबीपी के जवानो को सडक बनाते समय ये ममी मिली और उन्होंने इसे सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया।

ममी के सिर से निकला खून

कहा जाता है कि उस समय कुदाल सिर में लगी इस ममी के और कुदाल लगने के बाद ममी के सिर से खून भी निकला। जिसका निशान आज भी मौजूद है। इसके बाद सन 2009 तक ये ममी आईटीबीपी के कैम्पस में ही रखी रही। इसके बाद गांव वालो ने इस ममी को गांव में लाकर स्थापित कर दिया।

ममी को रखने के लिए शीशे का एक कैबिन बनाया गया है। इस ममी की देखभाल गांव में रहने वाले परिवार करते हैं। यहां आने वाले पर्यटकों को वे ममी के बारे में जानकारी देते है। यहां पर देश विदेश के हजारों पर्यटक इस मृत देह को देखने आते हैं।

इस ममी के बाल भी हैं। ममी की जांच भी की गई थी जिसमें वैज्ञानिको ने बताया था कि ये 545 वर्ष पुरानी है । पर इतने साल तक बिना किसी लेप के और जमीन में दबी रहने के बावजूद ये ममी कैसे इस अवस्था में है ये आश्चर्य का विषय है ।

गांव में बिच्छुओं का प्रकोप

कहते हैं कि करीब 550 वर्ष पूर्व गीयू गांव में एक संत थे। गीयू गांव में इस दौरान बिच्छुओं का बहुत प्रकोप हो गया। इस प्रकोप से गांव को बचाने के लिए संत फ्रांसिस जेवियर ने ध्यान लगाने के लिए लोगों से उसे जमीन में दफन करने के लिए कहा।

जब संत फ्रांसिस जेवियर को जमीन में दफन किया गया तो उनके प्राण निकलते ही गांव में इंद्रधनुष निकला और गांव बिच्छुओं से मुक्त हो गया।

बौद्ध भिक्षु सांगला तेनजिंग

जबकि कुछ लोगो का कहना है कि ये ममी बौद्ध भिक्षु सांगला तेनजिंग की है जो तिब्बत से भारत आए और यहां पर जो एक बार योगमुद्रा में बैठे तो फिर उठे ही नहीं।

ऐसा माना जाता है कि ममी के बाल और नाखुन बढ़ते हैं लेकिन गीयू गांव के लोगों की मानें तो अब ममी के बाल और नाखुन बढऩे कम हो गए हैं। बाल कम होने के कारण ममी का सिर गंजा होने लगा है।