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Thursday, 12 June 2014

Talking parrots and the hunter story

एक बार एक साधु ने अपनी कुटिया में कुछ तोते पाल रखे थे। सभी तोते अपनी सुरक्षा के लिए एक गीत गाते थे। गीत कुछ इस तरह था कि 'शिकारी आएगा जाल बिछाएगा पर हम नहीं जाएंगे' एक दिन साधु भिक्षा मांगने के लिए पास के एक गांव में गए।

इसी बीच एक बहेलिया ने देखा एक पेड़ पर तोते बैठे हैं उसे उन पक्षियों को देख उसे लालच हुआ उसने उन सभी तोते को पकड़ने की योजना बनाने लगा। तभी तोते एक साथ गाने लगे शिकारी आएगा जाल बिछाएगा पर हम नहीं जाएंगे। बहेलिया ने जब यह सुना तो आश्चर्यचकित रह गया

उसने इतने समझदार तोते कहीं देखें ही नहीं थे उसने सोचा इन्हे पकड़ना असंभव हैं ये तो प्रशिक्षित तोते लगते हैं। बहेलिया को नींद आ रही थी उसने उसी पेड़ के नीचे अपनी जाल में कुछ अमरूद के टुकड़े डाल कर सो गया, सोचा कि संभवतः कोई लालची और बुद्धू तोता फंस जाएं।

कुछ समय बाद जब वह सोकर उठा तो देखा कि सारे तोते एक साथ गा रहे थे शिकारी आएगा जाल बिछाएगा पर हम नहीं जाएंगे। पर वह यह गीत जाल के अंदर गा रहे थे। शिकारी उन सब बुद्धू तोते की हाल देख हंस पड़ा और सब को पकड़ कर ले गया।

संक्षेप में

हमें किसी भी ज्ञान को रटने की वजाय उसे समझने पर बल देना चाहिए। क्यों कि रटा हुआ ज्ञान विपत्ति पढ़ने पर काम नहीं आता।

Saturday, 7 June 2014

Ranjit singh gave valuable donet the golden temple

स्वर्ण मंदिर हालही में चर्चा में हैं। स्वर्ण मंदिर को हरमंदिर साहिब या दरबार साहिब भी कहा जाता है। इसके आस पास के सुंदर परिवेश और स्वर्ण की पर्त के कारण स्वर्ण मंदिर कहते हैं। यह अमृतसर (पंजाब) में स्थित सिक्खों का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है।

पंजाब-केसरी महाराज रणजीत सिंह ने स्वर्ण-मन्दिर को एक बहुमूल्य पटमण्डप दान में दिया था, जो संग्रहालय में है।

यह मंदिर सिक्ख धर्म का सहनशीलता तथा स्वीकार्यता के संदेश को अपने वास्तुकला में समेटे हुए है। जिसमें अन्य धर्मों के संकेत शामिल किए गए हैं।

दुनिया भर के सिक्ख अमृतसर आना चाहते हैं और श्री हरमंदिर साहिब में अपनी अरदास देकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करना चाहते हैं।

कहते हैं कि सन 1589 ने गुरु अर्जुन देव के एक शिष्य शेखमियां मीर ने सरोवर के बीच में स्थित वर्तमान स्वर्ण-मन्दिर की नींव रखी थी।

मन्दिर के चारों ओर चार दरवाजों का प्रबन्ध किया गया था। यह गुरु नानक के उदार धार्मिक विचारों का प्रतीक समझा गया।

मन्दिर में गुरु-ग्रंथ-साहिब की, जिसका संग्रह गुरु अर्जुन देव ने किया था, स्थापना की गई थी। सरोवर को गहरा करवाने और परिवर्धित करने का कार्य बाबू बूढ़ा नामक व्यक्ति को सौंपा गया था और इन्हें ही ग्रंथ-साहब का प्रथम ग्रंथी बनाया गया।

1757 ई. में वीर सरदार बाबा दीपसिंह जी ने मुसलमानों के अधिकार से इस मन्दिर को छुड़ाया, किन्तु वे उनके साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने अपने अधकटे सिर को सम्भालते हुए अनेक शत्रुओं को मौत के घाट उतारा।

उनकी दुधारी तलवार मन्दिर के संग्रहालय में सुरक्षित है। स्वर्ण-मन्दिर के निकट बाबा अटलराय का गुरुद्वारा है। ये छठे गुरु हरगोविन्द के पुत्र थे, और नौ वर्ष की आयु में ही सन्त समझे जाने लगे थे।

उन्होंने इतनी छोटी-सी उम्र में एक मृत शिष्य को जीवन दान देने में अपने प्राण होम दिए थे। कहा जाता है, कि गुरुद्वारे की नो मंजिलें इस बालक की आयु की प्रतीक हैं।

Thursday, 5 June 2014

Vaastu light colors to paint the house is so good

घर का वास्तु ठीक हो तो आपको परेशानियां स्पर्श भी नहीं कर सकती हैं। इन आसान से वास्तु टिप्स को आजमाकर आप हमेशा खुशी और हर्षोउल्लास से अपनी ज़िंदगी को और भी ज्यादा बेहतर तरीके से जी सकते हैं।

1. घर के मुख्य द्वारा की सजावट करें ऐसा करने से आपके धन की वृद्धि होती है।

2. घर की खिड़कियों में सुंदर कांच लगाएं, आपके संबंधों में मधुरता आएगी।

3. घर में दर्पण कुछ इस तरह से लटकाएं कि उसमें लॉकर या केश बॉक्स का प्रतिबिम्ब बने ऐसा करने से आपकी धन दौलत और शुभ अवसरों पर दो गुनी वृद्धि होती है।

4. अपने मास्टर बेडरूम को हल्के रंगों से पेंट करना चाहिए जैसे समुंदरी हरा, हल्का गुलाबी और हल्का नीला ये वो रंग हैं जो बेडरूम के लिहाज से अच्छे रहते हैं।

5. घर में रखी बेकार की वस्तुओं को समय-समय पर फेंकते रहना चाहिए। क्यों कि वास्तु के अनुसार घर में पड़ी वस्तुओं से प्रेम में बाधा पहुंचती है।


Tuesday, 3 June 2014

If you are a religious people always remain depression

विज्ञान ने भी यह साबित किया है कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोग अवसाद का शिकार कम होते हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसे लोगों के मस्तिष्क की बाहरी सतह यानी कॉर्टेक्स मोटी होती है। अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में यह जानकारी सामने आई है।

शोध का नेतृत्व कर रही डॉ माइरना वाइजमैन कहती हैं, 'हमारा मस्तिष्क हमारे विचारों और मनोदशाओं का आईना होता है। इमेजिंग की नई तकनीक से यह सब कुछ देखना संभव हुआ है। हमारा मस्तिष्क एक असाधारण अंग है, जो न सिर्फ हम पर नियंत्रण रखता है बल्कि हमारी मनोदशाओं से नियंत्रित भी होता है।'

नए शोध से पता चलता है कि मस्तिष्क की बाहरी सतह की मोटाई और आध्यात्मिकता में गहरा रिश्ता है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि जिन लोगों के मस्तिष्क के कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है वे आध्यात्मिक भी होते हैं।

यह तय है कि जो धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं उनके कॉर्टेक्स की मोटाई अधिक होती है। पता चला है कि जो लोग अवसाद का शिकार होते हैं उनके कॉर्टेक्स की सतह धार्मिक लोगों के मुकाबले पतली होती है।

इस शोध में ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनके माता-पिता या दादा-दादी अवसाद से संबंधित पहले के अध्ययन में शामिल थे। इनमें से कुछ के परिवार में अवसाद पीढ़ीगत बीमारी के रूप में थी। इस समूह की तुलना ऐसे लोगों के साथ की गई, जिनमें अवसाद के कोई लक्षण नहीं थे।

जिन बातों को हम पहले से जानते हैं, उन पर विज्ञान की मुहर लगती है तो उनमें हमारा विश्वास और प्रबल होता है।

Nirjla Ekadashi

एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्यास्त तक पानी न पीने का विधान होने के कारण इस एकादशी कहते हैं। वैसे तो एक महीने में दो बार एकादशी आती है। शास्त्रों में एकादशी का व्रत करने का विधान बताया गया है।

स्वास्थ्य, दीर्धायु, सामाजिक सुख तथा मोक्ष फल की प्राप्ति में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन आमरस दान करने के कारण इसे आम एकादशी भी कहते हैं।

ऐसे करें व्रत

ज्येष्ठ माह की में आने वाला निर्जला एकादशी व्रत के दिन पानी भी नहीं पीना चाहिए। इसलिए यह व्रत श्रमसाध्य होने के साथ संयम के साथ करना चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि वह जल को कलश से भरे। सफेद वस्त्र से उसे ढक दे। ढक्कर पर चीनी और दक्षिणा रख कर ब्राह्मणों को दान करें।

महिलाएं नथ पहनकर, ओढनी ओढ़ कर, मेंहदी लगाकर विधिपूर्वक शीतल जल से भरा मिट्टी का घड़ादान कर अपनी सास या अपने से बड़े लोगों के चरण स्पर्श करें।

एकादशी का व्रत करके अपने सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र, आम और अन्य फलों का दान करना चाहिए। इस दिन निर्जल व्रत को बहुत महत्व माना गया है। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर एकादशियों का लाभ प्राप्त होता है।

व्रत की कथा

एक दिन महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी का व्रत का विधान और फल बताया। इस दिन भोजन करने के दोषों की जब वे चर्चा करने लगे तो भीमसेन ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि इस दिन जब सारे लोग अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगे तो ये व्रत मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं तो बिना खाए-पीए नहीं रह सकता है। इसलिए मुझे कओ ऐसा व्रत बताइए जिसको करने के बार मुझे सारी एकादशियों का फल मिल जाए।

महर्षि व्यास जानते थे कि भीमसेन के उदम में वृक नामक अग्नि है। इसलिए अधिक भोजन करने पर भी उसकी भूख शांत नहीं होगी। भीमसेन के इस प्रकार के भावों को समझकर महर्षि व्यास ने आदेश दिया कि- भीम तुम ज्येष्ठ शुक्ल की एकादशी जिसे निर्जला एकादशी का व्रत अगर करो।

इस व्रत में आचमन में पानी पीने से दोष नहीं होता। इस दिन अन्न न खाकर, जितने पानी में एक माशा सोने की मुद्रा डूब जाए उतना ही अन्न ग्रहण करो। तो ऐसे में तुम्हें दोष भी नहीं लगेगा और तुम्हें पूरी एकादशियों का पुण्य मिलेगा। इसलिए निर्जला एकादशी को एक किंवदंती के अनुसार भीमसेनी एकदशी भी कहते हैं।

Strange here amazing temple

भारत विभिन्न धर्मों का देश है। यहां हर संस्कृति और धर्म को आश्रय प्राप्त है। यहां लगभग सभी धर्मों में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और अन्य तीर्थ स्थल मिल जाएंगे। देश में कुछ ऐसे भी मंदिर हैं जो अद्भुत हैं अपने नाम से या वहां की जानी वाली पूजा से उन्हीं में से हैं ये मंदिर...

ओम बन्ना मंदिर

राजस्थान के जोधपुर में ओम बन्ना का मंदिर अन्य सभी मंदिरों से बिल्कुल ही अलग है। ओम बन्ना मंदिर की विशेषता है कि इसमें पूजा की जाने वाले भगवान की मूर्ति नहीं है बल्कि एक मोटरसाइकिल और उसके साथ ही ओम सिंह राठौर की फोटो रखी हुई है, लोग उन्हीं की पूजा करते हैं।

मोटरसाइकिल के बारे में कहा जाता है कि इसी मोटरसाइकिल से 1991 में ओम सिंह का एक्सिडेंट हो गया था। एक्सिडेंट में ओम सिंह की तत्काल मौत हो गई। लोकल पुलिस मोटरसाइकिल को पुलिस थाने लेकर चली गई लेकिन दूसरे दिन मोटरसाइकिल वापस एक्सिडेंट वाली जगह पर पहुंच गई।

चाइनीज काली मंदिर

कोलकाता के टांगरा में एक 60 साल पुराना चाइनीज काली मंदिर है। इस जगह को चाइनाटाउन भी कहते हैं। इस मंदिर में स्थानीय चीनी लोग पूजा करते हैं। यहीं नहीं दुर्गा पूजा के दौरान प्रवासी चीनी लोग भी इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। यहां आने वालों में ज्यादातर लोग या तो बौद्ध हैं या फिर ईसाई। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां आने वाले लोगों को प्रसाद में नूडल्स, चावल और सब्जियों से बनी करी परोसी जाती है।

कावी में स्थित स्तंभेश्वर महादेव मंदिर

आप यह कल्पना नहीं कर सकते लेकिन यह बात सच है कि यह मंदिर पल भर के लिए ओझल हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद अपने उसी जगह वापिस भी जाता है। यह मंदिर अरब सागर के बिल्कुल सामने है और वडोदरा से 40 मील की दूरी पर है। खास बात यह है कि आप इस मंदिर की यात्रा तभी कर सकते हैं जब समुद्र में ज्वार कम हो। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है।

Life is so beautiful then why suicide

मध्यप्रदेश के इंदौर में एक ही दिन में 6 लोगों के आत्महत्या कर ली। कारण अलग-अलग थे। बड़ी वजह परिवार का दबाव, बहुत ज्यादा नकारात्मकता और मानसिक तनाव था।

हर तरफ चर्चा है कि ऐसा क्यों हो रहा है और आज की पीढ़ी को इससे कैसे रोका जा सकता है? आमतौर पर देखा जाता है कि यदि आप धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्ति हैं तो इस तरह के विचार आप के मन में कभी नहीं पनपेंगे और आप इस तरह का कोई कदम नहीं उठाएंगे। यह बात शास्त्रों में तो पहले ही लिख दी गई थी, इसे अब विज्ञान भी मानता है।

दरअसल आधुनिक समाज में धर्म एवं धार्मिक भावना कम हो रही है। ऐसे में आत्महत्या जैसी बुराई के निवारण के लिए आवश्यक है कि ईश्वर भक्ति, योगा, चिंतन, मनन जैसे क्रियाकलाप रोज किए जाएं। ऐसा करने से आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा और आत्महत्या जैसे बुरे विचार आपके मस्तिष्क को छू भी नहीं पाएंगे।

वर्तमान दौर में किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति को असफलता सहज स्वीकार्य नहीं होती। किंतु यह स्थिति, किशोरावस्था व युवावस्था में बेहद संवेदनशील होती है। जब किसी युवा को लगने लगता है कि वह अपने अभिभावकों के स्वप्न को साकार नहीं कर पाएगा तो वह नकारात्मक सोच में डूब जाता है और इस तरह की परिस्थिति उसे कहीं न कहीं उसे आत्महत्या के लिए विवश करती है।

ज्योतिष की नजर से...

अहमदाबाद के ज्योतिषी व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा और चंद्रमा को मनु का कारक माना गया है। अष्टम चंद्रमा नीच राशि में अथवा राहु को शनि के साथ विष योग और केतु के साथ ग्रहण योग उत्पन्न करता है। ऐसे समय में मनुष्य की सोचने समझने में शक्ति कम कर देता है। उसकी वजह से वो अपनी निर्णय शक्ति खो देता है। अगर 12वें भाव में ऐसी युति होने पर फांसी या आत्महत्या का योग बनता है। इसी तरह अनन्य भाव में अलग- अलग परिणाम उत्पन करता है।

बचने के ये उपाय भी हैं कारगर

शास्त्रों में इससे बचने के लिए शिव स्तुति, महामृत्युंजय मंत्र, शिवकवच, देवीकवच और शिवाभिषेक सबसे सहज सरल और प्रभावी उपाय हैं। किसी भी ग्रह के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए शुभ ग्रह की स्तुति और नीच ग्रह का दान श्रेष्ठ रहता है।

जिन्हें आत्महत्या के विचार आते हों, ऐसे व्यक्तियों को मोती एवं स्फटिक धारण करना चाहिए, और नियमित भगवान शिव का जलाभिषेक करना लाभप्रद रहते हैं। इसके अलावा पांच अन्न(गेहूं, ज्वार, चावल, मूंग,जवा और बाजरा) दान करना चाहिए। इसके साथ ही पक्षियों को इन अन्न के दाने भी खिलाना चाहिए।

आत्महत्या का कारण वास्तु भी?

जिस घर में आत्महत्या होती है, उस घर में दो या दो से अधिक वास्तुदोष अवश्य होते हैं। इनमें से एक दोष घर के ईशान कोण (पूर्व- उत्तर) में होता है और दूसरा दक्षिण पश्चिम में होता है। घर में दक्षिण पश्चिम जगह कोण के वास्तुदोष जैसे भूमिगत पानी की टंकी, कुआं, बोरवेल, बेसमेंट या किसी भी प्रकार से इस कोने का फर्श नीचा हो।

इस दोष के साथ यदि उस घर के पश्चिम र्नैत्य कोण में मुख्य द्वार हो तो घर के पुरूष सदस्य के साथ और यदि मुख्य द्वार दक्षिण र्नैत्य कोण में हो तो उस घर की स्त्री द्वारा आत्महत्या की संभावना बलवती हो जाती है।

दूसरा वास्तुदोष घर के ईशान कोण में होता है। जैसे - घर का यह कोना अंदर दब जाए, कट जाए, गोल हो जाए या किसी कारण पूर्व आग्नेय (ईस्ट आफ साऊथ ईस्ट) की ओर दीवार आगे बढ़ जाए तो घर के पुरूष सदस्य द्वारा और यदि उत्तर वायव्य (नार्थ आफ द नार्थ वेस्ट) की दीवार आगे बढ़ जाए तो घर की स्त्री सदस्य द्वारा आत्महत्या की जा सकती है।

इसी प्रकार घर के दक्षिण र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां और पश्चिम र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो पुरूष उन्माद जैसे रोगों के शिकार होंगे और कहीं-कहीं वे आत्महत्या भी कर सकते हैं व पूर्व आग्नेय कोण ढंके तो पुरूष द्वारा और उत्तर वायव्य ढंके तो भी स्त्री द्वारा आत्महत्या करने की संभावना बन जाती है। उपरोक्त आत्महत्याओं जैसी दुःखद घटनाओं से बचने का एकमात्र उपाय है कि, घर के वास्तुदोषों को दूर किया जा सकता है।

कहता है विज्ञान

इंदौर के मनोचिकित्सक डॉ. अभय जैन बताते हैं कि आत्महत्या का मूल कारण दरअसल डिप्रेशन है। आत्महत्या के मानसिक, सामाजिक, साइकोलॉजिकल, बायोलॉजिकल एवं जेनेटिक कारण होते हैं। ऐसे व्यक्ति जिनमें आत्महत्या के जीन होते हैं, उनमें बायोकेमिकल परिवर्तन हो जाते हैं और वह आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाते हैं।

इसके कई कारण होते हैं जैसे तनावपूर्ण जीवन, घरेलू समस्याएं, मानसिक रोग आदि। जिन लोगों में आत्महत्या के बारे में सोचने की आदत (सुसाइडल फैंटेसी) होती है, वही आत्महत्या ज्यादा करते हैं। नकारात्मकता आत्महत्या की बहुत बड़ी वजह हैं क्योंकि इस समय आप सही सलाह नही ले पाते। वहीं आत्महत्या का विचार करने वाले लोग यदि धर्म और अध्यात्म का सहारा लें तो इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।

युवावस्था संक्रमण काल है, युवाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खासतौर से कॅरियर, जॉब, रिश्ते, खुद की इच्छाएं, व्यक्तिगत समस्याएं जैसे लव अफेयर, मैरिज, सैटलमेंट, भविष्य की पढ़ाई आदि।

जब वह इस अवस्था में आता है, तो बेरोजगारी का शिकार हो जाता है और भविष्य के प्रति अनिश्चितता बढ़ जाती है। अपरिपक्वता के कारण कई बार परेशानियां आती हैं। जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, सायकोसिस, पर्सनालिटी डिसऑर्डर की स्थिति बन जाती है।

महत्वपूर्ण तथ्य

आत्महत्या पर पहली संस्थागत रिसर्च 1958 में लॉस एंजिल्स में हुई थी।

आत्महत्या, दुनिया में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण है।

किशोरावस्था और 35 वर्ष से कम आयुवर्ग में आत्महत्या, असमय मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है।

हर साल दुनिया में एक से दो करोड़ से भी ज्यादा लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी मौत नहीं होती।

Monday, 19 May 2014

Significant correlation between friday and columbus

कोलम्बस जिसका पूरा नाम था क्रिस्टोफर कोलम्बस। शुक्रवार का दिन कोलम्बस के लिए काफी भाग्यशाली रहा था क्योंकि उसने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खोज शुक्रवार के दिन की थी।

अगर माह की किसी भी तारीख का मूलांक निकाला जाए तो वह किसी न किसी के लिए जरूर शुभ होता है। हो सकता है यह अंक किसी खास वार को ही आता हो।

ये वार भी अंकशास्त्र के अनुसार आपके लिए बहुत शुभ हो सकता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण प्रसिद्ध खोजकर्ता कोलम्बस के जीवन काल को देखने पर मिलता है।

कोलम्बस एक समुद्री-नाविक, उपनिवेशवादी, खोजी यात्री था। उसने अटलांटिक महासागर में बहुत सी समुद्री यात्राएं कीं और अमेरिकी महाद्वीप के बारे में बताया। हालांकि अमेरिका पहुंचने वाला वह प्रथम यूरोपीय नहीं था किन्तु कोलम्बस ने यूरोपवासियों और अमेरिका के मूल निवासियों के बीच विस्तृत सम्पर्क को बढ़ावा दिया।

कोलम्बस शुक्रवार के दिन पर बहुत श्रद्धा रखता था। इसका कारण यह था कि उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं शुक्रवार को ही हुईं। वह 3 अगस्त 1492 को अपनी लंबी यात्रा के लिए रवाना हुआ। इस दिन शुक्रवार ही था।

कोलम्बस ने शुक्रवार को ही एक द्वीप के आस-पास पक्षियों को देखा उसने अनुमान लगाया कि पास में कोई आबादी है। समुद्री यात्रा करते हुए जब भूमि दिखाई दी तो उसे बड़ा ही सुखद अनुभव हुआ।

70 दिन लगातार चलने के बाद शुक्रवार को वह एक छोटे से अमेरिकन द्वीप पर उतरा। तब शुक्रवार 17 मई को उसने वारसेलोना में विजय प्राप्त की। शुक्रवार 30 नवम्बर को ही उसने पियोरतोसान्तो में क्राॅस की स्थापना की और शुक्रवार 4 जनवरी को ही वह स्पेन के लिए रवाना हुआ। कोलम्बस का जीवन अंकशास्त्र की दृष्टि से देखें तो काफी मिलता-जुलता लगता है।

हालांकि पाश्चात्य मत पहले दिया जा चुका है कि किस तारीख में उत्पन्न व्यक्ति के लिए कौन सा विशेष वार शुभ होगा। भारतीय मतानुसार जिसकी जन्मकुंडली में जो ग्रह बलवान होगा वह लग्नेश और चंद्रराशीश का मित्र होगा। वह शुभ होगा। पर निर्णय के लिए जन्मकुंडली की आवश्यकता होती है।

इस कारण अपने अनुभव के आधार पर निश्चय कर सकते हैं कौन सा वार शुभ और कौन सा अशुभ होगा।

Gautama buddha in tears

महात्मा बुद्ध भ्रमण पर थे। काफी थक गए थे। रास्ते में एक आम का बगीचा दिखाई दिया। वे वहां रुक गए। नीचे गिरे हुए मीठे आम खाए और आराम करने लगे। तभी वहां कुछ युवकों का झुंड आया। युवक पत्थर मारकर पेड़ पर लगे हुए आम गिराने लगे। पेड़ के दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध आराम कर रहे थे।

एक युवक ने पत्थर फेंका तो वह आम को न लगकर बुद्ध के माथे पर जा लगा। उनके माथे से खून बहने लगा। यह देखकर युवक भयभीत हो गए और अपराधबोध से ग्रस्त होकर बुद्ध के पास आकर उनसे माफी मांगने लगे।

बुद्ध की आंखों में आंसू आ गए। युवकों ने सोचा कि माथे में पीड़ा की वजह से उनके आंसू आए हैं। वे उनके चरणों पर गिरकर उनसे क्षमा करने का अनुरोध करने लगे। उनमें से एक ने कहा, 'हमसे भारी भूल हो गई है।

हमने आपको पत्थर मारकर रुला दिया।' इस पर बुद्ध ने कहा, 'मित्रों, मैं इसलिए दुखी हूं, क्योंकि जब तुमने आम के पेड़ पर पत्थर मारा तो पेड़ ने बदले में तुम्हें मीठे फल दिए, लेकिन जब तुमने मुझे पत्थर मारा, तो मैं तुम्हें कुछ अच्छा देने के बजाय केवल भय और अपराधबोध ही दे सका।'

संक्षेप में

भलाई करना हमारे स्वभाव में होना चाहिए, भले ही हमें वह बुराई के बदले में करनी पड़े।

Marita inl disruption

विवाह के बाद दो अलग-अलग घरों, विचारों, व्यक्तित्व के लोग आपस में मिलकर अपनी गृहस्थी का शुरुआत करते हैं। यदि वधू-वर के घर में पितृदोष के कारण संतानहीनता हो अथवा उत्पन्न संतति अपरिपक्व या अल्पायु हो तो वैवाहिक जीवन में समस्या खड़ी हो जाती है। ऐसी स्थिति में किसी योग्य पंडितजी की सलाह पर नारायण नागबलि विधि करें। इसके साथ ही डॉक्टर की सलाह भी लेनी चाहिए।

अनिष्ट ग्रहों के कारण होने वाली समस्या के निवारण के लिए ग्रहों के जप, होम और दान करें या सत्यपुरुष के चरित्र का वाचन कर सकते हैं। यदि अनजाने कारणों से दंपत्ति में अनबन हो तो विवाह होम एक दो वर्षों के बाद करते रहें।

पति के अविचारी, लोभी या दुष्ट होने पर पत्नियां अगर रोज श्री रुक्मिणी स्वयंवर का पाठ अगर करती है। तो उन्हें इस समस्या से निजात मिल जाएगी।

प्रदोष तिथि के दिन उमा-महेश्वर का पूजन करें। यदि इतना करने के बावजूद पति-पत्नी में में दरार बढ़ती जाए और बात तलाक तक पहुंच जाए तो दोनों में से एक या दोनों 16 सोमवार का व्रत करें मनोकामना जरूर पूरी होगी।

Monday, 28 April 2014

Live today as if he is not to touch relive the tension

एक बुनियादी स्तर पर, मनुष्य होने के नाते हम सब एक समान हैं, हम में से हर एक सुख की आकांक्षा रखता है और हम में से प्रत्येक दुख नहीं झेलना चाहता। आज, बढ़ती मान्यता, साथ ही ठोस वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो हमारी चित्त की स्थिति और सुख के बीच घनिष्ठ संबंध की पुष्टि करता है।

एक ओर हममें से कई ऐसे समाजों में रहते हैं जो भौतिक रूप से बहुत विकसित हैं, पर फिर भी हमारे बीच कई ऐसे हैं जो बहुत सुखी नहीं हैं। समृद्धि के सुन्दर धरातल के नीचे एक प्रकार की मानसिक अशांति है, जो निराशा, अनावश्यक झगड़े, नशीली दवाइयों या शराब पर निर्भरता, और सबसे बुरी स्थिति में आत्महत्या है।

ऐसी कोई गारंटी नहीं है कि केवल धन आपको आनंद अथवा जो तृप्ति आप चाहते हैं वह दे सकता है। यही आपके मित्रों के संबंध में भी कहा जा सकता है। जब आप क्रोध या घृणा की एक तीव्र अवस्था में होते हैं तो एक बहुत अंतरंग मित्र भी आपको एक प्रकार से ठंढा, सर्द, अलग और कष्टदायी प्रतीत हो सकता है।

परन्तु, मनुष्य के रूप में हमें यह अद्भुत मानव बुद्धि की भेंट मिली है। इसके अतिरिक्त, सभी मनुष्यों में दृढ़ संकल्प और उस दृढ़ता को वे जिस किसी दिशा में चाहें निर्धारित करने की क्षमता होती है। जब तक हम यह स्मरण रखें कि हमारे पास मानव बुद्धि की अनोखी भेंट है और दृढ़ता के विकास की क्षमता है और उसका उपयोग सकारात्मक ढंग से करते हैं, हम अपने अंतर्निहित मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कर पाएंगे।

यह अनुभव कि हममें यह महान मानव क्षमता है हमें आधारभूत शक्ति देता है। यह मान्यता ऐसे तंत्र के रूप में कार्य कर सकती है जो हमें बिना आशा खोए अथवा कम आत्म सम्मान की भावना में डूबे, किसी भी कठिनाई से निपटने के लिए क्षमता प्रदान करती है, फिर चाहे हम किसी भी प्रकार की परिस्थिति का सामना क्यों न कर रहे हों।..

Wednesday, 23 April 2014

Can become something special this wednesday 7

सफलता किसी पैमाने की मोहताज नहीं होती और सफलता का कोई शार्ट कट भी नहीं होता। यह बातें तमाम जगह हम पढ़ चुके हैं। सवाल यह नहीं कि आप कितने सफल है बल्कि यह कि आपने यह सफलता अर्जित करने के लिए कितने असफल प्रयास किए जिससे यह साबित हो सका की आपने सफलता का स्वाद बड़े ही धैर्य के साथ चखा है।

याद रखें सफलता उनको ही मिलती है जो पूरे मन से काम करते हैं और कहा भी गया है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना नहीं बल्कि कुछ करना पड़ता है।

इस मंत्र का करें उच्चारण

सुबह उठते ही सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर उनका दर्शन करें और इस मंत्र का उच्चारण करें।

कराग्रे वसते लक्ष्मी

कर मध्ये सरस्वती।

कर मूले तु गोविन्द:

प्रभाते कर दर्शनम्

सात दिन सात उपाय

सोमवारः शीशे में अपना मुख मण्डल देखने के उपरांत ही घर से निकलें।

मंगलवारः कोई भी मिष्ठान खाएं।

बुधवारः हरे धनिए के पत्ते खाएं।

बृहस्पतिवारः सरसों के कुछ दाने मुंह में रख कर घर से निकलें।

शुक्रवारः दही खाने के उपरांत ही घर से बाहर जाएं।

शनिवारः अदरक और घी को आपस में अच्छे से मिला लें और उसका सेवन करें।

रविवारः पान का पत्ता अपने पर्स में रखने के उपरांत ही घर से निकलें।

Thursday, 17 April 2014

Lakshmi is free from the narrow idea

उड़िया भाषा में प्रचलित लक्ष्मी पुराण की कथा सामाजिक पद और खाद्य पदार्थों के बीच वितरण के संबंध को स्पष्ट करती है। बताती है किस किसी भी तरह के भेदभाव से लक्ष्मी सदैव मुक्त है।

हम अक्सर यही अनुमान लगाते हैं कि पुराण संस्कृत में रचित हैं। पूरे भारत में यही माना जाता है पर यह सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए बलराम दास द्वारा 15 वीं शताब्दी में रचित लक्ष्मी पुराण उड़िया भाषा में लिखी गई है। इसमें उस घटना का वर्णन है जो पुरी में घटित हुई, जहां भव्य जगन्नाथ मंदिर स्थापित है।

इस मंदिर में, कृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र सहित शोभायमान हैं और आने वाले श्रद्धालुओं की इच्छाएं पूरी करते हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि भगवान की पत्नी, लक्ष्मी मुख्य मंदिर में कहीं भी नजर नहीं आती हैं। यह मंदिर अपनी रसोई के लिए विख्यात है जहां पर शोभायित भगवान के लिए बड़ी मात्रा में भोजन तैयार किया जाता है।

यही वह जगह है जहां कि भगवान हर वर्ष रथ और नाव यात्रा पर अपने सहोदर सहित निकलते हैं। यहां भगवान कई परंपराओं का निभाते हैं जिनमें मार्गशीर्ष माह में आने वाली श्राद्ध पंरपरा भी सम्मिलित है जिसमें वे अपने माता-पिता (अदिती-कश्यप, कौशल्या-दशरथ, यशोदा-नंद, देवकी- वसुदेव) को श्रद्धा अर्पण करते हैं। यहां हर 12 वर्ष में सभी देवता मृत्यु का वरण भी करते हैं (और उनके लिए एक अंतिम संस्कार स्थल भी बना हुआ है) और पुन: जन्म लेते हैं।

इससे पहले कि हम इस कथा में गहरे उतरें, यह स्मरण रखना आवश्यक है कि यहां पारंपरिक कथाकारों ने देवताओं को ऐतिहासिक या परालौकिक दृष्टि से नहीं देखा है, वे जाग्रत अवस्था में हैं जो सामान्य जीवन जीते हैं और सामान्य लोगों के साथ रहते हुए उनके साथ श्रेष्ठतम मार्ग यह हम कहें कि असाधारणता के अनुसरण का संवाद करते हैं।

एक दिन, बलभद्र ने लक्ष्मी को एक झाडू लगाने वाली के घर में प्रवेश करते देख लिया। उन्होंने घोषणा की कि अब लक्ष्मी अपवित्र हो गई हैं और अपने अनुज को आदेश दिया कि उन्हें घर में प्रवेश न दिया जाए। कृष्ण ने अपने अग्रज के आदेश का पालन किया और मंदिर के द्वार बंद कर दिए।

आने वाले कुछ दिनों में देवताओं को चिंतित करने वाली बात यह हुई कि उन्हें कोई भोजन नहीं परोसा गया। पता करने पर मालूम हुआ कि रसोई में भोजन बना ही नहीं क्योंकि सभी सब्जियां और फल, दालें और अनाज, सभी मसाले भंडार गृह और बाजार से गायब हो गए हैं। यहां तक कि पीने के लिए एक बूंद जल भी शेष नहीं बचा। देव सहोदरों ने पाया कि इस विपदा का कारण लक्ष्मी को त्यागना ही है।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने देवी लक्ष्मी से क्षमा मांगी और उनसे वापस मंदिर आने की याचना की। भाई-बहनों ने सीखा और समझा कि धन की देवी किसी भी तरह के प्रदूषण से अपवित्र नहीं होती हैं। खाद्य पदार्थ बिना किसी भेदभाव के लोगों की क्षुधा को तृप्त करते हैं, चाहे वह मार्ग बुहारने वाला हो या फिर राजा या देवता। दूसरे शब्दों में कहें तो भोजन सत्य है, जो किसी भी तरह के मानवीय दृष्टिकोण से स्वतंत्र है। अपवित्र होने का कोई भी विचार जो कि जाति प्रथा से उपजा है वह मिथ्या है, क्योंकि वह मानवीय दृष्टिकोण पर निर्भर है।

यह पौराणिक कथा कुछ भी हो सकती है लेकिन ब्राह्मण या पैतृक विचार से उपजी नहीं हो सकती। स्वाभाविक रूप से इसका अर्थ यह भी नहीं कि यह मार्क्सवादी सोच की है, अधीनतावादी या नारीवादी विचार है जैसा कि बहुत से शिक्षाविद् संकेत देते हैं।

यह किसी भी तरह का संकेतक, सूचक या उपदेशात्मक आख्यान नहीं है, जैसा कि बाइबल या कुरान या फिर मानव अधिकारों की घोषणा होती है। यह एक विचारात्मक आख्यान है। यह कथा सामाजिक पद और खाद्य पदार्थों के वितरण के बीच के संबंध पर प्रश्न खड़ा करती है, हमारी समझ का विस्तार करती है और सत्य और मिथ्या के बीच अंतर करने की तरफ हमारा ध्यान खींचती है।

Wednesday, 9 April 2014

God we do not see the illusion of ego

अधिकतर लोग ईश्वर की सत्ता को मानते हैं, फिर क्या वजह है कि लोग यह मानते हुए भी उसे देख नहीं पाते? इसका जवाब यह है कि उन लोगों को ईश्वर इसलिए दिखाई नहीं देता, क्योंकि माया का आवरण मनुष्य के ऊपर पड़ा होता है। जैसे सूर्य सबको प्रकाश और ऊष्मा देता है, लेकिन यदि वह बादलों से घिर जाए, तो अपना काम नहीं कर पाता। माया का पर्दा भी इसी प्रकाश है।

अब प्रश्न यह है कि यह माया है क्या? माया है हमारा अहंकार। अहंकार के रूप में यह माया बिलकुल सूर्य के सामने आ गए मेघ की तरह ही है। इसी के कारण हम ईश्वर को नहीं देख पाते। इसे इस तरह समझो कि अगर मैं अपने अंगोछे की ओट कर लूं, तो तुम मुझे नहीं देख सकते, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं तुम्हारे बिलकुल नजदीक हूं।

इसी तरह ईश्वर भी हमारे बहुत निकट है, किंतु अहंकार रुपी आवरण के कारण हम उसे नहीं देख पाते। क्योंकि जब अहंकार रहता है, तब न ज्ञान होता है, न मुक्ति मिलती है। अहंकार के कारण घमंड आता है।

हांडी में रखे दाल, चावल, पानी या आलू को हम तभी छू सकते हैं, जब तक उसे आग पर न रखा जाए। जीव की देह भी हांडी की तरह है। धन, मान-सम्मान, विद्या-बुद्धि,जाति-कुल आदि उन दाल, चावल और आलुओं की तरह हैं। अहंकार वह आग है, जो इनमें शामिल होकर उन्हें तप्त कर देती है।

अहंकार रुपी अग्नि के कारण जीव गर्म होता है। 'मैं' (स्वयं को महत्वपूर्ण समझने) का भाव जब तक पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती।

'मैं' से 'तुम' पर आजाने से ही अहंकार से मुक्ति मिलती है। अहंकार या 'मैं' दो तरह का होता है। एक कच्चा 'मैं' और दूसरा पक्का 'मैं'। 'मैं' जो कुछ देखता, सुनता या महसूस करता हूं, उसमें कुछ भी मेरा नहीं है, यहां तक कि यह शरीर भी मेरा नहीं है। मैं नित्यमुक्त हूं, ज्ञान-स्वरूप हूं।

यह विचार पक्का 'मैं' है, यह भक्ति औरज्ञान का 'मै है, जो सकारात्मक है। वहीं 'यह मेरा मकान है, यह मेरी पत्नी है, यह मेरा शरीर है, यह कच्चा 'मैं' है। यही माया है। जो अहंकार मनुष्य को कामिनी-कंचन में आबद्ध करता है, वह नकारात्मक है।

दरअसल, मैं और मेरा, यह अज्ञान का भाव है। तुम और तुम्हारा-यही ज्ञान है। जो सच्चा भक्त होता है, वह कहता है- जो कुछ भी कर रहे हो, वह तुम्ही कर रहे हो, मेरा तो कुछ भी नहीं है। मैं तो तुम्हारे लिए कर्म कर रहा हूं। मैं सिर्फ एक छोटा-सा शब्द है, इसे दूर करना अत्यंत कठिन है, लेकिन असंभव भी नहीं।

यदि कोशिश करने से 'मैं' नहीं जाता, तो उसे दास बना लो। इस भाव में रहो कि मैं दास हूं। ईश्वर का दास हूं, भक्त हूं। ऐसे 'मैं' में कोई दोष नहीं।

मिठाई खाने से अम्लदोष होता है, पर मिश्री इसका अपवाद है। इसी तरह यह 'मैं' बुरा नहीं। दास का मैं, भक्त का मैं और बालक का मैं जलराशि परखिंची हुई रेखा के समान हैं, जो ज्यादा देर नहीं टिकते। जीव और ब्रह्म में भेद बस इसलिए है कि उनके बीच 'मैं' खड़ा हुआ है।

पानी में लाठी डाल दी जाए,तो पानी दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है। अहं या मैं ही वह लाठी है। इसे उठा लो, तो पानी एक हो जाएगा। जीव और ब्रह्म आपस में मिल जाएंगे।

Monday, 31 March 2014

Chaitra navratri will accompany the launch of the hindu new year

भारतीय सनातन धर्म में नववर्ष का शुभारंभ सोमवार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से हो रहा है। इसी दिन देवी आराधना का पर्व चैत्र नवरात्र का शुभारंभ होगा। नौ दिनों में रोजाना देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना होगी। पहले दिन शैलपुत्री की आराधना होगी। घरों-मंदिरों में शक्ति उपासना के लिए विशेष मुहूर्तोंमें घट स्थापित किए जाएंगे। महापर्व की शुरुआत देवी के शैल पुत्री स्वरूप की आराधना से होगी।

41वां नामक संवत्सर

हिंदू नव वर्ष विक्रम संवत् 2071 एवं संवत्सरों की श्रृंखला का 41वां नामक संवत्सर होगा। इस तिथि से विक्रम संवत् का प्रारंभ भी होता है। मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारंभ किया था। ग्रंथों के अनुसार उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के राजा विक्रमादित्य ने इसी तिथि से कालगणना के लिए विक्रम संवत् का प्रारंभ किया था। जो आज भी हिंदू कालगणना के लिए सर्वाेत्तम माना जाता है।

अबूझ मुहूर्त

हिंदी पंचाग काल गणना का प्रथम माह चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा अर्थात गुड़ी पड़वा जिसे अबूझ मुहूर्त बताया है अर्थात बिना पंचांग देखे ही कोई भी शुभ कार्य इस दिन प्रारंभ कर सकते हैं। भगवान विष्णु का प्रथम मत्स्यावतार भी इसी दिन हुआ है।

60 साल बाद आया परिवर्तन

ज्योतिषाचार्य पं. धर्मेंद्र शास्त्री के अनुसार सन् 1953 के बाद 2014 में 19 जून से 2 नवंबर तक न्याय व धर्म के प्रतीक ग्रह शनि तुला व गुरू कर्क दोनों ही अपनी-अपनी उच्च राशि में होंगे। 60 साल कई अनुठे शुभ परिवर्तन होंगे एवं गुरु कर्क उच्च राशि में आने से किसी भी राशि की कन्या को विवाह में गुरु के 4, 8, 12 होने पर भी कोई अवरोध नही आएगा।

चंद्रदेव निभाएंगे राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की भूमिका

ज्योतिषीय कालगणना के अनुसार प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है और विभिन्न् ग्रह इस संवत् के स्वामी, राजा व मंत्री होते हैं। जिसका असर वर्ष भर जन सामान्य पर दिखाई देता है। आकाशीय सत्ता के लिए ग्रहीय व्यवस्था के हिसाब से राजा, मंत्री और सहायक मंत्रियों का चयन हो चुका है। हिंदू पंचांग के हिसाब से नए साल से आकाशीय सत्ता की डोर चंद्र के हाथ में होगी। चंद्र राजा और मंत्री दोनों ही पदों पर रहेंगे। नये वर्ष राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भूमिका चंद्रदेव निभाएंगे। चंद्र के राजा होने से नववर्ष उत्तम फलदायी होगा।

पांच कार्य शुभ और पांच क्रूर ग्रहों के पास

इस बार आकाशीय सत्ता के पांच कार्य शुभ और पांच क्रूर ग्रहों के पास हैं। संवत्- 2071 राजा- चंद्र, मंत्री- चंद्र, धान्येश- गुरु-पूर्व दिशा, धान्येश- मंगल, मेघेश- सूर्य, रसेश- शनि, दुर्गेश- सूर्य, नीरसेश-बुध,फलेश-सूर्य, धनेश- बुध।

चैत्र नवरात्र में पांच दिन है खास योग-संयोग

ज्योतिषाचार्य पं. जगदीश शर्मा के अनुसार इस बार तीज-त्योहार व शुभ योगों का भी संयोग बन रहा है। अंतिम दिवस नवमी पुष्य नक्षत्र में आने के कारण यह दिन और भी खास हो गया है। प्रतिपदा से नवमी तक देवी के विभिन्न् स्वरूपों की पूजा का विधान है। नवरात्रि के 5 दिन खास योग-संयोग के कारण इस बार पर्व अतिशुभ हो गया है। इन दिनों में श्रद्धालु पूजा-अर्चना, साधना के साथ पुण्यलाभ ले सकते हैं।

पहले दिन गुड़ी पड़वा के दिन घटस्थापना, 1 अप्रैल को चैतीचांद सर्वार्थ सिद्धि योग व अमृत योग, 2 अप्रैल को सौभाग्य सुंदरी योग, 4 को श्रीराम राज्योत्सव, 8 अप्रैल को नवमीं के दिन पुष्य नक्षत्र योग खास होगा।

Saturday, 29 March 2014

Science at the sight of the glory of rudraksh

एक किंवदंती के अनुसार रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई है। शिव का यही प्रिय रुद्राक्ष अब वैज्ञानिकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हो गया है और देश-विदेश में इस पर रूद्राक्ष पर शोध अनुसंधान जारी है।

रुद्राक्ष को नीला संगमरमर भी कहा जाता है। इसके वृक्ष भारत (पूर्वी हिमालय) के साथ-साथ नेपाल, इंडोनेशिया, जकार्ता एवं जावा में भी पाए जाते हैं। वनस्पतिशास्त्र में इसे इलियोकार्पस गेनिट्रस कहते हैं। गोल, खुरदुरा, कठोर एवं लंबे समय तक खराब न होने वाला रुद्राक्ष एक बीज है। बीज पर धारियां पाई जाती हैं जिन्हें मुख कहा जाता है। पांचमुखी रुद्राक्ष बहुतायात से मिलता है जबकि एक व चौदह मुखी रुद्राक्ष दुर्लभ हैं।

प्राचीन ग्रंथों में इसे चमत्कारिक तथा दिव्यशक्ति स्वरूप बताया गया है। मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष धारण करने से दिल की बीमारी, रक्तचाप एवं घबराहट आदि से मुक्ति मिलती है। रुद्राक्ष के बताए चमत्कारिक गुण वास्तविक हैं या नहीं यह जानने हेतु देश-विदेश मेंकई शोध कार्य किए गए एवं कई गुणों की पुष्टि भी हुई।

सेंट्रल काउंसिल ऑफ आयुर्वेदिक रिसर्च नई दिल्ली में 1966 में आयुर्वेदिक औषधि में प्रकाशित किया गया जिसमें रुद्राक्ष थैरेपी की चर्चा की गई थी। अस्सी के दशक में बनारस के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने डॉ. एस. राय के नेतृत्व में रुद्राक्ष पर अध्ययन कर इसके विद्युत चुंबकीय, अर्धचुंबकीय तथा औषधीय गुणों को सही पाया।

वैज्ञानिकों ने माना है कि इसकी औषधीय क्षमता विद्युत चुंबकीय प्रभाव से पैदा होती है। रुद्राक्ष के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र एवं तेज गति की कंपन आवृत्ति स्पंदन से वैज्ञानिक भी आश्चर्य चकित हैं। इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी फ्लोरिडा के वैज्ञानिक डॉ. डेविड ली ने अनुसंधान कर बताया कि रुद्राक्ष विद्युत ऊर्जा के आवेश को संचित करता है जिससे इसमें चुंबकीय गुण विकसित होताहै। इसे डाय इलेक्ट्रिक प्रापर्टी कहा गया। इसकी प्रकृति इलेक्ट्रोमैग्नेटिक व पैरामैग्नेटिक है एवं इसकी डायनामिक पोलेरिटी विशेषता अद्भुत है।

भारतीय वैज्ञानिक डॉ. एस.के. भट्टाचार्य ने 1975 में रुद्राक्ष के फार्माकोलॉजिकल गुणों का अध्ययन कर बताया कि कीमोफार्माकोलॉजिकल विशेषताओं के कारण यह हृदयरोग, रक्तचाप एवं कोलेस्ट्रॉल स्तर नियंत्रण में प्रभावशाली है। स्नायुतंत्र (नर्वस सिस्टम) पर भी यह प्रभाव डालता है एवं संभवत: न्यूरोट्रांसमीटर्स के प्रवाह को संतुलित करता है।

वैज्ञानिकों द्वारा इसका जैव-रासायनिक (बायो कैमिकल) विश्लेषण कर इसमें कोबाल्ट, जस्ता, निकल, लोहा, मैग्नीज़, फास्फोरस, एल्युमिनियम, कैल्शियम, सोडियम, पोटैशियम, सिलिका एवं गंधक तत्वों की उपस्थिति देखी गई। इन तत्वों की उपस्थिति से घनत्व बढ़ जाता है एवं इसी के फलस्वरूप पानीमें रखने पर यह डूब जाता है।

पानी में डूबने वाले रुद्राक्ष को असली माना जाता है, कुछ लोग यह भी मानते हैं कि दो तांबों के सिक्कों के मध्यरखने पर यदि इसमें कंपन होता है, तो यह असली है। असल में इस कंपन का कारण विद्युत चुंबकीय गुण तथा डायनामिक पोलेरिटी हो सकता है। जैव वैज्ञानिकों ने रुद्राक्ष में जीवाणु (बैक्टीरिया), विषाणु (वायरस), फफूंद(फंगाई) प्रतिरोधी गुणों को पाया है। कुछ कैंसर प्रतिरोधी क्षमता का आकलन भी किया गया है।

चीन में हुए खोज कार्य दर्शाते हैं कि रुद्राक्ष यिन-यांग एनर्जी का संतुलन बनाए रखने में कारगर है। दुनियाभर के वैज्ञानिक रुद्राक्ष के इतने सारे गुणों को एक साथ देखकर आश्चर्यचकित हैं।

Friday, 28 March 2014

Note is awakened human consciousness

प्रशासन और प्रशासक का सच्चा और समर्थ होना आवश्यक है। वही सच्चा और समर्थ प्रशासक होता है, जो अपने नागरिकों की हर इच्छा पूरी कर सके और यह तब ही संभव है जब उसका प्रशासन उस सत्ता से हो रहा हो, जो समस्त संभावनाओं का क्षेत्र है।

मनुष्य ब्रह्म की प्रति-छबि है और उसके अंदर अपरिहार्य रूप से निहित ब्रह्मत्व को वैदिक शिक्षा द्वारा न केवल वैयक्तिक रूप से, बल्कि सामूहिक स्तर पर जागृत किया जा सकता है। भारत की सनातन सत्ता के अनुभव के आधार पर चला आ रहा है कि सफल प्रशासन के लिए वैदिक तकनीकों का अभ्यास आवश्यक है।

यह अभ्यास आनन्दमय है। अभ्यास में आनंद की जो वर्षा होती है, उससे व्यक्त जीवन का हर पक्ष खिल उठता है। जीवन का हर क्षेत्र आनंदमयी गुणों में परिणत हो जाता है। यह विज्ञान सिद्ध है। विज्ञान का अर्थ है किसी विषय का पूर्ण तार्किक विवेचन और टेक्नोलॉजी का अर्थ है, इन विवेचनों से प्रतिपादित सिद्धांतों का कार्यरूप में अमल लाना है।

वेद विज्ञान की विशेषता यह है कि उसमें विज्ञान और टेक्नोलॉजी दोनों की सत्ता एक ही है। वेद जिस भावातीत आत्मा का स्पंदन है, वह व्यक्त, अव्यक्त और व्यक्त एवं अव्यक्त की संधि रूप हमारी चेतना में अपरिहार्य रूप से विद्यमान होने के कारण मानवीय सीमा से कुछ भी बाहर नहीं रहने देती।

भावातीत ध्यान और यौगिक फ्लाइंग से मानवीय चेतना को उसकी मौलिकता और पूर्णता में जगाकर, जागी हुई भावातीत चेतना का प्रयोगकर जीवन के समस्त क्षेत्रों में पूर्णता प्रदान की जा सकती है। मनुष्य योनि में केवल भौतिक जीवन जीना अमूल्य जीवन की बर्बादी है।

जीवन की भौतिक उपलब्धियां शारीरिक श्रम और संघर्ष के बिना भी प्राप्त की जा सकती हैं। यह सही है कि जीवन को कर्म की दरकार होती है लेकिन कर्म जब अपने सूक्ष्मतर स्तर पर होता है, उस स्तर पर होता है जो मन की सूक्ष्माति सूक्ष्म उपाधियों बुद्धि,वैयक्तिक अहं और समष्टि के अहं का भी स्रोत है, तो जो चाहा जाता है वह शारीरिक स्तर पर बिना कुछ किए हासिल हो जाता है। वेद की भाषा में इसे ही संकल्पसिद्धि कहा जाता है।

God is formless of has a form

पूरी दुनिया में विद्वान लोग ईश्वर के प्रति एक खास नजरिया रखते हैं। उनका सोचना है कि ईश्वर निराकार है। हम उसे वैसे नहीं देख सकते हैं, जैसे अपने को आईने में देखते हैं। ईश्वर पूरी तरह से बोध का मामला है। जो उस बोध से गुज़रता है, वही बुद्ध हो जाता है।

सरल लोग, जिनकी दुनिया उनकी रोजी-रोटी के इर्द-गिर्द मंडराती रहती है, वे ईश्वर को निराकार नहीं मानते। उनका खयाल है कि ईश्वर हमारी तरह ही कहीं होगा और वहीं से हमारे ऊपर नज़र रख रहा होगा। यही बात दर्शन और पौराणिक शब्दावली में कही जाए तो ईश्वर सगुण है।

ठीक वैसे ही जैसे हम लोग सगुण हैं। वहीं विद्वानों ने ईश्वर को निर्गुण बना रखा है-निरगुनिया। अब यह दर्शन का बड़ा महत्वपूर्ण द्वंद्व है। इस पर बड़ी बहसें हुई हैं। कई सिद्धांतों का प्रतिदान किया गया है। ईश्वर निराकार भी है और साकार भी। ईश्वर निर्गुण भी है और सगुण भी है। भारतीय धर्मों में इसे बहुत शांत तरीके से बताया गया है।

अगर भगवान साकार हैं, सगुण हैं तो उनके लिए ईश्वर शब्द चुना है। ब्रह्म का केवल बोध किया जा सकता है। यही बोध आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा होगा, जिसे हम परमतत्व या अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। यहां ईश्वर हमारे बहुत करीब आ जाता है और हम उसे थोड़ा नीचे ले आते हैं।

जब ईश्वर थोड़ा और नीचे आता है तो अवतार के रूप में आ जाता है-कभी राम बनकर, कभी श्याम बनकर। यहां से एक आम आदमी के लिए ईश्वर के साथ तादात्म्य बैठाना और सरल हो जाता है।

पूरी दुनिया में भक्ति की मदद से ईश्वर की निकटता आम आदमी के लिए बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आने वाली बात हो जाती है। अवतार की थ्याेरी ईश्वर का सरलीकरण है। ईश्वर और आध्यात्मिकता से संबंधित जितने प्रतीक हैं उन पर भी गाैर करना चाहिए। ईश्वर को अगर वाणी में व्यक्त करें तो वह 'ऊँ' होगा।

अगर आंखों से देखने वाली किसी ऑब्जेक्टिव चीज़ के रूप में व्यक्त करें तो वह प्रकाश होगा। यहां तक तो सब ठीक होगा, लेकिन जो निराकार हो, जिसका कोई आकार ही नहीं है जो दिखता ही नहीं है, फिर उसे कैसे व्यक्त करेंगे? लेकिन भारतीय आध्यात्मिकता ने निराकार को भी व्यक्त करने के कुछ तरीके सोचे होंगे। हमारी आध्यात्मिक परंपरा में 'ध्यान या मेडिटेशन' निराकार को व्यक्त करता है।

इस तरीके को ही हम ध्यान या मेडिटेशन के नाम से जानते हैं। अगर आप भगवान के करीबी शिष्यों में शामिल होना चाहते हैं तो आपको उनके निराकार स्वरूप का बोध करना पड़ेगा, जो आप केवल मेडिटेशन से हासिल कर सकते हैं।

Wednesday, 26 March 2014

Relationship of god and spirituality

पूरी दुनिया में विद्वान लोग ईश्वर के प्रति एक खास नजरिया रखते हैं। उनका सोचना है कि ईश्वर निराकार है। हम उसे वैसे नहीं देख सकते हैं, जैसे अपने को आईने में देखते हैं। ईश्वर पूरी तरह से बोध का मामला है। जो उस बोध से गुज़र जाता है, वही बुद्ध हो जाता है।

सरल लोग, जिनकी दुनिया उनकी रोजी-रोटी के इर्द-गिर्द मंडराती रहती है, वे ईश्वर को निराकार नहीं मानते। उनका खयाल है कि ईश्वर हमारी तरह ही कहीं होगा और वहीं से हमारे ऊपर नज़र रख रहा होगा।

यही बात दर्शन और पौराणिक शब्दावली में कही जाए तो ईश्वर सगुण है। ठीक वैसे ही जैसे हम लोग सगुण हैं। वहीं विद्वानों ने ईश्वर को निर्गुण बना रखा है-'निरगुनिया'। अब यह दर्शनशात्र का बड़ा महत्वपूर्ण द्वंद्व है।

इस पर बड़ी बहसें हुई हैं। कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। ईश्वर निराकार भी है और साकार भी। ईश्वर निर्गुण भी है और सगुण भी है। भारतीय धर्मों में इसे बहुत शांत तरीके से बताया गया है।

अगर भगवान निराकार है, निर्गुण है तो वह सुपर ईश्वर है, उसके लिए हमने 'ब्रह्म' शब्द चुना है-'द एब्सल्यूट'। अगर भगवान साकार हैं, सगुण हैं तो उनके लिए ईश्वर शब्द चुना है।

ब्रह्म का केवल बोध किया जासकता है। यही बोध आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा होगा, जिसे हम परमतत्व या अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन सगुण ईश्वर के साथ हम रिश्ता जोड़ सकते हैं। यहां ईश्वर हमारे बहुत करीब आ जाता है और हम उसे थोड़ा नीचे ले आते हैं। जब ईश्वर थोड़ा और नीचे आता है तो अवतार के रूप में आ जाता है- कभी राम बनके, कभी श्याम बनके।

यहां से एक आम आदमी के लिए ईश्वर के साथ तादात्म्य बैठाना और सरल हो जाता है। पूरी दुनिया में भक्ति की मदद से ईश्वर की निकटता आम आदमी केलिए बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आने वाली बात हो जाती है।

अवतार की थियरी ईश्वर का सरलीकरण है। ईश्वर और आध्यात्मिकता के से संबंधित जितने सिंबल हैं, भारत में उनका बड़ा बेहतरीन प्रकटीकरण हुआ है।

ईश्वर को अगर वाणी में व्यक्त करें तो वह 'ऊँ' होगा। अगर आंखों से देखने वाली किसी ऑब्जेक्टिव चीज के रूप में व्यक्त करें तो वह प्रकाश होगा। यहां तक तो सब ठीक होगा, लेकिन जो निराकार हो, जिसका कोई आकार ही नहीं है

जो दिखता ही नहीं है, फिर उसे कैसे व्यक्त करेंगे? लेकिन भारतीय आध्यात्मिकता ने निराकार को भी व्यक्त करने के कुछ तरीके सोचे होंगे।

हमारी आध्यात्मिक परंपरा में ध्यान या मेडिटेशन निराकार को प्रकट करता है। भारतीय आध्यात्मिकता की विशिष्टता हैं। इस तरीके को ही हम ध्यान या मेडिटेशन के नाम से जानते हैं।

अगर आप भगवान के करीबी शिष्यों में शामिल होना चाहते हैं तो आपको उनके निराकार स्वरूप का बोध करना पड़ेगा, जो आप केवल मेडिटेशन से हासिल कर सकते हैं।

You must have faith in the mind for enlightenment

एक बार बालक नचिकेता ने अपने पिता से कहा, आप ब्राह्मणों को कृषि कार्य के लिए अनुपयोगी गाय दान में दे रहे हैं। पिता ने यह नहीं कहा कि हां, यह ठीक नहीं है परंतु वे समझ गए कि यह मेरी निंदा कर रहा है, मेरा अनादर कर रहा है, मेरे कृत्य की भर्त्सना कर रहा है।

नचिकेता ने पिता से कहा- शास्त्र कहते हैं कि अच्छी वस्तु, अच्छी निधि तथा अच्छी संपदा का दान करना चाहिए। अगर आप दान ही कर रहे हैं तो मुझको किसे दान में देंगे ?

पिता मौन हो गए, लेकिन बालक नचिकेता बार- बार टोकने लगा-पिताजी ! आप मुझे किसे दान में देंगे? आपने यह भी विचार किया होगा कि मुझे भी किसी को दान में देंगे। इस पर पिता ने क्रोध में कहा-मैं तुझे यमराज को दान में देता हूं। आज से तू यम की वस्तु हुआ। दान की गई वस्तु कभी ली नहीं जाती और कभी लौटाई भी नहीं जाती। अब तू मेरा नहीं रहा। चूंकि मैं तुझे दान कर चुका हूं इसलिए तू मेरे पास नहीं रहेगा।

बालक नचिकेता को यह बुरा नहीं लगा कि मेरे पिता ने मुझे कुछ कहा है। ऐसी श्रद्धा थी नचिकेता की अपने पिता के प्रति। यही श्रद्धा ज्ञान के लिए कारक बनी और नचिकेता को यमराज के द्वार पर ले गई। यमराज ने देखा कि यह सामान्य बालक नहीं, श्रद्धावान बालक है। जब हमारे पास श्रद्धा आती है तो वह हमें सक्षम बनाती है।

अपने श्रद्धा भाव से हम गुरु के पास जो गुरुत्व है, साधु के पास जो साधुत्व है, संन्यासी के पास जो संन्यास तत्व है, गंगा के पास जो गंगत्व है, देवताओं के पास जो देवत्व है और भगवान के पास जो भगवत्ता है, उसके स्वाभाविक रूप से अधिकारी बन जाते हैं। श्रद्धावान व्यक्ति स्वाभाविक रूप से योग्यता रखता है चूंकि उसके पास तर्क नहीं होते।

नचिकेता संकल्पित मन से यमराज की चौखट पर बैठ गया। यमराज ने कहा-तू तीन दिन से मेरे द्वार पर बैठा है, बड़ा हठी है। मांग क्या मांगना चाहता है? इस पर बालक नचिकेता ने कहा- मैं मृत्यु का भेद जानने आया हूं। जन्म-मृत्यु क्या है, यह भेद मुझे बता दीजिए।

यह सुनकर यमराज हतप्रभ हो गए। उन्होंने बालक नचिकेता के समक्ष ढेरों प्रलोभन रखते हुए कहा-तुम चक्रवर्ती सम्राट बनने, पृथ्वी पर प्रतिष्ठित और पूजित होने अथवा स्वर्ग की संपूर्ण संपदा प्राप्त करने का वर मांग लो। भला तुम्हारे इन प्रश्नों में क्या रखा है? बालक नचिकेता ने कहा-महाराज! मुझे यह सब कुछ नहीं चाहिए।मुझे वही चाहिए जिसके बारे में मैंने आपसे पूछा है।यमराज मजबूर हो गए।

श्रद्धा उसे भी कहते हैं जिसके सामने जगत के सारे आकर्षण गौण हो जाएं। श्रद्धा का एक अर्थ यह भी है कि जगत के सभी आकर्षण गौण हो गए हैं।श्रद्धा का एक अर्थ यह भी है कि जगत के आकर्षण आपके सामने शिथिल हो जाएं। श्रद्धा के बल पर ही बालक नचिकेता ने सब कुछ प्राप्त कर लिया।

अगर हमारे निवेश के लिए श्रद्धा की पूंजी है तो हम संसार की अलभ्य वस्तु भी प्राप्त कर सकते हैं। हमारी श्रद्धा होना चाहिए और मार्ग की सारी मुश्किलें स्वमेव ही समाप्त हो जाती हैं। श्रद्धा के बल पर ही पंगु पर्वत लांघने का साहस कर जाता है। यह हमारी श्रद्धा ही है जो हमें ज्ञानवान बनाती है। 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्'।

जब आप श्रद्धा के साथ कुछ प्राप्ति के लिए जाते हैं तो भले ही किसी में ज्यादा देने का सामर्थ्य न हो तब भी आप कुछ लेकर ही लौटेंगे।

संक्षेप में

ज्ञान की प्राप्ति के लिए मन में श्रद्धा होना बहुत ही जरूरी है। जब हम श्रद्धा के साथ कुछ पाने की कोशिश करते हैं तो भले ही हमें प्राप्त हो लेकिन हम निष्फल नहीं हो सकते हैं। ईश्वर, गुरु और वैद्य के समक्ष श्रद्धा भाव के साथ जाएंगे तो हमेशा कुछ लेकर ही लौटेंगे।