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Monday, 14 July 2014

Keep love the idea of engagement between

व्यस्तता के बीच भी जरूरतों और सीमाओं को पहचानकर खुशियों के लिए कदम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रतिस्पर्धात्मक समय है। लोगों की जिंदगी पहले से ज्यादा व्यस्त हो गई है। दफ्तर में हर महीने बढ़ती जिम्मेदारी, परिवार के प्रति बढ़ता दायित्व और मित्रों के साथ जुड़े रहने की कोशिशें हर चीज हमसे ज्यादा समय की मांग करती है। हमारी व्यस्तता खत्म नहीं होती क्योंकि जिंदगी में लगातार नई जिम्मेदारियां जुड़ती जाती हैं।

जीवन में आगे बढ़ते हुए मिलने वाली जरूरी फुर्सत कम होती जाती है लेकिन काम के ज्यादा दबाव के बीच भी हमें अपनी प्रसन्नाता और खुशियों के लिए प्रयास करना छोड़ना नहीं चाहिए वरना जीवन से ऊब पैदा होने लगती है और जीवन निराशाजनक लगने लगता है। काम को टाला नहीं जा सकता लेकिन उसके साथ जीवन में प्रसन्नाता की तलाश करना बहुत जरूरी है। यह ठीक वैसे ही है कि एक नट रस्सी पर चलते हुए संतुलन साधता है लेकिन उसके चेहरे पर सहजता और मुस्कान बनी रहती है। संतुलन के साथ व्यस्तता के बीच भी खुश रहा जा सकता है।

अपनी जरूरतों को पहचानें आप संतुलित और प्रसन्ना रहना चाहते हैं तो अपनी जरूरतों को पहचानें। सुनिश्चित करें कि आपकी जरूरी आवश्यकताएं समय पर पूरी हों। अति व्यस्त रहने के बावजूद यह महत्वपूर्ण है कि आप पर्याप्त नींद लें और आपका खानपान भी संतुलित रहे। काम का दबाव इतना नहीं हो कि आप दैनिक जरूरतों को पूरा करने का समय भी न पाएं। ऐसी स्थिति है तो उसकी तरफ तुरंत ध्यान देना चाहिए। अगर आप खाने, पहनने और जीने के अंदाज पर गौर करने का समय भी नहीं पा रहे हैं तो आपको इन चीजों के लिए समय निकालना ही चाहिए।

पूर्व योजना के साथ आगे बढ़ें

व्यक्तिगत जीवन में आपको समय तभी मिलेगा जब आप अपने काम को नियत समय में पूरा कर पाएंगे। तभी सहजता और शांति आएगी। इसके लिए पूर्व योजना सबसे अहम है।

अपने कामों के लिए पूर्व योजना बनाने पर आप बिना किसी चूक के साथ उन्हें पूरा कर पाएंगे। एक उपाय यह हो सकता है कि आप अपने कामों की सूची बनाएं ताकि उन्हें याद रख सकें। हालांकि व्यस्त रहने पर सभी चीजें कर पाना तो संभव नहीं होगा लेकिन अगर आपको अपने कामों के बारे में पता है तो उन्हें लेकर आपको चिंता नहीं होगी। भले ही आप उनमें से कुछ ही काम पूरे कर पाएं लेकिन आप कामों के बीच प्राथमिकता भी तय कर पाएंगे।

दबाव में बिखरे नहीं

अत्यधिक व्यस्तता में यह भी होता है कि आप हताशा और गुस्से को परिजनों और मित्रों पर व्यक्त करने लगते हैं। अगर आपके साथ ऐसा कुछ हो रहा है जबकि आप काम से घर पहुंचने पर बहुत ज्यादा थकान और चिड़चिड़ापन महसूस कर रहे हैं तो काम के दौरान हर थोड़ी देर में खुद को सहज करना जरूरी है। काम को अपने ऊपर इतना हावी न होने दें कि आपकी भावनाएं बुरी तरह प्रभावित हों।

किसी भी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में लगे होने के बावजूद छोटे-छोटे ब्रेक लें, खुद को समय दें और तनाव को निकल जाने दें। पूरे दिन काम के बारे में ही सोचते रहने पर मानसिक थकान ज्यादा हो जाती है। अपने दिन में सहजता के लिए एक से ज्यादा चीजों को शामिल करें।

अपने लिए समय निकालें

आप कितने ही व्यस्त क्यों न हों लेकिन अपनी रुचियों के लिए समय निकालना आपको हताशा में नहीं घिरने देगा। सप्ताह में एक दिन की छुट्टी जरूर लें। रोज काम के अलावा अपनी रुचियों के लिए कुछ समय देना चाहिए। शारीरिक कसरत वाली किसी गतिविधि से

जुड़ना तनाव को कम करने में मदद करता है। माना कि आपके पास बहुत काम है लेकिन उसके बावजूद सुबह काम शुरू करने से पहले दस मिनट के लिए श्वास का अभ्यास असंभव नहीं है। इसके अलावा रात को घर पहुंचने के बाद मोबाइल फोन, ईमेल और अन्य चीजों से खुद को दूर रखने का प्रयास करें। अपने काम से यह अलगाव आपके मस्तिष्क को शांति देगा। संगीत या कोई अच्छी किताब आपको व्यस्तता के बावजूद प्रसन्नाता हासिल करने में मदद करेगी। ये सभी चीजें आपको प्रेरित भी करती हैं।

क्षमता से ज्यादा को कहें ना

आज के समय की मुश्किल यही है कि हमसे हमेशा अधिक की उम्मीद बंधी रहती है। भले ही हम मौजूदा स्थितियों में संघर्ष कर रहे हों लेकिन हम पाते हैं कि हमें नया काम मिलता ही जाता है। अगर अपनी प्रसन्नाता को बनाए रखना है तो बोझ से लगातार मुक्त होने का विवेक जगाना चाहिए।

जीवन में हम परिवार, मित्रों और कार्य से दूर नहीं हो सकते हैं लेकिन अतिरिक्त काम को ओढ़ने से पहले विचार कर सकते हैं कि क्या हम उसे सहज रूप में कर सकते हैं। स्पष्ट रूप से मना करने का अर्थ यह नहीं है कि आप जिम्मेदारी से जी चुरा रहे हैं बल्कि इसका अर्थ यही है कि आप सीमा तय कर रहे हैं और अपने जीवन में संतुलन बना रहे हैं। सीमाएं और प्राथमिकताएं तय करके ही आप आनंद पा सकेंगे। व्यस्त रहते हुए खुश रहने का यही मंत्र है।

काम और निजी जीवन में ऐसे साधें संतुलन

    तय करें कि आप कितने अधिक व्यस्त रहना चाहते हैं।

    देखें कि काम के घंटे निजी प्राथमिकताओं को प्रभावित न करें।

    व्यावसायिक लक्ष्य पूरे हों लेकिन सामाजिक मेलजोल भी बना रहे।

    संबंधों के लिए भी समय निकालें। उन्हीं से जिंदगी खुशहाल बनेगी।

    दिन में ऐसा समय जरूर हो जब गैजेट्स और उपकरणों से कटे रहें।

व्यस्त रहो पर आनंदित भी

कभी भी इतने व्यस्त न हो जाना कि दूसरों के बारे में सोच भी न सको।

- मदर टेरेसा

जो अच्छे काम में बहुत व्यस्त रहता है उसके पास अच्छा बनने के लिए समय ही नहीं रहता।

- रवींद्रनाथ टैगोर

Friday, 11 July 2014

Guru Puja miles pupil arrived long way

श्रीराधा-कृष्ण की लीला स्थली और संतों की साधना स्थली में बहने लगी है भक्ति और आस्था की बयार। गुरु पूर्णिमा पर विश्व के अनेक देशों समेत अनेक प्रांतों से श्रद्धालुओं के आगमन से धार्मिक नगरी गुलजार होने लगी है।

आस्था के साथ समर्पण का भाव मन में लिए मीलों लंबा सफर तय करके लोगों का आना लगातार जारी है। प्राचीन आश्रम, मठ-मंदिर हों या नये आधुनिक मठ और मंदिर हर ओर उल्लास और भक्ति का विहंगम संगम इन दिनों वृंदावन में देखा जा रहा है। पारंपरिक गुरु स्थान पर डेरा जमाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

गुरु पूर्णिमा पर्व 12 जुलाई को है, लेकिन गुरुवार तक शहर के हर आश्रम में हजारों शिष्यों ने पहुंचकर दस्तक दे दी। सुबह पूजन-अर्चन और संतों के प्रवचन सुन, मंदिर-मंदिर दर्शन कर पुण्य लाभ कमाने वाले श्रद्धालुओं की कमी नजर नहीं आ रही।

गुरु पूजन को मीलों लंबा सफर तय कर पहुंचे शिष्य-

गुरु पूजन को शहर में भक्तों का कारवां लगातार बढ़ रहा है, इन्हें उचित पार्किंग व्यवस्था मुहैया कराने व ट्रैफिक नियम के अनुसार वाहनों को आने-जाने की व्यवस्था न होने से शहर में जाम से हालात होने लगे हैं। गुरु पूर्णिमा पर्व में दो दिन बाकी हैं, लेकिन अभी से श्रद्धालु और आम नागरिक जाम की समस्या से जूझने लगे हैं। गुरु पूर्णिमा पर्व पर लाखों श्रद्धालु वृंदावन में गुरु पूजन करने पहुंच रहे हैं। गुरु स्थानों पर शुरू हुए धार्मिक अनुष्ठानों में शिरकत करने के लिए गुरुवार से ही श्रद्धालुओं ने निजी वाहनों से आना आरंभ कर दिया, लेकिन पुलिस की लापरवाही के चलते शहर में जाम के हालात लोगों की मुसीबत बन रहे हैं। सबसे व्यस्ततम चौराहे अटल्ला चुंगी पर रेंगते वाहन अधूरी व्यवस्था की चुगली करते दिखाई दिए। यमुना एक्सप्रेस-वे के रास्ते शहर में प्रवेश करने वाले वाहन इसी मार्ग से बांकेबिहारी मंदिर के अलावा कई आश्रमों में पहुंच रहे हैं, लेकिन पुलिस को कोई व्यवस्था न होने से यहां पूरे दिन जाम के हालात बने रहे।

दो पुलिसकर्मियों के कंधों पर इस चौराहे की जिम्मेदारी संभालना उनके लिए चुनौती साबित हो रही है। बांकेबिहारी को जाने वाले गांधी मार्ग पर वाहनों की लंबी कतार लगी थी। आगे विद्यापीठ चौराहा पर वाहन इस कदर एक-दूसरे के सामने आ खड़े हुए, जिन्हें निकालना संभव नहीं था। पुलिस यहां भी मौजूद न थी। यही हालात कुछ हरिनिकुंज इलाके में देखने को मिले। हरिनिकुंज इलाके में सड़क के दोनों ओ नो-पार्किंग जोन में दर्जनों वाहन खड़े होकर जाम को बढ़ावा देते रहे, इन्हें हटाने की जहमत तक नहीं उठा पाए यातायात पुलिसकर्मी। हालांकि यातायात पुलिसकर्मी क्रेन के साथ टहलते नजर जरूर आए, लेकिन वाहन चालकों से बातचीत कर उन्हें वहीं खड़े रहने की अनुमति दे गये। किशोरपुरा, बनखंडी, रंगजी मंदिर, सेवाकुंज, शाहजी मंदिर, नगर पालिका चौराहा, इस्कॉन मंदिर, प्रेम मंदिर पर भी जाम के हालातों से श्रद्धालु और स्थानीय लोग परेशान रहे।

Inundation of the city steeped in reverence of faith

गिरिराज प्रभु की दिव्यता पर नत मस्तक भक्ति ने गोवर्धन की धरा को अलौकिक बना रखा है। सतरंगी रोशनी में नहाई पर्वतराज की धरा राधे-राधे से गुंजायमान है। सप्तकोसीय परिक्रमा मार्ग भक्तों के जयकारों और भजनों से झंकृत हो रहा है। पांच दिवसीय मुड़िया पूर्णिमा मेला रफ्ता-रफ्ता शबाब पर पहुंच रहा है। जोश और उल्लास में डूबे भक्त गिरिराज महाराज की 21 किमी लंबी परिक्रमा झूमते-नाचते कर रहे हैं।

विभिन्न संस्कृति और भाषाओं के संगम ने मानो गोवर्धन में अनूठे संसार की रचना कर दी है। गुरुवार को पांच दिवसीय मेला के तीसरे दिन सूर्य देव की प्रचंडता श्रद्धालुओं की परीक्षा लेती रही, लेकिन भक्तों के जुनून में कोई कमी नहीं आई। आसमान से बरसते आग के गोले और गर्म दहकती धरा भक्तों के नंगे कदमों को रोकने का साहस नहीं जुटा सकी। शाम ढलते ही चारों दिशाओं से गूंजते जयकारे भक्तों के आगमन की सूचना दे रहे थे। गोवर्धन को जोड़ने वाले सभी संपर्क मागरें से उमड़ते आस्था के सैलाब को देखकर सरकारी मशीन हांफ ती नजर आई। परिक्रमार्थियों की संख्या के आगे व्यवस्थाएं बौनी साबित होने लगीं। बसें ठसाठस, तो रेलगाड़ी खचाखच भरकर गोवर्धन की तरफ दौड़ी आ रही हैं।

नहाने को लगी हैं कतारें- गुरुवार सुबह करीब साढ़े तीन बजे मानसीगंगा का किनारे स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइन नजर आई। सप्तकोसीय परिक्रमा के उपरांत मानसीगंगा में स्नान का महत्व है। सुरक्षा की दृष्टि से मानसीगंगा के घाटों को बैरीकेडिंग लगाकर बंद कर दिया गया है तथा किनारों पर स्नान के लिए फव्वारे लगाए गए हैं, परंतु फव्वारों की कम संख्या के कारण श्रद्धालुओं को स्नान किए बिना ही लौटना पड़ रहा है।

Vaishnav Devi Yatra: Ktdha be given to the important post of EO

हाईकोर्ट की डिवीजन बैंच ने भ्रष्टाचार के आरोपी कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर रवि कुमार का तबादला रियासी म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के पद पर किए जाने को गंभीरता से लिया। उन्होंने सरकार को निर्देश दिए हैं कि उन्हें रियासी मुख्यालय में महत्वपूर्ण पद न दिया जाए। अगर कोर्ट के निर्देश पर अमल नहीं हुआ तो शहरी विकास विभाग के डायरेक्टर स्वयं अदालत में पेश हो।

इसके लिए कोर्ट ने दो सप्ताह का समय दिया है। यह मामला एक गैर सरकारी एसओएस इंटरनेशनल के चेयरमैन राजीव चुन्नी द्वारा दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। जिसमें कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने की वकालत की गई। मामले में कहा गया कि रवि कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत दो एफआईआर दर्ज हैं और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। दरअसल एसओएस की ओर से दायर जनहित याचिका में यह अदालत से यह गुहार की गई थी कि माता वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए आने वाले वो श्रद्धालुओं जो पालकी वालों, पिट्ठुओं की सेवाएं लेते हैं, और उनसे टैक्स वसूला जा रहा है। यह टैक्स केवल कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी ही श्रद्धालुओं से ले सकती है, न कि जिला प्रशासन उन पर कोई और टैक्स लगा सकती है। यह टैक्स म्यूनिसिपल लिमिट कटड़ा में ही होना चाहिए लेकिन रियासी के डिप्टी कमिश्नर ने श्रद्धालुओं के लिए टैक्स की दरों में कुछ समय पहले संशोधन किया था और इन्हें लागू कर दिया था। दलील में कहा गया कि कटड़ा म्यूनिसिपल कमेटी के एग्जीक्यूटिव आफिसर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

Guru purnima is a festival to honor

भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से ही गुरु को आदर-सम्मान देने की परंपरा रही है। गुरु को हमेशा से ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना जाता है।

'आचार्य देवोभव:" का स्पष्ट अनुदेश भारत की पुनीत परंपरा है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में गुरु को भी भगवान की तरह सम्मानजनक स्थान दिया गया है। गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को यह विशेष पर्व मनाया जाता है। गुरु अपने आपमें पूर्ण होते हैं। अत: पूर्णिमा को उनकी पूजा का विधान स्वाभाविक है।

पथ प्रदर्शक हैं गुरु

आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी होती है। ऐसी मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के बाद सभी देवी-देवता चार मास के लिए सो जाते हैं। इसलिए देवशयनी एकादशी के बाद पथ प्रदर्शक गुरु की शरण में जाना आवश्यक हो जाता है। परमात्मा की ओर संकेत करने वाले गुरु ही होते हैं।

इसीलिए गुरु की छत्रछाया से निकले कपिल, कणाद, गौतम, पाणिनी जैसे विद्वान ऋषि आदि अपनी विद्या वैभव के लिए आज भी संसार में प्रसिद्ध हैं। गुरुओं के शांत पवित्र आश्रम में बैठकर अध्ययन करने वाले शिष्यों की बुद्धि भी वहां के वातावरण के अनुकूल उज्जवल और उदात्त हुआ करती थी। तब सादा जीवन, उच्च विचार गुरुजनों का मूल मंत्र था। तप और त्याग ही उनका पवित्र ध्येय था। लोकहित के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देना ही उनकी शिक्षा का आदर्श होता था।

श्रीकृष्ण हैं जगत् गुरु

धर्मग्रंथों में गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा गया है कि जो शिष्य के कानों में ज्ञान रूपी अमृत का सिंचन करे और उन्हें धर्म का मार्ग दिखाए वही गुरु है। यह जरूरी नहीं है कि हम किसी व्यक्ति को ही अपना गुरु बनाएं। योग दर्शन नामक पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण को जगत्गुरु कहा गया है, क्योंकि महाभारत युद्ध के दौरान उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया था।

व्रत का विधान

इसी उदात्त परंपरा की याद दिलाने के लिए प्रत्येक वर्ष आषाढ़ी पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन प्रात:काल शांत चित्त से अपने गुरु का स्मरण करते हुए गुरु पूर्णिमा व्रत का संकल्प करें। इस दिन अपने गुरुु के पास जाकर उनका अर्चन, वंदन और सम्मान करना चाहिए।

इस दिन अपने गुरु से आशीर्वाद, उपदेश और भविष्य के लिए निर्देश ग्रहण करना चाहिए। यदि गुरु दूर रहते हों, दिवंगत हों या आपने भगवान को ही अपना गुरु मान लिया हो तो उनके चित्र या पादुका (खड़ाऊं) को उच्च स्थान पर रखकर, लाल, पीले और सफेद कपड़े को बिछाकर स्थापित करें, लाल स्नेह, पीला समृद्धि और श्वेत शांति का प्रतीक है। ये तीनों ही जीवन में परम आवश्यक है। गुरु के चित्र या पादुका का धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, चंदन, नैवेद्म आदि से पूजन करें। गुरु स्रोत का पाठ करें और श्रद्धापूर्वक गुरु का स्मरण करें।

वेद व्यास ने वेद, उपनिषद और पुराणों का प्रणयन किया है। इसलिए वेद व्यासजी को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि वेद व्यासजी का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। आज के दिन व्यासजी के चित्र का पूजन और उनके द्वारा रचित ग्रंथों का भी अध्ययन करना चाहिए।

Feast of faith and belief

आज के युग में मनुष्य पूर्ण भौतिकता में लिप्त होकर अपने सन्मार्ग से भटक गया है। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए वह अनैतिक और कदाचारी बन चुका है। ऐसे में सदगुरु ही एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है जो इन भटके हुए लोगों को नैतिकता और सदाचार के मार्ग पर ला सकता है।

कहा गया है कि गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई यानी संसार सागर दुःख भरा हुआ है। उसे गुरु के बिना कोई भी पार नहीं लगा सकता है। गुरु की महिमा के बारे में सिखों के पहले गुरु कहते हैं कि सौ चांद और हजार सूर्य भी एक साथ आकाश में आ जाए तो भी गुरु की रोशनी का कोई मोल नहीं है।गुरु को भगवान से ऊंचा दर्जा देने वाले संत कबीर दास ने कहा है कि पहले में गुरु महाराज के चरण स्पर्श करुंगा उसके बाद भगवान के चरण स्पर्श करना चाहूंगा।

गुरु विकास का कारण है, वह कल्याण मित्र है और शिष्य की प्रतिभा को तराश कर कंचन बना देता है। जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बना दिया था। यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा का पर्व आस्था और विश्वास का पर्व है। यह समर्पण का पर्व है साथ ही लोगों में विश्वबंधुत्तव की भावना को बढ़ावा देता है।

Philosophy in the dark

अंधेरा और उजाला, रात और दिन यूं तो जीवन का हिस्सा है। बात चाहे दैनंदिनी जीवन की हो या फिर प्रतीकात्मकता की। हर इंसान का जीवन दिन-रात की तरह ही होता है। अंधेरे और उजाले में बंटा हुआ। जैसे दिन और रात है, वैसे ही जीवन में सुख-दुख की तरह ही अंधेरा और उजाला आता-जाता है।

अध्यात्म और धर्म में भी अंधेरा और उजाला प्रतीकों के तौर पर मौजूद हैं। हर तरह की सकारात्मकता का प्रतीक है उजाला... रोशनी... किरणें...। हर तरह की नकारात्मकता को अंधेरे के प्रतीक से परिभाषित किया गया है। ज्ञान उजाला है, अज्ञान अंधेरा।

प्रेम, सद्भाव, ममता, वात्सल्य, नैतिक, सद् इन सबको रोशनी से परिभाषित किया गया है, और ईर्ष्या, द्वेष, अनैतिकता, असद् इस तरह की सारी भावनाओं को अंधेरे से चित्रित किया जाता रहा है। लेकिन ये बस प्रतीकात्मकता तक ही सीमित है। तभी तो हमारे यहां कहा जाता है 'तमसो मा ज्योतिर्गमय" या फिर ये पश्चिम में कहा जाता है 'हे ईश्वर अंधकार में हमारी रोशनी बने रहना।

अंधेरा जीवन का उतना ही बड़ा सच है, जितना बड़ा सच उजाला है, रोशनी है। क्योंकि जिस तरह दिन और रात मिलकर एक चक्र पूरा करते हैं, उसी तरह रोशनी और अंधेरा मिलकर जीवन का चक्र पूरा करते हैं। अंधेरा सृष्टि में विद्यमान है, सूर्य से पहले अंधकार ही था, सूर्य आता और जाता है, उजाला भी आता-जाता रहता है। अंधकार बना रहता है।

अंतरिक्ष के अंधकार से लेकर गर्भ के अंधकार तक इसका अस्तित्व सृजन की पूर्वपीठिका है। अंधकार सृष्टि का पहला और अंतिम सत्य है। जीवन को सतत रहस्य, सृजन और अध्यात्म से सिंचित करता है ये अंधकार।

बिना अंधकार के हम सृजन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। सोचें कि धरती के भीतर बीज के अंकुरित होने से लेकर कोख में जीव के विकसित होने तक का साक्षी सिर्फ और सिर्फ अंधकार ही तो है। ये अंधकार ही है जो हमें खुद के साथ रहने, भीतर झांकने और महसूस करने का अवसर देता है।

आखिर ध्यान की अवस्था भी हमें आंखें बंद करने के बाद ही प्राप्त होती है। बिना अंधेरा के हम अपने करीब नहीं आ पाते हैं, हम खुद को जान नहीं पाते हैं। खुद में झांक नहीं पाते हैं, स्व हो नहीं पाते हैं। दुनिया से दूर जाने और खुद के करीब आने लिए अंधेरे की जरूरत होती है। ये सही है कि उजाला हमें देखने की सहूलियत देता है, लेकिन साथ ही ये हमें बंटने की सुविधा भी देता है। जब हम देखने की सीमा से बाहर चले जाते हैं तो हम अपने भीतर झांकने का अवसर पाते हैं।

जिस तरह रात और दिन एक दूसरे के पूरक हैं, उसी तरह अंधकारऔर प्रकाश का वजूद एक-दूसरे के साथ है। एक के बिना दूसरा समझा नहीं जा सकता है। दोनों ही जीवन के लिए जरूरी है।

हम ये भूल जाते हैं कि आंखें बंद करके ही हम साधना और आराधना करते हैं, कर सकते हैं। ध्यान के लिए भी अंधकार की ही दरकार होती है। अंधकार का मतलब भौतिक या शाब्दिक तौर पर अंधकार नहीं है। आंखों को बंद करने के बाद जो होता है वह भी तो अंध्ाकार ही है।

चाहे अंधकार को अज्ञान से और रोशनी को ज्ञान के प्रतीकों से व्यक्त किया जाता हो, लेकिन है तो ये दोनों ही जीवन के अभिन्न हिस्से। अंधकार या रात सृजन, रहस्य, विश्राम, पुनर्निर्माण और ईश्वर और स्व से रूबरू होने का अवसर है।

आखिर क्यों ईसा मसीह और भगवान कृष्ण का जन्म रात के अंधेरे में होता है? आखिर क्यों ईश्वर अब्राहम को रात में दिखाई देते हैं और मूसा को भी ईश्वर रात में ही दिखाई देते हैं।

इसी सिलसिले में अमेरिका की एक धर्मशास्त्री बारबरा ब्राउन टेलर अपनी हालिया किताब 'लर्निंग टू वॉक इन द डार्क में बताती हैं कि अंधेरा का हमारे जीवन में क्या महत्व है और ये भी कि जिस तरह से जीवन में रोशनी की जरूरत और महत्व है, उसी तरह से अंधेरे की भी जरूरत और महत्व है।

बारबरा कहती हैं कि जिस तरह से हमें तृप्ति के अहसास तक पहुंचने के लिए भूख को समझना जरूरी है, उसी तरह हमें रोशनी के अर्थ और महत्व को समझने से पहले अंधकार को समझना जरूरी है।

बिना अंधकार के उजाले का अर्थ नहीं समझा जा सकता है। यदि हम अंधकार को नकारात्मकता का प्रतीक भी मानें तब भी जीवन के सद् को समझने के लिए अंधकारको जानना ही होगा। बिना अंधकार को जानें हम स्व को नहीं जान सकते हैं, न ईश्वर को, न जीवन को और न ही सद्, सत् और सत्य को।

In the coming three days the political upheaval occurring

गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु अस्त होगा। इसी दिन राहु और केतु अपनी राशि परिवर्तन कर दूसरे ग्रह में प्रवेश करेंगे। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि राहु तुला राशि को छोड़कर दोपहर 3.45 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। कन्या का राहु शत्रुहंता योग बना रहा है।

यह योग 18 वर्ष पूर्व 1996 में बना था। वहीं केतु भी मेष को छोड़कर मीन राशि में प्रवेश करेगा। राहु केतु के इस परिवर्तन से सभी राशियों में प्रभाव पड़ेगा।

    12 जुलाई को गुस्र्पूर्णिमा

    राहू केतु बदलेंगे राशि

    बनेगा शत्रुहंता योग

ज्योतिषमठ संस्थान के संचालक पं विनोद गौतम ने बताया कि इसके पूर्व राहु केतु ने 23 दिसंबर 2012 में राशि परिवर्तन किया था। अब कन्या राशि में वैद्यति योग एवं धनु के चंद्रमा के समय उत्तरा अषाढ़ नक्षत्र में राशि परिवर्तन करेगा। वक्री रहने वाला ग्रह डेढ़ वर्ष तक कन्या राशि में रहेगा, जिससे कई राशियों पर प्रभाव पड़ेगा।

होंगे चार परिवर्तन

    12 जुलाई को राहु तुला छोड़ कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। केतु मेष को छोड़कर मीन में प्रवेश करेंगे।

    12 जुलाई को गुस्र् अस्त होगा।

    13 जुलाई को शुक्र का राशि वृष से मिथुन में जाएंगे।

    14 जुलाई को मंगल कन्या राशि से तुला में जाएंगे।

उजागर होंगे पुराने भ्रष्टाचार

तुला का मंगल षडयंत्रकारी योग बनाएगा। इससे पुराने भष्टाचार उजागर होंगे। राजनीति में उथल पुथल करेगा। एक माह तक राजनीति से जुड़े लोगों को प्रभावित करेगा। वहीं कन्या का राहु शत्रुहंता योग बना रहा है जिससे आतंकी, नक्सली, माओवादी जैसी घटनाओं पर कमी आएगी।

कुप्रभाव से बचाव के उपाय

जिन राशियों पर कुप्रभाव पड़ रहा है उन्हें तिल तेल, नारियल, लौंग तथा काले व भूरे रंग के वस्त्र में सात प्रकार के अनाज बांधकर शाम के समय गरीबों व अपंगों को दान करना चाहिए। इसके अलावा राहु का बीज मंत्र का जाप करना चाहिए।

राहु के कन्या में प्रवेश से राशियों पर प्रभाव

मेष- महासुख

वृष- धन क्षयकारी

मिथुन- अपमानजनक

कर्क- सौभाग्य दायक

सिंह- कलहकारी

कन्या- भयकारी

तुला- विनाशक

वृश्चिक- धनलाभ

धनु- विवादकारी

मकर- दुख देगा

कुंभ- धन क्षति

मीन- राजभय

So are necessary to master every guru purnima festival

जिसके पास गुरु नहीं, उसका सच्चा हितेषी कोई नहीं होता, उसके पास सब कुछ होते हुए भी वह अनाथ है। इसलिए जीवन में सदगुरु अति आवश्यक हैं।

किंतु धर्माचार्यों की मान्यता है कि पूर्व जन्मों के फलसवरूप ही सदगुरु की प्राप्ति होती है। गुरु शिष्य को शिक्षा के साथ संस्कार भी देता है जोकि मनुष्य को पूर्ण बना देता है। एक चाणक्य सैकड़ों चंद्रगुप्त को सम्राट बना सकता है। एक अरस्तु हजारों सिकंदर को महान बना सकता है।

ऐसे ऐतिहासिक कई उदाहरण हैं जिनमें युवा नरेंद्र को गुरु रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद बना दिया और गुरु समर्थ रामदास ने तो छत्रपति शिवाजी को ओज और उत्साह से पूर्ण कर दिया।

गुरु की इससे अधिक महिमा और भी है जब धर्म ग्रंथ यह भी वर्णन करते हैं कि ईश्वरावतार भगवान राम भी ज्ञान प्राप्ति के लिए महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र के श्रीचरणों में समर्पित हो गए। नंदबाबा ने भी बालकृष्ण को सन्दीपनी गुरु के पास गोकुल से उज्जयिनी तक भेज दिया।

ये ऐसे ऐतिहासिक प्रमाण हैं जो गुरु की सर्वज्ञाता और आवश्यकता को ज्ञापित करते हैं क्योंकि गुरु का दिया प्रत्येक मंत्र महामंत्र है इसे भगवान भी मान चुके हैं। इसलिए कहा भी कहा गया है कि-

गुरुब्रह्मा,गुरुविष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवै नमः

Saturday, 5 July 2014

Get pleasure from something but does give

एक आध्यात्मिक गुरु थे। एक आयोजन में उनके अनेक शिष्य आए। गुरु जी ने अपने शिष्यों के लिए एक प्रतियोगिता रखी। हर व्यक्ति को एक गुब्बारा दे दिया और उस पर अपना-अपना नाम लिखने को कहा। सारे गुब्बारे इकट्ठा कर दूसरे कमरे में रख दिए गए।

फिर उन लोगों से कहा गया कि वे एक साथ उस कमरे में जाकर अपने नाम का गुब्बारा ढूंढकर लाएं। वही जीतेगा, जो दो मिनट के अंदर अपने नाम का गुब्बारा ले आएगा। प्रतियोगिता शुरू होते ही सभी लोग कमरे की ओर दौड़ पड़े।

एक साथ जाने से लोग एक-दूसरे पर ही गिरने लगे। कमरे में अव्यवस्था फैल गई। गुब्बारे फूट गए। फलत: कोई भी व्यक्ति दो मिनट के भीतर अपने नाम का गुब्बारा नहीं ला सका।

अबकी बार आयोजकों ने फिर हर व्यक्ति के नाम लिखे गुब्बारे तैयार किए और लोगों से कहा, वे एक-एक करके कमरे में जाएं और कोई भी एक गुब्बारा उठाकर ले आएं और उस पर जिस व्यक्ति का नाम लिखा हो, उसे दे दें। तेजी से काम करने पर दो मिनटों में हर व्यक्ति के हाथ में उसका नाम लिखा गुब्बारा था।

अब गुरु जी ने समझाते हुए कहा, 'जीवन में भी आप लोग पागलों की तरह खुशियां तलाश रहे हैं, लेकिन वह इस तरह नहीं मिलती। जब आप दूसरों को खुशियां देने लगेंगे, तो आपको अपनी खुशी मिल जाएगी।'

संक्षेप मेंः

असली खुशी कुछ पाने से नहीं, बल्कि देने से मिलती है।

Friday, 4 July 2014

Weather interrupted the helicopter service, continue hiking Amarnath

खराब मौसम के बावजूद वीरवार को श्री अमरनाथ यात्रा जारी रही, हालांकि हेलीकॉप्टर सेवा बाधित रहने से श्रद्धालु हवाई मार्ग से यात्रा पर नहीं जा पाए। सुबह 8808 श्रद्धालु बालटाल और पहलगाम से पैदल यात्रा पर निकले।

देर शाम तक करीब दस हजार श्रद्धालुओं ने पवित्र हिमलिंग के दर्शन कर लिए थे। इसी के साथ छह दिनों में पवित्र गुफा में माथा टेकने वालों का आंकड़ा 70 हजार पार कर गया। इस बीच, दो और श्रद्धालुओं की पवित्र गुफा के पास हृदयगति रुकने से मौत हो गई। इस साल यात्रा के दौरान मरने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 10 हो गई है। अलबत्ता, इनमें से तीन की मौत हादसों में हुई है।

यात्रा के दोनों आधार शिविर बालटाल व पहलगाम में बुधवार रात को रुक-रुककर बारिश जारी रही। उम्मीद थी कि सुबह मौसम पूरी तरह साफ हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक बार तो यात्रा को स्थगित करने पर भी विचार किया गया, लेकिन मौसम में हल्के सुधार व यात्रा मार्ग को श्रद्धालुओं के आवागमन योग्य सुरक्षित पाए जाने पर यात्रा की अनुमति दे दी गई। अलबत्ता, धुंध छाए होने के कारण हेलीकॉप्टर सेवा को दिनभर स्थगित रखा गया।

संबंधित अधिकारियों ने बताया कि सुबह बालटाल से 5209 और पहलगाम के रास्ते 3299 श्रद्धालु दर्शन को निकले। इस बीच, वीरवार सुबह दो श्रद्धालु पवित्र गुफा के पास अचेत पाए गए। दोनों को तुरंत निकटवर्ती चिकित्सा शिविर ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने दोनाें को मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों के मुताबिक, इन दोनों की मृत्यु हृदयगति रुकने से हुई है। मृतकों की पहचान बलवंत सिंह पुत्र जगराम निवासी मकान नंबर 140, छोटी माता मंदिर के पास, गुड़गांव, हरियाणा और मूर्तिगिरि स्वामीनाथन पुत्र गुरुप्रेम गिरि निवासी समराओ स्ट्रीट फोर्ट तमिलनाडु के रूप में हुई है।

Tuesday, 1 July 2014

If the conduct beautiful mind and body beautiful

बात उन दिनों की है जब भगवान श्रीराम अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान चित्रकूट में थे। भगवान राम एवं माता सीता कुटिया के बाहर बैठे हुए थे।

लक्ष्मणजी उनके चरणों में बैठे थे। तभी श्रीराम ने कहा कि लक्ष्मण यहां आओ मेरे और सीता के बीच एक झगड़ा हो गया है। इसलिए तुम न्याय करो।

लक्ष्मण जी मान गए। तब श्रीराम-' मैं कहता हूं कि मेरे चरण सुंदर हैं। सीता कहती हैं उनके चरण सुंदर हैं। तुम दोनों के चरणों की पूजा करते हो। अब तुम ही फैसला करो कि किसके चरण सुंदर हैं। लक्ष्मणजी बोले आप मुझे इस धर्म संकट में मत डालिए।

तब श्रीराम ने समझाया कि तुम बैरागी हो। निर्भय होकर कहो। किसके चरण सुंदर हैं। राम के चरणों को दिखाते हुए लक्ष्मणजी बोले कि माता, इन चरणों से आपके चरण सुंदर हैं। इतना कहते हुए लक्ष्मण जी चुप हो गए और माता सीता खुश।

इस पर लक्ष्मण जी बोले माता अधिक खुश मत होना। भगवान राम के चरण हैं, तभी आपके चरणों की कीमत है। इनके चरण न हों तो आपके चरण सुंदर नहीं लग सकते। रामजी खुश हो गए।

तब लक्ष्मणजी फिर बोले कि आप दोनों को खुश होने की जरूरत नहीं। आप दोनों के चरणों के अलावा भी एक चरण हैं जिसके कारण ही आपके चरणों की पूजा होती है यानी आचरण। आचरण की कोई कीमत नहीं। महराज, आपके चरण सुंदर हैं तो उसका कारण आपका महान आचरण है।

संक्षेप में

यदि व्यक्ति के आचरण अच्छे हों तो उसका तन और मन दोनों ही सुंदर होता है और वह संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाता है।

Tuesday, 24 June 2014

Eagle and serpent was mainly because of the hostility

अमूमन यह प्रश्न सदियों से उठता आ रहा है कि नागों की उत्पत्ति कैसे हुई। नाग और गरुड़ के बीच मतभेद सदियों से चला आ रहा है। दरअसल नागों के बारे में भागवत् पुराण में विस्तृत लेख मिलता है।

कहते हैं कि कश्यप ऋर्षि की दो पत्नियां थीं। एक का नाम बनिता और दूसरी पत्नी का नाम कद्रू था। एक बार कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों पत्नियों से वर मांगने को कहा। कद्रू ने एक हजार वीर नागों की माता होनें का वर मांगा और बनिता ने एक वर से दो पुत्र मांगे जो बाद में अरूण और गरुण के नाम से प्रसिद्ध हुए।

नागों की मां कद्रू को धरती का प्रतीक माना जाता है। गरुड़ और अरुण की मां बनिता को स्वर्ग की देवी माना जाता है।

एक दिन कश्यप दोनों पत्नियों में इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि सूर्य के अश्व श्यामवर्ण के हैं या श्वेत। बनिता ने उनका रंग श्वेत बताया, पर कद्रू नहीं मानीं। वह एक ही रट लगाए हुए थी कि अश्व श्याम वर्ण के हैं। बनिता ने आखिरी शर्त लगा दी कि अगर अश्वों का रंग श्वेत हुआ तो तुम और तुम्हारे पुत्र हमारे दास रहेगें। कद्रू ने स्वीकार कर लिया।

शाम हुई। जब कद्रू ने अपने पुत्रों से इसकी चर्चा की तब शेषनाग को छोड़कर शेष सभी पुत्रों ने कहा कि मां तुम चिंता मत करो। हम लोग जाकर अश्वों से लिपट जाएंगे जिससे वे दूर से श्यामवर्ण के दिखाई देने लगेंगे। यह बात सुनकर कद्रू प्रसन्न हो गई।

परंतु बाद में बनिता को यह भेद पता चल गया और तभी से गरुण और नागों की दुश्मनी चली आ रही है।

Wednesday, 18 June 2014

we do not like things his solicitation

इस जीव जगत में बह्म पूर्ण है। इसलिए यह जगत भी पूर्ण है। उसी पूर्ण से इस पूर्ण की उत्पत्ति हुई है। अतः हम अगर इस पूर्ण को निकाल देते है तो शेष पूर्ण ही रहता है।

ईशोपनिषद में इस नश्वर जीवन के बारे में कुछ यही कहा गया है। सनातन(हिंदू) धर्म में 108 उपनिषदों के उल्लेख है। यह ध र्म ग्रंथ आदिकाल में लिखे गए हैं। जिनकी बातें आज भी उतनी ही सार्थक हैं जितनी की पहले थीं। ईशोपनिषद की कुछ ऐसी ही ज्ञानदायक बातों का पिटारा...

    इस परिवर्तनशील संसार में सब कुछ वस्तुएं ईश्वर ने ही बनाईं हैं और इनमें ईश्वर रहता है। जो वस्तुएं आपके पास नहीं है उसका लोभ मत करो।

    जो लोग केवल शारीरिक बल प्रदर्शन यानी दूसरों की पीड़ा देने के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें आदर्श मानवीय मार्ग को समझने की शक्ति नहीं है, वे लोग मृत्यु के बाद नर्क जाने को तैयार रहें।

    ब्रम्हा एक है, उसमें चंचलता है, सबसे प्राचीन है, स्फूर्ति प्रदान करने वाला है और मन से भी तेज चलने वाला है। वह स्थिर रहने पर भी अन्य दौड़ते हुए आगे बढ़ जाता है। मां के गर्भ में रहनेवाला जीव उसी ब्रह्मा के आधर से अपने पूर्व में किए कर्म फल को प्राप्त होता है।

    जो मनुष्य सभी प्राणियों की आत्मा के अंदर आत्मा है, ऐसा अनुभव करता है और समस्त प्राणियों में उसी एक आत्मा का विश्वासपूर्ण अनुभव करता है, उसे किसी के प्रति घृणा नहीं रहती।

    विद्या यानी आत्मज्ञान से आत्मा की उन्नति होती है। अविद्या से सांसारिकता प्राप्त होती है। अतः इन दोनोंका फल भिन्न-भिन्न है।

God is everywhere just need to find

एक धार्मिक व्यक्ति था। भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा थी। उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी। एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा-भगवान मुझसे बात करो, और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना।

इसलिए इस बार वह जोर से चिल्लाया और आकाश में घटाएं उमङ़ने लगी, बादलो की गड़गडाहट होने लगी लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना। उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर- नीचे सब तरफ देखा और बोला, भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा।

पर उसने नहीं देखा आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया।

अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा 'भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहां हो,मेरे पास हो,मेरे साथ हो और एक तितिली उड़ते हुए आकर उसके हथेली पर बैठ गई।

लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया, और उदास मन से आगे चला गया। भगवान इतने सारे रूपो में उसके सामने आए इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी।

संक्षेप में

ईश्वर हर जगह है। वह अपने तरीके से आते हैं और हम अपने तरीके से देखते हैं। हर जगह हर पल उन्हें महसूस करना चाहिए।

Source: Spirituality News & Hindi Rashifal 2014

Thursday, 12 June 2014

Talking parrots and the hunter story

एक बार एक साधु ने अपनी कुटिया में कुछ तोते पाल रखे थे। सभी तोते अपनी सुरक्षा के लिए एक गीत गाते थे। गीत कुछ इस तरह था कि 'शिकारी आएगा जाल बिछाएगा पर हम नहीं जाएंगे' एक दिन साधु भिक्षा मांगने के लिए पास के एक गांव में गए।

इसी बीच एक बहेलिया ने देखा एक पेड़ पर तोते बैठे हैं उसे उन पक्षियों को देख उसे लालच हुआ उसने उन सभी तोते को पकड़ने की योजना बनाने लगा। तभी तोते एक साथ गाने लगे शिकारी आएगा जाल बिछाएगा पर हम नहीं जाएंगे। बहेलिया ने जब यह सुना तो आश्चर्यचकित रह गया

उसने इतने समझदार तोते कहीं देखें ही नहीं थे उसने सोचा इन्हे पकड़ना असंभव हैं ये तो प्रशिक्षित तोते लगते हैं। बहेलिया को नींद आ रही थी उसने उसी पेड़ के नीचे अपनी जाल में कुछ अमरूद के टुकड़े डाल कर सो गया, सोचा कि संभवतः कोई लालची और बुद्धू तोता फंस जाएं।

कुछ समय बाद जब वह सोकर उठा तो देखा कि सारे तोते एक साथ गा रहे थे शिकारी आएगा जाल बिछाएगा पर हम नहीं जाएंगे। पर वह यह गीत जाल के अंदर गा रहे थे। शिकारी उन सब बुद्धू तोते की हाल देख हंस पड़ा और सब को पकड़ कर ले गया।

संक्षेप में

हमें किसी भी ज्ञान को रटने की वजाय उसे समझने पर बल देना चाहिए। क्यों कि रटा हुआ ज्ञान विपत्ति पढ़ने पर काम नहीं आता।

Statue of mother sita morality

राम-कथा में माता सीता का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। उनका चरित्र संयमी, साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए प्रेरित करता है। जिससे हर नारी को नैतिकता की शिक्षा मिलती है।

राम की शक्ति सीता जी नारी सशक्तीकरण का उदाहरण हैं। अपूर्व साहस, बल, धैर्य, मातृत्व, पति का सहयोग आदि गुण हमें आज के युग में भी प्रेरणा प्रदान करते हैं।

राम-कथा के अनुसार, मिथिलानगरी में सीरजध्वज जनक नाम के राजा को सीता भूमि को जोतते समय मिली थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी पुत्री स्वीकार किया। सीता में अपूर्व बल और साहस था।

कथा के अनुसार, उन्होंने शिव-जी का धनुष अपने हाथों से उठा लिया था, जिसे देखकर राजा जनक बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने घोषणा करवा दी कि जो भी शिव जी का धनुष तोड़ेगा, उससे ही सीता का विवाह किया जाएगा। जिस धनुष को सीता ने उठा लिया था, उसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा सके। श्रीराम ने उस धनुष को तोड़कर सीता से विवाह किया।

जब श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले चौदह वर्र्षो का वनवास दिया गया, तो सीता जी ने उनके साथ जाने का तत्काल निर्णय लिया। उन्होंने अपने पति को विपत्तियों में नहीं छोड़ा। श्रीराम द्वारा अयोध्या में ही रहने के आग्रह के बाद भी सीता जी ने सभी सुखों को छोड़कर श्रीराम के साथ वन में जाना ही उचित समझा।

यह एक पत्नी का कर्तव्य भी है कि वह पति के सुख-दुख में सहभागी बनें। सीता ने वही किया। आज की कामकाजी महिलाएं घर की आर्थिक स्थिति सुधारने और सशक्त बनने के लिए घर से बाहर निकलती हैं और काम करके पति का सहयोग करती है। सीता जी ने भी महल में रहने का मोह नहीं किया और वे पति के साथ कंकड़ भरे मार्ग पर निकल पड़ीं।

जब रावण ने अपनी माया से उनका हरण कर लिया, तब भी वे हताश-निराश नहीं हुईं। वे मानसिक रूप से इतनी सबल थीं कि तमाम धमकाने और माया का प्रभाव डालने पर भी उनका आत्मविश्वास नहीं डिगा और उन्होंने गलत प्रस्ताव के आगे समर्पण नहीं किया। वे सत्य के साथ ही रहीं। उनका आत्मविश्वास और धैर्य ही था कि अंतत: सत्य की जीत हुई।

सीता जब अपने पुत्रों लव-कुश के संग वाल्मीकि आश्रम में रहीं, वहां उन्होंने बच्चों लव-कुश को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। सीताजी का चरित्र हमें धैर्यवान, साहसी, आत्मविश्वासी और सहयोगी बनने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Where muslim women are a mess hanuman chalisa

देश की राजधानी नई दिल्ली के सर्वधर्म सद्भाव का एक बेहतर उदाहरण देखने को मिलता है। यहां यानी झंडेवालान मंदिर में हर मंगलवार को लगभग 50 मुस्लिम महिलाएं हनुमान चालीसा और श्री राम की आरती और पाठ करती हैं।

वहीं इन महिलाओं ने हनुमान चालीसा और राम आरती का उर्दू में अनुवाद स्वयं ही किया है।

इन महिलाओं का कहना है कि वह इस तरह सांप्रदायिक सद्भाव लाने और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपसी सम्मान की भावना पैदा करने के लिए करते हैं।

हनुमान चालीसा का जाप करने की यह पहल संकट मोचन मंदिर, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और 2006 में वाराणसी छावनी रेलवे स्टेशन पर बम धमाकों की श्रृंखला के बाद शुरू की थी।

यहां कुछ समय तक इस संगठन से जुडें लोगों ने वाराणसी में संकट मोचन मंदिर में हनुमान चालीसा का जाप किया। और, पिछले कुछ वर्षों में ही 35,000 से अधिक हिंदू-मुस्लिम धर्म की महिलाओं के समूह में शामिल हो गए।

Sai baba of shirdi sai stock present some kind of name

कहते हैं कि शिरडी के साईं बाबा को सबसे पहले नीम के पेड़ के नीचे ध्यानमुद्रा में लीन, सबसे पहले शिरडी के गांव में नाना चोपदार की बूढ़ी मां ने देखा था। वह उस समय सोलह वर्ष के थे और ध्यानमुद्रा में लीन थे। उनके मुख मंडल में अनूठा तेज और शांति थी। उन्हें सबसे पहले साईं नाम भगत म्हालसापति ने दिया था।

उनके व्यक्तित्व में एक चुंबकीय आकर्षण था। इस कारण लोगों की दिन-प्रतिदिन उनके बारे में जानने की इच्छा बढ़ती गई तब एक दिन आश्चर्यजनक घटना घटी। एक भक्त को भगवान खण्डोवा का संचार हुआ और वह बहुत खुश हो गया।

उस समय शिरड़ी में कुछ व्यक्तियों ने उससे पूछा कि हे भद्रजन आप यह बताने की कृपा करें की शिरडी में जो बालक ध्यान में लीन है। ये किस पिता की संतान है और शिरडी में कहां से आए हैं?

तब उस भक्त ने कहा कि भगवान खण्डोवा ने एक मुख्य स्थान पर खोदने का आदेश दिया है। लोगों द्वारा उस स्थान को खोदने पर एक बड़ी शिला के नीचे ईंटों के स्तम्भ दिखाई दिए तब उस बड़ी पत्थर की शिला को हटाया गया तो एक लंबी सी कतार का बरांडा दिखाई पड़ा जिसके अंदर एक गुफा थी जिसके चारों कोने पर दीप जल रहे थे। यह एक कमरा था जो तहखाना था।

जब लोगों ने उस बालक से पूछा तो उसने बताया कि यह स्थान उसके गुरु कहा है और लोगों को उस पवित्र स्थान की रक्षा करनी चाहिए। लोगों ने उस स्थान को वही बंद कर दिया। साईं उसी के पास लगे नीम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे। कहते हैं बाबा उस समय अंतध्यान हो गए। दूसरी बार जब साईं बाबा सदा के लिए पधारे तो फिर अपने दीर्ध जीवनकाल में शिरडी छोड़कर कहीं नहीं गए।

उसी समय औरंगाबाद जिले में धूप नाम का एक छोटा सा गांव है। जहां चांद पाटिल ना का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति रहता था। उस समय औरंगाबाद जिला निजाम स्टेट में आता था।

एक बार चांद पाटिल के भाई क लड़के की शादी थी और बारात शिडी आने वाली थी। फकीर उस शादी में अन्य अतिथिगणों के साथ आए। भगत म्हालसापति के खेत के किनारे भगवान खण्डोवा के मंदिर के पास बारात के लोग उतेर।

बैलगाड़ियों से एक-एक करके उतर रहे थे और जब बाबा उतरे तो उन्हें देखते ही भगत म्हालसापति ने उत्साहित हो उनका स्वागत किया और उन्हें साईं कहकर सम्बोधित किया। साईं का अर्थ होता है स्वागत करना। इसके बाद सभी भक्त लोग बाबा को साईं बाबा कहने लगे।

Wednesday, 11 June 2014

Wednesday fast process

क्या आपका मन किसी काम में नहीं लगता? क्या बार- बार किसी काम को करने से हतोत्साहित हो जाते हैं? या फिर व्यापार को लेकर आप हमेशा असंतुष्ठ रहते हैं?

तो इन समस्याओं के छुटकारा पाने के लिए बुधवार का व्रत कर सकते हैं। यह व्रत स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही मंगलदायक होता है। इस व्रत को करने से आपकी बुद्धि में काफी इजाफा हो सकता है।

करें ये उपाय

    सर्वप्रथम नित्यकर्मों से मुक्त होकर बुध देवता के मंत्र से बुध त्वं बुद्धिजनको बोधदः सर्वदा नृणाम्‌। तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नमः॥ उनका ध्यान करें।

    घर के इशान कोण में भगवान शिव या बुध का चित्र या मूर्ति कांस्य के बर्तन में स्थापित करना चाहिए। उनपर बेलपत्र, अक्षत, धूप और दीप जलाकर विधिवत पूजा करनी चाहिए।

    दिन हरे-पीले रंग के शेड वाले कपड़े पहनने चाहिए। पन्ना रत्न धारण करना शुभ होता है। व्रत में हरी वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए। मूंग का हलवा, हरे फल, छोटी इलाइची का विशेष महत्व है।

    दिन के व्रत की पूर्णाहुति सूर्यास्त के बाद एक बार फिर से बुध को धूप, दीप और गुड़, चावल एवं दही के भोग लगाने से होती है।उसके बाद प्रसाद वितरण कर स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए।

    व्रत करने वाले को दिन में एक बार ही नमक रहित भोजन करना चाहिए।

बुधवार का व्रत को विशाखा नक्षत्र में बुधवार के दिन से आरंभ करना चाहिए, जिसे 17 या 21 सप्ताह तक करना चाहिए। इस योग के नहीं मिलने की स्थिति में इस व्रत को किसी भी माह में शुक्ल पक्ष के पहले बुधवार से किया जा सकता है। ब्राह्मणों को भोजन करवाकर यथाशक्ति दान देना चाहिए।

बुधवार व्रत की कथा

कहते हैं समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत धनवान था। मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की सुंदरलड़की संगीता से हुआ था। एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया।

मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा। माता-पिता बोले- 'बेटा, आज बुधवार है। बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते।' लेकिन मधुसूदन नहीं माना। उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को न मानने की बात कही।

दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की। दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया। वहाँ से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की। रास्ते में संगीता को प्यास लगी। मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया।

थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था। संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई। वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई।

मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा 'तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?' मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- 'अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूँ। लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?'

मधुसूदन ने कहा 'तुम जरूर कोई चोर या ठग हो। यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था।' इस पर उस व्यक्ति ने कहा- 'अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो।

संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था। मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है। अब तुम चुपचाप यहाँ से चलते बनो। नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा।'

दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे। उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहाँ एकत्र हो गए। नगर के कुछ सिपाही भी वहाँ आ गए। सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए। सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया। संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी।

राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा। राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा। तभी आकाशवाणी हुई- 'मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया। यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।'

मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि 'हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई। भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा'

मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया। तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया। राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए। भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया।

कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई। बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था। दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए। मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे। इस तरह भगवान बुधदेव की कृपा से उनके यहां खुशियां बरसने लगीं।