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Tuesday, 1 July 2014

If the conduct beautiful mind and body beautiful

बात उन दिनों की है जब भगवान श्रीराम अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान चित्रकूट में थे। भगवान राम एवं माता सीता कुटिया के बाहर बैठे हुए थे।

लक्ष्मणजी उनके चरणों में बैठे थे। तभी श्रीराम ने कहा कि लक्ष्मण यहां आओ मेरे और सीता के बीच एक झगड़ा हो गया है। इसलिए तुम न्याय करो।

लक्ष्मण जी मान गए। तब श्रीराम-' मैं कहता हूं कि मेरे चरण सुंदर हैं। सीता कहती हैं उनके चरण सुंदर हैं। तुम दोनों के चरणों की पूजा करते हो। अब तुम ही फैसला करो कि किसके चरण सुंदर हैं। लक्ष्मणजी बोले आप मुझे इस धर्म संकट में मत डालिए।

तब श्रीराम ने समझाया कि तुम बैरागी हो। निर्भय होकर कहो। किसके चरण सुंदर हैं। राम के चरणों को दिखाते हुए लक्ष्मणजी बोले कि माता, इन चरणों से आपके चरण सुंदर हैं। इतना कहते हुए लक्ष्मण जी चुप हो गए और माता सीता खुश।

इस पर लक्ष्मण जी बोले माता अधिक खुश मत होना। भगवान राम के चरण हैं, तभी आपके चरणों की कीमत है। इनके चरण न हों तो आपके चरण सुंदर नहीं लग सकते। रामजी खुश हो गए।

तब लक्ष्मणजी फिर बोले कि आप दोनों को खुश होने की जरूरत नहीं। आप दोनों के चरणों के अलावा भी एक चरण हैं जिसके कारण ही आपके चरणों की पूजा होती है यानी आचरण। आचरण की कोई कीमत नहीं। महराज, आपके चरण सुंदर हैं तो उसका कारण आपका महान आचरण है।

संक्षेप में

यदि व्यक्ति के आचरण अच्छे हों तो उसका तन और मन दोनों ही सुंदर होता है और वह संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाता है।

Tuesday, 24 June 2014

Eagle and serpent was mainly because of the hostility

अमूमन यह प्रश्न सदियों से उठता आ रहा है कि नागों की उत्पत्ति कैसे हुई। नाग और गरुड़ के बीच मतभेद सदियों से चला आ रहा है। दरअसल नागों के बारे में भागवत् पुराण में विस्तृत लेख मिलता है।

कहते हैं कि कश्यप ऋर्षि की दो पत्नियां थीं। एक का नाम बनिता और दूसरी पत्नी का नाम कद्रू था। एक बार कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों पत्नियों से वर मांगने को कहा। कद्रू ने एक हजार वीर नागों की माता होनें का वर मांगा और बनिता ने एक वर से दो पुत्र मांगे जो बाद में अरूण और गरुण के नाम से प्रसिद्ध हुए।

नागों की मां कद्रू को धरती का प्रतीक माना जाता है। गरुड़ और अरुण की मां बनिता को स्वर्ग की देवी माना जाता है।

एक दिन कश्यप दोनों पत्नियों में इस बात पर विवाद खड़ा हो गया कि सूर्य के अश्व श्यामवर्ण के हैं या श्वेत। बनिता ने उनका रंग श्वेत बताया, पर कद्रू नहीं मानीं। वह एक ही रट लगाए हुए थी कि अश्व श्याम वर्ण के हैं। बनिता ने आखिरी शर्त लगा दी कि अगर अश्वों का रंग श्वेत हुआ तो तुम और तुम्हारे पुत्र हमारे दास रहेगें। कद्रू ने स्वीकार कर लिया।

शाम हुई। जब कद्रू ने अपने पुत्रों से इसकी चर्चा की तब शेषनाग को छोड़कर शेष सभी पुत्रों ने कहा कि मां तुम चिंता मत करो। हम लोग जाकर अश्वों से लिपट जाएंगे जिससे वे दूर से श्यामवर्ण के दिखाई देने लगेंगे। यह बात सुनकर कद्रू प्रसन्न हो गई।

परंतु बाद में बनिता को यह भेद पता चल गया और तभी से गरुण और नागों की दुश्मनी चली आ रही है।

Wednesday, 18 June 2014

God is everywhere just need to find

एक धार्मिक व्यक्ति था। भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा थी। उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी। एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से कहा-भगवान मुझसे बात करो, और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना।

इसलिए इस बार वह जोर से चिल्लाया और आकाश में घटाएं उमङ़ने लगी, बादलो की गड़गडाहट होने लगी लेकिन आदमी ने कुछ नहीं सुना। उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर- नीचे सब तरफ देखा और बोला, भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा।

पर उसने नहीं देखा आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ तभी एक शिशु का जन्म हुआ और उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया।

अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा 'भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहां हो,मेरे पास हो,मेरे साथ हो और एक तितिली उड़ते हुए आकर उसके हथेली पर बैठ गई।

लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया, और उदास मन से आगे चला गया। भगवान इतने सारे रूपो में उसके सामने आए इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी।

संक्षेप में

ईश्वर हर जगह है। वह अपने तरीके से आते हैं और हम अपने तरीके से देखते हैं। हर जगह हर पल उन्हें महसूस करना चाहिए।

Source: Spirituality News & Hindi Rashifal 2014

Thursday, 12 June 2014

Statue of mother sita morality

राम-कथा में माता सीता का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। उनका चरित्र संयमी, साहसी और आत्मविश्वासी बनने के लिए प्रेरित करता है। जिससे हर नारी को नैतिकता की शिक्षा मिलती है।

राम की शक्ति सीता जी नारी सशक्तीकरण का उदाहरण हैं। अपूर्व साहस, बल, धैर्य, मातृत्व, पति का सहयोग आदि गुण हमें आज के युग में भी प्रेरणा प्रदान करते हैं।

राम-कथा के अनुसार, मिथिलानगरी में सीरजध्वज जनक नाम के राजा को सीता भूमि को जोतते समय मिली थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी पुत्री स्वीकार किया। सीता में अपूर्व बल और साहस था।

कथा के अनुसार, उन्होंने शिव-जी का धनुष अपने हाथों से उठा लिया था, जिसे देखकर राजा जनक बहुत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने घोषणा करवा दी कि जो भी शिव जी का धनुष तोड़ेगा, उससे ही सीता का विवाह किया जाएगा। जिस धनुष को सीता ने उठा लिया था, उसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा सके। श्रीराम ने उस धनुष को तोड़कर सीता से विवाह किया।

जब श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले चौदह वर्र्षो का वनवास दिया गया, तो सीता जी ने उनके साथ जाने का तत्काल निर्णय लिया। उन्होंने अपने पति को विपत्तियों में नहीं छोड़ा। श्रीराम द्वारा अयोध्या में ही रहने के आग्रह के बाद भी सीता जी ने सभी सुखों को छोड़कर श्रीराम के साथ वन में जाना ही उचित समझा।

यह एक पत्नी का कर्तव्य भी है कि वह पति के सुख-दुख में सहभागी बनें। सीता ने वही किया। आज की कामकाजी महिलाएं घर की आर्थिक स्थिति सुधारने और सशक्त बनने के लिए घर से बाहर निकलती हैं और काम करके पति का सहयोग करती है। सीता जी ने भी महल में रहने का मोह नहीं किया और वे पति के साथ कंकड़ भरे मार्ग पर निकल पड़ीं।

जब रावण ने अपनी माया से उनका हरण कर लिया, तब भी वे हताश-निराश नहीं हुईं। वे मानसिक रूप से इतनी सबल थीं कि तमाम धमकाने और माया का प्रभाव डालने पर भी उनका आत्मविश्वास नहीं डिगा और उन्होंने गलत प्रस्ताव के आगे समर्पण नहीं किया। वे सत्य के साथ ही रहीं। उनका आत्मविश्वास और धैर्य ही था कि अंतत: सत्य की जीत हुई।

सीता जब अपने पुत्रों लव-कुश के संग वाल्मीकि आश्रम में रहीं, वहां उन्होंने बच्चों लव-कुश को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। सीताजी का चरित्र हमें धैर्यवान, साहसी, आत्मविश्वासी और सहयोगी बनने की प्रेरणा प्रदान करता है।

Wednesday, 11 June 2014

Wednesday fast process

क्या आपका मन किसी काम में नहीं लगता? क्या बार- बार किसी काम को करने से हतोत्साहित हो जाते हैं? या फिर व्यापार को लेकर आप हमेशा असंतुष्ठ रहते हैं?

तो इन समस्याओं के छुटकारा पाने के लिए बुधवार का व्रत कर सकते हैं। यह व्रत स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही मंगलदायक होता है। इस व्रत को करने से आपकी बुद्धि में काफी इजाफा हो सकता है।

करें ये उपाय

    सर्वप्रथम नित्यकर्मों से मुक्त होकर बुध देवता के मंत्र से बुध त्वं बुद्धिजनको बोधदः सर्वदा नृणाम्‌। तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नमः॥ उनका ध्यान करें।

    घर के इशान कोण में भगवान शिव या बुध का चित्र या मूर्ति कांस्य के बर्तन में स्थापित करना चाहिए। उनपर बेलपत्र, अक्षत, धूप और दीप जलाकर विधिवत पूजा करनी चाहिए।

    दिन हरे-पीले रंग के शेड वाले कपड़े पहनने चाहिए। पन्ना रत्न धारण करना शुभ होता है। व्रत में हरी वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए। मूंग का हलवा, हरे फल, छोटी इलाइची का विशेष महत्व है।

    दिन के व्रत की पूर्णाहुति सूर्यास्त के बाद एक बार फिर से बुध को धूप, दीप और गुड़, चावल एवं दही के भोग लगाने से होती है।उसके बाद प्रसाद वितरण कर स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए।

    व्रत करने वाले को दिन में एक बार ही नमक रहित भोजन करना चाहिए।

बुधवार का व्रत को विशाखा नक्षत्र में बुधवार के दिन से आरंभ करना चाहिए, जिसे 17 या 21 सप्ताह तक करना चाहिए। इस योग के नहीं मिलने की स्थिति में इस व्रत को किसी भी माह में शुक्ल पक्ष के पहले बुधवार से किया जा सकता है। ब्राह्मणों को भोजन करवाकर यथाशक्ति दान देना चाहिए।

बुधवार व्रत की कथा

कहते हैं समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत धनवान था। मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की सुंदरलड़की संगीता से हुआ था। एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया।

मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा। माता-पिता बोले- 'बेटा, आज बुधवार है। बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते।' लेकिन मधुसूदन नहीं माना। उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को न मानने की बात कही।

दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की। दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया। वहाँ से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की। रास्ते में संगीता को प्यास लगी। मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया।

थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था। संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई। वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई।

मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा 'तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?' मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- 'अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूँ। लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?'

मधुसूदन ने कहा 'तुम जरूर कोई चोर या ठग हो। यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था।' इस पर उस व्यक्ति ने कहा- 'अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो।

संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था। मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है। अब तुम चुपचाप यहाँ से चलते बनो। नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा।'

दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे। उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहाँ एकत्र हो गए। नगर के कुछ सिपाही भी वहाँ आ गए। सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए। सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया। संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी।

राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा। राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा। तभी आकाशवाणी हुई- 'मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया। यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।'

मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि 'हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई। भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा'

मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया। तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया। राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए। भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया।

कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई। बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था। दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए। मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे। इस तरह भगवान बुधदेव की कृपा से उनके यहां खुशियां बरसने लगीं।

Thursday, 5 June 2014

Learn to balance the mood of the boss

कहते हैं नौकरी पेंसिल की उस नोक की तरह होती है। जहां आप अगर खड़े हों तो फिसलने का डर हमेशा लगा रहता है। किसी भी नौकरी में आपके बॉस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर अपने बॉस का स्वभाव जान जाएं तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।

ज्योतिष में राशिफल के अनुसार बॉस के व्यवहार को परख सकते हैं। अहमदाबाद के ज्योतिर्विद व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि हर किसी का व्यवहार राशियों के अनुसार रहता है फिर चाहे वो आपका बॉस ही क्यो न हो? इसलिए आप अपने बॉस के नाम की राशि के अनुसार उनके व्यवहार को परख सकते हैं।

    मेष और वृश्चिक राशि को बॉस बड़े मजाकिया किंतु अनुशासित प्रकृति होते हैं। अपनी प्रशंसा सुनना संगीत नाटक व राजनीति में इनकी अधिक रूचि होती है। वृषभ व तुला राशि से इनका तालमेल कम होता है। ये जल्दी आवेश में आ जाते हैं और आक्रमक हो जाते हैं। इनसे बहुत ही प्यार से बोलकर काम निकालना आसान होता है।

    वृषभ व तुला राशि के बॉस स्वप्नलोक में विचरण करने वाले या कल्पनाशील प्रकृति के होते हैं। इनका स्वभाव जिद्दी अड़िअल किंतू नरम स्वभाव का होता है। एक बार कह दें तो यह वादा निभाना जानते हैं। प्यार में अक्सर धोखा खाते है। ऐसे बॉस अच्छे कवि, लेखक, सौंद्रर्य प्रेमी, दयालू और धार्मिक प्रकृति के होते हैं। किंतु वृश्चिक मिथुन राशि से नही बनती है। इनके शौक की प्रशंशा करते रहिए। यह इनकी कमजोरी है।

    मिथुन और कन्या राशि के बॉस गंभीर विचारशील प्रकृति के होते हैं। यह सहज व सरल किंतू अपने हित की पहले सोचने वाले होते हैं। ये पहले सोचते हैं फिर काम करते हैं। खिलाड़ी प्रकृति के होते हैं। प्यार में अक्सर सफल रहते हैं। अनुशासित व्यक्तित्व होता है। इनके ज्ञान व काम करने की प्रशंसा ये आप पर मेहरबान रहेंगे।

    कर्क राशि के जातक चालक परंतु भावुक होते हैं। इनका मन ईश्वर में लगा रहता है पर दिखावा पसंद करते हैं। इनको किसी पर भरोसा नहीं होता है। हर बार हर चीज को शंका से देखना इनकी फितरत में होता है । इसी स्वभाव से इनके आपसी संबध मजबूत नहीं रहते। इनके दुख में शामिल होकर आप इनको प्रभावित कर सकते हैं।

    सिंह राशि के व्यक्ति तेजस्वी ज्ञानी अनुशासित एवं नीति पर चलने वाले पारिवारिक किस्म के न्याय प्रिय होते हैं। दिल के साफ एवं ईमानदार मित्रता निभाना इनको बहुत आता है। तुला कुंभ मकर राशि से कम बनती। इनके साथ ईमानदारी से स्पष्ट बात कीजिए। चापलूसी इनको पसंद नहीं। कितु नास्तिक प्रकृति के होते हैं।

    धनु और मीन राशि के व्यक्ति संवेदनशील भावुक और धार्मिक प्रकृति के होते हैं। इसलिए अतिविश्वास पर बार- बार धोखा खाना नसीब में प्यार में धोखा खाते हैं। यह आस्तिक होते हैं और धर्म को मानते हैं। इनके साथ खुले मन के साथ बात कीजिए घुल- मिल जाएंगे। इनकी धार्मिक लोगों से बनती है।

    मकर और कुंभ राशि वाले व्यक्ति अनुशासित व्यक्ति होते हैं। संघर्ष करना और जीतना इन्हें पसंद है। अंदर से यह भावुक व दयालू होते हैं। बाहर से सख्त होने का दिखावा करते हैं। प्यार में ठोकर खाना बार-बार नसीब में होता है। दोस्ती निभाना इन्हें आती है। दिल की बात दोस्तों के साथ खुलकर करना और सभी तरह के शौक पूरा करना इनका स्वभाव होता है।

Source: Spiritual Hindi Stories & Rashifal Hindi 2014

Live today as if he is not to touch relive the tension

एक बुनियादी स्तर पर, मनुष्य होने के नाते हम सब एक समान हैं, हम में से हर एक सुख की आकांक्षा रखता है और हम में से प्रत्येक दुख नहीं झेलना चाहता। आज, बढ़ती मान्यता, साथ ही ठोस वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो हमारी चित्त की स्थिति और सुख के बीच घनिष्ठ संबंध की पुष्टि करता है।

एक ओर हममें से कई ऐसे समाजों में रहते हैं जो भौतिक रूप से बहुत विकसित हैं, पर फिर भी हमारे बीच कई ऐसे हैं जो बहुत सुखी नहीं हैं। समृद्धि के सुन्दर धरातल के नीचे एक प्रकार की मानसिक अशांति है, जो निराशा, अनावश्यक झगड़े, नशीली दवाइयों या शराब पर निर्भरता, और सबसे बुरी स्थिति में आत्महत्या है।

ऐसी कोई गारंटी नहीं है कि केवल धन आपको आनंद अथवा जो तृप्ति आप चाहते हैं वह दे सकता है। यही आपके मित्रों के संबंध में भी कहा जा सकता है। जब आप क्रोध या घृणा की एक तीव्र अवस्था में होते हैं तो एक बहुत अंतरंग मित्र भी आपको एक प्रकार से ठंढा, सर्द, अलग और कष्टदायी प्रतीत हो सकता है।

परन्तु, मनुष्य के रूप में हमें यह अद्भुत मानव बुद्धि की भेंट मिली है। इसके अतिरिक्त, सभी मनुष्यों में दृढ़ संकल्प और उस दृढ़ता को वे जिस किसी दिशा में चाहें निर्धारित करने की क्षमता होती है। जब तक हम यह स्मरण रखें कि हमारे पास मानव बुद्धि की अनोखी भेंट है और दृढ़ता के विकास की क्षमता है और उसका उपयोग सकारात्मक ढंग से करते हैं, हम अपने अंतर्निहित मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कर पाएंगे।

यह अनुभव कि हममें यह महान मानव क्षमता है हमें आधारभूत शक्ति देता है। यह मान्यता ऐसे तंत्र के रूप में कार्य कर सकती है जो हमें बिना आशा खोए अथवा कम आत्म सम्मान की भावना में डूबे, किसी भी कठिनाई से निपटने के लिए क्षमता प्रदान करती है, फिर चाहे हम किसी भी प्रकार की परिस्थिति का सामना क्यों न कर रहे हों।

मैं एक ऐसे व्यक्ति के रूप में यह लिख रहा हूँ जिसने 16 वर्ष की आयु में अपनी स्वतंत्रता खो दी, तत्पश्चात 24 वर्ष की आयु में अपना देश खो दिया। परिणामस्वरूप मैं 50 वर्ष से अधिक निर्वासन में रहा हूं जिस दौरान हम तिब्बतियों ने तिब्बती अस्तित्व को जीवित रखने और हमारी संस्कृति और मूल्यों के संरक्षण के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया है। अधिकांश दिनों में तिब्बत से आ रहे समाचार हृदयविदारक होते हैं पर फिर भी इन में से किसी भी प्रकार की चुनौतियां हार मानने का आधार नहीं देती। एक दृष्टिकोण जो मैं निजी तौर पर लाभदायक मानता हूं। वह इस विचार को विकसित करना है।

यदि कोई स्थिति अथवा समस्या ऐसी है जिसका समाधान है, तो उसको लेकर चिंता की कोई आवश्यकता नहीं। दूसरे शब्दों में, यदि कठिनाई से निकलने का कोई समाधान अथवा मार्ग है तो आपको उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। उचित कार्य उसके समाधान को ढूंढना है।

एक यथार्थवादी दृष्टिकोण लेते हुए और एक उचित प्रेरणा का विकास करते हुए भी आप अपने को भय और चिंता की भावनाओं के विरुद्ध बचा सकते हैं। यदि आप एक शुद्ध और सच्ची प्रेरणा का विकास करें, यदि आप दया, करुणा ,और सम्मान के आधार पर सहायता करने की इच्छा से प्रेरित हैं , तो आप कम भय अथवा चिंता के साथ और अधिक प्रभावी ढंग से किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार का कार्य कर सकते हैं तथा इस प्रकार का भय नहीं होता कि दूसरे आप के विषय में क्या सोचेंगे या क्या आप अंततः अपने लक्ष्य में सफल हो पाएंगे ।

यदि आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल भी हो गए तो आप यह सोचकर अच्छा अनुभव कर सकते हैं कि आपने प्रयास किया । पर एक बुरा प्रेरणी के साथ, लोग आप की प्रशंसा कर सकते हैं या आपलक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं , पर फिर भी आप सुखी नहीं होंगे ।

एक बौद्ध भिक्षु के रूप में मैंने सीखा है कि जो मुख्यतः हमारे आंतरिक शांति को भंग करते हैं वे क्लेश हैं। वे सभी विचार, भावनाएं और मानसिक स्तर जो एक नकारात्मक अथवा करुणाहीन चित्त की स्थिति को प्रतिबिम्बित करते हैं। आंतरिक शांति की हमारी अनुभूति को दुर्बल कर देते हैं। हमारे सभी नकारात्मक विचार और भावनाएँ - जैसे घृणा, क्रोध, अहंकार, वासना, लालच, ईर्ष्या इत्यादि कठिनाइयों के स्रोत परेशान करने वाले माने जाते हैं।

नकारात्मक विचार तथा भावनाएं सुखी रहने और दुख से बचने की हमारी सबसे आधारभूत प्रेरणा को बाधित करते हैं। जब हम उनके प्रभाव में कार्य करते हैं, तो हम दूसरों पर अपने कार्यों के प्रभाव को लेकर अनजान बन जाते हैं : इस तरह वे हमारे दूसरों के प्रति और स्वयं अपने प्रति विनाशकारी व्यवहार का कारण हैं। हत्या, घोटाले और छल सभी का उद्भव क्लेशों से होता है।

यह अनिवार्य रूप से इस प्रश्न को जन्म देता है- क्या हम चित्त का शोधन कर सकते हैं? ऐसा करने के कई उपाय हैं। इनमें, बौद्ध परंपरा में, चित्त शोधन कहलाया जाने वाला विशेष निर्देश है जो दूसरों के प्रति चिंता के विकास तथा कठिन परिस्थितियों को लाभ की ओर मोड़ने पर केंद्रित है। विचारों का यह रूप, समस्याओं को सुख में परिवर्तित करने की, ने तिब्बतियों को कठिन परिस्थितियों में भी अपनी गरिमा और उत्साह बनाए रखने में सक्षम किया है। निस्संदेह अपने जीवन में मुझे यह सुझाव व्यावहारिक रूप से लाभकर लगा है।

चित्त शोधन के एक बड़े आचार्य ने एक बार टिप्पणी की कि चित्त का सबसे अनोखे गुणों में से एक यह है कि उसे परिवर्तित किया जा सकता है। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि जो अपने चित्त शोधन का प्रयास करते हैं, वे अपने क्लेशों पर काबू पाते हैं और आंतरिक शांति की भावना प्राप्त करते हैं और समय रहते लोगों और घटनाओं के प्रति अपने मानसिक दृष्टिकोण और प्रतिक्रियाओं में परिवर्तन पाएंगे।

उनके चित्त और अधिक अनुशासित और सकारात्मक हो जाएंगे। और मेरा विश्वास है कि वे जैसे ही दूसरों के अधिक सुख के लिए योगदान देंगे वे अपनी सुख की भावना को बढ़ता पाएंगे। मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रत्येक जो इसे अपना लक्ष्य बनाएगा उसे सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होगा।

( यह लेख बौद्ध धर्मगुरू दलाईलामा की ऑफिशियल वेबसाइट से लिया गया है।)

Monday, 2 June 2014

Pleasant way to live life

खुश और चिड़चिड़े लोगों की जिंदगियां अलग नहीं होती हैं बल्कि उनका जिंदगी को देखने का नजरिया अलग होता है। किसी भी व्यक्ति के व्यवहार से इस बात का अंदाज हो जाता है कि वह अपनी जिंदगी को कितना महत्वपूर्ण मानता है।

कुछ लोग जीवन में हर चयन को लेकर बहुत सावधान होते हैं क्योंकि वे अपने जीवन को तमाम चीजों से अधिक महत्व देते हैं। ऐसे खुशमिजाज लोगों की कुछ सामान्य आदतों पर गौर करके प्रेरणा पाई जा सकती है।

    वे स्वयं को दूसरों की तरह बनाने के फेर में नहीं पड़ते। वे दूसरों के नहीं अपने प्रति ही उत्तरदायी होते हैं। उन्हें इस बात की प्रतीक्षा नहीं होती कि कोई उनकी तारीफ करेगा तभी वे जिंदगी को उस तरह से जिएंगे। वह न आलोचना से डरते हैं और न प्रशंसा से अपना रास्ता बदलते हैं।

    वे कोई भी काम इसलिए करते हैं क्योंकि वह उन्हें पसंद होता है। वे किसी भी काम को ढोते नहीं हैं। किसी भी दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण के मुकाबले वे खुद की दृष्टि को प्राथमिकता देते हैं। अपने अनुभवों के अनुरूप ही अपने निर्णय लेते हैं।

    वे अपने दोस्तों से प्यार करते हैं और उनकी सोहबत पसंद करते हैं लेकिन वे उन पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं होते। वे इस बात से परिचित होते हैं कि जब दोस्ती में अपेक्षा जगह बनाने लगती है तो फिर संबंध पहले की तरह नहीं रह जाते हैं।

    जब भी आप उनसे पूछें कि वे क्या कर रहे हैं तो वे अपने काम से संबंधित जवाब नहीं देते बल्कि उस रोमांच के बारे में बात करते हैं जिसे वे जी रहे होते हैं। वे आपको उन जगहों के बारे में बताते हैं जहां वे जाने वाले होते हैं या फिर जहां के रोमांचक अनुभव से गदगद होते हैं। वे पेशे से इतर बात करते ही मिलेंगे।

    वे किसी समुदाय या धर्म से बंधे नहीं होते और अपनी फिलॉसफी से जिंदगी जीते हैं। वे बंधे-बंधाए विचार के बजाय अपने अनुभवों से जिंदगी को देखते और तराशते हैं।

    चीजों के लेकर इस तरह के लोगों के मन में डर नहीं होता। वे जानते हैं कि चीजें समय के साथ बदलेंगी और वे इस बदलाव से अवगत होते हैं। वे चीजों को निराशा के भाव से नहीं उम्मीद से देखते हैं और बदलावों का स्वागत करते हैं।

    इस दुनिया को वे एक आकर्षक नाट्यमंच की तरह देखते हैं जहां वे एक पात्र की भांति हैं और हर घटना को पूरी तरह जीते हैं। वे सिर्फ एक ही चीज से बंधकर जिंदगी पूरी नहीं बिताते बल्कि अपनी रुचियों को विस्तार देने में भी कामयाब होते हैं।

    वे मौजूदा क्षण को जीते हैं लेकिन भविष्य को लेकर उनके पास कुछ सपने जरूर होते हैं। हालांकि वे सपनों के पीछे भागते नहीं लेकिन सहज रूप में उन्हें पूरा करने की कोशिश करते हैं। सपनों और महत्वाकांक्षाओं के बीच के फर्क से भलीभांति परिचित होते हैं।

    वे दूसरों को बदलने की कोशिश में नहीं रहते बल्कि इस बात को सीखने का प्रयास करते हैं कि उनके साथ निबाह कैसे किया जाए। वे मानते हैं कि लोग किसी के कहने से नहीं बल्कि अपनी जरूरतों और अपने अनुभवों से ही बदलते हैं।

Source: Spiritual Hindi News & Rashifal 2014

If you are not a prisoner of its ease anywhere

व्यक्ति अपने लिए आरामदायक सहजता तलाशता है लेकिन इस सहजता की आदत मुश्किल में डाल सकती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने पर आप बदलावों के साथ कदमताल में पिछड़ जाते हैं।

कहते हैं, 'एक जहाज किनारे पर सबसे सुरक्षित होता है लेकिन जहाज सिर्फ किनारे पर खड़ा रहने के लिए नहीं बनाया जाता है। अक्सर लोग अपनी जिंदगी में बदलाव के सवाल से जूझते हैं। वे खुद को अपनी मौजूदा स्थितियों में संतुष्ट नहीं पा रहे होते हैं लेकिन बदलाव के लिए उनके भीतर पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती है या कहें वे खुद को एक कम्फर्ट जोन में पाते हैं और उससे बाहर नहीं निकल पाते हैं।

ये लोग अपनी जिंदगी में बदलाव करने से हिचकते हैं। उन्हें असुरक्षा का डर सताता है। वे जिस तरह सहज स्थितियों के आदी हो जाते हैं उनसे बाहर निकलना भी उनके लिए कठिनाई पैदा करता है। अधिकांश लोगों के साथ यह भी होता है कि अपने लिए नई संभावनाएं तलाशते हुए वे खुद से बहुत सवाल पूछने लगते हैं और जब अपने ही सवालों के उत्तर नहीं दे पाते हैं तो अपने कम्फर्ट जोन से भी बाहर नहीं निकल पाते हैं।

ऐसे में तात्कालिक रूप से तो लगता है कि राहत है लेकिन लंबे समय में कम्फर्ट जोन से बाहर नहीं निकलना आपके लिए नया सीखने के सारे दरवाजे बंद कर देता है। लंबे समय तक अगर आप सहज स्थिति से बाहर निकलने की कोई कोशिश नहीं करते हैं तो चुनौतियों के लिए की जाने वाली तैयारियों में भी पिछड़ जाते हैं। जब आप लंबे समय इस सहजता की आदत लगा बैठते हैं तो जीवन में नई संभावनाओं की तरफ कदम नहीं बढ़ा पाते हैं।

कार्ल सेंडबर्ग ने एक बार कहा था, 'मेरे भीतर एक बाज है जो ऊंची उड़ान चाहता है लेकिन मेरे भीतर ही एक हिप्पोपोटेमस भी है जो कीचड़ में पड़ा रहना चाहता है।" मनुष्य के भीतर दोनों ही तरह के भाव होते हैं जिनकी कश्मकश चलती रहती है। जो लोग संभावनाओं की ओर खुद को प्रेरित कर पाते हैं वे जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने का डर मनुष्य के सबसे आम डरों में से है।

कम्फर्ट जोन क्यों?

    आप अपनी सहजता के दायरे में इसलिए भी बने रहते हैं क्योंकि आपको लगता है कि इससे बाहर निकलने पर आप असफल हो सकते हैं।

    अपनी सहज दुनिया से बाहर के लोगों और जगहों से संवाद की अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं रहता। लगता है कि आपमें वो बात नहीं है।

    बाहर की बदलती दुनिया को अपने स्वभाव के विपरीत पाते हैं और उसी जगह बने रहना चाहते हैं जहां मौजूदा समय में हैं।

    नई चुनौतियों या प्रयोगधर्मिता के प्रति शुरू से आपका रुझान नहीं रहा और तय फॉर्मेट में ज्यादा खुशी महसूस करते हैं।

    असुरक्षा का भय सताता है और नकारात्मकता की तरफ अधिक ध्यान देने की आदत के कारण भी अपनी तय दुनिया में ही बना रहना ठीक समझते हैं।

अपने कम्फर्ट जोन से आगे बढ़ते हुए खुद से कहें आप सबकुछ नहीं पा सकते जीवन में जब भी आप संभावनाओं को देखते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपके भीतर एक द्वंद्व पैदा होता है और आपको वर्षों से जमी जमाई चीजों से बाहर निकलने में कुछ छूटने का एहसास होने लगता है।

लेकिन जब तक आप कुछ छोड़ेंगे नहीं, नई चीजों के लिए जगह कैसे बनेगी। नई संभावनाओं को पाने के लिए पुरानी आशंकाओं से मुक्त होना जरूरी है। जब तक पिछले समय के बारे में सोचते रहेंगे आपके कदम आगे की ओर नहीं बढ़ेंगे।

कुछ मिनटों में फैसला करें

जब आप अपने मन का काम करने का निर्णय लेते हैं तो उसका फैसला करने में आपको कुछ ही सेकंड लगते हैं। जब आप अपने निर्णय पर पहुंच जाते हैं तो फिर दूसरों को भी उससे अवगत करा देते हैं कि अब आप क्या करना चाहते हैं। अगर आपने अपने मन में पक्का इरादा कर लिया है तो फिर फैसला लेने में देर नहीं लगती है और फिर आप चीजों के बारे में बहुत नहीं सोचते हैं।

अनिश्चितताओं को अपनाएं

भले ही आप इसके लिए तैयार हों या न हों लेकिन अनिश्चितताएं जीवन का हिस्सा हैं। या तो हम आने वाली चीजों के प्रति नकारात्मक भाव से सोच सकते हैं या फिर उनकी तरफ बहुत सकारात्मक तरीके से बढ़ सकते हैं। यह सहज वृत्ति होती है कि व्यक्ति नकारात्मकता से ज्यादा चिंतित होता है और अधिक सतर्क भी और इसलिए वह उसके निर्णयों को ज्यादा प्रभावित भी करती है। लेकिन अगर आप यह मान लें कि जीवन में अनिश्चितता सभी दूर है तो आपको आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।

दूसरों का नहीं, अपना सोचें

अक्सर हम कम्फर्ट जोन से निकलने से पहले यही सोचते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे और इसलिए कोई भी साहसिक कदम नहीं उठा पाते हैं। असल में दूसरों के बारे में सोचते हुए हम खुद को कमजोर कर लेते हैं। ऐसे मौकों पर यह जरूरी है कि सिर्फ अपने बारे में सोचा जाए।

यह न सोचें कि दूसरे आपको लेकर क्या बातें करेंगे। ऐसे समय अपनी संभावना को सोचें। जब भी हम किसी फैसले की घड़ी में होते हैं तो अक्सर थोड़े नर्वस और चिंतित होते हैं और ऐसे भावुक और कमजोर क्षणों में अक्सर सहजता जीत जाती है। थोड़ी भी अतिरिक्त चिंता हमें कमजोर कर देती है और हम आगे नहीं जा पाते हैं।

पैसा सबकुछ नहीं को विचारें

अक्सर कुछ लोग अपनी दुनिया से यह कहते हुए भी बाहर नहीं निकलते हैं कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता। यह सच है कि पैसा सबकुछ नहीं होता लेकिन नई चीजों को सीखना आपके जीवन के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होता है। एक ही दुनिया में रहते हुए आप बदलाव के साथ कदमताल नहीं कर पाते हैं। जब आपकी सहज दुनिया के भीतर ही कुछ समय बाद चीजें बदलती हैं तो आप खुद को पिछड़ा महसूस करते हैं। इसलिए पैसे के लिहाज से नहीं बल्कि सीखने की संभावनाओं को देखें।

रोज आएं कम्फर्ट से बाहर

    नई तरह का संगीत सुनें- अगर आप संगीत के शौकीन हैं तो एक ही तरह के गीत सुनने के बजाय नई तरह का संगीत सुनें जो आपको अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने में मदद करेगा।

    खाने में कुछ नया प्रयोग करें- हर सप्ताह या हर महीने में किसी नई रेसिपी को लेकर प्रयोग कर सकते हैं। यह बहुत ही रोमांचक अनुभव बन सकता है।

कुछ नया पढ़ें- आपके मित्र आपके पढ़ने को लेकर एक धारणा बनाकर चलते हैं और ऐसे में आपको कुछ नए विषयों को आजमाना चाहिए। यह आपको नए विचार भी देगा।

नए रास्ते तलाशें- अक्सर दफ्तर से घर लौटते हुए अगर आप एक ही रूट से आते हैं तो कभी-कभार रास्ता बदलकर देखना चाहिए। कभी व्हीकल बदलना भी मजेदार अनुभव दिला सकता है।
 

Thursday, 22 May 2014

How to awaken the kundalini

कुंडलिनी जाग्रत करने का अर्थ है मनुष्य को प्राप्त महानशक्ति को जाग्रत करना। यह शक्ति सभी मनुष्यों में सुप्त (सोई हुई) पड़ी रहती है। कुण्डली शक्ति उस ऊर्जा का नाम है जो हर मनुष्य में जन्मजात पाई जाती है।

यह शक्ति बिना किसी भेदभाव के हर मनुष्य को प्राप्त है। इसे जगाने के लिए प्रयास या साधना करनी पड़ती है। ठीक उसी तरह जिस प्रकार एक बीज में वृक्ष बनने की शक्ति या क्षमता होती है। हर मनुष्य में शक्तिशाली बनने की क्षमता होती है।

कुंडली जाग्रत करने के लिए साधक को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्तर पर साधना करनी पड़ती है। जप, तप, व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, योग आदि के माध्यम से साधक अपनी शारीरिक एवं मानसिक, अशुद्धियों, कमियों और बुराइयों को दूर कर सोई पड़ी शक्तियों को जगाता है।

योग और अध्यात्म की भाषा में इस कुंडलीनी शक्ति का निवास रीढ़ की हड्डी के समानांतर स्थित छ: चक्रों में माना गया है। कोई जीव उन शक्ति केंद्रों तक पहुंच सकता है। इन छ: अवरोधों को आध्यात्मिक भाषा में षट्-चक्र कहते हैं।

ये चक्र क्रमशः मूलधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र, आज्ञाचक्र। साधक क्रमश: एक-एक चक्र को जाग्रत करते हुए। अंतिम आज्ञाचक्र तक पहुंचता है। मूलाधार चक्र से प्रारंभ होकर आज्ञाचक्र तक की सफलतम यात्रा ही कुण्डलिनी जाग्रत करना कहलाता है।

    मूलाधार चक्रः यह गुदा और लिंग के बीच चार पंखुड़ी वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। यहां वीरता और आनन्द भाव का निवास है ।

    स्वाधिष्ठानः यह चक्र इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुड़ी हैं । इसके जाग्रत होने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है ।

    मणिपूर चक्रः नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । यह प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, आदि जमा रहते हैं ।

    अनाहत चक्रः हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है। यह सोता रहे तो कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता, मोह, दम्भ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा। जागृत होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे ।

    विशुद्धख्य चक्रः कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुड़ी वाला है। यहां सोलह कलाएं विद्यमान हैं।

    आज्ञाचक्रः भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, इस आज्ञा चक्र जाग्रत होने से यह सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं ।

    सहस्रार चक्रः सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है। यहां से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।

Why spend consumed

तिलक धारण करने के पहले भस्म लगाने की परंपरा है। क्योंकि भस्म में दुर्गंध नाशक और मन को उत्तेजित करने वाले अनेक रासायनिक घटक होते हैं। इससे शरीर की सुंदरता और तेजस्विता बढ़ जाती है।

भस्म लेपन से शरीर के रंध्र बंद हो जाते है ऐसी गलतफमियां लोगों में काफी प्रचारित हैं। वास्तविकता स्थिति से अलग है।

दरअसल भस्म में शरीर के अंदर स्थित दूषित द्वव्य सोख लेने की क्षमता होती है। इस कारण शरीर के संधि, कपाल, छाती के दोनों हिस्से तथा पीठ आदि पर भस्म लेपन करने से कई तरह के चर्म रोग नहीं होते हैं।

शरीर पर भस्म लगाते समय पारंपरिक विविध मंत्रों का उच्चारण भी किया जाता है। भस्म हाथ पर लेकर थोड़ा गीला करके तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियों से लगाएं। यो तीनों अगुंलियां पितृ, आत्म और देव तीर्थों के रूप में मानी गई हैं।

Shanidev is the birthday of lord shani jayanti

इस बार शनि जयंती त्रिपर्व संयोग के साथ आ रही है। पहले दिन सोम प्रदोष, दूसरे दिन शिव चतुर्दशी और तीसरे दिन शनि जयंती मिलकर यह संयोग बना रहे हैं। सर्वार्थसिद्धि योग होने से यह दिन और खास बन गया है।

शनि जयंती 28 मई बुधवार को आएगी। अमावस्या मंगलवार रात 11.45 बजे से बुधवार रात 12.09 बजे तक रहेगी। सर्वार्थसिद्धि योग बुधवार सुबह 5.13 बजे से दिवस पर्यंत रहेगा। ज्योतिर्विद्‌ श्यामजी बापू के अनुसार हवन-पूजन और साधना की दृष्टि से सर्वार्थसिद्धि योग खास है।

शनि दशा से पीड़ित जातकों के लिए यह दिन मंगलकारी होगा। वर्तमान में शनि अपनी उच्च राशि तुला में है, जो 02 नवंबर तक रहेगा। इस दिन शाम 5.56 बजे रोहिणी नक्षत्र लगेगा।

न्याय के देवता हैं शनि

ज्योतिर्विद देवेंद्र सिंह कुशवाह के मुताबिक के मुताबिक शास्त्रों में शनि को न्याय का देवता कहा गया है। मान्यता है कि शनि जयंती पर दान-पूजन से जातक शनि दोष से मुक्त होता है। इस दिन तिल-उड़द, काले कपड़े, लोहे की सामग्री दान करने का विधान है।

साढ़े साती के जातकों के लिए महत्वपूर्ण

पं. धर्मेंद्र शास्त्री ने बताया कि शनि जयंती पर बने त्रिपर्व संयोग के चलते तीन दिन शिव और शनि आराधना के लिए खास हैं। 26 मई को सोम प्रदोष, 27 को शिव चतुर्दशी और 28 को शनि जयंती रहेगी।

शनि के अधिष्ठाता देव भगवान शिव हैं। दो दिन शिव पूजन और अंतिम दिन शनि पूजन शुभ फल प्रदान करेगा। शिव पूजन से शनि की प्रसन्नाता प्राप्त होगी। कन्या, तुला और वृश्चिक राशि के जातकों पर साढ़े साती और कर्क व मीन पर शनि का ढैया है। इन जातकों को तीन दिन पूजन करना हितकारी रहेगा।

Monday, 19 May 2014

Significant correlation between friday and columbus

कोलम्बस जिसका पूरा नाम था क्रिस्टोफर कोलम्बस। शुक्रवार का दिन कोलम्बस के लिए काफी भाग्यशाली रहा था क्योंकि उसने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खोज शुक्रवार के दिन की थी।

अगर माह की किसी भी तारीख का मूलांक निकाला जाए तो वह किसी न किसी के लिए जरूर शुभ होता है। हो सकता है यह अंक किसी खास वार को ही आता हो।

ये वार भी अंकशास्त्र के अनुसार आपके लिए बहुत शुभ हो सकता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण प्रसिद्ध खोजकर्ता कोलम्बस के जीवन काल को देखने पर मिलता है।

कोलम्बस एक समुद्री-नाविक, उपनिवेशवादी, खोजी यात्री था। उसने अटलांटिक महासागर में बहुत सी समुद्री यात्राएं कीं और अमेरिकी महाद्वीप के बारे में बताया। हालांकि अमेरिका पहुंचने वाला वह प्रथम यूरोपीय नहीं था किन्तु कोलम्बस ने यूरोपवासियों और अमेरिका के मूल निवासियों के बीच विस्तृत सम्पर्क को बढ़ावा दिया।

कोलम्बस शुक्रवार के दिन पर बहुत श्रद्धा रखता था। इसका कारण यह था कि उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं शुक्रवार को ही हुईं। वह 3 अगस्त 1492 को अपनी लंबी यात्रा के लिए रवाना हुआ। इस दिन शुक्रवार ही था।

कोलम्बस ने शुक्रवार को ही एक द्वीप के आस-पास पक्षियों को देखा उसने अनुमान लगाया कि पास में कोई आबादी है। समुद्री यात्रा करते हुए जब भूमि दिखाई दी तो उसे बड़ा ही सुखद अनुभव हुआ।

70 दिन लगातार चलने के बाद शुक्रवार को वह एक छोटे से अमेरिकन द्वीप पर उतरा। तब शुक्रवार 17 मई को उसने वारसेलोना में विजय प्राप्त की। शुक्रवार 30 नवम्बर को ही उसने पियोरतोसान्तो में क्राॅस की स्थापना की और शुक्रवार 4 जनवरी को ही वह स्पेन के लिए रवाना हुआ। कोलम्बस का जीवन अंकशास्त्र की दृष्टि से देखें तो काफी मिलता-जुलता लगता है।

हालांकि पाश्चात्य मत पहले दिया जा चुका है कि किस तारीख में उत्पन्न व्यक्ति के लिए कौन सा विशेष वार शुभ होगा। भारतीय मतानुसार जिसकी जन्मकुंडली में जो ग्रह बलवान होगा वह लग्नेश और चंद्रराशीश का मित्र होगा। वह शुभ होगा। पर निर्णय के लिए जन्मकुंडली की आवश्यकता होती है।

इस कारण अपने अनुभव के आधार पर निश्चय कर सकते हैं कौन सा वार शुभ और कौन सा अशुभ होगा।

Gautama buddha in tears

महात्मा बुद्ध भ्रमण पर थे। काफी थक गए थे। रास्ते में एक आम का बगीचा दिखाई दिया। वे वहां रुक गए। नीचे गिरे हुए मीठे आम खाए और आराम करने लगे। तभी वहां कुछ युवकों का झुंड आया। युवक पत्थर मारकर पेड़ पर लगे हुए आम गिराने लगे। पेड़ के दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध आराम कर रहे थे।

एक युवक ने पत्थर फेंका तो वह आम को न लगकर बुद्ध के माथे पर जा लगा। उनके माथे से खून बहने लगा। यह देखकर युवक भयभीत हो गए और अपराधबोध से ग्रस्त होकर बुद्ध के पास आकर उनसे माफी मांगने लगे।

बुद्ध की आंखों में आंसू आ गए। युवकों ने सोचा कि माथे में पीड़ा की वजह से उनके आंसू आए हैं। वे उनके चरणों पर गिरकर उनसे क्षमा करने का अनुरोध करने लगे। उनमें से एक ने कहा, 'हमसे भारी भूल हो गई है।

हमने आपको पत्थर मारकर रुला दिया।' इस पर बुद्ध ने कहा, 'मित्रों, मैं इसलिए दुखी हूं, क्योंकि जब तुमने आम के पेड़ पर पत्थर मारा तो पेड़ ने बदले में तुम्हें मीठे फल दिए, लेकिन जब तुमने मुझे पत्थर मारा, तो मैं तुम्हें कुछ अच्छा देने के बजाय केवल भय और अपराधबोध ही दे सका।'

संक्षेप में

भलाई करना हमारे स्वभाव में होना चाहिए, भले ही हमें वह बुराई के बदले में करनी पड़े।

Tuesday, 13 May 2014

Who are the best in between religion and politics

धर्म जीवन को जीने की कला है। जीवन जीने का विज्ञान है। हम जीवन को उसके पूरे अर्थों में कैसे जिएं, धर्म उसकी खोजबीन है। धर्म यदि जीवन-कला की आत्मा है, तो राजनीति जीवन-कला का शरीर है। धर्म अगर प्रकाश है तो राजनीति पृथ्वी है।

भारत में राजनीति और धर्म दोनों जैसे विरोधी रहे हैं। यह एक दूसरे की तरफ पीठ किए हुए हैं। यह आज की ही बात नहीं है, हजारों वर्षों से ऐसा होता आ रहा है और इसका परिणाम हमने भोगा है। एक हजार वर्ष की गुलामी इसका एक बेहद संजीदा उदाहरण है। हिंदुस्तान गुलाम हुआ, क्योंकि हिंदुस्तान के धार्मिक लोगों के मन में ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कुछ करना चाहिए।

हजारों वर्षों तक धार्मिक आदमी कहता रहा कि राजनीति से हमें कुछ लेना-देना नहीं है। धर्म से हमें कुछ-लेना देना नहीं है। लेकिन कोई राज नीति धर्म निरपेक्ष कैसे हो सकती है? राजनीति के धर्म निरपेक्ष होने का क्या अर्थ हो सकता है? एक ही अर्थ हो सकता है कि जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, जो भी श्रेष्ठ है, राजनीति को उससे कोई प्रयोजन नहीं।

दरअसल धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ होता है सत्य से निरपेक्ष होना, प्रेम से निरपेक्ष होना, जीवन के गहनतम ज्ञान से निरपेक्ष होना। कोई भी राजनीति अगर धर्म से निरपेक्ष होगी, तो वह मनुष्य के शरीर से ज्यादा गहरा प्रवेश नहीं कर सकती है और जो समाज केवल शरीर के आस-पास जीने में लगा रहता है, उस समाज के जीवन में उसी तरह की दुर्गंध पैदा हो जाएगी।

अगर हम पुराना इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि हिंदुस्तान के धार्मिक लोगों ने भी राजनीति के साथ इतना ही गलत व्यवहार किया है। वे आज तक कह रहे हैं कि राजनीति से धर्म राजनीति से निरपेक्ष है।

धर्म का राजनीति से कोई संबंध न था और न ही है। स्वाभाविक था कि जब धर्म, राजनीति से इतना निरपेक्ष रहा हो तो धर्म से भी हमें कुछ लेना देना न रहा हो। धर्म एक चुनौती है, ऊपर उठाने के लिए धर्म एक पुकार है इसलिए निरंतर ऊपर उठते रहो धर्म एक आह्वान है ताकि मनुष्य ऊंचे शिखरों पर चढ़ता रहे।

राजनीति धर्म से अलग होकर सिर्फ कूटनीति रह जाती है। वह पॉलिटिक्स नहीं होती, सिर्फ डिप्लोमेसी हो जाती है। वहां झूठ और सच में कोई फर्क नहीं रह जाता। हिटलर ने अपने कमरे के ऊपर लिख रखा था कि सत्य के अतिरिक्त और कोई नियम नहीं और उसने अपने कमरे के बाहर लिख रखा था कि हिटलर से ज्यादा झूठ बोलने वाला आदमी पृथ्वी पर कभी नहीं रहा।

राजनीतिज्ञ सदा चाहता है कि धर्म से दूर रहे, क्योंकि धर्म के सामने उसे आत्मग्लानि होनी शुरू हो जाती है। पर वर्तमान हालात ऐसे नहीं हैं।

Monday, 12 May 2014

Unsolved mysteries of the mahabharata

महाभारत को पांचवां वेद कहा गया है। यह भारत की गाथा है। इस ग्रंथ में तत्कालीन भारत (आर्यावर्त) का समग्र इतिहास वर्णित है। अपने आदर्श पात्राें के सहारे यह हमारे देश के जन-जीवन को प्रभावित करता रहा है। इसमें सैकड़ों पात्रों, स्थानों, घटनाओं तथा विचित्रताओं व विडंबनाओं का वर्णन है।

महाभारत में कई घटना, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत है, चाहे वह कौरव, पांडव, कर्ण और कृष्ण हो या धृष्टद्युम्न, शल्य, शिखंडी और कृपाचार्य हो। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं।

उस समय मौजूद थे परमाणु अस्त्र

मोहनजोदड़ो में कुछ ऐसे कंकाल मिले थे जिसमें रेडिएशन का असर था। महाभारत में सौप्तिक पर्व के अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिए गए हैं। हिंदू इतिहास के जानकारों के मुताबिक 3 नवंबर 5561 ईसापूर्व छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र परमाणु बम ही था?

18 का अंक का जादू

कहते हैं कि महाभारत युद्ध में 18 संख्‍या का बहुत महत्व है। महाभारत की पुस्तक में 18 अध्याय हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया। गीता में भी 18 अध्याय हैं।18 दिन तक ही युद्ध चला। कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिणी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिणी सेना थी। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे। सवाल यह उठता है कि सब कुछ 18 की संख्‍या में ही क्यों होता गया?

कौरवों का जन्म एक रहस्य

कौरवों को कौन नहीं जानता। धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था। कुरु वंश के होने के कारण ये कौरव कहलाए। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थी, तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए।

गांधारी ने वेदव्यास से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर लिया। गर्भ धारण के पश्चात भी दो वर्ष व्यतीत हो गए, किंतु गांधारी काे कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई। इस पर क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट पर जोर से मुक्के का प्रहार किया जिससे उसका गर्भ गिर गया।

वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल ही जान लिया। वे गांधारी के पास आकर बोले- 'गांधारी! तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र ही सौ कुंड तैयार करवाओ और उनमें घृत (घी) भरवा दो।'वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुए के बराबर सौ टुकड़े हो गए।

वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए हुए सौ कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश देकर अपने आश्रम चले गए। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। फिर उन कुंडों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दु:शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ।

महान योद्धा बर्बरीक

बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री 'कामकंटकटा' के उदर से भी इनके जन्म होने की बात कही गई है। महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए।

बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह जानकर भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक उनका शीश मांग लिया।

बर्बरीक ने कृष्ण से प्रार्थना की कि वे अंत तक युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर सबसे ऊंची जगह पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर रख दिया गया, जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।

राशियां नहीं थीं ज्योतिष का आधार

महाभारत के दौर में राशियां नहीं हुआ करती थीं। ज्योतिष 27 नक्षत्रों पर आधारित था, न कि 12 राशियों पर। नक्षत्रों में पहले स्थान पर रोहिणी था, न कि अश्विनी। जैसे-जैसे समय गुजरा, विभिन्न सभ्यताओं ने ज्योतिष में प्रयोग किए और चंद्रमा और सूर्य के आधार पर राशियां बनाईं और लोगों का भविष्य बताना शुरू किया, जबकि वेद और महाभारत में इस तरह की विद्या का कोई उल्लेख नहीं मिलता जिससे कि यह पता चले कि ग्रह नक्षत्र व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं।

विदेशी भी शामिल हुए थे लड़ाई में

महाभारत के युद्ध में विदेशी भी शामिल हुए थे। इस आधार पर यह माना जाता है कि महाभारत प्रथम विश्व युद्ध था।

28वें वेदव्यास ने लिखी महाभारत

ज्यादातर लोग यह जानते हैं कि महाभारत को वेदव्यास ने लिखा है लेकिन यह अधूरा सच है। वेदव्यास कोई नाम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी, जो वेदों का ज्ञान रखने वालाें काे दी जाती थी। कृष्णद्वैपायन से पहले 27 वेदव्यास हो चुके थे, जबकि वे खुद 28वें वेदव्यास थे। उनका नाम कृष्णद्वैपायन इसलिए रखा गया, क्योंकि उनका रंग सांवला (कृष्ण) था और वे एक द्वीप पर जन्मे थे।

तीन चरणों में लिखी महाभारत

वेदव्यास की महाभारत तीन चरणों में लिखी गई। पहले चरण में 8,800 श्लोक, दूसरे चरण में 24 हजार और तीसरे चरण में एक लाख श्लोक लिखे गए। वेदव्यास की महाभारत के अलावा भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे की संस्कृत महाभारत सबसे प्रामाणिक मानी जाती है।

अंग्रेजी में संपूर्ण महाभारत दो बार अनुदित की गई थी। पहला अनुवाद 1883-1896 के बीच किसारी मोहन गांगुली ने किया था और दूसरा मनमंथनाथ दत्त ने 1895 से 1905 के बीच। 100 साल बाद डॉ. देबरॉय तीसरी बार संपूर्ण महाभारत का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं।

Love yourself

जब आप खुद से प्रेम करने लगते हैं तो चीजें एकाएक सुंदर और अर्थवान दिखाई देने लगती हैं। प्रसन्नता,

उत्कृष्टता और प्रेरणा के लिए अपने आप से प्रेम करना बहुत जरूरी है। अपने प्रति अच्छा भाव आपको अपने अन्य कामों में भी बेहतर प्रदर्शन का मौका देता है।

अपने प्रति अच्छा महसूस करने पर हम शांति और सकारात्मकता के साथ अपने कामों को पूरा कर पाते हैं। बहुत छोटी-छोटी चीजों के सहारे हम यह देख सकते हैं कि हम खुद को बेहतर नजर के साथ देख पा रहे हैं या नहीं।

अक्सर हम दूसरों के साथ व्यवहार में इतने ज्यादा व्यस्त होते हैं कि अपने प्रति ईमानदारी से एकाग्र नहीं हो पाते हैं लेकिन जब हम खुद के लिए समय निकालते हैं तो दुनिया पहले से ज्यादा बेहतर बन सकती है।

हमारी समस्याओं, तनावों और चिंताओं का हल तभी निकल सकता है जबकि हम खुद से प्यार करें। तभी हम अपने को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। अपने को समझे बिना और अपनी खूबियों के एहसास के बिना कोई भी व्यक्ति आनंद की अवस्था में नहीं पहुंचता है। जब आप अपनी जरूरतों को जान लेते हैं तो ज्यादा बेहतर काम कर पाते हैं। यह अपने सहारे संसार को बदलने का प्रयास भी है।

कैसे जांचें स्वयं से प्रेम है

अपने सपनों को आप प्राथमिकता देते हैं और वे ही चीजें करते हैं जो आपको प्रेरित करती हैं और अच्छा महसूस करने में मदद करती हैं।

जिन चीजों से आप सहमत नहीं होते या जो आपकी योजना में ठीक नहीं बैठती उनके लिए स्पष्ट रूप से ना"कहते हैं।

आप उन लोगों के साथ समय बिताते हैं जो आपका समर्थन करते हैं, आपको प्रेरित करते हैं और आपकी अच्छी चीजों को बढ़ावा देते हैं।

आप अपने विचारों के साथ जाना पसंद करते हैं और दूसरों को प्रसन्ना करने के लिए कोई काम नहीं करना चाहते।

आप अपने आप से बात करते हुए शांति के साथ रह पाते हैं और खुद से आपको चिढ़ नहीं होती।

आप उन नई चीजों के साथ प्रयोग का साहस कर पाते हैं जिनका अनुभव आप हमेशा से लेना चाहते थे।

आप अपने भोजन, व्यायाम और एकांत के लिए समय निकाल पाते हैं।

अपने सत्य के पक्ष में खड़े रह पाते हैं। पैसा उन चीजों में खर्च करते हैं जो आपको आश्चर्य महसूस करने में मदद करती हैं।

अच्छी चीजों को देखना और उन चीजों से दूरी रखना जो आपको नीचे ले जाती हैं।

खुद से रिश्ता बदले दुनिया

जब आप अपने से प्यार करने लगते हैं तो आप शंका और चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। हम अपनी भावनाओं और निर्णयों पर विश्वास करते हैं। यह हमें ज्यादा साहसी और प्रामाणिक बनाता है।

हम दिल से जीने लगते हैं और जिंदगी को ज्यादा उदार तरीके से देखने लगते हैं। हम अपने लिए तय की गईं सीमाओं से बाहर देखने लगते हैं और ज्यादा बड़े सपनों में विश्वास करने लगते हैं।

हम नकारात्मक पक्षों पर ध्यान देना बंद देते हैं और अपनी संभावनाओं पर ध्यान देकर अपने लिए आगे की राह खोज पाते हैं। हम यह देखते हैं कि हमारा जीवन कितने नई चीजों से भरा हुआ है।

हम सकारात्मकता, शांति, आत्मविश्वास और प्रसन्नता के साथ अपने काम में आगे बढ़ने लगते हैं। हमारे व्यवहार में एक खास तरह की तन्मयता झलकने लगती है।

Get special grace of lord shani

यमराज यदि मृत्यु के देवता हैं, तो शनि कर्म के दंडाधिकारी हैं। गलती जाने में हुई हो या अनजाने में, दण्ड तो भोगना ही पड़ेगा।

कहते हैं जिस व्यक्ति पर शनि की ढैया या साढ़ेसाती हो या फिर जाे कुंडली में शनि के अशुभ प्रभाव के कारण किसी रोग से पीड़ित है अगर वे इन उपायों को आजमाते हैं तो उसे शनिदेव की विशेष कृपा की प्राप्ति होती है और सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

1. दोनों समय भोजन में काला नमक और काली मिर्च का प्रयोग करें।

2. शनिवार के दिन बंदरों को भुने हुए चने खिलाएं और मीठी रोटी पर तेल लगाकर काले कुत्ते को खाने को दें।

3. यदि शनि की अशुभ दशा चल रही हो तो मांस-मदिरा का सेवन न करें।

4. प्रतिदिन पूजा करते समय महामृत्युंजय मंत्र ऊं नमः शिवाय का जाप करें शनि के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है।

5. घर के किसी अंधेरे भाग में किसी लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भरकर उसमें तांबे का सिक्का डालकर रखें।

6. शनि ढैया के शमन के लिए शुक्रवार की रात्रि में 8 सौ ग्राम काले तिल पानी में भिगो दें और शनिवार को प्रातः उन्हें पीसकर एवं गुड़ में मिलाकर 8 लड्डू बनाएं और किसी काले घोड़े को खिला दें। आठ शनिवार तक यह प्रयोग करें।

7. शनि के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए शनिवार के दिन काली गाय की सेवा करें। पहली रोटी उसे खिलाएं, सिंदूर का तिलक लगाएं, सींग में मौली (कलावा या रक्षासूत्र) बांधे और फिर मोतीचूर के लड्डू खिलाकर उसके चरण स्पर्श करें।

8. प्रत्येक शनिवार को वट और पीपल वृक्ष के नीचे सूर्योदय से पूर्व कड़वे तेल का दीपक जलाकर शुद्ध कच्चा दूध एवं धूप अर्पित करें।

9. शनिवार को ही अपने हाथ के नाप का 29 हाथ लंबा काला धागा लेकर उसको मांझकर(बंटकर) माला कि तरह गले में पहनें।

10 यदि शनि की साढ़ेसाती से ग्रस्त हैं तो शनिवार को अंधेरा होने के बाद पीपल पर मीठा जल अर्पित कर सरसों के तेल का दीपक और अगरबत्ती लगाएं और वहीं बैठकर क्रमशः हनुमान, भैरव और शनि चालीसा का पाठ करें और पीपल की सात परिक्रमा करें।

Monday, 5 May 2014

Where this temple women can get the children to bed

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला की लड़भडोल तहसील। यहां के सिमसा गांव में सिमसा देवी का एक ऐसा मंदिर है जहां पर निः संतान महिलाएं अगर मंदिर के फर्श पर सो जाएं तो उन्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है।

आधुनिक विज्ञान ये भले ही न मानें पर आस्था के बल पर ये संभव है। नवरात्रि के समय इस मंदिर हिमाचल पर्देश के पडोसी राज्यों पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ ऐसी सैकड़ों महिलाएं इस मंदिर आती हैं, जिनकी संतान नहीं होती है।

माता सिमसा या देवी सिमसा को संतान-दात्री के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रों में होने वाले इस विशेष उत्सव को स्थानीय भाषा में सलिन्दरा कहा जाता है। सलिन्दरा का अर्थ है 'स्वप्न आना' होता है।

माना जाता है कि जो महिलाएं माता सिमसा के प्रति मन में श्रद्धा लेकर से मंदिर में आती है माता सिमसा उन्हें स्वप्न में मानव रूप में या प्रतीक रूप में दर्शन देकर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती हैं।

कहते हैं कि कोई महिला स्वप्न में कोई कंद-मूल या फल प्राप्त करती है तो उस महिला को संतान का आशीर्वाद मिल जाता है। देवी सिमसा आने वाली संतान के लिंग-निर्धारण का भी संकेत देती है।

जैसे कि किसी महिला को अमरुद का फल मिलता है तो समझा जाता है पुत्र प्राप्त होगा। अगर किसी को स्वप्न में भिन्डी प्राप्त होती है तो समझा जाता है कि संतान के रूप में कन्या की प्राप्ति होगी। और यदि किसी को धातु, लकड़ी या पत्थर की बनी कोई वस्तु प्राप्त हो तो समझा जाता है कि उसको संतान नहीं होगी।

यह मंदिर बैजनाथ से 25 किलोमीटर और जोगिन्दर नगर से लगभग 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

Who is aghori

अघोरियों का जीवन जितना कठिन है, उतना ही रहस्यमयी भी। इनकी साधना विधि सबसे ज्यादा रहस्यमयी होती है जिसकी अपनी शैली, अपना विधान है, अपनी अलग विधियां हैं।

अघोरी का मतलब होता है घोर नहीं यानी वह बहुत सरल और सहज होते हैं। जिसके मन में कोई भेदभाव नहीं हो। अघोरी हर चीज को समान भाव से देखते हैं। वे सड़ते जीव के मांस को भी उतना ही स्वाद लेकर खा सकते हैं, जितना स्वादिष्ट पकवानों को स्वाद लेकर खाया जा सकता है।

कहते हैं कि अघोरियों की दुनिया निराली है। वे जिस पर प्रसन्न हो जाएं, उसे सब कुछ दे देते हैं। उनकी कई ऐसी बातें हैं, जिसे सुनकर आप हैरान हो सकते हैं।

1. अघोरी किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा किए बगैर नहीं छोड़ते। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं। अधिकांश अघोरियों की आंखें लाल होती हैं, जैसे वो गुस्से में हों, लेकिन उनका मन उतना ही शांत भी होता है। काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी गले में धातु की बनी नरमुंड की माला पहनते हैं।

2. वे अमूमन श्मशान में ही अपनी कुटिया बनाते हैं। वहां एक धूनी जलती रहती है। जानवरों में वो सिर्फ कुत्ता पालना पसंद करते हैं। उनके साथ उनके शिष्य रहते हैं। अघोरी अपनी बात के बहुत पक्के होते हैं। वे अगर किसी से कोई बात कह दें तो उसे जरूर पूरा करते हैं।

3. अघोरी तीन तरह की साधना करते हैं। शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पैरहै। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाई जाती है।

4. शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्मशान साधना। इसमें आम परिवार के लोग भी शामिल हो सकते हैं। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहां प्रसाद के रूप में मांस-मंदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता है।

5. अघोरी गाय का मांस छोड़ कर बाकी सभी चीजें खाते हैं। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है, इसलिए वे श्मशान में रहना ही ज्यादा पंसद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र फलदायक होता है। यहां आमतौर पर लोग जाते नहीं, इसीलिए साधना में विघ्न पड़ने का कोई प्रश्न नहीं उठता। उनके मन से अच्छे-बुरे का भाव निकल जाता है।

6. कम ही लोग जानते हैं कि अघोरियों की साधना में इतना बल होता है कि वो मुर्दे से भी बात कर सकते हैं। ये बातें पढ़ने-सुनने में भले ही अजीब लगें, लेकिन इन्हें पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। उनकी साधना को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती।