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Monday, 30 June 2014

Will only be met by myself alone

जब आप एकांत में अपने निर्णयों और जीवन के बारे में विचारते हैं तो अधिक बेहतर तरीके से आगे बढ़ पाते हैं। अकेले में विचार हमारी दूसरों पर निर्भरता भी खत्म करता है। अधिकतर लोग अकेले हो जाने से डरते हैं। यही कारण है कि वे दोस्त बनाते हैं, प्रियजनों के बीच रहना चाहते हैं और हर समय किसी न किसी संस्था या गतिविधि के साथ जुड़े रहना चाहते हैं।

तमाम तरह की सोशल नेटवर्किंग साइट्स की बढ़ती लोकप्रियता इसी तरफ इशारा करती है। इन सोशल प्लेटफॉर्म्स के कारण व्यक्ति आधा घंटा भी खुद पर खर्च नहीं करता लेकिन जब हम अपने साथ समय बिताते हैं, खुद से बातचीत करते हैं तो हमारे जीवन में शांति और निर्णयों में अधिक सहजता दिखाई देती है। खुद के साथ कुछ वक्त रहने पर हमारे मन की व्यग्रता और हड़बड़ी भी खत्म होती है।

अक्सर अकेले रहने वाले व्यक्ति की सामाजिकता पर सवाल उठाए जाते हैं लेकिन यह सच है कि जब हम अकेले होते हैं तभी हमें अपने व्यक्तित्व के आकलन का मौका मिलता है। अपनी जिंदगी की दिशा तय करने का यही सबसे उपयुक्त समय होता है। खुद के साथ बिताए जाने वाले लम्हें अपने रिश्तों, अपनी खूबियों और अपने जीवन के बड़े निर्णयों के तमाम पहलुओं पर सोचने का मौका देते हैं। आइए देखें खुद के साथ बिताए जाने वाले लम्हों का हासिल क्या है।

सरलता से परिचय

इस समय जीवन बहुत आपाधापी और व्यस्तता के बीच है। ऐसे में हमने खुद को हम यह करना चाहते हैं, हमें यह करना चाहिए, हमें यह करने की जरूरत है और हमें यह नहीं करना चाहिए, जैसे बहुत सारे प्रश्नों के बीच खड़ा कर लिया है। इस तरह के तमाम प्रश्न हमारे भीतर एक खिंचाव पैदा करते हैं।

हम पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। माना कि हमारे जीवन में बहुत सारी चीजें चल रही हैं लेकिन हमें थोड़ा रुककर यह देखने की जरूरत तो है कि कहीं हम सिर्फ प्रतियोगिता को ही तो नहीं जीने लगे हैं। प्रतियोगिता से मुक्ति के लिए और अपनी खुशी को बेहतर तरीके से समझने के लिए अकेलापन बहुत मददगार होता है। वह बताता है कि आपकी सही जरूरतें क्या हैं।

सूचनाओं से मुक्ति

इन दिनों जिस तरह का जीवन हमारे आसपास है उसमें लोगों के दिमाग में बहुत सारी सूचनाएं और चीजें भरी रहती हैं। याद रखिए कि हम सिर्फ सूचनाएं इकट्ठा ही नहीं करते हैं बल्कि उन सूचनाओं के आधार पर प्रतिक्रिया की कोशिशें भी करते हैं। लगातार सूचनाओं के बीच आप प्रतिक्रिया ही व्यक्त करते रह जाते हैं और अपने मन की बात नहीं सुन पाते हैं। समय-समय पर इन सूचनाओं से दूर होने की जरूरत होती है। जब हम एकांत में समय बिताते हैं तो बहुत सारी नई सूचनाओं से भी बच जाते हैं और इनके प्रभाव से दूर होकर चीजों को देख पाते हैं।

सटीक निर्णय की ओर

दुनिया को देखने की हमारी दृष्टि अक्सर निकट के लोगों द्वारा प्रभावित होती है। हमारे मित्र, रिश्तेदार, शिक्षक और माता-पिता उनके अनुभवों के द्वारा हमारे हमारे निर्णयों और जरूरतों को प्रभावित करते हैं इसलिए यह जरूरी है कि हम अकेले में कुछ समय बिताकर अपनी सही और असल आवश्यकताओं से परिचित हों। जिस भी दिशा में हम आगे

बढ़ने जा रहे हों उसके बारे में अपने दिल पर हाथ रखकर पूछें कि क्या यही हम चाहते हैं। इस उत्तर के साथ आगे बढ़ना आपके मन की दुविधा खत्म कर देगा।

चिंताओं से मुक्ति

जब हमारे विचारों और हमारे आगे बढ़ने की दिशा के बीच कोई दुविधा नहीं होती है तो हमारे मन में किसी भी तरह की चिंता नहीं होगी। यह तभी होगा जब हम अकेले रहकर अपने विचार और दिशा के बीच एकरूपता बनाएं। जब तक हम एकांत में अपने बारे में और अपने निर्णयों के बारे में ठीक से नहीं सोचेंगे तो मन कई तरह की चिंताओं से भरा रहेगा। चिंताओं से मुक्ति के लिए खुद के साथ समय बिताना बहुत ही जरूरी है।

खत्म होती निर्भरता

बहुत से लोग इस कारण एकांत में समय नहीं बिताते क्योंकि उन्हें दूसरों का साथ अच्छा लगता है, उनके साथ बातचीत करना अच्छा लगता है। इससे उनके निर्णयों को दूसरों से सहारा मिलता है। यह मानव स्वभाव है। दूसरों के साथ बिताए जाने वाले लम्हों के कारण हमारी खुशी उन पर निर्भर हो जाती है।

हम ऐसे किसी साथ का उपयोग अपनी समस्याओं से दूर जाने के लिए करते हैं। हम खुद से दूर जाने के लिए भी दूसरों का सहारा लेते हैं। लेकिन यह समझना होगा कि तब हमारे निर्णय पूरी तरह अपने नहीं होते और हमारी दूसरों पर निर्भरता बढ़ती जाती है। एकांत में अपने निर्णयों पर विचार हमारी निर्भरता को खत्म करता है।

सक्रियता में बढ़ोतरी

अक्सर हम अपनी जिंदगी में खालीपन को भरने के लिए तरह-तरह की गतिविधियों में शामिल होते रहते हैं। कभी गौर कीजिएगा कि जब आप कुछ नहीं कर रहे हैं तब भी कुछ तो आप कर ही रहे होते हैं। रोजमर्रा के जीवन में अतिरिक्त गतिविधियों को हटाने की जरूरत है। गैर-जरूरी चीजों को अगर हम कम करते रहेंगे तो हमारी सक्रियता में बढ़ोतरी होगी। तब हम पाएंगे कि हमारे पास अधिक समय है और अधिक ऊर्जा भी।

छोटे पलों का आनंद

अक्सर प्रतियोगिता में बने रहने पर हम अपने आसपास की बहुत छोटी चीजों का आनंद नहीं ले पाते हैं, इसलिए जब अकेले हों तो उन चीजों के बारे में सोचें। उन छोटी चीजों के बारे में जो आपको सहज उपलब्ध हैं और जो आपके ध्यान से दूर रहती हैं। इन चीजों पर ध्यान देने पर आप पाएंगे कि जीवन कितने रूपों में बंटा हुआ है और हर रूप आपको विस्मित करने की क्षमता से परिपूर्ण है।

प्राथमिकता में मदद

जब हम एकांत तलाश पाते हैं तो यह भी देख पाते हैं कि हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं और उन प्राथमिकताओं की दिशा में आगे बढ़ने के लिए किन-किन प्रयासों की जरूरत है। एकांत में हम शांत मन से अपनी प्राथमिकताओं के बारे में सोच पाते हैं।

ऐसा करते हुए आप जीवन के तमाम पक्षों को देखते हुए प्राथमिकताएं तय करते हैं। हमारा लक्ष्य तब सफल ही नहीं होता बल्कि अपने लिए सुकून और सहजता की तलाश भी होता है।

Friday, 27 June 2014

Keep in mind that not spilled jar of milk

शुकदेव को उनके पिता ने परामर्श दिया कि वे महराज जनक की शरण में जाकर दीक्षा ग्रहण करें। पिता के परामर्श से शुकदेव महराज जनक के दरबार जा पहुंचे और राजा जनक से दीक्षा देने का अनुरोध किया।

जनक ने शुकदेव की परीक्षा लेने से पहले उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से उनके हाथ में दूध का कटोरा दिया और उनसे कहा कि इस कटोरे को हाथ में लेकर मिथिला नगर घूमकर आओ याद रखना कटोरे या कहें मर्तबान (मर्तबान चीनी मिट्टी का गोलाकार पात्र होता है प्राचीन समय इसका प्रयोग तरल पदार्थ, अचार, मुरब्बे तथा रसायन आदि रखने के लिए किया जाता था) से दूध की एक बूंद न छलके।

शुकदेव ने आज्ञा मान ली और दूध के कटोरे को बिना छलकाए मिथिला घूमकर वापस आ गए। यह देखकर महराज जनक बहुत खुश हुए और उन्होंने शुकदेव से पूछा कि उन्होंने मिथिला घूमते हुए क्या देखा?

शुकदेव बोले मैं मिथिला घूमने के बाद भी कुछ नहीं देख पाया क्यों कि मेरा पूरा ध्यान दूध के कटोरे पर था वह किसी तरह भी न छलक पाए। जनक ने कहा यही एकाग्रता योग है। इसे जीवन भर साधते रहो, यही मेरी दीक्षा है।

संक्षेप में

हम जो काम करते हैं उसे पूरे समर्पण भाव से करना चाहिए। जब हम किसी काम को एकाग्रचित रहते हुए किया जाता है तो उसका परिणाम भी सकारात्मक और चौंकाने वाला आता है।

Wednesday, 25 June 2014

Here find the secret

एक बार ऋर्षि पिप्पलाद के पास कुछ शिष्य आए और उनसे कहा कि - 'हे गुरुदेव हमें जीवन और मृत्यु का रहस्य समझाने की कृपा करें।'

तब ऋर्षि ने कहा कि, 'जीवन के विषय में मैं थोड़ा बहुत बता सकता हूं, क्योंकि मैंने जीवन जिया है, जहां तक मृत्यु के विषय में बात की जाए तो मैं अभी मरा नहीं हूं।'

ऋर्षि ने गंभीरता से कहा कि ऐसे में यह मृत्यु के बारे में कैसे बता सकता हूं। जो मर चुका है उससे यह सवाल किया जाए तो वह इसे काफी अच्छे से इस बारे में बता पाएगा।

कुछ देर बाद चुप रहने के बाद के बाद ऋर्षि पिप्लाद ने कहा कि दूसरा विकल्प यह है कि खुद मर कर देखो। हालांकि तब दूसरे तुम्हारे अनुभव को नहीं जान पाएंगे। इसलिए मृत्यु के रहस्य से इसलिए अब तक पर्दा नहीं उठा है। जो जान लेता है वह यह बताने के लिए जिंदा नहीं रहता है।

संक्षेप में

कुछ रहस्य ऐसे होते है जिन्हें जानने के लिए कुछ कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। इसलिए ऐसे रहस्यों को भूल जाना ही बेहतर है।


Monday, 23 June 2014

If youre not certain when desired find happiness here

जब मनचाहे परिणाम न मिल रहे हों तो बहुत छोटी-छोटी बातों में खुशियां ढूंढना चाहिए। किसी भी अंतिम परिणाम से निराश होने के बजाय अपने प्रयासों पर ध्यान देना चाहिए। बुरे स्वप्नों को भूलकर आगे बढ़ने का यही मंत्र है।

हम सभी की जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जबकि परिणाम हमारे पक्ष में नहीं रहते। प्रयासों के बावजूद हम सही नतीजे तक नहीं पहुंच पाते। जिंदगी में सबसे कठिन क्षण ये ही होते हैं जबकि व्यक्ति वर्तमान से निराश होता है और भविष्य के प्रति भी कोई आशा नजर नहीं आती है।

ऐसे में कोई भी अपने प्रयासों को संदेह दृष्टि से देखने लगता है और उसी के परिणामस्वरूप नए कार्यों में लगने वाली ऊर्जा भी कम होने लगती है। यह याद रखना चाहिए कि जिंदगी एक सीधी सड़क की तरह नहीं हो सकती, इसमें कई तरह के मोड़ होते हैं और हर मोड़ थोड़ा चौंकाता है।

इन मोड़ों से गुजरते हुए कई बार ऐसी अप्रत्याशित स्थितियों से सामना होता है जिनके लिए हम तैयार नहीं होते और तब हम बहुत निराश महसूस करते हैं। हर मोड़ पर अपने मन का दृश्य मिले यह संभव नहीं है और इसलिए अप्रत्याशित घटनाओं का सहजता के साथ मुकाबला करना जरूरी है।

जीवन में जब अपने मन के अनुरूप कुछ भी न हो रहा हो तो हमें बहुत शांति के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। परीक्षा यही है कि हम ऐसी स्थितियों में भी अपनी क्षमताओं और स्वाभाविकताओं में बने रहें। जब कुछ भी हमारे मन का नहीं हो रहा हो तो यह विश्वास करना बहुत जरूरी है कि चीजें ठीक होंगी।

नकारात्मक परिणामों के बीच सकारात्मक रवैया बहुत ही जरूरी और महत्वपूर्ण है। उस वृक्ष का खयाल कीजिए जो पतझड़ में पूरी तरह सूखा दिखाई देता है लेकिन वसंत आते ही वह नए पत्तों से लद जाता है। जिंदगी में ऐसे पतझड़ी समय से निकलने के लिए आशा की बहुत जरूरत होती है। आशा ही कठिन वक्त में भी हमें प्रयासों से जोड़े रखती है।

फिर जब अपने मन के अनुरूप परिणाम नहीं आ रहे हों तो यह मौका होता है कि हम अपनी योजनाओं की तरफ फिर से देखें। अगर हम किसी एक ही चीज को बार-बार साबित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं और वह फिर भी ठीक से नहीं हो पा रही है तो हमें अपनी योजना में फेरबदल करके देखना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लंबे समय की अपनी योजनाएं या अपने अंतिम लक्ष्य को बदलना चाहिए बल्कि उन योजनाओं के रास्तों में

थोड़ा-सा बदलाव सही दिशा में आगे बढ़ने का मौका देगा और राह आसान बनाएगा। उन चीजों की तरफ ध्यान दें जिनके कारण सही परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं और देखें कि आप उन स्थितियों में कौन-सा वैकल्पिक मार्ग चुन सकते हैं। विकल्प तनावों और पड़ने वाले दबाव को भी बहुत हद तक कम कर देते हैं।

जब मनचाहे नतीजे नहीं मिल रहे हैं तो ऐसा समय धैर्य की परीक्षा होता है। ऐसे में चीजों के परिणामों के बारे में बहुत अधीर नहीं होना चाहिए और उन्हें समय देना चाहिए। परिणामों की हड़बड़ी या अति उत्सुकता भी हमारे मन की शांति को भंग करती हैं और ऐसे में धीरज के साथ आगे बढ़ना बहुत राहत देगा।

अधीरता की स्थिति में हम परिणामों के लिए अपना सबकुछ झोंक देते हैं और इसलिए भी निराशा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए जरूरी है कि धीरज के साथ परिणामों की प्रतीक्षा की जाए ताकि बहुत मुश्किल स्थितियां न बने।

चाहे हम कितना भी बुरा महसूस कर रहे हों लेकिन उन स्थितियों में भी खुद को प्रेरित बनाए रखना जरूरी है। अगर हम इसी शिकायत के साथ आगे बढ़ें कि हम जकडन महसूस कर रहे हैं तो धीरे-धीरे हम परिस्थितियों को और भी मुश्किल बना लेते हैं।

जब परिणाम मन के अनुरूप नहीं आ रहे हैं तो नए रास्तों को खोजने की तरफ बढ़ना और नई चीजों को आजमाने के लिए स्वयं को आगे बढ़ाना बहुत जरूरी होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हौसला न हारें। अंतरप्रेरणा होना चाहिए, फिर भले ही परिणाम आज पक्ष में न भी हों लेकिन भविष्य के प्रति उम्मीद तो बनी ही रहती है।

जब बड़े परिणाम हमारे पक्ष में नहीं आ रहे हैं तब लंबे समय बाद मिलने वाली किसी बड़ी सफलता के बारे में चिंतित न रहें बल्कि रोज मिलने वाले छोटे-छोटे पलों को पूरी तरह जिएं। अपने परिणाम पर ज्यादा निर्भरता या ज्यादा फोकस भी निराशा को बढ़ाता है।

इसकी बजाय आपको अपने छोटे-छोटे प्रयासों की सुंदरता को देखना चाहिए। इस तरह आप एक संतुलन पैदा कर सकते हैं और निराशा को खुद से दूर ले जा सकते हैं। हालांकि यह आसान नहीं होता लेकिन जब हम इस तरह आगे बढ़ेंगे तो कोई भी असफलता या निराशा हमारा उत्साह तोड़ नहीं पाएगी।

प्रयासों का महत्व समझें ऐसे समय में जबकि मनचाहे परिणाम नहीं मिल रहे हों तो अपने प्रयासों की उत्कृष्टता के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए। तब यही देखना हमें आगे बढ़ने में मदद करता है कि हमने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया और कुछ चीजें हमारी पहुंच से बाहर थीं।

अगर आप नकारात्मक ढंग से खुद के प्रति सोचने लगे तो शायद आगे कोई भी चीज बेहतर तरीके से अंजाम नहीं दे पाएंगे। आपको आने वाली चीजों को बेहतर करने के लिए खुद के प्रति आशावादी होना ही होगा। तभी अच्छा कर पाएंगे।

ये उपाय आजमाएं

    छोटा ब्रेक लेकर तैयारी करें।

    अपनी योजना का आकलन करें।

    दूसरे लोगों से भी सहयोग लें।

    नई योजना बनाएं।

    वैकल्पिक योजना तैयार रखें।

Thursday, 12 June 2014

How did stress

आधुनिक जीवन में हम भौतिक तरक्की और आराम को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। सुविधाओं के इस समय में भौतिक वस्तुएं अधिक प्रकाशमान हो गई हैं या कहें कि उनकी महत्ता अधिक हो गई है। हालांकि यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि यह तरक्की और आराम बहुत सारे तनाव और खिंचाव के साथ आता है और इसी वजह हम उसका वैसा उपभोग नहीं कर पाते हैं।

तनाव और खिंचाव हमारे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद है और हम उसे अनुभव भी करते हैं। व्यवसाय में प्रतिस्पर्धा है, परिवार और सामाजिक संबंधों में तनाव है और अंतत: हम अपने भीतर इस तनाव को चिंता, डर और हताशा के रूप में महसूस करने लगते हैं।

निश्चित मात्रा में तनाव बहुत सामान्य है। इसे हम ऑब्जेक्टिव स्ट्रेस कह सकते हैं। यह तनाव चुनौतीपूर्ण स्थितियों में होता है। जैसे कि बहुत ही थोड़े समय में आपको बहुत सारा काम पूरा करना है। यद्यपि हम कार्यकुशल हो सकते हैं, कार्य के कारण हमारा शेड्यूल अति व्यस्त है तो हम तनाव महसूस करते ही हैं।

इस तरह की स्थितियों में हमें शांत रहने की जरूरत है। हमें तय समय में काम को अच्छे से पूरा करने के रास्ते तलाशना ही होते हैं। इसे समय प्रबंधन भी कहा जाता है। अगर मुझे बहुत थोड़े समय में दस पत्र लिखना होंगे तो मैं हर पत्र में कुछ ही लाइनें लिख पाऊंगा।

ऑब्जेक्टिव स्ट्रेस से मुक्ति का एक तरीका है खुद को अधिक अनुशासित और व्यवस्थित करना। सुबह जल्दी उठने का अनुशासन हमारे जीवन को सहज बनाने में मदद करता है। अक्सर काम में जब हम जल्दी में होते हैं, हम हड़बड़ी में चीजें करने लगते हैं और ऐसे में ही अक्सर गलतियां कर बैठते हैं लेकिन योजना और अनुशासन के साथ हम तनाव से मुक्ति की स्थिति बना सकते हैं और उसमें ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।

अगर हम सब्जेक्टिव स्ट्रेस की बात करें तो इस दुनिया में केवल स्थितियां होती हैं और तनाव और दबाव जैसा कुछ नहीं होता। जो तनाव हम महसूस करते हैं वह बाह्य परिस्थितियों के कारण नहीं होता बल्कि उस स्थिति में हम कैसा बर्ताव करते हैं उस कारण होता है। इस तरह का तनाव हमारी आंतरिक बनावट के कारण होता है।

बाह्य स्थिति नहीं हमारी आंतरिक बनावट या संरचना ही हमारे लिए समस्या बन जाती है?

चिंता और व्यग्रता इससे पैदा होती है कि हम किसी खास परिस्थिति का कुशलता के साथ मुकाबला नहीं कर पाते हैं। यह तनाव का एक प्रकार होता है जो हम अमूमन महसूस करते हैं और हम इससे मुक्ति के लिए कई तरह से प्रयास करते हैं। जैसे कि जब हमारी तैयारी नहीं होती है तो हम चिंतित हो जाते हैं और तनाव में आ जाते हैं लेकिन अगर किसी विद्यार्थी ने अच्छे से पढ़ाई की है तो परीक्षा उसके लिए चिंता की बात नहीं है।

अगर कोई विद्यार्थी अच्छी तैयारी के बावजूद परीक्षा कक्ष में भी चिंता में है तो उसका अर्थ है कि उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या उसके माता-पिता की उससे अपेक्षा बहुत ज्यादा है। इसलिए अपेक्षा, महत्वाकांक्षा, इच्छा एक प्रेरक या आगे ले जाने वाली शक्ति के बजाय हमें सफलता से दूर ले जानी वाली चीजें साबित होती हैं। अपेक्षा की वजह से ही तनाव पैदा होता है।

इच्छा और महत्वाकांक्षा हमें कार्य के लिए प्रेरित करती हैं लेकिन अगर वे बड़ी हों तो वे हमारे माथे पर पसीना ला देती हैं वे फिर प्रेरक नहीं रह जातीं। फिर वे हम पर हावी होने लगती हैं। व्यावसायिक असुरक्षा, भावनात्मक असुरक्षा, तनावपूर्ण संबंध या किसी भी तरह की असुरक्षा तनाव पैदा करती है।

हर समय एक भय लगा रहता है। इस दुनिया के बारे में एक ही बात निश्चित है कि यहां सबकुछ अनिश्चित है। इस तथ्य को स्वीकार करना कि कुछ भी निश्चित नहीं है, हमें बड़ी राहत मिलती है। हम इसी तरह सहज हो सकते हैं कि इस दुनिया में सबकुछ बदलता रहता है और हमें अपनी तरह से प्रयास करने के बाद शांत रहना चाहिए।

सब्जेक्टिव स्ट्रेस से मुक्ति का तरीका यह है कि हमें आस्था रखना चाहिए। चाहे इसे आस्था कहिए या भरोसा या विश्वास। यह उसी तरह है कि जब हम प्लेन में सफर करते हैं तो हम आराम से सोते हैं और पायलट के भरोसे सबकुछ छोड़ देते हैं। उसकी कुशलता पर निर्भर रहते हैं और बहुत चिंतित नहीं होते।

इसी तरह हमें अपने जीवन में भी निश्चिंत होना चाहिए। इसी तरह हमें दुनिया को चलाने वाली शक्तियों पर आस्था रखना चाहिए। मन में अगर शांति रहेगी तो हम ज्यादा बेहतर काम कर पाएंगे।

Tuesday, 11 March 2014

Life wont get chocked in planning only

जब प्रेम होगा तो अपने-आप होगा, आपकी योजना के अनुसार नहीं। यह आपकी योजना का हिस्सा हो ही नहीं सकता क्योंकि योजना तो सिर्फ आपकी पिछली जानकारियों और अनुभवों से ही बनती है। अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के अनुसार ही चलती रहे तो कभी कोई नई चीज आपके जीवन को छू भी नहीं पाएगी।

दरअसल योजना वह चीज है जो आपके मन में होती है। पर करते आप वह हैं जो आपके हाथ में होता है। आप कितना समय योजना बनाने में लगाते हैं और कितना काम करने में यह हर व्यक्ति को अपने जीवन के अनुसार, अपने काम-काज अनुसार तय करना होता है।

अगर आप योजना आयोग में काम करते हैं तो आप केवल योजना ही बनाते रहते हैं क्योंकि वही आपका काम है। योजना को अमल में लाना किसी और का काम है। आपका काम चाहे जिस भी तरह का हो जीवन की प्रकृति ही ऐसी है कि आप बस इस वक्त में ही कुछ तय कर सकते हैं।

इस वक्त खाना खा सकते हैं, अभी सांस ले सकते हैं, इसी वक्त जी सकते हैं। योजना भी आप अभी बना सकते हैं। आप कल के बारे में योजना तो बना सकते हैं, लेकिन सबकुछ तय नहीं कर सकते। योजना महज एक विचार है। हम जो अब तक जानते हैं उसी के आधार पर आगे की योजना बनाते हैं।

यानी एक तरह से हमारी योजना हमारे अतीत का ही एक सुधरा हुआ रूप है। योजना तो अतीत के एक टुकड़े को ले कर उसे सजाने-धजाने जैसा काम है। यह जीने का सही तरीका नहीं है। हां, हमें योजना की जरूरत है लेकिन अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के मुताबिक ही चलती रहे तो इसका मतलब है कि आप एक बेचारगी वाला जीवन जी रहे हैं। आपके जीवन में कुछ ऐसा होना चाहिए जिसकी आपने कभी कल्पना भी न की हो।

जीवन की संभावना इतनी अपार है कि कोई भी उस हद तक योजना नहीं बना सकता। इसलिए योजना को एक सहारे की तरह रखिए और जीवन को घटित होने दीजिए, जीवन अभी जैसा है उसमें नई संभावनाएं ढूंढिए। पता नहीं कब क्या सामने आ जाए। हो सकता है आपके साथ कुछ ऐसा हो जाए जैसा आज तक किसी के साथ न हुआ हो।

अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के अनुसार ही चलती रहे तो वही बेतुकी चीजें आपके साथ भी होंगी जो आज तक इस दुनिया में होती रही हैं। आपके साथ कभी भी कुछ नया नहीं होगा। अगर आपका जीवन आपकी योजना के अनुसार चलता रहे तो आपको प्रेम नहीं हो पाएगा, आपको आनंद की अनुभूति नहीं होगी, और आत्मज्ञान का तो सवाल ही नहीं है, क्योंकि यह आपकी कल्पना के दायरे में ही नहीं है।

आप अपनी योजना के अनुसार औरों की तरह किसी लड़की या लड़के का हाथ थाम कर पेड़ के चारों ओर चक्कर लगा सकते हैं, गाना गा सकते हैं, लेकिन फिर भी आप नहीं जान पाएंगे कि प्रेम क्या होता है। आप अपनी योजना के अनुसार शादी तो कर सकते हैं लेकिन आप नहीं जान पाएंगे कि प्रेम क्या है।

आप संतान तो पैदा कर सकते हैं, फिर भी आप नहीं समझ पाएंगे कि प्रेम क्या है। जब प्रेम होगा तो अपने-आप होगा, आपकी योजना के अनुसार नहीं। यह आपकी योजना का हिस्सा हो ही नहीं सकता क्योंकि योजना तो सिर्फ आपकी पिछली जानकारियों और अनुभवों से ही बनती है। अगर आपकी जिंदगी आपकी योजना के अनुसार ही चलती रहे तो कभी कोई नई चीज आपके जीवन को छू भी नहीं पाएगी।

इसलिए आपको जानना होगा कि किस हद तक योजना बनाएं। अगर आपके पास किसी तरह की कोई योजना ही नहीं होगी तो आपको यह भी पता नहीं होगा कि कल क्या करना है। इसके लिए एक खास तरह का संतुलन बनाना होगा, एक खास समझदारी से यह तय करना होगा कि किस चीज की योजना बनाएं और किन चीजों को बस अपने आप होने दें। आप किसी महान दूरदर्शिता से अपनी योजना नहीं बनाते।

दरअसल भविष्य की अप्रत्याशित घटना को झेल न पाने के भय के कारण आप योजना बनाते हैं। मनुष्य को बस एक ही तकलीफ है कि उनका जीवन वैसा नहीं चल रहा जैसा उसके विचार से चलना चाहिए। बस इतनी सी बात है कि आपकी कोई बेकार-सी योजना साकार नहीं हो रही, कुछ उससे बहुत बड़ा साकार हो रहा है। आप सुबह-सुबह कॉफी पीना चाहते थे, कॉफी नहीं मिली तो आप दुखी हो गए। लेकिन जो इतना भव्य सूरज निकल रहा है उसे आप नहीं देख रहे हैं।

इस विशाल ब्रह्मांड में, जहां आपके चारों ओर जीवन का नृत्य चल रहा है, आपकी योजना एक निहायत मामूली-सी चीज है। उसको इतनी अहमियत मत दीजिए। हां, आपके पास इतनी योजना होनी चाहिए कि कल सुबह उठ कर क्या करना है, लेकिन कभी यह उम्मीद मत कीजिए कि आपकी योजना के अनुसार ही सब कुछ हो और सबसे खास बात यह कि हमेशा यह सपना देखिए और प्रार्थना कीजिए कि आपका जीवन आपकी योजना, आपकी कल्पना और आपकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा ले कर आए।

याद रखिए कि अगर आपका जीवन आपकी योजना के अनुसार चलता है तो फिर वह एक दुखी जीवन होगा, उसमें कुछ भी आश्चर्य और चकित करने वाला पल नहीं होगा। आश्चर्य के बिना जीवन नीरस है।